श्याम बैरागी ने कभी सपने में नहीं सोचा होगा कि ‘गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल’ वाला गीत यह गीत देश में इतना लोकप्रिय हो गया कि उसे बॉलीवुड में भी जगह मिल गई। सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार हाल ही में रिलीज़ हुई वरुण धवन की फिल्म ‘भेड़िया’ में इस गीत की 32 सेकंड की क्लिप इस्तेमाल की गई है। फिल्म के निर्माता-निर्देशक ने इसके लिए श्याम बैरागी से विशेष अनुमति ली थी। अपने गीत को बॉलीवुड की फिल्म में सुनकर बैरागी आज भी खुशी से भर जाते हैं।
जब-जब मैं भारत आता हूँ, कुछ न कुछ नया देखने को मिल ही जाता है। लंदन में भारत से जुड़ी किसी नई बात के बारे में पढ़ने या टीवी पर देखने से उसे नज़दीक से समझने का अवसर नहीं मिल पाता। लेकिन भारत आकर जब उन्हीं बातों का प्रभाव समाज पर प्रत्यक्ष रूप से देखता हूँ, तो महसूस होता है कि वास्तव में कुछ सकारात्मक हो रहा है।
वर्तमान यात्रा के दौरान फ़रीदाबाद में अपनी माँ के घर ठहरते हुए सुबह-सुबह लाउडस्पीकर पर एक गीत सुनाई दिया- “गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल… गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल…”। स्वाभाविक रूप से हैरानी हुई, लेकिन बाहर निकलकर देखने पर बात स्पष्ट हुई। एक गाड़ी आती है, जो इस गीत के माध्यम से लोगों को यह याद दिलाती है कि वे अपना रोज़मर्रा का कचरा आस-पास न फेंकें, बल्कि उसी गाड़ी में डालें, ताकि इलाके में स्वच्छता बनाए रखना संभव हो सके।
गीत आगे कहता है, “देख–देख–देख तू यहाँ वहाँ न फेंक… / देख–देख–देख तू यहाँ वहाँ न फेंक… / देख फैलेगी बीमारी, होगा सब का बुरा हाल…”
तो दूसरी आवाज़ सवाल करती है, “तो का करें भईया?”
और पहली आवाज़ एक बार फिर शोर मचाते हुए याद दिलाती है, “गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल… / गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल…”
मैं लंबे समय से लंदन में रह रहा हूँ, जहाँ हर सप्ताह एक कचरा उठाने वाली गाड़ी आती है और बिना किसी शोर-शराबे के कचरा ले जाती है। हमारे घरों में री-साइकल होने वाले कचरे और रसोई के गीले कचरे के लिए अलग-अलग बिन होती हैं। हर घर या फ़्लैट की अपनी अलग बिन होती है, और निर्धारित दिन पर इन्हें ख़ाली किया जाता है। री-साइकल कचरा उठाने का दिन अलग तय है, और किचन के गीले कचरे के लिए अलग दिन। इस व्यवस्थापन के कारण दोनों प्रकार के कचरे के आपस में मिल जाने की कोई संभावना ही नहीं रहती।
जब मैंने अपनी बहन से इस बारे में बात की, तो उसने बताया कि ये कचरा उठाने वाले प्रति घर पच्चीस रुपये प्रति माह शुल्क लेते हैं। यह बात पहले-पहल मुझे कुछ आश्चर्यजनक लगी। लेकिन फिर विचार किया कि हम लंदन में भी तो काउंसिल टैक्स देते हैं, और उसी टैक्स में से कचरा उठाने जैसी सेवाओं का खर्च निकाला जाता है।
मुझे एक बात पर थोड़ी हैरानी ज़रूर हुई कि आम भारतीय मज़ाक में कचरा उठाने वालों के बारे में बात करता है। मैंने बहुत से मित्रों और उनकी पत्नियों से बात की, मगर उनके जवाब सुन कर हैरानी होना स्वाभाविक था। वे उन कचरा उठाने वालों के बारे में लगभग उपहास के टोन में बात कर रही थीं। “ओ मोए आंदे ने, शोर मचांदे होए सवेरे-सवेरे!”


गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल।
श्याम बैरागी लिखित इन सात शव्दों ने धीरे धीरे भारत में सफ़ाई लाने के लिए एक जागृति पैदा कर दी है। बहुत बहुत साधुवाद श्याम जी को इन सात शव्दों के लिए और अपको तेजेन्द्र भाई पुरवाई के माध्यम से हम सब को बताने के लिए।
हार्दिक धन्यवाद भाई विजय विक्रान्त जी।
एक जाना माना व्यक्तित्व बन गए हैं,श्याम बैरागी। वर्तमान सरकार का पहले दिन से ही इस मुद्दे पर जोर रहा है।अब ग्यारह बारह वर्ष में कुछ बात बनी है। वस्तुतः ऐसे जनोन्मुखी मुद्दों को एक नए परन्तु सृजनात्मक अंदाज़ ए बयां से लिखना होगा,तभी पाठकों के दिल ओ दिमाग पर एक शाश्वत छाप पड़ेगी।
बड़ी ही सादगी और दिलचस्प अंदाज़ में लिखा संपादकीय ,युवा पाठकों को आकर्षित करेगा।
बहुत शुक्रिया भाई सूर्यकान्त जी।
गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल, इस गीत के रचयिता से आपने परिचित करवाया। साधुवाद। कुछ वर्ष पूर्व लंदन के दौरान सप्ताह में कचरे वाले आते थे। चुपचाप ले जाते थे, लेकिन समस्या थी कि गीले कचरे का बैग रात को निकाल कर रख नहीं सकते थे, लोमड़ियाँ बिखेर जाती थी। सुबह- सुबह उठकर निकालना पड़ता था। यही समस्या यहाँ भी है। कुत्ते या गाय बिखेर देते थे और कचरे वाला कब आकर चला गया पता ही नहीं चलता था, लेकिन गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल दूर से ही गीत की ध्वनि सुनकर बाहर निकल आते हैं।
मोदी जी के स्वच्छता अभियान में श्याम बैरागी जी का बहुत बड़ा योगदान है। वह बधाई के पात्र हैं। शेष फरीदाबाद की स्थिति में कुछ अधिक सुधार नहीं है । ऐसे दृश्य जगह- जगह दिखाई देते हैं। लोगों का जागरूक होना अत्यंत आवश्यक है।आपका सम्पादक प्रेरित करने वाला है।
सुदर्शन जी इस खूबसूरत टिप्पणी के लिये आपको हार्दिक धन्यवाद। आपने लंदन की यादों को इस संपादकीय से जोड़ कर अपनी यादें ताज़ा कर लीं और संपादकीय को नये आयाम दिये।
बहुत सुंदर संपादकीय सर
बहुत शुक्रिया अंजु जी।
वाह वाह!
सादर, स्नेह नमस्कार
बहुत सुंदरता से आपने इस गाने को आम सतह पर लाकर संपादकीय के साथ जोड़कर गाने के साथ न्याय किया है।
स्वच्छ भारत की अलख जगी मोदी जी की सोच से! भारत में स्वछता अभियान में भिन्न विधाओं को भी जोड़ा गया.।’तारक मेहता का उल्टा चश्मा ‘ को भी इस अभियान में सम्मिलित किया गया जिसका आम आदमी पर काफ़ी प्रभाव दिखाई दिया।
आपके खोजी पत्रकार को सलाम है। हममें से भला किसको पता होगा कि घर-घर के दरवाज़े पर यह गीत भोर में पहुंचकर सही जीवन जीने का पाठ पढाएगा?
लगभग डेढ/दो दशक पहले आपके लंदन में मैंने जब शांति से घर के बाहर से गाड़ी में से बिना किसी शोर शराबे के हरी सी जैकेट पहने बंदों को काले प्लास्टिक बैग्स उठाकर ले जाते देखा था, उत्सुकता हुई थी। मैं कई दिनों तक खिड़की में से झाँककर उनको देखती रही थी। कोई शोर-शराबा नहीं। तब कल्पना भी नहीं थी कि हमारे देश में भी कभी ऐसा कुछ देखना मिल सकता है!
हमारे देश में कई कारण हैं जो यह काम चुप्पी से नहीं हो सकता. बाहर निकालकर रखेंगे तो स्ट्रीट डॉग्स या जैसे आपने कचरा दर्शन कराए हैं, वह स्थिति कहीं भी दिखाई दे जाएगी.
दूसरे,जो शिक्षित कहलाने वाला वर्ग है, वह इसका मज़ाक उड़ाए, यह भी कितना बचकाना व्यवहार है
हरेक सोसाइटी के बाहर कचरे के बड़े डिब्बे तो रखे गए लेकिन उसमें ऐसे भागते दौड़ते कचरा फेंककर जाते थे कि आधा कचरा सड़क पर गिरता था। रहा सहा गौ माताएं उसमें मुँह डालकर अपना भोजन तलाश करने के चक्कर में गिरा देती हैं।
यहाँ पर गाना बजना भी बेहद ज़रूरी है वरना जब कचरा वाले घर घर के बाहर आवाज़ देकर चले जाएंगे तब उनसे सुबह सुबह ही झगड़े का शोर कर्णछिद्रों को भेद देगा।
अंततोगत्वा जो हो रहा है, बेहतरी के लिए.
आपको साधुवाद इतने गंभीर विषय पर बात करने व गीत लैखक के बारे में सूचना देने के लिए उनको इसका क्रैडिट मिलना महत्वपूर्ण है।
बहुत बधाई
प्रणव जी आपने संपादकीय को सही कोण से परखा और अपनी सकारात्मक टिप्पणी भेजी। मुझे लगता है कि जब कभी कोई सकारात्मक कदम उठाया जाए, उसकी प्रशंसा होना ज़रूरी है।
जिस तरह बाबा रामदेव जी ने योग का प्रसार किया लोगों को जागरूक किया उसी तरह
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी ने स्वछता अभियान का नारा दिया बिगुल बजाया और देश /प्रदेश के शासन -प्रशासन ने योगदान दिया, युवा सिने कलाकारों, खिलाड़ियों, छात्रों ने भी आगे होकर लोगो को जागरूक किया ।अब स्वछता एक मिशन है भारत का
Dr Prabha mishra
आपने सही कहा आदरणीय!
इस सप्ताह के अपने संपादकीय में आप ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण विषय के संदर्भ में एक गीत की चर्चा की है जो घर के कचरे को कहीं और न फेंक कर नियमित रूप से कचरा उठाने वाली गाड़ी में उसे डालने का आह्वान देता है।
यह खुशी की बात है निवासी जन उस का स्वागत करते हैं। और इस का प्रचलन हमारे भारत के कई शहरों में हो शुरू हो गया है।
धन्यवाद व शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
आपकी स्नेहपूर्ण टिप्पणी के लिए दिल से शुक्रिया दीपक जी।
इस गीत का ट्यून भी बहुत प्रभावशाली है। गीत के लेखक कि जानकारी मिली, ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए हार्दिक आभार।
धन्यवाद मंजुला जी।
नमस्कार सर….
यह बहुत ही सुंदर संपादकीय रहा हर बार की तरह… एक ऐसे विषय पर आपने लिखा जिसको वास्तविक रूपसे कोई मूल्य नहीं दिया जाता है..इस गीत के सृजनकार से मिलवाकर एक नयापन दिया है इस लेख को…
चाहे गीत लिखा जाए मिशन बढ़ाया जाए… जो भी हो जाए, जबतक हम स्वयं सफाई का ध्यान नहीं रखेंगे तबतक कुछ नहीं ठीक होगा. इसलिए तो गीत सुनने के बाद भी चारों ओर कचरे दिखते है…
धन्यवाद सर..
आदरणीय अनिमा जी, इस सकारात्मक एवं सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
हमेशा की तरह बेहतरीन संपादकीय हार्दिक शुभकामनाएं
धन्यवाद संगीता।
इस बार का संपादकीय भारत के स्वच्छता अभियान पर केंद्रित है। श्याम बैरागी द्वारा रचित ‘गीत गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल’ अपने पूरे रौ के साथ संपादकीय में विचरण करता है। यह गीत स्वच्छता अभियान का ‘सिग्नेचर ट्यून’बन चुका है।
एक साहित्यकार/पत्रकार को विषय ढूंढना नहीं पड़ता है। विषय तो यूं ही राह चलते मिल जाते हैं। कैसे व्यक्त करना है, ये कला आनी चाहिए।
फरीदाबाद यात्रा के दौरान सुबह-सुबह इस गीत को आपने सुना। गीत के शब्द और ध्वनि ने स्वच्छता अभियान का पूरा खाका तैयार कर दिया। इस अभियान पर आपकी ये यात्रा सफल कही जा सकती है। कुछ लेकर जाना बुरा नहीं है, ये तो हमारी संस्कृति का अंग है। विदा के समय उपहार देने की परंपरा चली आ रही है। संपादकीय के विषय को उपहार ही समझना चाहिए। इसलिए यह यात्रा अभियान एक दस्तावेज बन गया है।
साहित्यकार को एक अकेली रचना कहां से कहां पहुंचा दे कहा नहीं जा सकता है। बहुत से लोग जीवन भर कागज काले करते रहते हैं पर शीर्ष तक नहीं पहुंच पाते हैं। अपने क्षेत्र विशेष तक सीमित होकर रह जाते हैं। ‘गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल’ गीत ने श्याम बैरागी को प्रसिद्धि के ऊपरी पायदान तक पहुंचा दिया है। सही कहा गया है कि रचना अपने लेखक का चुनाव खुद करती है। इस रचना ने श्याम बैरागी का चुनाव किया।
आपने फरीदाबाद में स्वच्छता की स्थिति देखी। कचरे के ढेर में गौमाता भोजन ढूंढ रही है। यह स्थिति हर कस्बे/ शहर की है। घर का कचरा निकलकर एक स्थान पर इकट्ठा कर दिया जाता है। रिसाइक्लिंग की व्यवस्था कम है। कचरे के ढेर को जानवर थुथरयाते रहते हैं जिससे बदबू फैलती रहती है। फिर भी पहले से स्थिति ज्यादा अच्छी है।
आपने ये सही कहा है कि कुछ भारतीय कचरा उठाने वाले का उपहास करते हैं। लोग उसके काम को निम्न स्तर का मानते हैं। वे नहीं समझते हैं कि सफाई मानव जीवन में कितनी महत्वपूर्ण है।
यहां तो ये बात पैठ बना चुकी है कि गंदगी छू गई तो नहाना जरूरी है। गंदगी को देखकर मुंह बनाना हमें खूब आता है, हमें पिच्च से थूकना भी आता है पर गंदगी उठाने वाले के प्रति सम्मान व्यक्त करना नहीं आ पाया। हम तो उसे हिकारत से देखने के आदी हो चुके हैं। ऐसा आज भी प्रचलन में है।
गंभीर विषय को कुछ लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं। उसको हल्का करने में अपनी भरपूर ऊर्जा खर्च करते हैं। इसके बावजूद स्वच्छता अभियान सफलता की ओर अग्रसर है। कई शहर स्वच्छता में अब्बल आ चुके हैं।
संपादकीय मौलिक तो है ही, साथ में ये संदेश देना नहीं भूलता है कि हम अभी मिशन पर हैं। मिशन पूरा हो जाएगा तभी हम स्वच्छ भारत के सपने को पूरा कर पाएंगे।
श्याम बैरागी के बारे में जानना काफी दिलचस्प रहा।
मौलिक एवं शोधपरक संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई सर
भाई लखन लाल पाल जी, आपकी टिप्पणी हमेशा संपादकीय के तमाम कोणों को परख कर लिखी जाती है। (एक दो कोण मुझे भी आपकी टिप्पणी पढ़ने के बाद समझ में आते हैं।) आपने वर्तमान संपादकीय को भी पाठकों के लिए समझने की कुंजी प्रस्तुत कर दी है। हार्दिक आभार।
मान गए इस बात को कि विषय तो हमारे आसपास बिखरे रहते हैं केवल एक लेखक की नजर चाहिए उसे देखने के लिए। इस बार का यह संपादकीय इसी उक्ति को साबित करता है।
हम अलाहाबाद में रहते थे, रोज सवेरे गाड़ी आती थी, गेट की घंटी बजती थी और हम कूड़ा पकड़ाते थे। गाना दूर से ही लाउडस्पीकर पर बजता सुनाई दे जाता। ट्यून इतनी कैची कि गाड़ी जाने के बाद हम लोग गुनगुनाते रहते। ऐसा जुबान पर चढ़ा यह गीत कि ठसक के साथ दिमाग में पैठ गया। आपने याद दिलाया तो फिर याद आया।
आप विषय को पूरा उलट पलट कर, 360० एंगल से घुमा कर फिर प्रस्तुत करते हैं। मजा आया यह संपादकीय पढ़कर।
सरस, आपने बिल्कुल ठीक कहा कि विषय हमारे आसपास बिखरे रहते हैं, बस उस नज़र की ज़रूरत है जो उन्हें पहचान ले। संपादकीय ने आपको नॉस्टेल्जिक बना दिया, यह पुरवाई की सफलता कही जा सकती है। हार्दिक आभार।
गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल – संपादकीय के माध्यम से आपने उसके रचयिता श्याम बैरागी के बारे में बताया है जो आपके पाठकों के लिए नया है कि श्याम बैरागी ने इस गीत की रचना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के स्वच्छता अभियान से प्रेरित होकर की तथा इस गीत को बॉलीवुड की फ़िल्म भेड़िया में भी स्थान मिल चुका है।
यह सच है कि स्वच्छता अभियान को मोदी जी के शासनकाल में गति मिली और कहीं तो पता नहीं किन्तु लखनऊ के गोमतीनगर एरिया में 1995 से ही कचरा उठाने की गाड़ी आती रही है तथा सभी निवासी उसका स्वयं पेमेंट करते थे। बाद में पेमेंट सोसाइटी द्वारा किया जाने लगा। योगी जी ने कचरे के लिए हरी गाड़ी की व्यवस्था की जिसमें गीले और सूखे कचरे को अलग-अलग रखने की व्यवस्था थी। माइक द्वारा कुछ तो बजता था, जो आज याद नहीं, शायद यही गाना होगा।
बेंगलुरु में भी जहाँ मैं रहती हूँ। गीला और सूखा कचरा रखने की अलग व्यवस्था है। अब तो ऐसी कचरे की बास्केट भी आने लगी हैं जिसमें दो कम्पार्टमेंट गीला और सूखा कचरा रखने के लिए होते हैं। भारत बदल रहा है लेकिन कभी-कभी कहीं कचरे के ढेर भी दिख जाते हैं जो या नागरिकों या कचरा ले जाने वाली गाड़ियों की कुव्यवस्था का परिणाम है।
कहते हैं लेखक की पैनी दृष्टि से कुछ नहीं बचता। आपका संपादकीय भी इसी बात का द्योतक है।
साधुवाद आपका।
सुधा जी आपने गहराई से संपादकीय की पड़ताल की है। आपने लखनऊ और बेंगलूरु के बारे में जानकारी देकर संपादकीय को और अधिक गहराई प्रदान कर दी है। हार्दिक धन्यवाद।
नमस्कार संपादक जी । सचमुच आप की कलम पारस-मणि है, लोहे को छू जाए तो सोना बना देती है। धन्य हैं आप।
कहते हैं घूरे के भी दिन बदलते हैं। परंतु आज तो कचरे के भी भाग्य खुल गए । कचरे का निपटान भी मधुर संगीत के साथ किया जाता है। सचमुच दिन बदल गए!
स्कूल दिनों में एक पाठ था घूरे से सोना बनाओ। वह कचरे से खाद बनाने के संबंध में था। अब घूरे से नहीं, बल्कि घूरे को हटाकर सोना बनाया जा रहा है । हमारा स्वास्थ्य भी तो सोना ही है न।… और अच्छे स्वास्थ्य का पहला कदम सफाई है।
श्याम बैरागी का गाना प्रसिद्ध हुआ, वे जिला स्तर से उठकर राष्ट्रीय स्तर पर पहुंच गए, गाने ने उनकी जीवन धारा ही बदल दी, इसके लिए वे धन्यवाद पात्र हैं । इसके अलावा हमारी (वर्तमान) सरकार भी उतनी ही सम्मान की पात्र है। ये इस बात का सबूत है कि हमारी सरकार नागरिकों के स्वास्थ्य को लेकर पूर्णतया जागरूक है।
मुझे याद है बहुत साल पहले मैं जयपुर गई थी किसी काम से। एक परिचित परिवार ने खाने पर बुलाया। उनका रसोईघर मकान की पहली मंजिल पर था और रसोईघर से लगी हूई बालकनी थी। जैसे ही बालकनी का दरवाजा खोला सड़क पर कचरे का ढेर दिखाई दिया । उन दिनों ये सरकार नहीं थी। कचरे में ऐसी-ऐसी चीजें दिखाई दे रही थी कि खाना खाना मुहाल हो रहा था। किसी तरह 2-4 निवाले खाए और मैं नीचे आ गई। बातों-बातों मैंने उनसे कहा भी नगरपालिका को कहकर ये कचरा हटवा दो न। उन्होंने बड़ी उदासीनता से कहा, हम तो कितनी बार दरखास्त दे चुके हैं वे लोग कुछ करते ही नहीं है।
सबसे अधिक धन्यवाद मैं संपादक जी को देना चाहूँगी, कि उन्होंने भारत यात्रा के दौरान भारत की सूक्ष्म चीजों को भी गहराई से देखा और उसे अति प्रतिष्ठित पत्रिका “पुरवाई” में स्थान दिया ।
दुःख इस बात का है कि अभी भी जनता में जागरूकता की कमी है, अभी भी बहुत जगह कचरे के ढेर दिखाई देते है। इसका भयंकर दृश्य संपादकीय में चित्र में दिखाया गया है ।
धन्यवाद संपादक जी। हम चाहते हैं आपके इस आलेख से लोग कुछ जागृत हों और… गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल… सुनकर कचरा लेकर वैसे ही बाहर भागें जैसे बचपन में आइसक्रीम वाला आया सुनकर भागते थे।
सादर
उषा
उषा जी आपने खुले दिल से संपादकीय पर स्नेह की बारिश की है। इससे पुरवाई टीम का उत्साह वर्धन होता है। आप हमेशा पुरवाई संपादकीय पर सार्थक एवं सारगर्भित टिप्पणी भेजती हैं। हार्दिक धन्यवाद।
दरअसल भारत में यश, अपयश, लाभ हानि, जीवन मरण, सुख दुख, उत्सव, हर वक्त के लिए संगीत बजता है, और हम भारतीय हृदय से आत्मसात भी करते हैं, यही वजह है कि कचरा निकालने के लिए भी म्यूजिक बनाया गया, ताकि लोगों को अलार्म की तरह अलर्ट करें और वह घर के कचरे को उचित स्थान पर जमा कर सकें, मगर हाय रे भारत की किस्मत यहां के कुछ इंसान तो,
हाथन पावन के कायले
मो में मूछें जाय,वाले ठहरे,
भारत में क्या नहीं है कानून है, कायदे हैं, नियम हैं सभी विदेश की तरह उपयोगी भी हैं, मगर उनका अनुपालन नहीं है
यह वे लोग हैं,जो
डंडा के खबईया
बातन से का माने रे?
आदरणीय प्रिय तेजेंद्र सर आप इतनी सुंदर उपयोगी प्रेरणास्पद संपादकीय लिखते हो,
भारतीय मानवों को जगाने के लिए बताते हो कि विश्व में देखो क्या हो रहा है, और हम कहां हैं कहां है हमारी नैतिक शिक्षा, प्यारे भारतवासियों जागो, मगर मजाल है,
यहां पर कानून के पालन के लिए जब तक कड़ा प्रावधान न होगा कड़ी सजा न होगी
तब तक स्वच्छता अभियान पूर्णतया सफल नहीं हो सकेंगे,
लातन के भूत बातन से मनवे वारे नईया।
बेहतरीन संपादकीय सर❤️
कुंती जी, आपने लिखा है कि, “भारत में क्या नहीं है कानून है, कायदे हैं, नियम हैं सभी विदेश की तरह उपयोगी भी हैं, मगर उनका अनुपालन नहीं है।” बस यही समस्या है… लातों के भूत बातों से नहीं मानते… यह तो आपने स्वयं कहा है। कुछ करना ही होगा… संपादकीय को पसंद करने के लिये तो शुक्रिया है जी…
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
इस संपादकीय को देखकर यह महसूस हुआ कि संपादक की तीखी नजर से कुछ भी नहीं बचता! यह विषय महत्वपूर्ण और प्रयास सराहनीय तो है पर गाने पर ध्यान जाएगा यह अकल्पनीय था।
इस संपादकीय को पढ़ते हुए अनायास ही हमारे चेहरे पर एक मुस्कान आ गई।
हमारे यहाँ यह गाना नहीं बजता, हमारे यहाँ तो स्वच्छता अभियान वाला गाना बजता है।
आवाज शायद कैलाश खैर की है-
*स्वच्छ भारत का इरादा कर लिया हमने*
*देश से अपने ये वादा कर लिया हमने।*
जब यह अभियान शुरू हुआ था तब हमारे शहर में दो रंग के दो डस्टबिन हर घर में दिए गए थे, एक में सूखा और एक में गीला कचरा रखना था,लेकिन लोगों ने इसका पालन नहीं किया और न ही नगर पालिका वालों ने इस पर कोई तवज्जो दी।
बाद में लोगों ने वह डस्टबिन अपने उपयोग में रख लिये और कचरा अपने हिसाब-किताब से एकमएक करके डालते रहे।
दिक्कत यह थी कि गाड़ी 9:00 के आसपास आती थी और नहाना धोना सुबह से हो जाता था।नहाने के बाद कचरा गाड़ी के पास जाने की कोई इच्छा नहीं करता था। पर फिर भी उसका उपयोग किया।
यहाँ कचरा गाड़ी वाले को कोई पैसे देने नहीं पड़ते हैं। यह काम नगर पालिका की तरफ से होता है। उसके बाद भी कहीं ना कहीं घूड़े का ढेर दिखाई दे जाता है। और उसके आसपास जानवर भी दिख जाते हैं।
व्यक्ति अपने घर की सफाई कर लेता है। मोहल्ले की और अपने आसपास की सफाई से उसका कोई लेना देना नहीं होता न उसे उससे कोई मतलब होता है।
पर फिर भी लोग कचरा गाड़ी का इस्तेमाल एक बार तो करते हैं।
समझदार लोग कचरा गाड़ी का ही उपयोग करते हैं।
भारत में लोग इतने अधिक स्वावलंबी नहीं है कि अपने सारे काम स्वयं करें। बर्तन ,झाड़ू पोछा के लिए कोशिश करते हैं कि सहयोगी मिल जाए।
वैसे नगर पालिका भी शायद यह मजबूरी में कर रही होगी क्योंकि मोदी जी का आदेश है।
वरना नगर पालिका की लापरवाही से जनता बहुत परेशान होती ही रही है और अभी भी हो रही है।
इस दृष्टि से इंदौर शहर एक नंबर पर है और एक लंबे समय से एक नंबर पर ही रहा है।
अगर किसी ने सूखा और गीला कचरा मिला दिया तो उनके साथ चलने वाला एक सहकर्मी उनके हाथ से ही उसे निकलवाते हैं जो डालता है।वहाँ काफी सख्ती है।सड़कों पर ढोर भी दिखाई नहीं देते।
गलियों में कुत्ते जरूर दिखाई देते हैं मेन रोड का नहीं पता।
सड़कों पर पान वगैरह थूकना भी मना है। गाड़ी वाले पान तंबाखू वाले अपनी व्यवस्था से चलते हैं।
किसी दुकान के आसपास कोई गंदगी आप नहीं फैला सकते और न ही कोई दुकान वाला आपको ऐसा करने देगा।
12:00 बजे रात को सारी सड़कें सिर्फ झड़ती ही नहीं धुलती भी हैं।
“कचरा निकाल” वाला गाना हमने सबसे पहले रायपुर में सुना था। और हँसी तब भी आई थी। अच्छा भी लगा।
यह गाना इस दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है कि अनपढ़ ,गरीब या आदिवासी लोग सहज भाषा को सरलता से समझ पाते हैं। “गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल” वाली बात सहजता से समझ में आ जाती है कि आपको कचरा निकाल कर गाड़ी में डालना है।
हर जगह पैसे देने वाली बात नहीं है।
रायपुर हमारा मायका है वहाँ रहते हुए हमने यह देखा कि नगर पालिका,नगर पंचायत कचरे से ,सब्जी के कचरे से और फल के छिलकों से खाद बनाने के लिए भी घरों घर प्रेरित करती है। स्वयं भी जैविक खाद बनाकर बेचती है। सुविधायें उपलब्ध भी कराती है।
स्वच्छ भारत अभियान के तहत सरकार का यह एक बेहतरीन प्रयास है।
इंदौर को अगर छोड़ दें तो बाकी जगह आपको घूड़े के ढेर और उसके आसपास पालतू पशु नजर आ जाएँगे, यह दुखद तो है।
जहाँ तक लंदन की बात है, तो लंदन तो फिर लंदन ही है। आपको पढ़ते हुए काफी कुछ जान गए हैं लंदन के बारे में।
श्याम बैरागी जी निश्चित रूप से इस गाने के लिये बधाई के पात्र हैं।
आदरणीय नीलिमा जी, आपने पूरे विस्तार के साथ संपादकीय के विषय को खंगाला है। इतनी लंबी और सार्थक टिप्पणी हर पाठक नहीं लिख सकता। आप पुरवाई की पाठक नंबर 1 हैं।
आपकी संपादकीय से इस गीत के रचनाकार का नाम जानना सुखद रहा बाकी दिल्ली में इसके लिए कोई चार्ज नहीं लगता हालांकि फिर भी गंदगी की बात तकलीफ देह है पर समस्या ये है कि हमारे देश में सिविक सेंस नहीं है, क्या कीजिएगा
आलोक भाई, सही कहा आपने। धन्यवाद।
तेजेन्द्र शर्मा जी, आपका यह संपादकीय “गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल!” केवल एक संस्मरण नहीं, बल्कि आधुनिक भारत के बदलते सामाजिक व्यवहार और व्यवस्था के बीच के अंतर्विरोधों का एक जीवंत दस्तावेज़ है। आपने जिस सूक्ष्मता से लंदन की खामोश स्वच्छता व्यवस्था और भारत के ‘संगीतमय’ स्वच्छता अभियान की तुलना की है, वह पाठकों को एक साथ सोचने और मुस्कुराने पर मजबूर कर देती है। एक प्रवासी भारतीय की दृष्टि से जब आप भारत के इन सकारात्मक बदलावों को देखते हैं, तो उसमें एक तरफ खुशी झलकती है और दूसरी तरफ व्यवस्था की कमियों को लेकर गहरी चिंता भी।
लेख का सबसे प्रभावशाली हिस्सा वह है जहाँ आप इस राष्ट्रव्यापी गीत के रचयिता, मंडला (मध्य प्रदेश) के शिक्षक श्याम बैरागी को खोज निकालते हैं। यह जानकर सुखद आश्चर्य होता है कि 2016 में नगरपालिका के निर्देश पर लिखा गया एक गीत आज स्वच्छता मिशन की वैश्विक पहचान बन चुका है। वरुण धवन की फिल्म ‘भेड़िया’ जैसी बॉलीवुड फिल्मों में इस गीत की 32 सेकंड की क्लिप का इस्तेमाल होना इस बात का प्रमाण है कि यह धुन आज जन-मन की धड़कन बन चुकी है। श्याम बैरागी का यह गीत—”गाड़ी वाला आया घर से कचरा निकाल… देख-देख-देख तू यहाँ वहाँ न फेंक”—आज केवल एक धुन नहीं, बल्कि करोड़ों भारतीयों की सुबह का ‘अलार्म’ बन गया है। यह वाकई प्रेरणादायक है कि कैसे एक शिक्षक की कलम ने प्रधानमंत्री मोदी के ‘स्वच्छ भारत’ के आह्वान को संगीत के जरिए गली-गली तक पहुँचा दिया।
आपने बहुत ही बेबाकी से समाज के उस वर्ग पर प्रहार किया है जो इस सेवा को उपहास की दृष्टि से देखता है। “ओ मोए आंदे ने, शोर मचांदे होए सवेरे-सवेरे” जैसे जुमले दरअसल हमारी उस सामंती मानसिकता को दर्शाते हैं जहाँ हम सफ़ाई की उम्मीद तो करते हैं, लेकिन सफ़ाई करने वालों को वह सम्मान नहीं दे पाते जिसके वे हकदार हैं। लंदन के ‘काउंसिल टैक्स’ और भारत के ‘पच्चीस रुपये प्रति माह’ के शुल्क की तुलना यह स्पष्ट करती है कि स्वच्छता मुफ़्त की सेवा नहीं, बल्कि एक नागरिक उत्तरदायित्व है। यह समझना ज़रूरी है कि जब हम सेवा का मूल्य चुकाते हैं, तो वह हमारी भागीदारी को भी सुनिश्चित करता है।
संपादकीय में फ़रीदाबाद के सेक्टर 18 और अंबेडकर उद्यान के सामने फैले कचरे और उसमें भोजन ढूँढते मवेशियों (गौ माता) का ज़िक्र एक कड़वी हकीकत को बयां करता है। यह देखना वाकई कष्टदायक है कि एक तरफ जहाँ ‘स्वच्छ भारत अभियान’ एक राष्ट्रीय क्रांति है, वहीं ज़मीनी स्तर पर हम भारतीय आज भी इस प्रवृत्ति से ग्रसित हैं कि “बदलाव तो आए, लेकिन उसे लागू कोई और करे”। गाय को माता कहना और फिर उसी को प्लास्टिक व कचरे के ढेर में मुँह मारने के लिए विवश छोड़ देना हमारी आस्था और व्यवहार के बीच के विरोधाभास को उजागर करता है।
लेख के अंत में श्याम बैरागी के उन छंदों का उल्लेख करना—”सब्जी के छिलके में, कतरन जो फल के हैं… घर पे पड़ी धूल डस्ट, हमको देता भारी कष्ट… पूजन के बाद बची राख फूल पाती”—यह याद दिलाता है कि स्वच्छता केवल कचरा फेंकना नहीं, बल्कि कचरे का सही प्रबंधन (Waste Management) है। आपकी यह चिंता जायज है कि जब तक आम जनता और सफ़ाई कर्मचारी इस गीत के सार को गंभीरता से नहीं लेंगे, तब तक गलियों में कचरे और बीमारी का यह चक्र—”देख फैलेगी बीमारी, होगा सब का बुरा हाल”—टूट नहीं पाएगा।
यह संपादकीय एक ओर श्याम बैरागी जैसे गुमनाम नायकों को श्रेय देता है, तो दूसरी ओर हमें आईना भी दिखाता है। एक साहित्यिक पत्रिका के संपादक के तौर पर बिहार चुनाव जैसे राजनीतिक विषयों पर संयम बरतते हुए ‘स्वच्छता’ जैसे बुनियादी मानवीय मुद्दे पर ध्यान केंद्रित करना आपकी परिपक्वता और सामाजिक सरोकारों को दर्शाता है। आपकी यह ‘आँखों देखी’ रिपोर्टिंग हमें यह सोचने पर विवश करती है कि क्या हम वाकई उस दिन का इंतज़ार कर रहे हैं जब कचरा उठाने वाली गाड़ियाँ लंदन की तरह बिना शोर मचाए आएँगी, या हम अभी भी उसी आवाज़ के इंतज़ार में रहेंगे—”गाड़ी वाला आया, घर से कचरा निकाल!”