रिपोर्ट प्रस्तुत – किरण खन्ना
परम्परा और प्रगति एक दूसरे पर आश्रित हैं। परम्परा का मूल्यांकन व निर्वहन किए बिना प्रगति सम्भव नहीं है। हिन्दी साहित्य के इतिहास के विभिन्न कालों-आन्दोलनों में परम्परा और प्रगति के इसी अन्योन्याश्रय सम्बन्ध को विभिन्न आलोचकों और साहित्येतिहासकारों की दृष्टि से समझने-समझाने का प्रयास इस संगोष्ठी का ध्येय है जिसके आयोजन के निमित्त यह पुस्तक अपने स्वरूप में आयी l
निसंदेह साहित्य के इतिहासकार का दायित्व परम्परा और प्रगति के आपसी सम्बन्ध की पहचान करना है। साहित्य का इतिहास किसी एक परम्परा की निरन्तरता का इतिहास नहीं होता।परम्परा के विकास में बराबर निरन्तरता ही नहीं होती, कई बार अन्तराल की स्थितियाँ भी आती हैं और परम्पराओं की विकास की प्रक्रिया में सामंजस्य के अतिरिक्त अन्तर्विरोध भी होते हैं। साहित्य के इतिहास में परम्पराओं के विकास पर विचार करते समय निरन्तरता और अन्तराल तथा सामंजस्य और संघर्ष के द्वन्द्वात्मक सम्बन्ध की पहचान आवश्यक है। परम्परा की सार्थकता वर्तमान रचनाशीलता को गति देने में होती है l परम्परा का मूल्यांकन वर्तमान रचनाशीलता के सन्दर्भ में होना चाहिए, समकालीन रचनाशीलता के ऊपर परम्परा को प्रतिष्ठित करने के लिए नहीं।
किसी भी समाज का साहित्य वहाँ के जन साधारण की चित्तवृत्ति का सार्थक प्रतिबिम्ब होता है, और यह भी उल्लेखनीय है कि जनमानस की चित्तवृत्ति के परिवर्तन के साथ-साथ साहित्य के स्वरूप में भी परिवर्तन होता चला जाता है। आदि से अन्त तक इन्हीं चित्तवृत्तियों की परम्परा को परखते हुए साहित्य सृजन में परम्परा और आधुनिकता के साथ इस सृजन का सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है। यहां एक तथ्य उभरता है कि ‘जनता की चित्तवृत्ति’ साहित्य में परिवर्तन के लिए आवश्यक है और यहाँ ‘परिवर्तन’ प्रगति का सूचक है और प्रगति ‘जनता की चित्तवृत्तियों’ की परम्परा के साथ-साथ साहित्य की अपनी परम्पराओं के सामंजस्य का परिणाम। आचार्य रामचंद्र शुक्ल जी सही अर्थों में हिन्दी साहित्य के पहले इतिहासकार थे जिन्होंने ‘परम्परा’ और ‘प्रगति’ के आपसी सम्बन्ध से साहित्य के साथ-साथ समाज के परिवर्तन की रूपरेखा प्रस्तुत की। इसी प्रक्रिया में उन्होंने न सिर्फ साहित्य और समाज के आपसी सम्बन्धों की पड़ताल की बल्कि साहित्यिक परम्पराओं के उद्भव, विकास, पतन, उनके आपसी संघर्ष और इन सबके बावजूद परम्पराओं की निरन्तरता का भी लेखा जोखा प्रस्तुत किया। परम्पराओं की बहुवचनात्मकता की खोज और उनके आपसी सामंजस्य से विकसित साहित्यिक निरन्तरताओं की भी पड़ताल की।
आज शिक्षण, विज्ञान, तकनीकी, वाणिज्य, कहने का तात्पर्य है कि किसी भी राष्ट्र की सांगोपांग प्रगति के लिए अनिवार्य प्रत्येक ज्ञानानुशासन भारतीय ज्ञान परम्परा का ही एक विकसित होता हुआ प्रारूप है जो राष्ट्र के भविष्य की रचनात्मकता को आधार प्रदान करता है l यह आधारभूत रूप से किसी समय और समाज में मौजूद जीवन्त रहीं आस्था,संस्कृति ,चिंतन और परम्परा को क्षरणशील होने नहीं देता । ऐसी परम्पराएँ ऐतिहासिक विकास में, एक युग से दूसरे में संक्रमण के समय मौजूद जरूर रहती है, पर उनका नष्ट होना अवश्यम्भावी है किन्तु समाज के बुध्दिजीवी वर्ग द्वारा अपने सृजन के माध्यम से इसे संरक्षण दिया जाता है l
भारतीय ज्ञान परम्परा शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार द्वारा 1918 में आरम्भ एक उपक्रम है जिसका अभीष्ट भारत की गरिमामय संस्कृति और ज्ञान के साथ युवा वर्ग को जोड़ना और भारत को फिर से विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना है l डीएवी कॉलेज अमृतसर के स्नातकोत्तर हिन्दी विभाग द्वारा हिंदी और हिन्दीतर साहित्य में भारतीय ज्ञान परम्परा विवेचन : विविध विमर्श विषय पर एक दिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया l केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा उच्च शिक्षा मंत्रालय भारत सरकार के अनुदानित सौजन्य से आयोजित इस संगोष्ठी में पूरे भारत के हिन्दी / अहिंदीभाषी विद्वानों सहित भारतीय मूल के प्रवासी हिंदी साहित्यकारों ने भी सहभागिता की l कॉलेज प्राचार्य डॉ अमरदीप गुप्ता के निर्देशन में और अध्यक्ष हिंदी विभाग डॉ किरण खन्ना के संयोजन में आयोजित इस कार्यक्रम में बीज वक्ता की भूमिका में डॉ तेजेन्द्र शर्मा MBE लंदन यू के , विशिष्ट वक्ता की भूमिका में प्रोफेसर अपर्णा सारस्वत क्षेत्रीय निदेशक केंद्रीय संस्थान आगरा ने प्रतिभागिता की और कार्यक्रम की अध्यक्षता पद्मश्री डॉ हर मोहिंदर सिंह बेदी जी ने की l बिजनौर से वनस्पति विज्ञान की प्राध्यापिका डॉ भारती चौहान , डॉ अदिति सिन्धु, प्रतिष्ठित साहित्यकर्मी डॉ नीरजा शर्मा, आगरा से डॉ शुभदा पांडे, दिल्ली से प्रोफेसर पूजा गोस्वामी, पटियाला विश्विद्यालय से डॉ जसविंदर सिंह, डॉ शेफाली बेदी, बठिंडा विश्विद्यालय से डॉ समीर महाजन, अबोहर से डॉ किरण ग्रोवर, होशियारपुर से डॉ दीपक , फगवाड़ा से डॉ नीलू शर्मा, जालंधर से डॉ मनिंदर कौर , डॉ मीनू नंदा, डॉ रिचा नागला, डॉ निधि शर्मा, फतेहगढ़ से डॉ रश्मि शर्मा सहित गुरु नगरी से प्रोफेसर डॉ विनोद तनेजा जी, डॉ अतुला भास्कर , डॉ सविता रामपाल, डॉ राजदविन्दर कौर, डॉ गगनदीप, डॉ बाबुशा , प्रोफेसर पूनम कुमारी, डॉ नव दीप कलसी, श्री नवदीप जोशी, डॉ अमनदीप, डॉ सीमा शर्मा इत्यादि विद्वान जन ने शोध पत्र प्रस्तुत किए l पूरे भारत से प्राप्त शोध आलेखों को प्रकाशित कर पुस्तक का विमोचन भी किया गया l

