Wednesday, February 11, 2026
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डॉ चन्द्रशेखर तिवारी की एकांकी – वीर लोरिक और मंजरी : पूर्वानुराग से संकल्प तक

वीर लोरिक और मंजरी : पूर्वानुराग से संकल्प तक

(त्याग, संकल्प और पूर्वराग की अमर गाथा)
लोक-कथा पर आधारित नूतन नाट्य रूपान्तरण
पात्र-परिचय
सूत्रधार : कहानी को जोड़ने वाला और निष्कर्ष-रूप में अन्तिम सन्देश देने वाला।
वीर लोरिक : बलिया का एक वीर योद्धा, जो न्याय के लिए लड़ता है।
मंजरी : सोनभद्र की दृढ़ निश्चयी और साहसी कन्या।
मलिक : दुष्ट सरदार (वीर लोरिक का मुख्य प्रतिद्वन्द्वी और सत्ता एवं शोषण का प्रतीक)।
गॉंव का मुखिया : मंजरी का पिता।
रूपा : मंजरी की अत्यन्त घनिष्ठ सहेली।
ग्रामीण/ सैनिक : 5-6 गौण पात्र।
दृश्य-1
(मंच पर सोनभद्र के एक गाँव का दृश्य। चिन्तित मुद्रा में मुखिया आसन पर विराजमान है। कुछ ही दूरी पर मंजरी अपनी सहेली रूपा के साथ उदास बैठी है। ग्रामीण चिन्तित हैं।)
(मंच-निर्देश : मंच पर मध्यम, शान्त पीला प्रकाश।)
सूत्रधार : (ऊर्जावान आवाज़ में) यह कहानी उस प्रेम की है, जिसकी ज्वाला ने दो दिशाओं को मिला दिया। एक ओर बलिया का वीर लोरिक और दूसरी ओर सोनभद्र की गौरवशाली परम्परा की प्रतीक मंजरी! यह गाथा केवल मिलन की नहीं; बल्कि त्याग के साथ संकल्प और पूर्वानुराग की भी है।
(सूत्रधार किनारे होता है। मुखिया उदास बैठा है। मंजरी और रूपा किनारे बात कर रही हैं।)
रूपा : मंजरी! मुखिया जी बहुत चिन्तित हैं। तुम कब तक इस दुष्ट मलिक की दहशत और अपनी कठोर शर्त के कारण विवाह को टालती रहोगी?
मंजरी : (शान्त, पर दृढ़) मेरी शर्त कठोर नहीं रूपा! यह भूमि निर्भय वीरों की प्रतीक्षा कर रही है। यह भूमि मलिक जैसा अत्याचारी सरदार, जो स्त्रियों को अपनी जागीर समझता है, के भय से मुक्ति की कामना करती है। रूपा! मेरी सखी! तुम तो मेरे स्वभाव को अच्छी तरह से जानती हो, मैं अपना जीवन किसी कायर को नहीं सौंप सकती।
रूपा : तो क्या आर्यावर्त में कोई वीर नहीं बचा?
मंजरी : ( कुछ सोचती हुई, आँखों में चमक) बचा है! मैंने बचपन से अपने माता-पिता और गॉंव वालों के मुख से बलिया के एक वीर योद्धा के किस्से सुन रखा है—वीर लोरिक! कहते हैं, जहाँ कहीं भी अत्याचार, अनाचार या शोषण दिखता है, वह बिजली की तरह उसके ख़िलाफ़ खड़ा हो जाता है!
रूपा : लोरिक? हाँ, उसकी तलवार की खबरें तो दूर-दूर तक फैली हैं!
मंजरी : (स्वप्निल अन्दाज़ में) हाँ सखी! बिना देखे ही… केवल उसके पौरुष और त्याग की कहानियाँ सुनकर— जैसे इतिहास में संयोगिता ने पृथ्वीराज को, दमयन्ती ने नल को और सुभद्रा ने अर्जुन को उनके कर्मों से चुना था— उसी तरह मैंने भी मन-ही-मन उसे अपना पति चुन लिया है। मेरा साथी वही होगा! रूपा! मेरा दृढ़ विश्वास है, वही वीर मेरी चुनौती स्वीकार करेगा और इस धरती को मलिक के आतंक से मुक्त करायेगा।
रूपा : (आश्चर्य से) वाह!बिना देखे ही मन हार बैठी! परन्तु देखना; मेरा मन भी कहता है कि एक दिन तुम्हारी यह अटल श्रद्धा ही तुम्हें विजय दिलायेगी!
(मुखिया उदास होकर आगे आते हैं।)
मुखिया : (दर्दभरी आवाज़ में) मेरी बेटी! दुष्ट मलिक की दहशत ने गाँव के सभी युवाओं को कायर बना दिया है। …. समझ में नहीं आता कि आगे क्या होगा?
मंजरी : होगा क्या पिताजी? मेरा मन कहता है कि शीघ्र ही लोरिक यहॉं आयेगा और दुष्ट मलिक के आतंक से लोगों को मुक्ति दिलायेगा।
मुखिया : लोरिक? … बलिया का वह वीर, जिसकी बहादुरी के किस्से दूर-दूर तक सुने जाते हैं क्या, वह इतनी दूर से आयेगा?
मंजरी : (तेज़, स्पष्ट आवाज़ में) हॉं, पिताजी! देखिएगा, वह शीघ्र ही आयेगा। … और मैंने तो मन-ही-मन संकल्प भी कर लिया है कि मेरा विवाह तभी होगा; जब मेरा चुना हुआ वीर, मेरी चुनौती को स्वीकार करे।
दृश्य-2
(दूर से ढोल-नगाड़े की दमदार आवाज़। सभी ग्रामीण आश्चर्य से देखते हैं। लोरिक का शानदार प्रवेश। उसकी वेशभूषा एक योद्धा की है।)
(प्रकाश : लोरिक पर वॉर्म स्पॉटलाइट।)
लोरिक : (दमदार आवाज़ में) रुक जाओ… सोनभद्र-वासियों! बलिया के वीर लोरिक का प्रणाम स्वीकार करो! मेरी यात्रा केवल धरती की दूरी नापने के लिए नहीं थी! मैंने बलिया में ही सोनभद्र की कन्या मंजरी की अप्रतिम सुन्दरता… और उससे भी बढ़कर, उसकी निर्मल चुनौती का यश सुना!
मुखिया : (आश्चर्य से) सुन्दरता की चर्चा?… और चुनौती की भी?
लोरिक : हाँ, मुखिया जी! मैंने यह भी सुना है कि दुष्ट सरदार मलिक इस गाँव की बेटियों पर अपनी बुरी नज़र गड़ाये बैठा है और मंजरी पर उसका अत्याचार सबसे अधिक है! उसका अत्याचार और मंजरी का सौन्दर्य, मुझे यहाँ तक खींच लाया है। मलिक के आतंक से लोगों को मुक्ति दिलाना और मंजरी की रक्षा करना मेरा धर्म है! प्रेम कोई दूरी नहीं देखता और यदि वह कर्त्तव्य से जुड़ जाये तो दूरियॉं और भी पट जाती हैं।
मंजरी : (लोरिक की आँखों में देखते हुए, मन में अपार सन्तोष के साथ) वीर लोरिक! बलिया के वीर! आर्यावर्त की शान! तुम्हारा साहस सराहनीय है! मेरा विश्वास सही था! परन्तु स्मरण रहे, मेरी चुनौती सिर्फ युद्ध नहीं है। दुष्ट सरदार मलिक कहता है कि इस गाँव की भूमि पर सिर्फ उसका ही अधिकार है और यहॉं की प्रत्येक सुन्दर स्त्री को वह अपनी जागीर समझता है। उस स्त्रैण को हराना असम्भव है।
लोरिक : (मुस्कुराकर) असम्भव? यह शब्द लोरिक के शब्दकोश में नहीं है, मंजरी! मैं आज इस धरती पर तुम्हारे प्रेम और तुम्हारे संकल्प की रक्षा के लिए आया हूँ।
दृश्य-3
(मंच का प्रकाश लाल और नाटकीय होता है। एक तरफ एक बड़े, काले रंग के ‘पत्थर’ का सांकेतिक रूप रखा है। सरदार मलिक का प्रवेश। वह घमण्डी और क्रूर दिखता है।)
(प्रकाश : मलिक पर तीखी स्पॉटलाइट, मंच पर लाल प्रकाश।)
मलिक : (जोरदार ठहाका) अरे वाह! …बलिया का एक छोटा-सा बच्चा! लोरिक! तू मेरी चुनौती को क्या समझेगा? तूने जिस तलवार को मॉंजा है, मैंने उससे कई गुना भारी तलवारें हवा में घुमायी है। तू मंजरी को क्या बचायेगा! वह मेरी सम्पत्ति है।
लोरिक : (अपनी विशाल, भारी तलवार (संकेतक) दिखाते हुए) यह तलवार, मलिक! मेरे बलिया के गौरव, सोनभद्र के सम्मान और मंजरी के अटल प्रेम से भरी है। यह केवल लोहा नहीं, यह माँ विन्ध्यवासिनी का दिया हुआ संकल्प है! इसका भार वही उठा सकता है, जिसके सीने में वज्र-संकल्प हो।
मलिक : (लोरिक का मज़ाक उड़ाते हुए) संकल्प! तो सिद्ध करो अपना बल! अगर सचमुच वीर हो तो सदियों पुराना यह गौरव-पत्थर काटकर दिखाओ। यह मेरी शक्ति का अखण्ड प्रतीक है। इसे काटने वाला आज़ तक पैदा नहीं हुआ!
(मलिक उस विशाल पत्थर की ओर इशारा करता है। मंजरी और मुखिया चिन्तित होते हैं।)
मंजरी : (दृढ़, किन्तु विश्वास से) लोरिक! तुम कर सकते हो! तुम्हारे प्रेम में ‘वह’ शक्ति है, जो तुम्हें हर चुनौती पर विजय प्राप्त करायेगी!
लोरिक : (मंजरी की ओर देखते हुए आत्मविश्वास के साथ पत्थर की ओर मुड़ता है।) मंजरी! मैं जानता हूँ, यह केवल पत्थर नहीं है। यह मेरे और तुम्हारे बीच आने वाली अन्तिम बाधा है। मैं इस बाधा को काटकर रहूॅंगा।… मंजरी! आज मैं तुम्हारे पूर्वानुराग को सच्चा सिद्ध करूँगा! मेरे सच्चे मान के प्रतीक इस तलवार से आज यह पत्थर कटेगा!
(अत्यन्त नाटकीय संगीत शुरू होता है। लोरिक अपनी भारी तलवार उठाता है और पूरी ताकत से पत्थर पर तलवार चलाता है।)
(ध्वनि : भीषण ध्वनि के साथ संगीत चरम पर।)
(मंच-निर्देश : पत्थर से टकराने पर भीषण ध्वनि आती है और तुरन्त ‘कटा हुआ’ पत्थर का टुकड़ा दिखता है।)
(मलिक और ग्रामीण चकित रह जाते हैं। धीरे-धीरे संगीत थम जाता है।)
मलिक : (हकलाते हुए) यह … यह … यह कैसा चमत्कार! … किसी मनुष्य में इतनी शक्ति … यह असम्भव है।
लोरिक : (तलवार नीचे रखते हुए शान्त, किन्तु प्रभावशाली) मलिक! यह ताक़त मेरे बाहुबल की नहीं, मंजरी के प्रेम, सोनभद्र की मिट्टी के सम्मान और न्याय के संकल्प की है। आज़ यह पत्थर कट गया और तुम्हारे अत्याचारों का अध्याय भी समाप्त हो गया।
(मलिक शर्मिन्दा होकर मंच से भाग जाता है।)
दृश्य-4
(मंच पर उजाला और प्रसन्नता का माहौल छा जाता है। सभी ग्रामीण और मुखिया खुश हैं।)
(प्रकाश : मंच पर तेज सफ़ेद प्रकाश। लोरिक और मंजरी पर वॉर्म स्पॉटलाइट।)
मुखिया : (गर्व से) बलिया के वीर लोरिक! तुमने केवल युद्ध नहीं जीता, बल्कि हमारा ‘विश्वास’ भी जीता है।
मंजरी : (लोरिक का हाथ थामते हुए, आँखों में चमक) लोरिक! मेरी कसौटी केवल बल की नहीं थी, वह संकल्प की थी। तुम मेरे सच्चे साथी हो, मेरे जीवनसाथी; फ़िर जीवनसाथी ही क्यों! आज़ से इस राज्य के संरक्षक भी हो। मेरे मन का पूर्वानुराग आज सफल हुआ!
लोरिक : (मंजरी की ओर देखकर) मेरा प्रेम तुम्हारे लिए इस कटे हुए पत्थर से भी अटल है। मंजरी! हमारी यह गाथा अमर रहेगी।
(लोरिक और मंजरी एक-दूसरे का हाथ थामे खड़े रहते हैं।)
सूत्रधार : (दर्शकों से) तो दर्शकों! आपने देखा, बलिया के वीर लोरिक और सोनभद्र की मंजरी की कहानी; जो हमें यह सिखाती है कि सच्चा प्रेम और साहस पहाड़ों को भी झुका सकता है।
(विजयोत्सव का संगीत धीरे-धीरे बजता रहता है।)
लोरिक : (दर्शकों की ओर देखते हुए) अपने लक्ष्य के लिए, अपने अपनों के लिए…
मंजरी : (दर्शकों की ओर देखती हुई) हमेशा साहस से डटे रहना।
लोरिक और मंजरी : (एक साथ) वीरता ही जीवन है और न्याय के लिए खड़ा होना ही सच्चा प्रेम है!
सूत्रधार : (गहरी किन्तु प्रभावशाली आवाज़ में) बलिया के वीर लोरिक और सोनभद्र की दृढ़ निश्चयी कन्या मंजरी की यह गाथा, केवल इतिहास नहीं है। यह वर्तमान के लिए एक स्पष्ट संदेश है—
      मंजरी ने लोरिक को उसकी प्रसिद्धि या धन के लिए नहीं, बल्कि उसके न्याय और वीरता के कार्यों के आधार पर मन-ही-मन अपना पति चुना था। यह घटना हमें सीख देती है कि हमें जीवन में बाहरी रूप के बजाय चरित्र और सिद्धान्तों को महत्त्व देना चाहिए।
      ‘वीर लोरिक का पत्थर’ आज भी सोनभद्र में उस सत्य का प्रमाण है कि केवल ‘बल’ के द्वारा ही प्रेम  को नहीं प्राप्त किया जा सकता; बल्कि उसके लिए दृढ़ संकल्प की भी आवश्यकता होती है।
     दुष्ट मलिक सत्ता में बैठे भ्रष्टाचार, शोषण और अत्याचार का प्रतीक का जिस तरह से अन्त हुआ, उससे यह सीख मिलती है कि मंजरी की तरह यदि एक व्यक्ति भी अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करे और उसे समाप्त करने की अडिग शर्त रखे तो दूर से भी न्याय की शक्ति के प्रतीक के रूप में कोई-न-कोई लोरिक उसकी रक्षा के लिए आकर खड़ा हो ही जाता है।
(सभी कलाकार एक साथ दर्शकों को नमस्कार करते हैं। विजयोत्सव का संगीत (ढोल, शहनाई) तेज़ी से बजता है। पर्दा गिरता है।)

डॉ चन्द्रशेखर तिवारी
हिन्दी शिक्षक 
.बी.आई.सी.रेणुसागर, सोनभद्र (उ.प्र.)
पिन– 231218
ई-मेल : [email protected] 
मोबाइल नम्बर- 9415970693
             7905167669


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