1 – तुमसे अच्छा कौन है ?
पूनम का सुंदर चांद हो तुम
भोर की मुस्कान हो तुम,
मेरे चेहरे का नूर हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है?
जिंदगी का अहसास हो तुम
मेरे सुरों के राग हो तुम,
जीवन का श्रृंगार हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है?
मेरी श्वासों की खुशबू हो तुम
विश्वाशों की पराकाष्ठा हो तुम,
नशीली शाम की मदहोशी हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है?
मेरी रूह का अहसास हो तुम
जज्बातों की उम्मीद हो तुम,
मेरी कविता के अल्फाज हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है?
खुबसूरत सी कायनात हो तुम
खुशियों का सुन्दर जहां हो तुम,
प्रेम का महकता गुलशन हो तुम
तुमसे अच्छा कोन है ?
रिश्तों की परिपूर्णता हो तुम
उषा की पहली किरण हो तुम,
सौरभ युक्त फुल हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है?
दिल के इतने पास हो तुम
हृदय की मधुर धड़कन हो तुम,
जीवन में सबसे खास हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
दिनचर्या की आदत हो तुम
जीवन की मेरी कल्पना हो तुम,
बेबाकी में बेहद खास हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरे लिए संसार हो तुम
रखते मेरा ख्याल हो तुम,
जीवन की मेरी ख्वाहिश हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरी सुंदर सी आरजु हो तुम
मेरी आंखो के ख्वाब हो तुम,
मेरे होठों की मुस्कान हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरी सफलताओं की मंजिल हो तुम
मेरी शायरी के शायर हो तुम,
मेरी ङायरी के पन्ने हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरी गुजारिशों की उम्मीद हो तुम
मेरी फरमाइशों की महिफल हो तुम,
मेरे संसार की रौनक हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरे खूबसूरत अल्फाज हो तुम
सादगी की पराकाष्ठा हो तुम,
सरलता की परिभाषा हो तुम
तुमस अच्छा कौन है ?
हकीकत का अंदाज हो तुम
धड़कनों की फरियाद हो तुम,
इश्क के सागर हो तुम
तुमसे अच्छा कोन है ?
हसीन सा एक ख्वाब हो तुम
मुद्दतों की मन्नत हो तुम,
मेरी किस्मत का फक्र हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
मेरा सच्चा अफसाना हो तुम
मेरी खामोशियों का मौन हो तुम,
मेरे बदलते जीवन की तस्वीर हो तुम
तुमसे अच्छा कौन है ?
2 – मजबूर बच्चे
एक ही भट्टे पर
काम करते दिखे
राजू और मुनिया,
हृदये की संवेदना
गर्मी बन तप रही
भट्टे में उनकी,
बचपन की भाषा भूल
अभिलाषाओं की तपिश में
भट्टा झोंक रहे,
अभावों में जीकर
मुश्किलों पर चलकर
मर गए सपने उनके,
ये पैदा हुए किन्हीं
खूबसूरत तंत्रिकाओं से,
शरीर स्टील का
हृदय लोहे का,
और मस्तिष्क की तंत्रिकाएं
रक्तिम अरुणिमा से युक्त,
लग रहे मजबूर से बच्चे,
क्या बंद हुए मदरसे ?
या स्कूलों में ताले लगे ?
सिर पर लादे हुए बोझ,
फाइलों में गुमे हुए
जादुई आंकडे से लगे,
बेचारे मजबूर से लगे
मैं निकली बाहर
तप्त हुआ शरीर,
सूर्य की गर्मी से,
मीलों चलने पर
मुझे ओढना पड़ा लिहाफ,
बेचारे मजबूर बच्चे
कैसे कर पाते हैं समायोजन ?
प्रकृति व अपने आपसे,
कुछ ऐसे इंसान
जो लबरेज रहते हैं
अमीरी से,
गाडियों में निकलते है
अमीरी के छींटे लगाते,
बेचारे मजबूर बच्चे
एक छोर थामे है गरीबी का,
दूसरा अपनी जिंदगी का,
मैं सूर्य की तपिश को
सह नही पाई,
कुंजो, झुरमुटों की ओट भी
मुझे बचा नहीं पाई,
दौड कर आई
घर के दालान में,
सोचने लगी मैं,
कैसे कर पाते है बच्चे ?
ये मजबूर बच्चे
खुले दालान में ।
3 – बातें मानवता की
आत्मसम्मान की आवाज
कभी डरती नहीं,
सर्कस नुमा जहां में
कभी मानवता रहती नहीं ।
आराम परस्त जिंदगी में
जीत कभी होती नहीं,
आत्म सात टूटने से
जंग कभी जीती जाती नहीं ।
सारे आघात सारी कहानी
आसानी से जाहिर होती नहीं,
स्थिति अनुरूप डालने में
सबको महारत हासिल होती नहीं ।
घर की बात
बाजारों तक जाए,
यह फितरत
अच्छी होती नहीं ।
आपस की बातें
अखबारों तक जाए,
यह मन्नत
अच्छी होती नहीं।
इंसान होकर
इंसान के काम ना आए,
यह आदत
अच्छी होती नहीं ।


बबीता जी
आपके तीनों ही कविताएं पढ़ीं ।
पहली कविता शायद पुत्री के लिए है जो मन्नतों के बाद हुई होगी । बेटी तो अनमोल रत्न होती ही है।
दूसरी कविता में मजदूर बच्चों का दर्द है।
तीसरी कविता के अंतिम तीन पद अच्छे लगे।
बधाई आपको कविताओं के लिये।
बहुत बहुत धन्यवाद मैम