Monday, April 20, 2026
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पद्मा मिश्रा की दो कविताएँ

1 – दहलीज पर खड़ी औरत
दहलीज पर खडी औरत ,
क्या सोचती है ?
नाम आँखों से निहारती
आकाश का कोना कोना ,
उड़ने को आकुल -व्याकुल,
पंख तौलती है ,
तलाशती है राहें मुक्ति के उस द्वार की,
स्वप्न भरी आँखें ,
थामना चाहती हैं- क्षितिज के ओर छोर ,
पर पांवों को लहुलुहान कर जाती हैं,
परम्पराओं की बेड़ियाँ।
दहलीज के इस ओर …
उसका घर है,ममता है, ..जीवन का वर्तमान भी,
पर दहलीज के उस ओर ..
उसका स्वप्न पलता है,
आगत भविष्यकी रंगीनियाँ हैं ,मुक्ति है,
और संभावनाओं का खुला आकाश भी,
पर यहीं पर रोकती हैं भावनाएं ,
द्वंद्ध सा मचता ह्रदय में,
क्या करूँ उस मुक्ति का?
जो छीन लेगी पाँव के नीचे धरा?
और जब साँझ होगी,
डूबता सूरज भी नहीं साथ होगा।
तब अँधेरी कालिमा में
कौन होगा साथ मेरे ?
रोशनी बन कर नए प्रभात की ?
और फिर कोर आँचल के भिंगोती,
बालती दहलीज पर ,एक दिया उम्मीद का,
इस आस में
फिर कभी पंख पाकर उड़ सकूगीं ,.
साथ मेरे -घर ,मेरे अपने मेरे सपने ..
मेरा संसार होगा ..
बस यही एक स्वप्न जीती जा रही है-
‘दहलीज पर खड़ी औरत ।
2 – अनेक रूपों में
जब तुम
थकान से आकुल-व्याकुल ,
पुकारते हो उसे –
शांति और सुकून की छाँह तलाशते,
अपेक्षित क्षुधा की तृप्ति के लिए ,
तब वह माँ बन जाती है-l
मन में उमड़ते संघर्षों –
विमर्शों के शमन हेतु,
चाहते हो कोई साथ,
वह मित्र बन तुम्हे संभालती है।
कभी बहन बन -तुम्हारे दुखों को ,
आँचल में संभालती ।
तुम्हारी मुस्कान बन जाती है।
अपने नन्हे हाथों से ,मचलती ,
गोद में आने की जिद करती –
बिटिया भी वही ,
दुनिया की भीड़ से अलग,
अपने मधुमय एकांत में –
पत्नी बन तुम्हे दुलारती नारी –
कदम से कदम मिलाती –
जिंदगी के ऊँचे-नीचे रास्तों पर ,
वह पत्नी, प्रिया, बहन, बेटी –
कितने रूपों में जीती है -एक साथ ,
स्वयं-सिद्धा बन कर ।
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4 टिप्पणी

  1. आदरणीया पद्मा जी की नारी जीवन पर अति भावपूर्ण कविता। बहुत ही सजीव चित्रण किया गया है।

  2. नारी की विवशता और नारी की महत्ता को दर्शाती बहुत सुंदर भावपूर्ण कविताएँ। हार्दिक बधाई पद्मा मिश्राजी।

  3. पद्मा मिश्रा जी की कविता -‘ दहलीज पर खड़ी औरत’ नारी के द्वंद्व को उजागर करती है। दहलीज पर खड़ी औरत के लिए सामने दो मुकाम है। एक जहां परंपराएं हैं। उन परंपराओं को निभाने की जिम्मेदारी है तो दूसरी ओर मुक्ति का द्वार है। जहां से मुक्त होकर स्वच्छंद आकाश में विचरण कर सकती हैं।
    एक नारी दहलीज पर खड़ी नम आंखों से आकाश के कोनों को निहारती है। यह वही कोना है जिसे महादेवी वर्मा जी कह उठती हैं –
    ‘विस्तृत नभ का कोई कोना,
    मेरा न कभी अपना होना,
    परिचय इतना इतिहास यही
    उमड़ी कल थी, मिट आज चली।’
    यद्यपि इस कविता में इस तरह की कहीं निराशा नहीं है जैसी महादेवी वर्मा जी की रचना में है। यहां असमंजसता है। वह उड़ना चाहती है मुक्त गगन में, संभावनाओं के आकाश में। जब वह अपने पंखों को तौलती है तो उसकी आंखों में न जाने कितने स्वप्न भर जाते हैं। वह क्षितिज के ओर-छोर को अपनी बांहों में समेट लेना चाहती है। लेकिन क्या यह इतना आसान है?
    दहलीज के इस पार देखती है तो उसके सामने भावनाएं आड़े आ जाती हैं। परंपराओं की बेड़ियां उसके सपनों को लहूलुहान कर देती हैं। वह जान रही है कि बेड़ियों को तोड़कर उड़ान भरती है तो उसके पैरों की जमीन छीन ली जाएगी।
    मन में आंधियों का शोर मचल उठता है। उड़ान के बाद डूबता सूरज उसका साथ न दे पाएगा। उस अंधेरी कालिमा में उसके साथ कोई नहीं होगा।
    लेकिन नारी हताश नहीं है। वह अपनी ही दहलीज पर उम्मीदों का दीपक जला लेती है। जब कभी पंख मिलेंगे तो वह अपने पंखों से आकाश को नाप लेगी। उस आकाश को जहां उसकी मुक्ति के सपने टंके हुए है। इन्हीं उम्मीदों के साथ वह अपने सपनों को जी लेती है।
    पूरी कविता में द्वंद्व अपने चरम पर रहता है। इस द्वंद्व के बीच वह अपने सपनों को मिटने नहीं देती है। कुछ भी कहो, कल्पनाएं भी कम आनन्ददायक नहीं होती है।

  4. प्रिय पद्मा
    तुम्हारी दोनों कविताएँ पढ़ीं।
    पहली कविता ‘दहलीज पर खड़ी औरत’ में एक अंतर्द्वंद्व है।
    कविता देहलीज के दोनों और की स्थितियों के बीच के तुलनात्मक अंतर्द्वंद्व को व्यक्त करती है।
    लेकिन दुविधाओं की बेड़ियों के बीच भी देहलीज पर खड़ी औरत उम्मीद का दिया जलाती है जहाँ भविष्य की रंगीनियाँ होंगी, मुक्ति होगी, संभावनाओं का खुला आकाश होगा जहाँ पंख पाकर वह उड़ सकेगी‌ उसका अपना घर, उसके अपने सपने और उसके अपने संसार में।
    इस कविता को पढ़ते हुए हमें मैथिलीशरण गुप्त जी की “यशोधरा” चंपू काव्य से एक पंक्ति याद आती है-
    “आशा से आकाश थमा है ”
    उम्मीद पर ही दुनिया कायम है।

    दूसरी कविता “अनेक रूपों में” तुमने नारी के विभिन्न स्वरूपों में उसके कर्तव्य निर्वहन की व्याख्या की है। यथा-माँ, मित्र,बहन, बेटी, पत्नी रूप में। स्वयंसिद्धा बन पति को खुश रखने का प्रयास करती है। जबकि हर रूप में उसके कर्तव्य भिन्न-भिन्न होते हैं।
    दोनों ही कविताएँ स्त्री/नारी के सहयोग ,त्याग, समर्पण, सामंजस्य, धैर्य, सहनशीलता की सार्थक अभिव्यक्ति है। दोनों ही
    कविताओं के लिये बहुत-बहुत बधाइयाँ ।

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