बुतों के शहर में
कवि : प्रवीन कुमार
प्रकाशन: अनुभव प्रकाशन
समकालीन हिंदी कविता में बुतों के शहर में एक ऐसा कविता-संग्रह है जो बिना शोर मचाए अपने समय की सच्चाई कहता है। यह पुस्तक उस दौर की तस्वीर सामने रखती है, जहाँ मनुष्य बाहर से सक्रिय है, लेकिन भीतर से धीरे-धीरे कठोर और संवेदनाहीन होता जा रहा है। प्रवीन कुमार की कविताएँ इसी बदलते मनुष्य और समाज को बहुत शांत स्वर में देखती और समझती हैं।
इस संग्रह का केंद्र वही आम आदमी है, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सब कुछ सहते हुए भी बोल नहीं पाता। कवि की ये पंक्तियाँ इस भाव को स्पष्ट कर देती हैं…
“वह जो एक आदमी है,
रोना चाहता है
राज-समाज की
संवेदना की लाश पर”
यहाँ ‘राज-समाज’ केवल सत्ता नहीं है, बल्कि पूरी व्यवस्था है, जिसमें संवेदना के लिए कोई जगह नहीं बची। आदमी रोना चाहता है, पर उसका रोना भी मानो किसी काम का नहीं रह गया। यही इस समय की सबसे बड़ी पीड़ा है, जिसे कवि बहुत सादगी से सामने रखता है।
प्रवीन कुमार की कविताओं की भाषा सरल और सीधी है। वे बड़े-बड़े शब्दों या कठिन शिल्प का सहारा नहीं लेते। उनकी कविता पाठक से आम बातचीत की तरह बात करती है। यही कारण है कि उनकी रचनाएँ पढ़ते समय दूरी महसूस नहीं होती, बल्कि लगता है कि कवि हमारे ही अनुभवों को शब्द दे रहा है।
इस संग्रह में प्रकृति के चित्र भी बहुत सहज रूप में आते हैं। कवि लिखते हैं…
“पतझड़ की सूनी डाल
प्रशांत होकर भी
बदसूरत कहाँ है
बसंत पलता है
उसी की गोद में”
इन पंक्तियों में पतझड़ केवल मौसम नहीं, बल्कि जीवन का वह समय है जिसे हम अक्सर खाली या व्यर्थ मान लेते हैं। कवि बताता है कि सूनेपन के भीतर भी आगे की संभावना छिपी होती है। यह सोच कविता को केवल भावुक नहीं, बल्कि आशावान भी बनाती है।
बुतों के शहर में का ‘घर’ भी खास अर्थ रखता है। यह घर सिर्फ़ इंसानों का नहीं है। इसमें गाय, भैंस, जीव-जंतु, कीट-पतंगों तक की मौजूदगी महसूस होती है। यह बताता है कि कवि की दुनिया केवल मनुष्य तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे जीवन को साथ लेकर चलती है। यही दृष्टि इस संग्रह को मानवीय और व्यापक बनाती है।
कवि समाज की कमियों को दिखाता है, लेकिन उँगली उठाने या भाषण देने के अंदाज़ में नहीं। कहीं हल्का-सा व्यंग्य है, कहीं करुणा और कहीं चुप्पी। कई बार यह चुप्पी ही सबसे ज़्यादा कह जाती है। कविताएँ पाठक को सोचने के लिए छोड़ देती हैं।
आज के समय में, जब मनुष्य धीरे-धीरे वस्तु बनता जा रहा है, यह संग्रह उसे ठहरकर अपने भीतर देखने को कहता है। प्रवीन कुमार की कविताएँ यह उम्मीद करती हैं कि पाठक सिर्फ़ पढ़े नहीं, महसूस भी करे।
कुल मिलाकर बुतों के शहर में एक संवेदनशील और ईमानदार कविता-संग्रह है। यह किताब चुपचाप मन में उतरती है और देर तक बनी रहती है l एक सवाल की तरह, जो भीतर से उठता रहता है।
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ओ री कठपुतली
उपन्यास
अंजू शर्मा
अंजू शर्मा द्वारा लिखित उपन्यास “ओ री कठपुतली” दिल्ली की कठपुतली कॉलोनी में बसे लोक कलाकारों के जीवन की कथा है, जहाँ जीवन स्वयं एक कठपुतली-नाटक की तरह चलता है।यह बस्ती केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि स्मृतियों, संघर्षों, कला और पीड़ा का साझा संसार है।यहाँ रहने वाले लोग कठपुतली नचाने वाले, मदारी, बाजीगर, चित्रकार दूसरों के मनोरंजन का साधन बनते हैं, पर अपनी ज़िंदगी में वे असुरक्षा, अभाव और अनिश्चित भविष्य से जूझते रहते हैं।महानगर की चमक के बीच यह बस्ती एक ऐसा अँधेरा कोना है, जहाँ विकास के दावे पहुँचते तो हैं, पर राहत नहीं बन पाते।
उपन्यास की पृष्ठभूमि में विस्थापन और मकान की समस्या एक स्थायी डर की तरह उपस्थित है।कठपुतली कॉलोनी का उजड़ना केवल झुग्गियों का टूटना नहीं, बल्कि पीढ़ियों की पहचान, कला की परंपरा और सामूहिक स्मृति का मिट जाना है। दूसरे प्रदेशों से विस्थापित लोग जब कहीं पर अपना बसेरा बनाते हैं वही पर अपना एक लोक बसा लेते हैं, सुख दुख साथ संबंध सब उनके साझे होने लगते हैं Iविकास के नाम पर जिस तरह इन कॉलोनी को उजाड़ा जाता है, वह व्यवस्था की संवेदनहीनता को उजागर करता है। लोक कलाकारों के संरक्षण और प्रोत्साहन की बातें कागज़ों में रह जाती हैं, जबकि ज़मीन पर उनकी बस्ती का नामोनिशान मिटा दिया जाता है।
इस कथा की आत्मा वहाँ रहने वाली स्त्रियों के जीवन संघर्ष में बसती है।मंदरा, माया, सुहागी, सुहेला, कृष्णा और अन्वेषा ये सभी स्त्रियाँ केवल पात्र नहीं, बल्कि अलग-अलग परिस्थितियों में जकड़ी स्त्री चेतना के रूप हैं।कोई पत्नी के रूप में समझौतों का बोझ ढो रही है, कोई माँ बनकर अभाव में बच्चों को पाल रही है, तो कोई अपने अस्तित्व और पहचान के प्रश्नों से जूझ रही है।ये स्त्रियाँ एक-दूसरे से जुड़कर जैसे एक साझा नियति रचती हैं, जहाँ व्यक्तिगत पीड़ा सामूहिक अनुभव बन जाती है।
उपन्यास में रिश्तों की बनावट अत्यंत यथार्थपूर्ण है।गरीबी और अस्थिरता का दबाव रिश्तों में कड़वाहट भी लाता है, फिर भी सहारा बनने की इच्छा पूरी तरह खत्म नहीं होती।कॉलोनी का आपसी जीवन दुख में साथ खड़ा होना, स्मृतियों को साझा करना, और एक-दूसरे की कहानी सुनना मानवीय संवेदना को जीवित रखता है।स्मृतियाँ यहाँ केवल अतीत नहीं, बल्कि वर्तमान को सहने की ताकत बन जाती हैं।
कठपुतली का प्रतीक इस उपन्यास में बहुस्तरीय अर्थ ग्रहण करता है।मंच पर कलाकार कठपुतलियाँ नचाते हैं, लेकिन असल जीवन में वे स्वयं व्यवस्था, नियति और सत्ता की डोरों से बँधे हुए हैं।विशेषकर स्त्रियाँ इस प्रतीक को सबसे तीखे रूप में जीती हैं,वे चलती हैं, बोलती हैं, निर्णय लेती हुई दिखती हैं, पर उनकी डोर कहीं और से खींची जाती है। उपन्यास का कथ्य यहीं ठहर कर विचार करता है, जहाँ कला और जीवन के बीच का अंतर मिट जाता है।
अंजू शर्मा की भाषा तथ्यात्मक और संवेदनशील है। स्मृतियों,भीतर की आवाज़ों और मौन को जिस तरह उन्होंने शब्दों में ढाला है, वह उपन्यास को केवल दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक गहन साहित्यिक अनुभव बना देता है। कथानक किसी एक घटना पर नहीं, बल्कि जीवन की परत-दर-परत खुलती सच्चाइयों पर आधारित है।
यह उपन्यास केवल कठपुतली कॉलोनी का वृत्तांत नहीं है।इसमें इंसानी रिश्तों, स्त्री मन की जटिलताओं, लोक कला की उपेक्षा और विकास के खोखले दावों की कथा एक साथ बुनी गई है।‘ओ री कठपुतली’ पाठक को यह सोचने पर विवश करता है कि आखिर किसकी डोर किसके हाथ में है, और इस खेल में सबसे अधिक पिसता कौन है।यही प्रश्न इस उपन्यास को गहराई और प्रासंगिकता प्रदान करता है। सेतु प्रकाशन से प्रकाशित यह उपन्यास अमेजन पर उपलब्ध हैI


नीलिमा जी!
आपके पढ़ने की ललक महसूस हुई।
प्रवीण कुमार जी की “बुतों के शहर में” काव्य संग्रह की समीक्षा पढ़ी। काव्य संग्रह का शीर्षक ही प्रतीकात्मक लग रहा है।बोलना चाहिये,बोल सकते हैं पर बोलते नहीं।
जीवन होते हुए भी जीवन का नहीं होना ही बहुत होना है। जीवन मूल्य ही अगर जीवन में नहीं हैं तो जीवन कैसा?
वास्तव में संवेदनाओं के न रहने से इंसान निर्मम हो जाता है,कठोर हो जाता है।
आपने जो दो उदाहरण दिए वह काफी अर्थपूर्ण हैं।
अंजू शर्मा का उपन्यास
“ओ री कठपुतली ”
जैसे माँ कह देने के बाद कुछ और समझने की जरूरत नहीं पड़ती वैसे ही कुछ वर्ग ऐसे हैं जिनका जिक्र होने के बाद व्याख्या की कोई आवश्यकता नहीं रह जाती। कठपुतली ऐसा ही शब्द है।
एक लंबा समय बीत गया कठपुतली नृत्य देखे हुए। राजस्थान में ही देखने का मौका मिला था। एक अद्भुत कला है यह भी,
पर तब भी कठपुतली परिवार के दर्द ने हमें द्रवित किया था।
हमने उनसे बातचीत की थी।
जाहिर है दिल्ली जैसे महानगर में उनका जीवन असुरक्षा, अभाव,अनिश्चित भविष्य के साथ-साथ गहरे अंधकार में भी होगा।
ऊँचाई चाहे धन की हो, चाहे पद की हो, चाहे अधिकार की हो ; अपने नीचे के अँधेरे को नहीं देख पाती है, इससे बड़ी विडंबना दुनिया में और कुछ नहीं।
दोनों ही संग्रह भावनात्मक दृष्टि से देखने पर एक ही रेखा पर खड़े नजर आते हैं।
काव्य संग्रह की पीड़ा मानवीयता के बरक्स है जो संवेदनहीन होती जा रही है और उपन्यास एक वर्ग के अस्तित्व और पीड़ा का अहसास कराता है जिसे एक कृपा दृष्टि की अपेक्षा है।
बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।