Wednesday, February 11, 2026
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संपादकीय – रहमान के पास नहीं है काम!

ए. आर. रहमान इस समय 59 वर्ष के हो चुके हैं,अर्थात अगले वर्ष वे अपना साठवाँ जन्मदिन मनाएँगे। अधिकांश क्षेत्रों में लोग इस उम्र तक सेवानिवृत्त हो जाते हैं। रहमान ने लगभग तीन दशकों तक तमिल, हिन्दी, अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। वे अपने समय के एक लीजेंडरी संगीतकार बन चुके हैं। फिर शिकायत किस बात की है……यह समझ से परे है।

संगीतकार ए. आर. रहमान ने बीबीसी को दिए एक विशेष इंटरव्यू में कहा था कि ”पिछले आठ वर्षों से उन्हें बॉलीवुड में काम मिलना लगभग बंद हो गया है।“
यहीं नहीं, इस इंटरव्यू में उन्होंने फ़िल्म इंडस्ट्री में व्याप्त भेदभाव को लेकर भी बयान दिया। उन्होंने कहा, “अब फ़ैसले लेने की ताक़त ऐसे लोगों के हाथों में है, जो रचनात्मक नहीं हैं। यह सांप्रदायिकता से जुड़ा मामला भी हो सकता है, हालाँकि मेरे साथ सीधे तौर पर ऐसा कुछ नहीं कहा गया…. मैंने बस इधर-उधर से ऐसी बातें सुनी हैं…”
अंग्रेज़ी में एक शब्द है—‘चाइनीज़ व्हिस्पर’, जिसका अर्थ होता है इधर-उधर से सुनी गई बातें। यानी ए. आर. रहमान के पास अपने कथन के समर्थन में कोई पुख़्ता आधार नहीं है; यह मात्र उनका अनुमान प्रतीत होता है।
अल्लाह रक्खा रहमान ने कुछ समय पहले विक्की कौशल अभिनीत फ़िल्म ‘छावा’ के लिए भी संगीत दिया था। मगर अपने बीबीसी साक्षात्कार में उन्होंने इसी फ़िल्म को समाज को “बाँटने वाली फ़िल्म” करार दे दिया। ऐसे में लोग सवाल उठा रहे हैं कि यदि फ़िल्म का विषय नफ़रत फैलाने वाला था, तो रहमान को इसमें संगीत देने की मजबूरी क्या थी।
ए. आर. रहमान इस समय 59 वर्ष के हो चुके हैं,अर्थात अगले वर्ष वे अपना साठवाँ जन्मदिन मनाएँगे। अधिकांश क्षेत्रों में लोग इस उम्र तक सेवानिवृत्त हो जाते हैं। रहमान ने लगभग तीन दशकों तक तमिल, हिन्दी, अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं तथा अंग्रेज़ी फ़िल्मों में भी संगीत दिया है। वे अपने समय के एक लीजेंडरी संगीतकार बन चुके हैं। फिर शिकायत किस बात की है……यह समझ से परे है।
पुराने ज़माने के कुछ महान संगीतकार दो से तीन दशकों तक लगभग बिना काम के रहे। नौशाद की याद रखने लायक अंतिम फ़िल्म ‘आदमी’ (1968) थी। वर्ष 1972 में उन्होंने मीना कुमारी अभिनीत फ़िल्म ‘पाकीज़ा’ में केवल पृष्ठभूमि संगीत दिया था। उनकी मृत्यु 2006 में हुई। उन्होंने कभी यह नहीं कहा कि इन तीन दशकों में उन्हें मुसलमान होने के कारण काम नहीं मिला।
ठीक इसी तरह अपने समय के धाकड़ संगीतकार ओ. पी. नैय्यर की आख़िरी ढंग की फ़िल्म ‘प्राण जाए पर वचन न जाए’ 1974 में प्रदर्शित हुई थी। आत्मसम्मान के लिए कुख्यात ओ. पी. नैय्यर की मृत्यु 2007 में हुई। लगभग तीन दशकों तक उन्हें भी नियमित फ़िल्मी काम नहीं मिला। वे कुछ संगीत कार्यक्रमों में निर्णायक (जज) भी बने, मगर उन्होंने भी रहमान की तरह किसी प्रकार की शिकायत नहीं की।
शंकर-जयकिशन की जोड़ी में से शंकर को भी जयकिशन की मृत्यु के बाद लगभग काम मिलना बंद ही हो गया। ‘पहचान’ और ‘बेईमान’ जैसी कुछ फ़िल्में शंकर की झोली में आईं, मगर लगभग दस वर्ष वे भी बिना काम के रहे। अनु मलिक के पास भी इस समय काम नहीं है। ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएँगे’ वाली संगीतकार जोड़ी जतिन-ललित भी अब कहीं दिखाई नहीं देती। आनंद मिलिंद जैसे कोई संगीतकार कभी हिन्दी सिनेमा में आए भी थे यह किसी को याद ही नहीं। आजकल सोनू निगम, कुमार शानू और उदित नारायण भी काम के लिए लगभग तरसते नज़र आते हैं। शंकर-एहसान-लॉय भी काम के अभाव से जूझते प्रतीत होते हैं। ऐसे में ये सब अपने-अपने लिए कौन-सा ‘विक्टिम कार्ड’ लेकर सामने आएँ कि उन्हें काम नहीं मिल रहा है?
हिन्दी सिनेमा में संगीतकारों का एक लंबा और समृद्ध सिलसिला रहा है। एक ज़माने में अनिल बिस्वास, आर. सी. बोराल, पंकज मलिक, हुस्नलाल-भगतराम और ग़ुलाम हैदर का ज़माना था। फिर नौशाद साहब का दौर आया। उसके बाद सचिन देव बर्मन, शंकर-जयकिशन, खेमचंद प्रकाश, वसंत देसाई और सी. रामचन्द्र का ज़माना रहा। ओ. पी. नैय्यर, ग़ुलाम मुहम्मद, सलिल चौधरी और मदन मोहन ने भी ख़ूब ख्याति अर्जित की। इसके बाद रवि, कल्याणजी-आनंदजी और लक्ष्मीकांत-प्यारेलाल का दौर आया। बप्पी लहरी और अनु मलिक ने भी सफलता के रस चखे।
यानी हर संगीतकार का एक काल होता है, एक समय होता है, और आम तौर पर बीस से पच्चीस वर्षों तक ही उनका जलवा रहता है। संगीतकार आनंदजी और प्यारेलाल तो एक लंबे अरसे से बिना काम के अपना जीवन बिता रहे हैं, मगर किसी ने भी इसे सांप्रदायिक या राजनीतिक रंग देने की कोशिश नहीं की।
ए. आर. रहमान के परिवार को लेकर एक और सच्चाई उस समय सामने आई, जब तमिल कवि और गीतकार पेरई सूदन ने एक टिप्पणी में कहा, “एक बार जब मैं ए. आर. रहमान के घर गया, तो उनकी माँ ने मुझे घर में प्रवेश करने से पहले अपने माथे का तिलक हटाने को कहा। उन्होंने कहा- हम मुसलमान हैं। अगर आपको अंदर आना है, तो आपको अपने माथे से तिलक हटाना होगा। लेकिन मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और वहाँ से चला गया।”
अंग्रेज़ी के महान कवि एल्फ़्रेड लॉर्ड टेनिसन ने अपनी कविता ‘Morte d’Arthur’ में कहा है-The old order changeth, yielding place to new. यानी पुरातन को बदलना होता है, ताकि नया अपना स्थान ले सके। जिस तरह पहले होता आया है, ठीक वैसा ही आज के युग में भी होना तय है।
आज सुखविंदर सिंह का ज़माना नहीं है, बल्कि अरिजीत सिंह का ज़माना है। दस वर्ष पहले यह नाम शायद ही किसी ने सुना हो, मगर आज के फ़िल्मी गायकों में सबसे बड़ा नाम अरिजीत सिंह का ही है। हालाँकि सलमान ख़ान ने अरिजीत को हिन्दी सिनेमा से बाहर करने के प्रयास किए, मगर अरिजीत के सितारे सलमान की नकारात्मक कोशिशों से कहीं अधिक मज़बूत साबित हुए।
दरअसल देखने में आता है कि कुछ लोग अपने जीवन में तमाम उपलब्धियाँ हासिल करने के बाद, जब सेवानिवृत्ति के क़रीब पहुँचते हैं, तो ‘विक्टिम कार्ड’ खेलने लगते हैं।
शिया और आग़ाख़ानी मुसलमानों में एक अवधारणा है, जिसे ‘अल-तक़िय्या’ कहा जाता है। ए.आई. (Artificial Intelligence) के अनुसार यह अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-जीवन या आस्था पर गंभीर ख़तरा होने की स्थिति में अपनी वास्तविक मान्यताओं को छिपाना या परिस्थितिवश भिन्न व्यवहार करना। इसे मुख्य रूप से मजबूरी में अपनाया गया एक बचाव का तरीक़ा माना जाता है।
यह तब अपनाया जाता है, जब किसी को जान का ख़तरा हो या उत्पीड़न का सामना करना पड़ रहा हो-अर्थात दिल में कुछ और मानना, लेकिन भय के कारण सार्वजनिक रूप से कुछ और प्रकट करना। शिया मुसलमानों पर हुए अत्याचारों के दौरान, मृत्यु से बचने के लिए इस तरीक़े को अपनाया गया।
भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी और पूर्व क्रिकेट कप्तान मुहम्मद अज़हरुद्दीन (दोनों कांग्रेस पार्टी से जुड़े रहे हैं) पर आरोप लगाए जाते रहे हैं कि उन्होंने इस ‘विक्टिम कार्ड’ का इस्तेमाल किया। नसीरुद्दीन शाह को भी इसी संदर्भ में अक्सर उल्लेखित किया जाता है। इसी तरह ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी उस्मान ख़्वाज़ा ने 88 टेस्ट मैच खेलने के बाद जब संन्यास लेने की घोषणा की, तो उन्होंने अपनी टीम के कुछ खिलाड़ियों पर नस्लीय भेदभाव के आरोप लगाए। यह समझ से परे लगा कि ऐसे कथित माहौल में वे ऑस्ट्रेलिया के लिए 88 टेस्ट मैच कैसे खेल पाए।
उस्मान ख़्वाज़ा चार वर्ष की उम्र में अपने माता-पिता के साथ पाकिस्तान से ऑस्ट्रेलिया गए। वहाँ उन्होंने क्रिकेट खेला, 88 टेस्ट मैच खेले और वह सब हासिल किया, जो किसी का भी सपना हो सकता है। उन्होंने वहीं की एक युवती से विवाह किया, जिसने बाद में धर्म परिवर्तन कर इस्लाम स्वीकार किया। तमाम उपलब्धियाँ हासिल करने के बावजूद, जाते-जाते उन्होंने मुस्लिम होने के आधार पर भेदभाव की बात उठाई। कुछ लोगों का मानना है कि बेहतर होता यदि वे उस देश और वहाँ की क्रिकेट व्यवस्था के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते।
हिन्दी सिनेमा से जावेद अख़्तर, रज़ा मुराद जैसी हस्तियों ने ए. आर. रहमान के दावे को ख़ारिज करते हुए कहा कि हिन्दी फ़िल्म इंडस्ट्री में धर्म और मज़हब को देख कर काम नहीं दिया जाता। मगर राजनीतिक दलों और मौलवियों ने रहमान के वक्तव्य को हथियार बना कर भारतीय जनता पार्टी सरकार के विरुद्ध मुहिम छेड़ दी। 
जब चारों ओर से रहमान की अनुचित टिप्पणी पर प्रतिक्रियाएँ आने लगीं, तो रहमान ने अपनी सफ़ाई देते हुए एक नया वीडियो जारी किया। इस वीडियो में रहमान कहते हैं- “डियर फ्रेंड्स, म्यूज़िक हमेशा से मेरे लिए जुड़ने, जश्न मनाने और संस्कृति का सम्मान करने का एक माध्यम रहा है। भारत मेरी प्रेरणा है, मेरा गुरु है और मेरा घर है। मैं समझता हूँ कि कभी-कभी इरादों को ग़लत समझ लिया जाता है, लेकिन मेरा उद्देश्य हमेशा संगीत के ज़रिए आगे बढ़ना, सम्मान करना और सेवा करना रहा है।”
रहमान इस वीडियो में आगे कहते हैं-“मैंने कभी किसी को कष्ट पहुँचाने के बारे में नहीं सोचा। मुझे उम्मीद है कि मेरी ईमानदारी महसूस की जाएगी। मुझे भारतीय होने पर गर्व है, जिसकी वजह से मैं एक ऐसी जगह बना पाता हूँ, जो हमेशा अभिव्यक्ति की आज़ादी देती है और अलग-अलग संस्कृतियों की आवाज़ों का सम्मान करती है।”
ए. आर. रहमान ने आभार जताते हुए अंत में कहा-“प्रधानमंत्री के समक्ष वेव समिट में प्रस्तुत किए गए ‘झाला’ और ‘रूह-ए-नूर’ को संवारने से लेकर, युवा नागा संगीतकारों के साथ एक स्ट्रिंग ऑर्केस्ट्रा बनाने तक, ‘सनशाइन ऑर्केस्ट्रा’ को मेंटॉर करने से लेकर भारत का पहला मल्टी-कल्चरल वर्चुअल बैंड ‘सीक्रेट माउंटेन’ बनाने तक, और हैंस ज़िमर के साथ ‘रामायण’ का स्कोर करने के सम्मान तक-हर सफ़र ने मेरे मकसद को और मज़बूत किया है। मैं इसके लिए आभारी हूँ और ऐसे संगीत के प्रति समर्पित हूँ, जो अतीत का सम्मान करता है, वर्तमान का जश्न मनाता है और भविष्य को प्रेरित करता है… जय हिंद और जय भारत।”
‘पुरवाई’ की संपादकीय टीम का मानना है कि इस विवाद को घसीटने से बेहतर है कि इसे जल्द से जल्द समाप्त कर दिया जाए। ए. आर. रहमान ने अपनी भूल स्वीकार कर ली है। वे हमारे आइकॉन हैं। हमें भी दरियादिली दिखाते हुए उनकी इस भूल के लिए उन्हें माफ़ कर देना चाहिए।
तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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50 टिप्पणी

  1. सादर नमस्कार सर….
    हमेशा की तरह बहुत ही महत्वपूर्ण जानकारी के साथ आज का संपादकीय पाठकों के सामने है। मेरा व्यक्तिगत रूपसे यह मानना है कि परिवर्तनशील जीवन में ऐसी भावनाओं का आना संभव है कि ‘मेरा दौर अब चला गया ” पर धर्म के नाम पर ऐसा सबकुछ कहना अनुचित है.. मुझे रहमान साहब का काम बहुत पसंद…हो सकता है खाली बैठ जाने पर उनको ऐसा महसूस हुआ हो…. हमारे passions जब खतरे में आते हैं तो ऐसी सोच आ जाती है कि लोग अब दूसरों को पसंद करने लगे हैं.. हमारा काम भूल गए… इत्यादि…
    ठीक हो जाना चाहिए सबकुछ…
    हर बात को आजकल खींचना एक ट्रेंड होता जा रहा है..
    आपका फिल्मों में अद्भुत ज्ञान है सर…. ऐसे ही लिखते रहिये सर……..

  2. समकालीन विषय पर यथावत सार्थक संपादकीय हमेशा की तरह बेहतरीन बहुत-बहुत हार्दिक बधाई

  3. बहुत बढ़िया समसामयिक संपादकीय, हम लोग आजकल इस विषय पर आपस में ही चर्चा कर रहे हैं। रहमान के संगीत को बहुत सराहा गया है और बहुत इज्जत भी उन्हें मिली है। अब यदि वे इस तरह का वक्तव्य देते हैं तो ये सचमुच दुखद प्रवृत्ति है।
    आप ने बालीवुड और समाज के अन्य क्षेत्रों से बढ़िया उदाहरण प्रस्तुत किए हैं, जो कि एक सच्चाई है।
    क्रिया पर प्रतिक्रिया भी स्वाभाविक है जो सुनने में आ रही है।
    यदि रहमान की बातों में कुछ तथ्यात्मक होता तो खान त्रयी अब तक राज नहीं कर रही होती।

  4. रहमान को खबरों में बने रहना है और अपने मुस्लिम होने की टिकट को भुनाने का एक प्रयास करना है जिससे उन्हें यथा संभव जो भी बोनस/फायदा मिल सकता है वह मिल जाए.हद है !जिस व्यक्ति ने भारत देश और भारतीयों से इतना सम्मान प्राप्त किया,इतनी लोकप्रियता प्राप्त की, वही आज इतने निम्न स्तर की बातें कर रहा है?देखने वाली बात है कि यह बातें वह परिस्थितियों से लाभ लेने के लिए कर रहे हैं या वह वास्तव में ही इसी प्रकार के हैं ? देश के प्रति ऐसी भावना रखने वाले व्यक्ति को इतना सम्मान और लेख लोकप्रियता देना क्या उचित है यह देश को तय करना होगा?!

  5. मुझे कभी भी उनका संगीत पसंद नहीं आया। इस देश ने, उनके चाहने वालों ने उन्हें फ़र्श से अर्श पर बैठाया, ऑस्कर दिलवाया। क्या उन्होंने कभी इस बात का ज़िक्र किया है कि उनकी टीम के संगीत वादकों को उन्होंने दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल दिया और आज वो लोग भूखे मर रहे हैं? जहाँ एक ओर अनूप जलोटा, सोनू निगम, अभिजीत भट्टाचार्य जैसे गायकों ने लानत मलामत की है उनकी, वहीं विद्या बालन जैसी अभिनेत्री को हिंदुत्व से नफ़रत है, ये उनका हालिया बयान है। तो भई किसने रोका है उन्हें, छोड़ दें अपने धर्म को रहमान की तरह। अपने देश, और हिंदुत्व पर प्रहार करने से आप कतई कूल नही, फ़ूल लगते हो। भगवद्गीता के तृतीय अध्याय के कर्म योग में भगवान श्री कृष्ण ने यूँ ही नहीं कहा “स्वधर्मे निधनम श्रेयः परधर्मो भयावह”।

    • रिंकू जी, आपका ग़ुस्सा समझ में आता है। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद

  6. आदरणीय सर,
    सादर अभिवादन के साथ मुझे यह कहने में कत्तई संकोच नहीं हो रहा है कि आप द्वारा लिखित यह संपादकीय भारतीय सिनेमाई विमर्श के इतिहास में एक कालजयी और साहसिक हस्तक्षेप के रूप में दर्ज किया जाएगा। कारण, यह संपादकीय केवल एक व्यक्ति विशेष के वक्तव्य की समीक्षा मात्र नहीं है, बल्कि यह समकालीन बौद्धिक जगत में व्याप्त पाखंड, विक्टिमहुड की संस्कृति और कला के क्षेत्र में आने वाले अपरिहार्य परिवर्तनों का एक अत्यंत गहरा अकादमिक विच्छेदन है। आपने जिस प्रखरता और तार्किक सुसंगतता के साथ ए. आर. रहमान जैसे वैश्विक ख्याति प्राप्त कलाकार के विरोधाभासी आचरण को प्रश्नांकित किया है, वह न केवल प्रशंसनीय है, बल्कि इस आत्ममुग्ध दौर में सत्य का दर्पण दिखाने जैसा एक दुष्कर और अनिवार्य कार्य भी है। यह संपादकीय एक ओर जहाँ कला की गरिमा को परिभाषित करता है, वहीं दूसरी ओर कलाकार की नैतिक जवाबदेही के प्रति गंभीर प्रश्न भी खड़े करता है।
    संपादकीय का सबसे मर्मस्पर्शी और दार्शनिक पक्ष वह है, जहाँ आपने अल्फ्रेड लॉर्ड टेनिसन की कालजयी काव्य पंक्तियों—”The old order changeth, yielding place to new”—के माध्यम से प्रकृति और समय के शाश्वत नियम की व्याख्या किया है। आपने भारतीय संगीत के स्वर्ण युग के पुरोधाओं—अनिल बिस्वास, पंकज मलिक, हुस्नलाल-भगतराम, गुलाम हैदर, नौशाद साहब, ओ. पी. नैय्यर, मदन मोहन और शंकर-जयकिशन—का संदर्भ देकर यह अकाट्य सत्य स्थापित किया है कि इन विभूतियों ने दशकों तक मुख्यधारा से दूर रहने के बावजूद अपनी रचनात्मक गरिमा को कभी धूमिल नहीं होने दिया और न ही उन्होंने अपनी अनुपस्थिति को कभी साम्प्रदायिक या राजनीतिक रंग देने का कुत्सित प्रयास किया। रहमान जैसे कलाकार का, जिन्हें भारत ने अगाध स्नेह और वैश्विक सम्मान दिया, 59 वर्ष की आयु में सेवानिवृत्ति के करीब पहुँचकर ‘काम की कमी’ का रोना रोना अचरज भरा है। यह प्रवृत्ति न केवल उनके अपने महान कद को छोटा करती है, बल्कि उन पूर्ववर्ती दिग्गजों की विरासत का भी अपमान करती है जिन्होंने अभाव में भी मौन गरिमा बनाए रखी।
    आपने रहमान के दावों की विसंगतियों को जिस प्रकार तर्क की कसौटी पर कसा है, वह आपकी सूक्ष्म निरीक्षण शक्ति का परिचायक है। रहमान का यह कहना कि उन्होंने भेदभाव के बारे में केवल “इधर-उधर से सुना है”, उन्हें एक गंभीर कलाकार के बजाय अफ़वाहों पर आधारित ‘चाइनीज व्हिस्पर’ का शिकार व्यक्ति सिद्ध करता है। विशेषकर, ‘छावा’ जैसी फिल्म में संगीतबद्ध होने के पश्चात उसी फिल्म को ‘समाज को बाँटने वाली’ कहना, उस बौद्धिक और नैतिक दोहरेपन को उजागर करता है जहाँ आर्थिक लाभ और वैचारिक प्रहार साथ-साथ चलते हैं। संपादकीय का यह प्रश्न अत्यंत मर्मभेदी है कि यदि फिल्म का विषय वास्तव में नफरत फैलाने वाला था, तो रहमान की रचनात्मक शुचिता और नैतिक साहस उस समय मौन क्यों थे जब वे इसके लिए अनुबंध कर रहे थे? क्या कलाकार की अंतरात्मा केवल पारिश्रमिक प्राप्त करने के बाद ही जाग्रत होती है?
    संपादकीय का सबसे बौद्धिक और समाजशास्त्रीय विस्तार वह है जहाँ आप ‘अल-तक़िय्या’ और ‘विक्टिम कार्ड’ की अवधारणाओं के माध्यम से एक व्यापक वैश्विक नैरेटिव का अन्वेषण करते हैं। हामिद अंसारी, उस्मान ख्वाजा, नसीरुद्दीन शाह और मुहम्मद अज़हरुद्दीन जैसे उदाहरणों को एक सूत्र में पिरोकर आपने यह स्पष्ट किया है कि यह एक सुनियोजित पद्धति बनती जा रही है। जब सफलता का सूरज ढलने लगता है या जब व्यवस्था के विरुद्ध किसी विशेष नैरेटिव को बल देना होता है, तब अक्सर अपनी विफलता को छिपाने के लिए ‘अल्पसंख्यक पहचान’ को एक सुरक्षा कवच या सहानुभूति बटोरने के औज़ार की तरह उपयोग किया जाता है। उस्मान ख्वाजा का उदाहरण देकर लेखक ने कृतज्ञता बनाम शिकायत के मनोविज्ञान को जिस तरह समझाया है, वह समाजशास्त्र के किसी उच्च स्तरीय शोध पत्र जैसा प्रभावी है। जो व्यवस्था और जो देश आपको शिखर तक पहुँचाते हैं, विदाई के समय उसी की न्यायप्रियता पर प्रश्नचिन्ह लगाना एक प्रकार की वैचारिक कृतघ्नता ही कही जाएगी।
    इसके साथ ही आपने फिल्म उद्योग के भीतर व्याप्त उस छद्म उदारवाद के पीछे छिपी कट्टरता पर भी कड़ा प्रहार किया है, जो अक्सर चर्चा का विषय नहीं बन पाती। तमिल कवि और गीतकार पेरई सूदन के साथ घटित ‘तिलक’ हटाने वाली घटना का उल्लेख कर संपादकीय ने उस पर्दे को हटा दिया है, जिसके पीछे कथित ‘सेकुलर’ कलाकार अपनी संकीर्ण धार्मिक कट्टरता को छिपाए रखते हैं। यह प्रसंग उस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त करता है कि भेदभाव केवल एक पक्ष की ओर से होता है। अरिजीत सिंह की निर्बाध सफलता और सलमान खान जैसे प्रभावशाली व्यक्ति द्वारा उनके मार्ग में उत्पन्न बाधाओं के विफल होने का उदाहरण देकर आपने यह पुनः स्थापित किया है कि कला के क्षेत्र में केवल मेधा और प्रतिभा ही अंतिम सत्य है। आज सुखविंदर सिंह, कुमार शानू या उदित नारायण का युग न होकर अरिजीत सिंह का युग होना किसी भेदभाव का परिणाम नहीं, बल्कि ‘काल-परिवर्तन’ का स्वाभाविक क्रम है।
    ‘पुरवाई’ के संपादक के रूप में आपका यह दृष्टिकोण कि रहमान की वैश्विक उपलब्धियों के आलोक में उनकी इस भूल को विस्मृत कर दिया जाए, भारतीय मनीषा की ‘क्षमा वीरस्य भूषणम्’ और ‘उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्’ के आदर्श को चरितार्थ करता है। रहमान द्वारा अपनी सफाई में जारी वीडियो, जिसमें उन्होंने प्रधानमंत्री के समक्ष प्रस्तुति और अपनी विभिन्न सांस्कृतिक परियोजनाओं (सनशाइन ऑर्केस्ट्रा, सीक्रेट माउंटेन, रामायण) का उल्लेख किया है, वह यह दर्शाता है कि यह संपादकीय किसी दुर्भावना से प्रेरित नहीं है, बल्कि एक सुधारात्मक आलोचना है। यह आलेख अपनी भाषाई शुचिता, तार्किक दृढ़ता, ऐतिहासिक संदर्भों की प्रचुरता और वैचारिक प्रखरता के कारण एक ऐसी साहित्यिक कृति बन पड़ा है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए कला, नैतिकता, राष्ट्रवाद और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के अंतर्संबंधों को समझने का अनिवार्य मार्ग प्रशस्त करेगी।

    • भाई चंद्रशेखर जी, आपकी टिप्पणी तो संपादकीय की गहन समीक्षा है। किसी भी पत्रिका की संपादकीय की टीम के लिए यह किसी उपलब्धि से कम नहीं। हार्दिक धन्यवाद

  7. अपने इस सामयिक विषय को व्यापक रूप में संबोधित किया है जिससे पाठकों को नई और रोचक जानकारी मिली। बॉलीवुड चाहे भाई – भतीजावाद के लिए बदनाम है मगर सच्चाई तो यह है कि अंत में यहां टैलेंट के आधार पर ही पांव जमाए जा सकते हैं न कि किसी बाप- दादा की विरासत के भरोसे। आम धारणा तो यह है कि बॉलीवुड धार्मिक संकीर्णता की सोच से कोसों दूर है तभी तो फिल्म इंडस्ट्री के शीर्ष में चमकते सितारों में मुस्लिम किरदार ही अधिकतर नजर आते हैं और इंडस्ट्री में धर्मांतरिक विवाह पद्धति भी खूब प्रचलित है। समय के साथ सब कुछ बदलता है, पीढ़ियों बदलती हैं उनकी सोच और पसंद बदलती है, रोल मॉडल बदलते हैं। अगर रहमान अपने संगीत को आज के सिनेमा दर्शकों की पसंद के अनुसार ढालेंगे तो इस संकीर्ण विचार की शर्मिंदगी से निकल अपने कार्य लक्ष्यों को जरूर पा सकेंगे और संगीत की दुनिया में हम सब लाखों- करोड़ों उनके प्रशंसकों की शुभकामनाएं से नए कीर्तिमान स्थापित करेंगे।

  8. सब सही है लेकिन जब बार बार इस क़ौम के लोग यही करें तो क्यों माफ़ कर देना चाहिए, ये अपने ही समाज के दुश्मन हैं और मिली सफ़लता के प्रति ना शुक्रगुज़ार हैं

  9. इस बार का संपादकीय ,बॉलीवुड के स्टार संगीतकार श्री ए रहमान और उनके बयान से उपजे विवाद की पड़ताल औचित्यपूर्ण परन्तु रोचक अंदाज़ ए बंया से करता है।
    अल तकिया! विक्टिम कार्ड! और अपनी कमियों को छुपाने की विकृत मनोवृति को नज़ीर से बयां करना ,कोई आदरणीय अग्रज श्री तेजेंद्र शर्मा से सीखे ।
    इस संपादकीय में उपरोक्त प्रवृति वाले प्रसिद्ध नामों की चर्चा,बेबाकी का सबूत है । वहीं व्यावहारिक सोच भी कई बॉलीवुड हस्तियों यथा ओपी नैयर,शकर जयकिशन ,,,की उतार पर करियर से बताया गया है।यह भी एक विडंबना ही है कि भारत में संप्रदाय विशेष ,धर्म विशेष या विक्टिम कार्ड के खिलाफ अपनी कुत्सित हरकतों से बाज नहीं आते ।
    इस मानसिकता के लोग यह क्यों भूल जाते हैं कि भारत सरीखे देश ने उन्हें इज्ज़त, शोहरत, नाम ,पैसा और स्टारडम क्या नहीं दिया।तिस पर भी उनके आका और धार्मिक आका या वे स्वयं इसी शैतानी प्रवृति के चलते भारत की वसुधैव कुटुंबकम् की आत्मा को कलुषित और कलंकित करने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते।वहीं जब उनका विरोध होता है तो वे माफ़ी मांगने में अपनी वही सियारी प्रवृत्ति दिखाते हुए माफ़ी मांग लेते हैं ।
    चीन की भांति कम से कम स्टार लोगों का सोशल इंडेक्स होना चाहिए ताकि प्रायोगिक तौर पर इन्हें सुधारने की कवायद हो और देश के बहुल जनसंख्या को कुछ राहत मिले
    सलाम इस संपादकीय के लिए।

    • भाई सूर्यकांत जी आपने ए आर रहमान के वक्तव्य पर गहरा विश्लेषण कर दिया है। इसमें आपका आक्रोश भी महसूस हो रहा है। सार्थक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।

  10. आदरणीय तेजेन्द्र जी!

    हर बार की तरह इस बार भी एक अलग तरह का संपादकीय है आपका।

    पढ़ते हुए सबसे महत्वपूर्ण बात यह लगी की हर इंसान को अपने काम, विशेष तौर से अपने पेशे के प्रति ईमानदार रहना चाहिये।
    जबकि आप जानते हों कि आपका पेशा ऐसा है जहाँ स्थायित्व नहीं रहता। फिल्मी दुनिया है ही ऐसी। इससे जुड़ा हर काम अस्थाई है, चैलेंजिंग है, दिग्गज से दिग्गज लोग नीचे उतर जाते हैं और कब कौन ऊपर चढ़ जाता है पता भी नहीं चलता। दुनिया वैसे भी नवीनता की चमक देखती परिवर्तन की यदि है। इस तरह के पेशों में सावधानी और सतर्कता बहुत अधिक अपेक्षित है ,साथ ही अपनी जबान पर भी लगाम लगा कर रखना जरूरी होता है।

    जैसा कि आपने बताया की विक्की कौशल अभिनीत फिल्म ‘छावा’ के लिये आपने संगीत दिया, लेकिन बीबीसी साक्षात्कार में इसी फिल्म को “समाज को बाँटने वाली फिल्म करार दिया।” इस तरह के विरोधाभास करियर के हिसाब से नुकसानदायक होते ही हैं। हालांकि छावा फिल्म हमारी देखी हुई नहीं है। पर बात कॉमन सेंस की थी जिस पिक्चर में हम संगीत दे रहे हैं उसी के विरोध में कोई ऐसी बात कह रहे हैं जो नहीं कहना चाहिये।और बात भी सामान्य नहीं है। वहाँ जहाँ सांप्रदायिकता हमेशा ही विवाद का विषय रही हो।
    एक सामान्य इंसान भी होता तो वह सोचता कि यह उसके कैरियर की दृष्टि से नुकसानदायक हो सकता है।

    जबकि आपके पास अनेक उदाहरण ऐसे मौजूद हों ,जो आपने भी अपने संपादकीय में दिये हैं और अच्छी खासी लंबी लिस्ट है उदाहरण के लिये ,सिर्फ एक नाम मात्र नहीं।

    और फिर उसके बाद अनर्गल बयानबाजी! एक मुकाम पर पहुँचने के बाद आपको इस मुकाम पर बने रहने के लिये बहुत कुछ सोचना समझना पड़ता है। क्योंकि उत्तरदायित्व भी बढ़ जाते हैं। एक-एक कदम फूँक-फूँक कर उठाना होता है। अब जो स्थिति बन गई है ,इसे कहते हैं जानबूझकर अपने पैर में कुल्हाड़ी मारना।

    जो रही सही कमी थी, वह माँ ने पूरी कर दी। माँ को भी समझ में नहीं आया कि इससे मेरे बेटे के कैरियर में प्रभाव पड़ सकता है।
    गलती को स्वीकार कर लेना बड़ी बात होती है। लेकिन गलती कर के स्वयं को साबित करने के लिये धर्म का सहारा लेना गलत है। जो चीज किसी एक के लिए सही हो सकती है वही चीज दूसरे के लिए गलत कैसे हो सकती है!

    आपने विक्टिम कार्ड के प्रयोग का समीचीन सटीक उदाहरण दिया।

    जो नया इस संपादकीय में सीखने के लिए मिला-
    अंग्रेजी में- *चाइनीज़ व्हिस्पर* जिसका अर्थ होता है इधर-उधर से सुनी गई बातें।

    अंग्रेज़ी के महान कवि एल्फ़्रेड लॉर्ड टेनिसन की अपनी कविता *’Morte d’Arthur’ में कहा गया – *”The old order changeth, yielding place to new.”* यानी पुरातन को बदलना होता है, ताकि नया अपना स्थान ले सके।

    शिया और आग़ाख़ानी मुसलमानों की अवधारणा, जिसे *‘अल-तक़िय्या’* कहा जाता है। और आपने बताया कि ए.आई.के अनुसार यह अरबी भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है-जीवन या आस्था पर गंभीर ख़तरा होने की स्थिति में अपनी वास्तविक मान्यताओं को छिपाना या परिस्थितिवश भिन्न व्यवहार करना। इसे मुख्य रूप से मजबूरी में अपनाया गया एक बचाव का तरीक़ा माना जाता है।
    ‘पुरवाई’ की संपादकीय टीम ने बिल्कुल सही सोचा इस विवाद को घसीटने से बेहतर है कि इसे जल्द से जल्द समाप्त कर दिया जाए।
    अगर कोई अपनी गलती स्वीकार कर लेता है तो उसे माफ कर देना
    ही बड़प्पन है।
    सिनेमा व संगीत से जुड़ी हुई आपकी जानकारी और अनुभव काबिले तारीफ है।

    वास्तविकता का दर्पण दिखाते हुए मानवीयता युक्त इस संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुतबधाई।

    • आदरणीय नीलिमा जी, आपका इस संपादकीय के ज़रिए कुछ नये मुद्दों से परिचय हुआ, जान कर अच्छा लगा। हम अपने प्रयास ऐसे ही जारी रखेंगे। हार्दिक धन्यवाद आपका।

  11. बहुत ही विचारणीय संपादकीय। कला चाहे कोई सी भी हो, यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसमें योग्यता के बल पर ही कोई टिक पाता है। यहां धर्म या भाई भतीजावाद अधिक लंबा नहीं टिक पाता। । श्रोता, पाठक व दर्शक कुछ समय बाद बदलाव चाहता है और बदलाव की यह प्रक्रिया व प्रवृत्ति वर्तमान समय में कुछ अधिक हो गई है। कुछ लोगों में परिवर्तन को लेकर स्वीकार्यता का भाव नहीं आ पाता और वे बेसिर पैर की दलीलें देने लगते हैं। ए.आर रहमान जी भी ऐसा ही कर रहे हैं।
    पुरवाई संपादकी टीम की बात सही है ।

    • प्रिय सुधा, आपकी संपादकीय के साथ सहमति हमारा हौसला बढ़ाती है। अपनी प्रतिक्रिया देती रहें। हार्दिक धन्यवाद।

  12. इस बार का संपादकीय— ‘रहमान को नहीं है काम!’— फिल्म संगीतकार ए.आर. रहमान द्वारा बीबीसी को दिए गए इंटरव्यू पर केंद्रित है। फिल्म जगत में काम न मिलने का कारण उन्होंने अपने मुसलमान होने की संभावना के रूप में रखा है। किसी ने उन्हें यह बताया है कि इसी कारण उन्हें काम नहीं मिल पा रहा है।
    फिल्मी दुनिया की अंदरूनी हकीकत अक्सर इसी तरह सामने आती है। कई बार लोग परिस्थितियों से आजिज आकर अपनी असफलताओं का ठीकरा बाहरी कारणों पर फोड़ते हैं। एक समय ऐसा भी था जब ए.आर. रहमान सफलता की सीढ़ियाँ लगातार चढ़ते चले जा रहे थे। स्वाभाविक है कि उस दौर में उन्होंने अच्छा खासा धन भी अर्जित किया होगा। लेकिन आज स्थिति यह है कि उन्हें बाहर आकर इस तरह के इंटरव्यू देने पड़ रहे हैं।
    अच्छे समय में कमाए गए पैसों को यूँ ही उड़ा देना समझदारी नहीं होती। भविष्य को ध्यान में रखकर बचत और वैकल्पिक व्यवस्थाओं के बारे में सोचना चाहिए। समय कब, कहाँ लाकर खड़ा कर दे—इसका कोई ठिकाना नहीं। शुरुआती सफलता कई बार व्यक्ति को अंधा कर देती है और वह धन के महत्व को नहीं समझ पाता। इसके दुष्परिणाम बाद में सामने आते हैं।
    ए.आर. रहमान जी, फिल्मी दुनिया पर इस तरह के आक्षेप पहले भी लगते रहे हैं। यदि सुनी-सुनाई बातों की ओर जाएँ, तो लोग यह भी कहते रहे हैं कि सलमान खान के कारण विवेक ओबेरॉय का करियर प्रभावित हुआ। सच क्या है और कितना है, यह अलग बहस का विषय है, लेकिन ऐसी चर्चाएँ फिल्म इंडस्ट्री के भीतर हमेशा से मौजूद रही हैं।
    एक समय यह भी कहा जाता था कि कुछ प्रभावशाली लोगों का एक बड़ा समूह बना हुआ था, जो अपनी मनमर्जी से इंडस्ट्री को चला रहा था। बीच-बीच में डी-कंपनी के दखल की चर्चाएँ भी सुनने को मिलती रहीं। कहा जाता था कि उसकी एक धौंस में हीरो-हीरोइन रुपये खोखे में भरकर पहुँचा देते थे और फिल्म कैसी बनेगी, कौन उसका अभिनेता होगा—यह सब पहले ही तय हो जाता था। इन बातों की कभी विधिवत पुष्टि नहीं हुई और न ही उस दौर में किसी ने खुलकर शिकायत की। उस समय की तथाकथित अनकंट्रोल डेमोक्रेसी का खेल ही कुछ ऐसा था, जो अपने साथ अराजकता लेकर आया। छोटा राजन और दाऊद इब्राहिम की काली करतूतें उसी दौर की भयावह पृष्ठभूमि की ओर संकेत करती हैं।
    भारत एक लोकतांत्रिक देश है और यहाँ अपनी बात कहने की सभी को आज़ादी है। लेकिन केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर स्वयं को विक्टिम सिद्ध करने की कोशिश ठीक नहीं मानी जा सकती। ऐसे आरोपों के साथ साक्ष्यों का होना ज़रूरी होता है।
    संपादक महोदय जी, आपने इस संपादकीय में संगीत की दुनिया का पूरा इतिहास पाठकों के सामने रख दिया है। ऐसा लगता है जैसे शुरुआत से लेकर आज तक के संगीतकारों को पंक्ति में खड़ा कर यह प्रश्न किया गया हो कि क्या उन्हें कभी सांप्रदायिक भेदभाव से गुजरना पड़ा—और सभी के उत्तर ‘न’ में ही मिलते हैं। पूर्ववर्ती संगीतकारों से यह मौन संवाद अपने आप में अनोखा है। इस तरह के लेखन के लिए विशेष कला चाहिए, और वह कला आपके संपादकीय में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
    आपके संपादकीय ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। बहुत-बहुत बधाई सर

    • भाई लखन लाल पाल जी आपने लिखा है – “आपके संपादकीय ज्वलंत मुद्दों पर बेबाकी से अपनी बात रखते हैं। बहुत-बहुत बधाई सर!” आपने पूरे संपादकीय को खंगाला भी है। आपको दिल से शुक्रिया।

  13. समसामयिक जानकारी देता बेहतरीन सम्पादकीय। उड़ती पतंग एक ऊँचाई पर जाकर स्थिर हो जाती है। वह कोई अकेली तो है नहीं ।नई पतंगोॉ को भी अवसर मिलने पर उड़ान भरनी होती है, दुनिया का यही दस्तूर है। ए.आर रहमान गम्भीर प्रवृत्ति के संगीतकार है, उनके मुँह से छोटी बात अच्छी नहीं लगी। हर छह दिन के बाद विश्व के हर कोने से सटीक प्रमाणों के साथ हम पाठकों को जानकारी देने के लिए साधुवाद।

    • सुदर्शन जी, आपकी सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। स्नेह बनाए रखें।

  14. जितेन्द्र भाई: ए आर रहमान की समस्या क्या है। जिस भारत देश ने उसे सब कुछ दिया और जहाँ उसे सब कुछ मिला उसी के बारे में BBC तथा और जगहों में जाकर उल्टा बोलना कहाँ की शराफ़त है? यह तो अपना मुस्लिम कार्ड खेल कर लोगों को भ्रमित करने का सहज तरीका हुआ। अगर अब मुस्लिम होने पर इतनी परेशानी हो रही है तो क्यों नहीं वापस हिन्दु धर्म को अपना लें जिसे 23 साल की उमर में सन 1989 में ए ऐस दिलीप कुमार नाम छोड़कर ए आर रहमान नाम अपनाया था। ऐसा करने पर सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा।

    • विजय भाई आपने तो दो टूक सलाह दे डाली है ए आर रहमान को। आपका स्नेह हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

  15. ‘रहमान के पास काम नहीं’ संपादकीय में ए. आर. रहमान के कुछ दिन पूर्व लगाए आरोपों को आपने भारत के पूर्व उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, और पूर्व क्रिकेट कप्तान मुहम्मद अज़हरुद्दीन के साथ नसीरुद्दीन शाह तथा ऑस्ट्रेलिया के क्रिकेट खिलाड़ी उस्मान ख़्वाज़ा से जोड़ते हुए इन लोगों की मानसिकता को बखूबी दर्शाने के साथ अंग्रेज़ी के महान कवि एल्फ़्रेड लॉर्ड टेनिसन की कविता ‘Morte d’Arthur’ में लिखे वाक्य “The old order changeth, yielding place to new.” जो उद्धरण दिया है वह न केवल इनके लिए वरन सभी व्यक्तियों के लिए अक्षरशः सत्य है।
    इंसान की न जाने यह कैसी प्रवृति है कि वह अपनी कमियों को न देखकर सदा दूसरों पर आरोप लगाता रहा है। जिस देश के लोगों ने इनकी प्रतिभा के कारण उन्हें सिर आँखों पर रखा, उन्हीं पर भेद-भाव का आरोप लगाना कहाँ तक उचित है? ये लोग अपने लिए तो खाई खोद ही रहे हैँ, अपनी कौम के लिए लोगों को भी अनचाहे आरोपित बना रहे हैं।
    एक विचारोत्तेजक, समसामयिक संपादकीय के लिए साधुवाद।

    • सुधा जी, आप पुरवाई के हर संपादकीय पर सारगर्भित टिप्पणी करती हैं। आपने वर्तमान संपादकीय को विचारोत्तेजक और समसामयिक कहा है। हार्दिक धन्यवाद।

  16. आदरणीय भाई
    हमेशा की तरह लीक से हटकर कुछ नये मुद्दे उठाता संपादकीय बहुत कुछ सोचने के लिए विवश कर गया।आमतौर पर संगीत मन पर गहरा प्रभाव छोडती है पर वही संगीत जब धर्म और विवाद का विषय हो जाता है तब उसका जनमानस पर गहरा मनोवैज्ञानिक असर होता है।वैसे भी सांप्रदायिकता हमेशा विवाद का विषय रही है हमारे देश में।इस बार आपने लोकप्रिय संगीतकार ए आर रहमान के विषय में चर्चा की है,जो बिल्कुल यथार्थ के करीब है।ए आर रहमान का संगीत मन को छू लेता है ,विशेष रुप से * मां तुझे सलाम* के गीत मुझे अत्यन्त प्रिय हैं पर जब अनर्गल बयानबाजी या धार्मिक विवाद उत्पन्न करने जैसे विवाद जन्म लेते हैं तो यह लोकप्रियता खतरे में पड जाती है जैसा कि आपने संपादकीय में लिखा है–**यानी हर संगीतकार का एक काल होता है, एक समय होता है, और आम तौर पर बीस से पच्चीस वर्षों तक ही उनका जलवा रहता है। संगीतकार आनंदजी और प्यारेलाल तो एक लंबे अरसे से बिना काम के अपना जीवन बिता रहे हैं, मगर किसी ने भी इसे सांप्रदायिक या राजनीतिक रंग देने की कोशिश नहीं की।**
    उनकी मां के गलत व्यवहार से जुडी घटना सचमुच आश्चर्य में डालती.है और आक्रोश भी होता है।संपादकीय ने इस पर प्रकाश डाला है**
    जब तमिल कवि और गीतकार पेरई सूदन ने एक टिप्पणी में कहा, “एक बार जब मैं ए. आर. रहमान के घर गया, तो उनकी माँ ने मुझे घर में प्रवेश करने से पहले अपने माथे का तिलक हटाने को कहा। उन्होंने कहा- हम मुसलमान हैं। अगर आपको अंदर आना है, तो आपको अपने माथे से तिलक हटाना होगा। लेकिन मैंने ऐसा करने से इनकार कर दिया और वहाँ से चला गया।”
    उन्हे संगीत जगत में काम न मिलने या उपेक्षित हो जाने का एक कारण यह.कट्टर धार्मिकता भी हो सकती है।जबकि संगीत गीत सृजन की आत्मा है ,और एक कलाकार धर्म जाति पाखंड और कट्टरता से दूर रहकर ही लोगों के मन में अपनी जगह बना सकता है। जैसा कि कोई भी संगीत वर्षों तक हमारे मन में अंकित रह पाता है क्योंकि गीत संगीत का कोई धर्म नहीं होता ,वह.हिंदू या मुसलमान नही है,वह.विशुद्ध कलाकार का सृजन है और केवल भारतीय।
    बहुत अच्छा सारगर्भित संपादकीय, हमारे ज्ञान की वृद्धि भी करता है और नये प्रसंगों के माध्यम से बहुत कुछ कहने में समर्थ भी है जिन्हे हम उतना नहीं जानते कि सही गलत का निर्णय ले सकें। वहुत बहुत बधाई हो भाई, बहुत सार्थक सोच के साथ सकारात्मक दृष्टिकोण से यह संपादकीय संग्रहणीय भी है।
    सादर प्रणाम।
    पद्मा मिश्रा.जमशेदपुर

    • प्रिय पद्मा, जब एक बहन अपने भाई के लेखन पर परखने वाली निगाह से टिप्पणी करती है तो संपादक भाई को भी कुछ नया सीखने को मिलता है। हार्दिक धन्यवाद।

  17. विक्टिम कार्ड आजकल फैशन में है। खेलों, सहानुभूति भी लो और काम भी । फिर चाहें धर्म हो क्षेत्र या भाषा । हर कलाकार /रचनाकार का एक समय ऐसा आता है जिसमें उससे कुछ नया नहीं हो पा रहा होता है । दूसरे लोग आगे बढ़ते दिखते हैं। तो कुंठा पनपाने की जगह एकल बेहतर करने का अभ्यास करना चाहिए । पर ये थोड़ा कठिन रास्ता है । अहंकार की चोट का मलहम ऐसे कार्ड से तुरंत मिल जाता है। जावेद अख्तर जी कि तरह लोग भी समझदार हैं। झांसे में नहीं आते । विचारणीय संपादकीय के लिए बधाई सर

  18. हर बार की तरह इस बार भी आपका संपादकीय किसी शोध से कम नहीं। आप जिस विषय को उठाते हैं उसे सरसरी निगाह, एवं कही सुनी प्रचलित बातों तक न रख उसपर गहन अध्ययन के बाद ही अपने संपादकीय का विषय बनाते हैं। यह वास्तव में एक सीखने वाली कला है। सभी इतना लिख चुके हैं कि अब और कुछ कहना केवल दोहराव होगा।
    बस यूँही सामयिक विषय उठाकर हमें वस्तु स्थिति से अवगत कराते हुए हमें समृद्ध करते रहिए।

  19. नमस्कार।
    आपके संपादकीय हमेशा ही बहुत सार्थक विषयों को उठाते हैं। आप विवादित विषयों को उठाने में संकोच नहीं करते और हैरानी की बात यह होती है कि आप अपनी बात को भरपूर शोध करके रखते हैं। इस कारण आपका संपादकीय उत्तेजक नहीं, विचारोत्तेजक होता है। इस संपादकीय में भी आपने जिस तरह सिने जगत कई नामी हस्तियों का उल्लेख करते हुए अपनी बात रखी है, वह उसे तथ्यपरक बनाने के साथ साथ तार्किक रूप से भी संपुष्ट करती है।
    निस्संदेह, आपके संपादकीय पाठकों को विषय विशेष पर समग्रता में जानकारी उपलब्ध कराती है ताकि वह स्वयं भी समुचित निष्कर्ष पर पहुंच सके। आप अपना मत पाठकों पर थोपने के बदले उन्हें तस्वीर का हर पक्ष दिखाते हैं और उसे अपना निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी देते हैं।
    साधुवाद!

    • अलका आपने लिखा है – “निस्संदेह, आपके संपादकीय पाठकों को विषय विशेष पर समग्रता में जानकारी उपलब्ध कराती है ताकि वह स्वयं भी समुचित निष्कर्ष पर पहुंच सके। आप अपना मत पाठकों पर थोपने के बदले उन्हें तस्वीर का हर पक्ष दिखाते हैं और उसे अपना निर्णय लेने की स्वतंत्रता भी देते हैं।” यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है। आपके पास एक साहित्यिक दृष्टि है। आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। हार्दिक धन्यवाद।

  20. आईने सा साफ है एकदम। यह भी एक विकृत सोच वाला शख्स ही है। आपने तफ्सील से इस मामले पर लिखा है। बहरहाल यह विवाद अब थम गया है मगर यह बंदा एक्सपोज हो गया।

  21. यह विक्टिम कार्ड तो हारे हथियार हो गया लगता है। जिसे देखो अपनी असफलता पर पर्दा डालने के लिए उठा लेता है। यह रहमान एक थोड़े ही है भरे हैं। अच्छे सम्पादकीय लिए आपको ।

  22. क्या सचमुच माफ करना सही है??अपनी इस आदत ,संस्कार के कारण ही हम सदैव छले गये हैं।भारतीय मन पर राज करने के बाद आप यदि भेदभाव का आरोप लगाते हैं तो अब भारतीय जनता वही करेगी जैसा आप सोचते हैं।बदनाम तो कर ही चुके आप भारत को, फिर अब रियायत क्यूँ??
    आपने सचेत किया भारत को अपने धर्म के लोगों से।आप नहीं बदलने वाले।
    धन्यवाद तेजेन्द्र भाई इस विषय पर संपादकीय लिखने के लिये।

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