शुरू-शुरू में मैं बहुत गर्व से सोचा करता था कि यह अनूठा प्रयोग केवल हमारे इलाके हैरो में ही होता है। मगर जब मैंने जानकारी हासिल करने की शुरुआत की, तो पाया कि ब्रिटिश समाज अपने दिमाग़ी तौर पर कमज़ोर लोगों के लिए बहुत जागरूक है। लंदन के हर इलाके में ऐसे कई प्रोजेक्ट चलाए जा रहे हैं, जहाँ मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों को आत्मनिर्भर बनने का मौका दिया जाता है। सच तो यह है कि ब्रिटेन के हर शहर में ऐसी संस्थाएँ मौजूद हैं, जो इस नेक काम में हाथ बँटा रही हैं।
मित्रो! आज मैं ‘पुरवाई’ के पाठकों का परिचय एक ऐसी दुनिया से करवाने जा रहा हूँ, जिसके बारे में अधिकांश लोगों ने तो शायद सोचा भी नहीं होगा। इस विचित्र दुनिया का एक हिस्सा मेरे घर से करीब पाँच–सात मिनट की दूरी पर स्थित है। इसका नाम है ‘रेड ब्रिक कैफ़े’। आप पूछ भी सकते हैं कि संपादक जी, रेस्टॉरेंट तो भारत और विश्व के हर शहर में बहुत से होते हैं। जी, आप एकदम ठीक कह रहे हैं, मगर यहाँ मामला कुछ अलग ही है।
‘रेड ब्रिक कैफ़े’ अन्य खाने-पीने की जगहों से बिल्कुल भिन्न है। इसके पीछे एक सोच है, एक मुहिम है समाज को कुछ देने की और जिन्हें परमात्मा ने कुछ अलग बनाया है, उन्हें बराबरी का हक़ देने की सोच।
इस रेस्टॉरेंट को चलाती है- ‘हैरो एसोसिएशन फ़ॉर डिसएबल्ड पीपल’ (HAD)। इसमें काम करने वाले तमाम युवा कुछ ऐसी बीमारियों से ग्रस्त होते हैं, जिससे वे सामान्य स्तर पर कुछ भी सीखने में अक्षम होते हैं-जैसे कि ऑटिज़्म। उनके चेहरे पर भी कुछ ऐसे भाव होते हैं कि आप देखते ही समझ जाते हैं कि वे आम इंसान से भिन्न हैं। बहुत से बच्चे डाउन सिंड्रोम से ग्रस्त होते हैं। उन पर वैसे ही बहुत प्यार आता है।

मैं पिछले कई सालों से इस कैफ़े का समर्थन करता रहा हूँ। इसके पीछे एक ही सोच होती है कि अगर हमें बाहर रेस्टॉरेंट में खाना ही है, तो फिर रेड ब्रिक कैफ़े में क्यों नहीं। यहाँ का माहौल आपको एक अलग किस्म की अनुभूति देता है। मन में संतुष्टि का एहसास भी होता है कि यहाँ खाना खाने से हम इन बच्चों के साथ बातचीत भी कर सकते हैं और उन्हें ऐसा एहसास दे सकते हैं कि उनमें किसी प्रकार की कोई कमी नहीं है। उनके साथ सहज बातचीत करके ख़ुद अपने आप को भी संपूर्णता प्रदान कर सकते हैं।
एयर इंडिया में दो दशकों से अधिक काम करने के कारण भोजन को लेकर मेरी सोच और स्वाद काफ़ी बदल गए हैं। इसलिए मुझे भारतीय खाने की कोई ख़ास तलब नहीं लगती। मैं फ़्रेंच, इटैलियन, चाइनीज़-किसी भी प्रकार के भोजन का आनंद उठा सकता हूँ। रेड ब्रिक कैफ़े में इंग्लिश और वेस्ट इंडीज़ के व्यंजन आसानी से मिल जाते हैं। हर रोज़ भोजन का एक अलग ही मेनू होता है।
एक ख़ास बात यह भी है कि इस कैफ़े में दाम बहुत वाजिब लगाए जाते हैं। कोस्टा कॉफ़ी में केवल एक गिलास लाटे कॉफ़ी के चार पाउंड चालीस पेंस चुकाने पड़ते हैं, जबकि ‘रेड ब्रिक कैफ़े’ में 9 फ़रवरी को मैंने एक गिलास लाटे कॉफ़ी और तीन डाइजेस्टिव बिस्कुटों के पैकेट के लिए कुल तीन पाउंड साठ पेंस अदा किए।
मेरी खोजी निगाह पूरे माहौल का जायज़ा ले रही थी। सबसे पहले मेरे पास एक लड़की आई, जिसे मैं कुछ सालों से वहाँ काम करते हुए देखता रहा हूँ। उसने मुझे काउंटर पर जाकर अपना ऑर्डर करने के लिए कहा। मैं वहाँ गया, तो वह स्वयं काउंटर पर आकर मेरा ऑर्डर लिखने लगी। उसने एक स्लिप पर मेरा ऑर्डर लिखा और एक दूसरे युवक को दे दिया। युवक वह पर्ची लेकर किचन एरिया की तरफ़ बढ़ गया।
मैं रेड ब्रिक कैफ़े की हर मेज़ पर चल रही गतिविधि को पूरे मनोयोग से देख रहा था। मैंने देखा कि कैफ़े की मैनेजर अपने हाथ में एक आई पैड लिए हर वेटर के साथ-साथ चलते हुए उनकी फ़ोटो खींच रही थी, जब वे ग्राहकों की मेज़ पर उनके ऑर्डर किए हुए व्यंजन रख रहे थे। वह उन्हें समझाती भी जा रही थी कि किस प्रकार मेज़ पर भोजन रखना है।
इतने में एक युवक मेरे पास मेरी कॉफ़ी लाटे और बिस्कुट रख गया। मैंने उस लड़की को बुलाया, जिसने मेरा ऑर्डर लिया था। मैंने उसे समझाया कि मुझे कॉफ़ी तो मिल गई है, मगर मैंने अभी तक उसके पैसे नहीं चुकाए हैं। आम तौर पर जब आप काउंटर पर खाना ऑर्डर करते हैं, तो पैसे पहले अदा कर दिए जाते हैं, मगर यहाँ ऐसा कुछ नहीं हुआ था।

मैंने उसे पाँच पाउंड का नोट दिया और वह उस नोट को लेकर अपने बॉस के पास चली गई। मैंने एक बहुत ही ख़ूबसूरत-सा दृश्य देखा कि बॉस एक युवक को पाँच पाउंड का नोट दिखा कर उसे समझाने का प्रयास कर रहा था कि इसमें से कॉफ़ी और बिस्कुट की कीमत काट कर छुट्टा वापिस करना है।
पहले उसे मशीन पर कॉफ़ी और बिस्कुट के पैसे पंच करवाए गए। फिर उसमें पाँच पाउंड की पेमेंट डाली गई। उसके बाद उसे समझाया गया कि कितने पैसे छुट्टे वापस करने हैं। इस सारी प्रक्रिया का वीडियो कैफ़े की मैनेजर बना रही थी। उसके बाद मैनेजर उस प्यारे-से युवक को मेरी टेबल पर लाई और उसने मुझे रसीद के साथ एक पाउंड चालीस पेंस की चेंज वापस की। इस सारी प्रक्रिया के दौरान मुझे उस युवक पर बेइंतिहा प्यार आ रहा था कि कितनी शिद्दत से वह सारा काम सीख रहा था। इसकी कोई गारंटी नहीं थी कि पंद्रह मिनट के बाद उसे यह प्रक्रिया याद भी रह पाएगी या नहीं।
आपने ऊपर दिए चित्र को देखकर यह बात तो समझ ली होगी कि यह कैफ़े हमारे क्षेत्र के पुस्तकालय दि वील्डस्टोन सेंटर के भवन में स्थित है। इस रेस्टॉरेंट को चलाने वाली संस्था ‘हैरो एसोसिएशन ऑफ़ डिसेबल्ड पीपल’ की स्थापना एक छोटे संगठन के रूप में वर्ष 1972 में की गई थी। उस समय हैरो में विकलांग लोगों के लिए कोई संगठित संस्था मौजूद नहीं थी।


आपके द्वारा लिखा गया सम्पादकीय मनोबल बढ़ाने में मदद करता है मेरा ऐसा मानना है कि मानसिक अपाहिज न होना, हर जीत आपकी होगी
इस ख़ूबसूरत और सारगर्भित टिप्पणी के लिए स्नेहाशीष मोनिका।
बहुत ही सराहनीय कार्य। सैल्यूट है इन्हें । बहुत ही भावुक और संवेदनशील। काश भारत में भी ऐसी योजनाएं होती।
अंजु जी, हमें ऐसे बच्चों को बराबरी का अहसास दिलाना आवश्यक है। हार्दिक धन्यवाद।
बेहतरीन कार्य, साधुवाद, ऐसे महान कार्यों के लिए तारीफ़ या शुक्रिया के शब्द छोटे हो जाते हैं, शुक्रिया इस दुनिया से परिचित कराने के लिए
इस सकारात्मक टिप्पणी के हार्दिक धन्यवाद आलोक।
ऐसे रेस्टोरेंट्स हमारे देश मे भी होने चाहिए, य़ह बहुत अच्छी पहल है
बिल्कुल सही कहा जया। धन्यवाद।
संवेदनाओं को व्यक्त करता प्रेरक आलेख व जानकारी । साधुवाद
धन्यवाद अनीता जी।
इस बार “पुरवाई” का सम्पादकीय किसी राजनैतिक -सामाजिक कोलाहल और हाहाकार से अलग पाठकीय मनोभाव को भीतर ही भीतर द्रवित करने विषयक है।
“रेड ब्रिक कैफ़े” की सेवा भावना मानवीय मूल्यों का जीवंत उदाहरण है । ब्रिटेन में मानसिक रूप से विकलांग बच्चों के मनोबल को सबको समानांतर गतिमान रखने का उपक्रम प्रेरित करता है ।
रेस्टॉरेंट की संचालिका
– ‘हैरो एसोसिएशन फ़ॉर डिसएबल्ड पीपल’ की भूमिका सराहनीय है । यह प्रत्येक देश के लिए अनुकरणीय है ।
इन विकलांग बच्चों की फोटो देखते पर कथाकार तेजेंद्र शर्मा जी की कहानी “ गोद उतराई “ का सहसा स्मरण हो आया , जिसमें मानसिक रूप से विकलांग एक बच्चे की मार्मिक स्थितियों का सफलतम चित्रांकन है ।
समाजोपयोगी सम्पादकीय के लिए सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा जी को बधाई और शुभकामनाएँ ।
——
मीनकेतन प्रधान
रायगढ़ (छत्तीसगढ़) भारत
भाई मीनकेतन जी, इस भावपूर्ण साहित्यिक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
हैरो एसोसिएशन फ़ॉर डिसेबल्ड पीपल का यह एक सराहनीय प्रयास है। उन्हें दया नहीं अधिकार मिलना चाहिए। उनको डिफरेंटली एबल होने का एहसास कराना चाहिए। भारत में भी ऐसे प्रयास के लिए सरकार और गैर सरकारी संस्थाओं को आगे आना पड़ेगा। दिव्यांग जनों के सशक्तिकरण की दिशा में यह संपादकीय लेख एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाने में सक्षम होगा।
हार्दिक बधाई, धन्यवाद।
जयंत भाई, आपकी टिप्पणी हमारे लिए महत्वपूर्ण है। ऐसी ज़िम्मेदारी भरा संपादकीय लिखने की प्रेरणा मिलती है।
आदरणीय सर, सादर प्रणाम।
आपका यह संपादकीय ‘एक अलग किस्म की दुनिया’ केवल एक लेख नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं का एक अत्यंत गहरा और प्रेरक दस्तावेज़ है। आपने लंदन के हैरो में स्थित ‘रेड ब्रिक कैफ़े’ के माध्यम से समाज के उस वर्ग की ओर हमारा ध्यान आकर्षित किया है, जिसे अक्सर मुख्यधारा से काट दिया जाता है। संपादकीय की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह दिव्यांगता को ‘बेचारगी’ के चश्मे से नहीं, बल्कि ‘आत्मनिर्भरता’ और ‘समान अधिकार’ के दृष्टिकोण से देखता है। ऑटिज़्म और डाउन सिंड्रोम जैसी चुनौतियों से जूझ रहे युवाओं को व्यावसायिक प्रशिक्षण देकर उन्हें समाज का सक्रिय हिस्सा बनाना एक क्रांतिकारी सोच है, जिसे आपने बहुत ही आत्मीयता के साथ बुना है।
आपका सूक्ष्म अवलोकन प्रशंसनीय है, विशेषकर जब आप पाँच पाउंड के नोट से छुट्टा वापस करने की तकनीकी और धैर्यपूर्ण प्रक्रिया का वर्णन करते हैं। यह दृश्य पाठक के मन में उन बच्चों के प्रति गहरा सम्मान पैदा करता है जो अपनी सीमाओं के बावजूद सीखने का जज्बा रखते हैं। कोस्टा कॉफ़ी जैसी बड़ी श्रृंखलाओं के साथ इस कैफ़े की तुलना करके आपने न केवल आर्थिक पहलू को छुआ है, बल्कि यह भी बताया है कि यहाँ दी जाने वाली सेवा का मूल्य मुद्रा से कहीं अधिक ‘सुकून’ और ‘संतुष्टि’ में निहित है।
ब्रिटिश समाज की इस जागरूकता को रेखांकित करते हुए आपने भारत के संदर्भ में जो आह्वान किया है, वह अत्यंत सामयिक है। यह संपादकीय हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि असली विकलांगता शरीर में नहीं, बल्कि समाज की उस सोच में है जो इन बच्चों को बराबरी का अवसर नहीं देती। ‘हर तरह की विकलांगता दिखाई नहीं देती’ जैसी पंक्ति पाठकों को आत्मचिंतन के लिए विवश करती है।
कहना अनुचित नहीं होगा कि आपका यह दृष्टिकोण न केवल ‘पुरवाई’ की संपादकीय गरिमा को बढ़ाता है, बल्कि समावेशी समाज के निर्माण की दिशा में एक सशक्त वैचारिक हस्तक्षेप भी है। आपने अपनी सहज भाषा और कथात्मक शैली से एक गंभीर सामाजिक मुद्दे को अत्यंत मर्मस्पर्शी बना दिया है।
भाई चन्द्रशेखर जी, आपने जिस मेहनत से सारगर्भित टिप्पणी लिखी है, हमारे लिए पुरस्कार से कम नहीं है। हार्दिक धन्यवाद
जी, इस स्नेह हेतु आभारी हूॅं।
मानवीय संवेदनाओं से भरपूर बहुत ही बेहतरीन संपादकीय…भारत में भी धीरे धीरे ऐसी सोच विकसित हो रही है। हार्दिक शुभकामनाएं
बहुत शुक्रिया संगीता।
मैं हमेशा आपके संपादकीय की प्रतीक्षा करती हूँ। जिसमें समसामयिक विषयों पर बेहतरीन जानकारी रहती है। बहुत-बहुत धन्यवाद!
सरिता जी, किसी भी पत्रिका के लिए यह सम्मान का विषय है कि पाठक उसके संपादकीय की प्रतीक्षा करें। आपका दिल से शुक्रिया।
मानवीय संवेदनाओं से परिपूर्ण और प्रेरणात्मक संपादकीय। दिव्यांगों और मानसिक रूप से सक्षमता की बाट जोह रहे विशेष मानवों को केंद्र में रखा गया है।
तथ्यात्मक रूप से रोचक वर्णन !!!
संपादक महोदय को बधाई।
बहुत बहुत धन्यवाद सर जी।
इस बार का संपादकीय -‘ एक अलग किस्म की दुनिया’ में आपने मानसिक रूप से विकलांग लोगों की सहायता में लगी संस्था HAD को केंद्र में रखा है। मानवीय संवेदना का यह उदाहरण प्रेरणादायक है।
आंखों देखी लिखी गई संपादकीय और वहां के चित्र देखकर पूरी तस्वीर दिमाग में चलचित्र की तरह घूमने लगती है। किस तरह का माहौल होगा वहां का, आए हुए लोगों को देखकर उनके चेहरों पर कैसे भाव बनते होंगे आदि आदि।
पश्चिम जगत कई बातों में शेष विश्व से आगे रहता है। विकलांगों के प्रति कई लोगों में हिकारत का भाव देखा गया है। यह संस्था उनके लिए जिस तरह का काम कर रही है, वह प्रशंसा से ज्यादा आदरित वाला भाव जगा रही है। वर्तमान मानव विकलांगों को अपने हाल पर छोड़कर विकास की अंधी दौड़ में दौड़ा जा रहा है और वही ये लोग पीछे छूटते जा रहे हैं। इन पर लोगों पर कम ध्यान है।
संपादकीय को पढ़कर एक घटना मुझे याद आ रही है। जंगल में शेरों ने हाथी के बच्चे पर हमला कर दिया। मां हाथी ने बचाने की भरपूर कोशिश की पर शेरों ने उसे इतना लहूलुहान कर दिया था कि वह उठ नहीं सकता था। जंगल का ये नियम है कि जो उठ नहीं सकता है, चल नहीं सकता है, उसे यूं ही शिकारियों के हवाले कर दिया जाता है। इस स्थिति में मां हाथी बच्चे को छोड़कर आगे बढ़ गई थी।
उस दृश्य को देखकर मन व्यथित हो गया था। विकलांग बच्चों को ऐसे तो नहीं छोड़ा जाता है। बार-बार दिमाग में मंथन चल रहा था।
इस संपादकीय ने लंदन की संस्था HAD ने साबित कर दिया है कि मानवीय दुनिया के नियमों में विकलांग बच्चों को यूं नहीं छोड़ा जाता है। उनको दया पर नहीं, आत्मनिर्भर बनाकर आमजन जैसा जीवन व्यतीत कराया जाता है। मैं इसे उस घटना का जवाब मान रहा हूं। इस संस्था को सैल्यूट और उस देश के लोगों को भी सैल्यूट करता हूं।
मानवीय संवेदनाओं से भरपूर इस संपादकीय को बहुतायत में पढ़ा जाना चाहिए।
हमारी संवेदनाएं आप तक पहुंच पाईं, यह हमारे लिए महत्वपूर्ण है भाई लखन लाल पाल जी। आपने बहुत विस्तार से अपनी टिप्पणी लिखी है जिससे हमें और बेहतर लिखने की प्रेरणा मिलती है। हार्दिक धन्यवाद।
आपके संपादकीय हमेशा ही अलग अलग विषयों पर आधारित होते हैं। देश- दुनिया , समाज और व्यक्ति की विभिन्नताओ को सोचने के लिए बाध्य करता संपादकीय।
इस बार रेड ब्रिक कैफे ने पुरवाई में अपनी उपस्थिति दर्ज की है। नए जगह को खोज कर उनसे परिचय करवाने के लिए आपका अभिनंदन ।
इस उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद संगीता जी।
संपादकीय पढ़ते हुए “मिट्टी” कैफे के बारे में सोचती रही। भारत में 2017 में “मिट्टी” कैफे श्रंखला की शुरुआत हुई थी। जैसा आपने लिखा, लगभग इसी तरह के चैलेंजिग लोग इस श्रृंखला में काम कर रहे हैं।
मिट्टी कैफे के बारे में नई जानकारी मिली। यह कहां पर संचालित हो रही है? कृपया बताइएगा।
इस जानकारी के लिए हार्दिक धन्यवाद वन्दना जी। जानकर संतोष हुआ। धन्यवाद आपका।
शारीरिक विकलांग के लिए भारत में दिव्यांग शब्द का प्रयोग होता है, जिन्हें विभिन्न क्षेत्रों में सुविधाएं प्रदान करने की मुहीम चलती हैं, लेकिन मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों या बड़ों को आत्मसम्मान और आत्मनिर्भर बनाने के प्रयास बहुत कम होते हैं, आपका संपादकीय समाज में जागरुकता बढ़ाने का सुखद प्रयास है, जिसका अधिक से अधिक प्रचार प्रसार होना आवश्यक है सर. ऐसी संस्था को सलाम है.
आपको भी हार्दिक अभिनंदन और साधुवाद.
आपने ठीक कहा संगीता। समाज के लिए आवश्यक है कि इस ओर ठोस और सकारात्मक कदम उठाए जाएं।
आदरणीय तेजेंद्र जी, आपका प्रत्येक संपादकीय हमारे लिए महत्वपूर्ण होता है। इस बार आपने, मानसिक रूप से विकलांग व्यक्तियों को सामान्य जीवन प्रदान करने की सुविधा की बात की है। उदाहरण स्वरूप अआपने एच.ए.डी. द्वारा संचालित रेडब्रिक कैफे के क्रियाकलाप का विस्तार में वर्णन किया है। आपके कथाकार की दृष्टि आपके संपादकीय में झलकती है। आप बहुत सतर्क तरीके से आसपास की गतिविधियों पर ध्यान देते हैं तथा कुशलता पूर्वक उन्हें अपने शब्दों में प्रस्तुत कर देते हैं। विदेशों में विकलांग व्यक्तियों के लिए बहुत सुविधाएं हैं किंतु अपने देश में मानसिक अपंगता के लिए अभी कोई अलग से प्रयास नहीं दिखाई देता है। इस दिशा में प्रयास हो रहे होंगे किंतु सतह पर अभी नज़र नहीं आते। संगीता चौबे पंखुड़ी को पढ़कर यह अच्छी जानकारी मिली की मिट्टी नाम से कोई संस्था मानसिक विकलांग लोगों के लिए कुछ कार्य कर रही है । उम्मीद है भविष्य में समाज में संपन्न लोगों की दृष्टि इस इस ओर भी जाएगी।
हमें नई जानकारी देने के लिए हार्दिक धन्यवाद।
तेजेंद्र जी लंगर चलता है कि नहीं लंदन में? कृपया बताइएगा।
विद्या जी गुरुद्वारों और मंदिरों में लंगर चलते हैं। संपादकीय पर आपकी सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
आपने अपने संपादकीय ‘एकदम अलग किस्म की दुनिया में’ आपने हैरो एसोसिएशन फ़ॉर डिसएबल्ड पीपल’ (HAD) द्वारा विकलांगों के लिए, उनके द्वारा चलाये जा रहे ‘रेड ब्रिक कैफ़े’ के द्वारा अच्छी जानकारी दी है। इस कैफ़े का काम सराहनीय ही नहीं, नई सोच को विकसित करने वाला भी है।
ऐसे बच्चे भी समाज के अंग हैं, ऐसे कैफे हर देश में होने चाहिए जिससे बच्चों को समाज की मुख्य धारा में लाया जा सके। इसके साथ ही समाज का हर वर्ग अपना कर्तव्य समझ सके।
इसको पढ़कर मुझे तारे जमीन पर पिक्चर की याद आ गई।
प्रेरणास्पद संपादकीय के लिए साधुवाद।
सुधा जी हम सबके मन में मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों की एक छवि होती है जो किसी कहानी, फ़िल्म या अनुभव से जुड़ी होती है। आपने सही कहा है कि – ऐसे बच्चे भी समाज के अंग हैं, ऐसे कैफे हर देश में होने चाहिए जिससे बच्चों को समाज की मुख्य धारा में लाया जा सके। इसके साथ ही समाज का हर वर्ग अपना कर्तव्य समझ सके।
आपके सम्पादकीय की प्रतीक्षा रहती है.जैसे यह लेख ही कितना प्रेरक है. भारत में शायद ऐसी संस्था नहीं है.होगी भी तो मुझे जानकारी नहीं है.
आदरणीय तेजेन्द्र जी!
आज का संपादकीय बेहद करुण लगा !मन अंदर तक भीग गया।
इस बात के लिये तो ब्रिटिश सरकार की दिल खोलकर तारीफ की जानी चाहिये।
यहाँ भारत में तो किसी नेता के दिमाग में यह बात आ ही नहीं सकती, और धोखेधड़ी से किसी के दिमाग में आ भी गई तो सिरे से खारिज कर दी जाएगी।
यह भी सही है,कि जब तक पूरी बात पता नहीं होती तो अपन अपने शहर के प्रति गर्वित होते हैं।अब पूरे देश के प्रति गर्वित होने की बात है।
और हम लोग भी बहुत अच्छा महसूस कर रहे हैं यह जानकर कि दुनिया में ऐसा भी देश है,ऐसी शासन व्यवस्था भी है और ऐसे लोग भी हैं जो मानसिक रूप से विकलांग लोगों की आत्मनिर्भरता के लिये इतनी सजगता व सचेतनता से न केवल प्रतिबद्ध हैं, बल्कि निरंतर प्रयासरत हैं ताकि वे लोग बड़े होकर अपने पैरों पर खड़े हो सकें, आत्मनिर्भर बन सकें।
यह काम ऐसा है, जिसमें बहुत अधिक धैर्य की आवश्यकता होती है। क्रोध के लिये तो यहाँ जगह ही नहीं।
निश्चित रूप से आपने एक नई दुनिया से ही परिचय करवाया है सर जी !जिसके बारे में सोचना तो क्या कल्पना भी नहीं की जा सकती।
आपको पढ़कर लगा कि वास्तव में ‘रेड ब्रिक कैफे’ एक सोच एक मुहिम ही है। सभी लोगों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ! काबिले तारीफ है यह।
भारत में तो भ्रष्टाचार इतना है कि लोग अगर सोचेंगे भी तो इस हिसाब से कि इसमें कितना लाभ अपने को होगा और किस तरह से?
हालांकि स्कूल यहाँ पर भी हैं। पर स्कूल ही हैं।
इस संपादकीय के लिए आपकी जितनी भी प्रशंसा की जाये उतनी कम है कि पुरवाई के सदस्यों के लिए और संपादकीय में तथ्य पूर्ण जानकारी देने के लिये उस कैफे में जाकर हर चीज को बड़ी बारीकी से परखा और एक-एक बात को परख कर ब्यौरेवार वर्णन किया। पढ़ते हुए ऐसा लगा मानो वक्त कुछ देर के लिये वहाँ पहुँच गया और सब कुछ हम अपनी आँखों से देख और महसूस कर रहे हैं। इतनी मेहनत!!!!!और मूल्य भी कम!!!! संवेदनाओं ने यहाँ आकाश छू लिया और कहने के लिए शब्द चुक गए।
अपन सभी कितने भाग्यशाली हैं कि भगवान ने हर तरह से स्वस्थ बनाया, किंतु नियति सबके लिए एक सी नहीं होती।
हमने सबसे पहले होशंगाबाद में ही ऐसे बच्चों और लोगों को देखा। हमारे आसपास ही कम से कम 4-5 ऐसे थे।
और हमारी खुद की जूनियर फ्रेंड के दोनों बेटे ऐसे थे। वह दोनों तो बहुत जल्दी शांत हो गए।
पता नहीं इस तरह की बीमारियों के कितने प्रकार रहते होंगे क्योंकि हमें भिन्न-भिन्न रूपों में नजर आए।
यह बात सही है कि हर तरह की विकलांगता दिखाई नहीं देती है, और जो दिखलाई नहीं देती है वही चीज ज्यादा तकलीफ देह होती है। पर हैं तो वह भी इंसान ही।इसके लिये सबसे अधिक प्रेम और धैर्य की सख्त आवश्यकता होती है। ऐसा हम सोचते हैं।
स्कूल में कुछ समय के लिए हमें भी एक दो बार इस तरह के एक दो बच्चों को संभालना पड़ा था। वह समय हमारे लिए कठोर परीक्षा का था और अनुभव बिल्कुल नहीं। वहाँ हमने एक माँ की हैसियत से काम लिया। जिन माताओं को जागती आँखों से हर पल इस स्थिति से गुजरना होता होगा उनके लिए तो जिंदगी ही परीक्षा बन जाती है।
जब से पढ़ा है, तब से एक अजीब सी विचलन है। ‘रेड ब्रिक कैफे’और फोटो आँखों के सामने से हट नहीं रहे।
पर एक चीज हमने नोट की, इन लोगों में कोई ना कोई एक खूबी उभर के आती है। कुछ में हमने ऐसा पाया।
इस अपरिचित किंतु महत्वपूर्ण संपादकीय के लिए तहेदिल से आपका शुक्रिया।
आदरणीय नीलिमा जी, आपने समय निकाल कर संपादकीय को पढ़ा और इतने विस्तार से अपनी टिप्पणी लिखी – इसके लिए आपको विशेष धन्यवाद। स्नेह बनाए रखें।
संवेदना से परिपूर्ण प्रेरणादायी सम्पादकीय।मानसिक विकलांगता कोई बीमारी नहीं, बस एक कमी है। HAD का कार्य सराहनीय है। संस्था के बारे में अवगत कराने के लिए साधुवाद।
हार्दिक धन्यवाद सुदर्शन जी।
मानसिक विकलांगता दिन पर दिन बढ़ती जा रही है, ऐसे बच्चों को शिक्षित करने वाली बेटी की मां होने के नाते इस कार्य की सराहना करती हूं बल्कि ऑटिज्म जैसे विषयों को गहराई से समझकर लिखती भी हूं।
जो ब्रिटेन में पहल की जा रही है, इसका हमारे देश में अभाव है। जब मां बाप अपने बच्चों की उपेक्षा करते हों तो देश क्या सोचेगा?
यहां एक संस्थान ऐसा जरूर है, जो एक डाउन सिंड्रोम से ग्रसित बच्चे की डॉक्टर मां ने खोला है क्योंकि उसके डॉक्टर पति ने उसे इसीलिए छोड़ दिया कि वह बच्चे को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे।
उसने और बच्चों को वहां आत्मनिर्भर बनाने की दृष्टि से खोला और सृजन सिखाया। बस समय समय पर हम अपनी साहित्यिक संस्था के प्रोग्राम रखते हैं और वहां से उन बच्चों द्वारा तैयार सामान खरीदते हैं।
हमारे यहां सरकार भी यह व्यवस्था नहीं कर पाती कि इनके लिए विशेष स्कूलों की स्थापना कर सकें। सिर्फ दिल्ली की बात करूं तो ऐसे बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने और शिक्षित करने का एक सेशन की फीस आठ सौ से लेकर बारह सौ तक है। उनको आत्मनिर्भर बनाने का प्रयास तो सिर्फ सपना है।
रेखा जी आपने अपनी डॉक्टर मित्र की व्यथा साझा करके और अपनी बेटी के अनुभवों से अपने को पुख़्ता करके जो टिप्पणी लिखी है मन को छू गई है। हार्दिकआभार।
संवेदनाओं से परिपूर्ण प्रेरणात्मक संपादकीय के लिए हार्दिक धन्यवाद Sir।
स्नेहाशीष आशुतोष।
बहुत सुंदर मार्मिक संवेदनशील संपादकीय के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई और हमें बहुत बढ़िया इनफार्मेशन मिली इसके लिए भी आपको धन्यवाद। यह बहुत बड़ा काम है।
आदरणीय भाग्यम जी, हार्दिक आभार।