Sunday, May 17, 2026
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कवयित्री एवं लेखिका मंजु मंगल प्रभात लोढ़ा से तेजेन्द्र शर्मा की बातचीत

डॉ. मंजू मंगल प्रभात लोढ़ा एक बहुमुखी व्यक्तित्व की मालिक हैं। वे एक philanthropist, कवयित्री, लेखिका, प्रेरक वक्ता और समर्पित सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो लोढ़ा फाउंडेशन के माध्यम से समाज में अपने उल्लेखनीय योगदान के लिए जानी जाती हैं।

डॉ. मंजू लोढ़ा एक सजग एवं सक्रिय साहित्यकार हैं और विविध विषयों पर 14 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। उनकी काव्य प्रतिभा और साहित्यिक गहराई ने उन्हें राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ख्याति दिलाई है। साहित्य, परोपकार और सामाजिक नेतृत्व में उनकी उत्कृष्टता को मान्यता देते हुए उन्हें अब तक 100 से अधिक प्रतिष्ठित पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

सार्वजनिक सेवा की समृद्ध विरासत वाले परिवार में जन्मी डॉ. मंजू लोढ़ा ने बचपन से ही सामाजिक जिम्मेदारी को अपनाया। शिक्षा, संस्कृति और मानवीय सेवा के प्रति गहरी प्रतिबद्धता के साथ, डॉ. मंजू लोढ़ा अपने शब्दों, कार्यों और समाज के प्रति अटूट समर्पण से लोगों को प्रेरित करती रहती हैं। हाल ही में लंदन के नेहरू सेंटर में पुरवाई के संपादक तेजेन्द्र शर्मा को उनसे बातचीत करने का अवसर मिला। वही बातचीत आपके लिए प्रस्तुत है –

तेजेन्द्र : मंजु जी समाज कल्याण के काम तो आपके मायके में भी होते रहे हैं और ससुराल में भी। साहित्य की ओर आपका रुझान कब और कैसे शुरू हुआ?

मंजु :- मुझे बचपन से ही पुस्तकों से गहरा लगाव रहा है। हर तरह की किताबें पढ़ने का मुझे बहुत शौक था। कहानियाँ, उपन्यास, रहस्य और रोमांच से भरपूर साहित्य, यानी गुलशन नंदा, कर्नल रंजीत, वेद प्रकाश शर्मा से लेकर महादेवी वर्मा, जयशंकर प्रसाद, बच्चन जी और नीरज जी जैसे महान साहित्यकारों की रचनाएँ मैं बड़े मन से पढ़ा करती थी। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं की कहानियाँ भी मुझे बहुत प्रभावित करती थीं। बचपन में आने वाली बच्चों की पत्रिकाएँ और कॉमिक्स, जैसे ‘नंदन’, भी मैं बड़े उत्साह से पढ़ती थी। शायद वहीं से साहित्य के प्रति मेरा प्रेम जागृत हुआ और धीरे-धीरे मेरा झुकाव साहित्य की ओर बढ़ता चला गया।

मेरे लिए साहित्य कोई अचानक लिया गया निर्णय नहीं था, बल्कि यह मेरे भीतर बचपन से ही बहती संवेदनाओं की एक स्वाभाविक धारा थी। मायके में सेवा, संस्कार और समाज के प्रति समर्पण देखा और ससुराल में भी वही वातावरण मिला। इन अनुभवों ने मेरे मन में भावनाओं का एक सुंदर संसार रचा, और वही भाव धीरे-धीरे शब्दों में ढलने लगे। धीरे-धीरे यह लिखना मेरे लिए आत्म-अभिव्यक्ति का माध्यम बन गया और साहित्य मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बनता चला गया।

तेजेन्द्र : भिन्न विधाओं में आपकी 14 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपकी प्रिय विधा कौन सी है… आप किस विधा में अपने आपको सबसे अधिक सहज पाती हैं?

मंजु :- मैंने विभिन्न विषयों पर पुस्तकें लिखी हैं जैसे माँ पर, पिता पर, भगवान को चिट्ठियाँ लिखीं। इसके अलावा मैं अनेक सामाजिक और समसामयिक विषयों पर लेख भी लिखती हूँ। कहानियाँ मैंने बहुत कम लिखी हैं, शायद एक-दो ही कहानियाँ आज तक लिख पाई हूँ।

हालाँकि मैंने कई विधाओं में लिखा है, लेकिन कविता मेरे दिल के सबसे करीब है। कविता लिखते हुए या उसे पढ़ते हुए मन को एक अद्भुत सुकून मिलता है। ऐसा लगता है जैसे हृदय के भीतर कोई निर्मल नदी कल-कल बहने लगी हो। कविता एक ऐसा माध्यम है, जहाँ कम शब्दों में बहुत गहरी बात कही जा सकती है। इसके माध्यम से हम अपनी भावनाओं को सहजता से दूसरों तक पहुँचा सकते हैं।

कविता में मैं अपने मन की हर भावना को सहज रूप से व्यक्त कर पाती हूँ — चाहे वह प्रेम हो, पीड़ा हो, देशभक्ति हो या जीवन के अनुभव। कई बार कुछ कविताएँ पाठकों को इतनी अपनी लगती हैं कि उन्हें महसूस होता है मानो यह उनके ही दिल की बात हो। शायद यही कारण है कि कविता हमेशा मेरे हृदय के अत्यंत निकट रही है।

तेजेन्द्र : अपने कविता संग्रह संवेदनाओं के सफ़रऔर जीवन के रंग कविताओं के संगमें आपने भारत के प्रधानंत्री श्री नरेन्द्र मोदी, उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी जी एवं सिनेमा कलाकार अमिताभ बच्चन पर कविताएं लिखी है। ऐसी व्यक्तिपरक कविताएं लिखने के पीछे आपकी क्या सोच है?

मंजु :- मैंने उन्हीं व्यक्तित्वों पर कविताएँ लिखी हैं, जिनसे मैं स्वयं रूबरू मिल चुकी हूँ। जब किसी व्यक्ति को करीब से देखने, समझने और उसके व्यक्तित्व के भीतर छिपी संवेदनाओं को महसूस करने का अवसर मिलता है, तभी उस पर लिखे शब्दों में सच्चाई और आत्मीयता उतर पाती हैं।  मैंने श्री नरेंद्र मोदीजी, श्री अमित  भाई शाह, श्री देवेंद्र  फड़नवीस, श्री योगी जी ,श्री अमिताभ बच्चन , श्री धर्मेंद्र जैसे अनेक प्रेरणादायी व्यक्तित्वों पर लिखा है। जब मैंने मोदी जी को अपनी पुस्तकें भेंट कीं, तब उनका उन्हें बड़े ध्यान और आत्मीयता से देखना मेरे लिए अत्यंत गर्व का क्षण था। उन्होंने बहुत सहजता से बातचीत की और लेखन को आगे किस दिशा में ले जाना चाहिए, इस पर अपने विचार भी साझा किए।

अमित भाई शाह जी आज जिस पद पर हैं, प्रसिद्धि के उच्च शिखर पर है, परिवार के लिए उनके पास समय जरूर है, परिवार के प्रति गहरा जुड़ाव देखा। जब भी मुंबई आते हैं बहन से मिलने जरूर जाते हैं उनके पोते-पोतियों से खेलते हैं। व्यस्तता के बीच भी वे अपने परिवार के लिए समय निकालते हैं और रिश्तों को सहेजकर रखते हैं।

देवेंद्र जी फडणवीस सदैव मुसकुराते हुए, सकारात्मक और आत्मीय लगे। योगी जी का गायों के प्रति प्रेम, उनका सादा जीवन और शांत स्वभाव मन को छू जाता है।

अमिताभ बच्चनजी से  मुलाकात के दौरान उनका स्नेह भाव  मन को छू  लिया , वह जितनी लोगों की सामाजिक मदद करते हैं, उसके बारे में किसी को नहीं बताते, दाएं हाथ से दिया तो बाएं हाथ को भी पता ना चले।

धर्मेंद्र जी से मुलाकात के दौरान उनका अपने गाँव, बचपन और माँ के प्रति लगाव देखकर मैं भावुक हो गई। बातें करते-करते उनकी आँखें नम हो गई थीं। कई बार बड़े व्यक्तित्व बाहर से दृढ़ दिखाई देते हैं, लेकिन भीतर उनका मन बेहद कोमल और भावुक होता है। संघर्षों से निकले इन लोगों की यही मानवीय संवेदनाएँ मुझे सबसे अधिक प्रभावित करती हैं और शायद इसी कारण मैं उनके बारे में सहजता से लिख पाई।

श्री नरेंद्र जी मोदी, अमित भाई शाह, योगी जी, देवेंद्र जी, अमिताभ बच्चन, धर्मेंद्र जैसे व्यक्तित्व केवल नाम नहीं, बल्कि प्रेरणा, संस्कार और जीवन मूल्यों के प्रतीक हैं। मेरी कविताएँ और लेखन उनके बाहरी वैभव से अधिक, उनके भीतर छिपी संवेदनाओं और मानवीय गुणों को अभिव्यक्त करने का प्रयास हैं। इसके साथ ही मैंने प्रेमचंद जी सुनीता विलियम्स, किशोर कुमार, मोहम्मद रफ़ी जैसे अनगिनत प्रेरणादाई व्यक्तित्वों पर लिखा हैं।

 तेजेन्द्र : आपकी एक पुस्तक भारतीय सेना के परमवीर चक्र विजेताओं के बारे में भी प्रकाशित हो चुकी है। इस तरह आपको भारतीय सैनिकों की भीतरी  सोच को भी समझने का अवसर मिला होगा। इस पुस्तक के लिखने के दौरान क्या आपने अपने व्यक्तित्व में कोई बदलाव महसूस किया?

मंजु :– जब मैं ‘परमवीर चक्र अवार्ड डायरी’ लिख रही थी, तब मेरा मन उन सैनिकों के प्रति हमेशा नतमस्तक रहा, जो अपना परिवार, अपने रिश्ते-नाते, अपना सुख-चैन सब कुछ छोड़कर देश की रक्षा करते हैं। वे हमारे लिए, देश के लिए अपने प्राणों का बलिदान दे देते हैं। आज उन्हीं की वजह से हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं। वे खून की होली खेलते हैं, इसलिए हम दिवाली मना पाते हैं।

दुनिया की सारी दौलत अगर तराजू के एक पलड़े में रख दी जाए और दूसरे पलड़े में एक सैनिक की बहादुरी, तो उस बहादुरी का पलड़ा हमेशा भारी रहेगा। मेरा तो मानना है, और मैं सबसे निवेदन भी करती हूँ कि जब भी कोई वर्दी-धारी सैनिक दिखे, तो उनके सम्मान में खड़े होकर तालियाँ अवश्य बजाइए। साल में कम से कम एक त्योहार सैनिकों के साथ ,शहीद सैनिकों के परिवारों के साथ जरूर मनाइए, ताकि उन्हें यह एहसास हो कि आज भी देश की 125 करोड़ जनता उनके साथ खड़ी है। उनके घर के बेटे, पति, पिता का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। यह एहसास हमें उन्हें हमेशा कराते रहना चाहिए।

इस भावना की शुरुआत भी एक विशेष अवसर से हुई। वर्ष 2014 में, जब “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत के 50 वर्ष पूरे हो रहे थे, तब लोढ़ा फाउंडेशन के माध्यम से हमने रेसकोर्स में एक भव्य कार्यक्रम आयोजित किया था। वहाँ माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी, लता दीदी, कवि प्रदीप जी की बेटी और मंच पर उपस्थित हमारे देश के वे वीर सैनिक थे, जिन्हें परमवीर चक्र, कीर्ति चक्र और अन्य वीरता पदकों से सम्मानित किया गया था। उस दिन उनका विशेष सम्मान किया गया। १,५०,००० लाख लोगों ने एक साथ लता जी के साथ “ऐ मेरे वतन के लोगों” गीत गाया था। वह वातावरण ऐसा था, जिसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता।

उस समय चुनावों से पहले का दौर था और नरेंद्र मोदी जी का वहाँ अत्यंत प्रभावशाली वक्तव्य रहा। पूरा जनसमूह एक स्वर में “मोदी जी हमारे प्रधानमंत्री बनेंगे” के नारों से गूंज उठा था। वातावरण ही अलग था। कार्यक्रम समाप्त होने के बाद जब कई सैनिक मुझसे मिले, तो उन्होंने नर्म आवाज  में कहा, “बेटा, बहुत अच्छा काम किया। हमारे सम्मान तो बहुत हुए हैं, लेकिन किसी गैर-सरकारी संस्था द्वारा इतने बड़े स्तर पर और इतने लोगों के सामने इस प्रकार सम्मान मिलना हमारे लिए बहुत बड़ी बात है।”

उसी दिन मेरे मन में यह भाव आया कि आज तक मैं भी इन वीरों के त्याग, साहस और बलिदान को पूरी तरह नहीं जानती थी। जब हम ही नहीं जानते, तो देश की युवा पीढ़ी इनके बारे में कैसे जानेगी? तभी मेरे मन में इस पुस्तक को लिखने का विचार आया और मैंने “परमवीर चक्र अ वार डायरी” पुस्तक लिखी। कई स्कूलों में इसकी प्रदर्शनी भी लगवाई, ताकि बच्चे हमारे वीर सैनिकों के बारे में जान सकें।

अब तक देश में 21 वीर जवानों को परमवीर चक्र प्राप्त हुए हैं, जिनमें से साथ को जीवित रहते हुए तथा 14 वीरों को यह सम्मान मरणोपरांत मिला। आज भी उनमें से तीन वीर हमारे बीच जीवित हैं। और मुझे परमवीर चक्र विजेता श्री बाना सिंह जी से मिलने का सौभाग्य तीन बार प्राप्त हुआ।

तेजेन्द्र : मंजु जी आपने स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा, महिला सशक्तिकरण, स्वच्छता और सामाजिक कल्याण के क्षेत्र में काम करते हुए अनगिनत जिंदगियों में सकारात्मक बदलाव लाने में सफलता प्राप्त की है। क्या आपको इन गतिविधियों से लेखन के लिये कुछ नये थीम मिल पाते हैं?

मंजु :- जहाँ चाह, वहाँ राह और मेरे जीवन में साहित्य और शब्द कुछ इस तरह रचे-बसे हैं कि मुझे लगता है वे मेरी रग-रग में समाए हुए हैं।

कोई भी बात हो , कोई भी भावना हो, कोई भी अनुभव हो, वह कभी कविता के रूप में तो कभी लेख या आलेख के रूप में सहज ही मेरी कलम से निकल पड़ता है। अधिकतर मैं रात के शांत वातावरण में लिखती हूँ, जब चारों ओर सन्नाटा होता है और मन अपने भावों से संवाद करता है। कई बार सुबह सामायिक, ध्यान या आत्मचिंतन के क्षणों में भी मन में अनगिनत भाव उमड़ते हैं। मैं हमेशा अपने पास एक कॉपी और पेन रखती हूँ, ताकि जो भाव उस क्षण जन्म लें, उन्हें तुरंत कागज़ पर उतार सकूँ। बाद में उन्हें सुधारना पड़े, यह अलग बात है, लेकिन भावों को उसी समय शब्द देना मुझे आवश्यक लगता है।

कहते हैं न — कविता हृदय के उन कोनों की अभिव्यक्ति है, जिन्हें हमने जिया, देखा और महसूस किया हो। कवि की कविता कल्पना भी होती है और हकीकत भी। वह सूरज की तरह तेज और प्रखर होती हैं, तो चाँदनी की तरह शीतल और धवल भी। वह हिमालय की तरह अडिग, अटल और निश्चल होती हैं। सच्चा कवि कभी दुनिया के बाज़ारों में  कभी नहीं बिकता, बल्कि वह तो हर कदम पर समाज का आईना बनकर  साथ चलता हैं। मेरा मानना हैं कि हर इंसान के भीतर एक कवि छिपा होता है; कमी केवल लेखन की होती हैं,  अपनी-अपनी भावना को शब्द देने की होती हैं। जब भाव उमड़ते हैं, तब उन्हें कलम का सहारा चाहिए होता हैं, और जो व्यक्ति अपनी कलम से कागज़ को रंग देता है, कविता उसी की हो जाती हैं।

तेजेन्द्र : आपका लेखन अपने निजी अनुभवों पर आधारित होता है या उसमें कल्पना की उड़ान भी शामिल होती है? क्या कुछ ऐसी कविताएं भी लिखी हैं आपने जो पूरी तरह से कल्पना की उड़ान ही हों?

मंजु :– मेरी जो कविताएँ होती हैं, उनमें कल्पनाओं की उड़ान कम होती है, वे हकीकत से ही जुड़ी रहती हैं। मैं अपने आस- पास जो देखती हूँ, जो सोचती हूँ, उन्हीं भावों को अपनी कविताओं में लिख देती हूँ।

उदाहरण के रूप में, एक बार की बात है कि मैंने एक शुरुआत की थी “मन की बात, आओ मन की बात करो।” उसमें कई महिलाएँ आती थीं और अपने मन की बातें साझा करती थीं। कई महिलाओं को अपने पति से सम्मान नहीं मिल पाता था, उनके काम को घर में नकारा जाता था। जब उन्होंने अपनी पीड़ा व्यक्त की, तब मैंने एक कविता लिखी थी

“सब कुछ बनाया तूने, माना मैंने,

आओ जग के रचयिता,

पर तू न गढ़ पाया रे

एक ऐसा पुतला,

जो नारी संग जिए,

नारी संग मरे,

भूलकर दुनिया सारी,

वह नारी संग विचरे।…

तेजेन्द्र : मंजु जी, आप लंदन नियमित रूप से आती हैं। यहां भी हर तरह के लोगों से आपकी मुलाक़ात रहती है। लंदन शहर और यहां के लोगों के प्रति आप कैसा महसूस करती हैं?

मंजु :- लंदन एक बहुत ही सुंदर जगह है जहां पर अपना एक इतिहास है, आर्ट, म्यूजिक, कल्चर है , लंदन के लोग भी बहुत एक है वहाँ लोग अपनापन और प्यार देते है , लंदन पर मैंने एक पूरी कविता लिखी है, जिसे मैं आपसे अवश्य साझा करूँगी। जब मैं पहली बार लंदन आई थी, तब यहाँ मैं किसी को ज़्यादा नहीं जानती थी। लेकिन वर्षों से लगातार आते-जाते आज यहाँ बहुत अच्छे लोगों से मेरी मित्रता हो गई है। मेरे मोबाइल फोन में लगभग सवा सौ लोग लंदन के हैं, जिनसे मैं में बातचीत कर सकती हूँ।

तेजेन्द्र जी से मेरी पहली मुलाकात पार्लियामेंट हाउस में उनके एक कार्यक्रम के दौरान हुई थी, जहाँ मैं अपने पति के साथ गई थी। उन्होंने हमारा बहुत आत्मीयता से स्वागत किया और हमेशा मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित किया। नेहरू सेंटर में भी मैं उनके साथ दो कार्यक्रम कर चुकी हूँ। यही बड़े लोगों का बड़प्पन होता है कि वे दूसरों को आगे बढ़ाने में प्रसन्नता महसूस करते हैं। तेजेन्द्र जी एक संवेदनशील साहित्यकार हैं और लोगों को प्रोत्साहित करने का उनका स्वभाव वास्तव में प्रेरणादायक है।

यहाँ के सभी लोग बहुत अच्छे हैं और मैं हमेशा यही चाहूँगी कि मेरा लंदन आना-जाना बना रहे और सभी लोगों से मिलना होता रहे। लंदन में जैन मंदिर भी हैं, सनातन धर्म के मंदिर भी हैं, गुरुद्वारे भी हैं। मैं जब भी यहाँ आती हूँ, इन धार्मिक स्थलों पर जाकर पूजा और सेवा अवश्य करती हूँ। मुझे लगता है कि लंदन के भीतर भी एक छोटा-सा भारत बसता है, और शायद यही बात मुझे लंदन से और अधिक जोड़ देती है।

हालाँकि आजकल यहाँ ‘लॉ एंड ऑर्डर’ की स्थिति कुछ हद तक चिंताजनक दिखाई देती है, जो कभी-कभी मन में भय भी उत्पन्न करती है। लंदन जैसा सुंदर और विश्व-प्रसिद्ध शहर ऐसा होना चाहिए जहाँ लोग बेफिक्र होकर घूम-फिर सकें और अपने जीवन का आनंद ले सकें। यदि ऐसा वातावरण पूरी तरह बन जाए, तो निस्संदेह लंदन दुनिया के सबसे बेहतरीन शहरों में से एक बन सकता है।

तेजेन्द्र –  हिन्दी के युवा साहित्यकारों को आप कोई संदेश देना चाहेंगी? ताकि वे अपने लेखन की गुणवत्ता में निखार ला पाएं।

मंजु :- मैं इतनी बड़ी नहीं हूँ कि मैं किसी साहित्यकार को कुछ कह सकूँ, लेकिन हाँ मैं उनसे यही कहना चाहती हूँ कि सफलता पाने का कोई छोटा रास्ता या शॉर्ट-कट नहीं होता। निरंतर मेहनत करते रहिए, अपनी मेहनत के बल पर आगे बढ़ते रहिए। अपनी कविताओं में हमेशा आप सत्य को दिखाइए, जो वास्तव में समाज में हो रहा है उसे अपनी लेखनी में उतारिए। तब आप एक दिन निश्चित ही ऊँचाइयों तक पहुँचेंगे। मेहनत करते रहिए, निरंतर आगे बढ़ते रहिए। कौन कितना आगे बढ़ रहा है या नहीं बढ़ रहा है, इस पर ध्यान मत दीजिए। आप अपनी लकीर बड़ी कीजिए और अपने मार्ग पर निरंतर चलते रहिए। और बड़े साहित्यकारों से मैं यही कहना चाहती हूँ कि जो नए और उभरते हुए साहित्यकार हैं, उन्हें अवश्य मंच दें, उन्हें अपने कार्यक्रमों में शामिल करें, उनका उत्साह-वर्धन करें, उनकी हौसला-अफ़ज़ाई करें — जैसे तेजेन्द्र जी करते हैं।

तेजेन्द्र शर्मा
तेजेन्द्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.
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