शाम होने को अभी कुछ समय बाकी था। जैसे-जैसे सूरज पश्चिम में अपनी मंजिल की तरफ दौड़ रहा था, पेड़ों का साया पूरब की तरफ विस्तार पा रहा था। कस्बे का वह पत्रकार भी अपने साये का पीछा करता हुआ कुछ दूर अनमने ढंग से चलता रहा और सुनसान रास्ते पर एक चाय की टपरी में खाली पड़ी बैंचों में से एक पर जा बैठा। वह सोच रहा था कि बहुत दिन हुए कोई नई कहानी नहीं लिखी। उसके लिए कहानी का मतलब कोई बड़ी ख़बर की तलाश हुआ करती। टेबल स्टोरी और फर्जी किरदारों से बातें करके वह बोर हो चुका था। फ्रीलांस पत्रकार के रूप में वह जिन पत्रिकाओं से जुड़ा था, उसे कभी-कभार ही कोई काम करने लायक असाइनमेंट मिलता था। वरना जिस इलाके में वह रहता था, वहाँ की छोटी मोटी दुर्घटनाओं या अपराध से जुड़े समाचार ही संबंधित पत्रिकाओं को भेजकर उसे संतोष कर लेना पड़ता।
खर्च कम हो, तब आय कम भी हो तो अधिक परेशानी नहीं होती। जैसे तैसे गुज़र बसर हो रही थी, लेकिन उसकी उकताहट बढ़ती जा रही थी। हर दिन की वही कहानी, पुलिस इंस्पेक्टर की दी हुई जानकारी या फिर किसी अधिकारी का बयान। समाचार पत्रों को स्थानीय नेताओं में कोई दिलचस्पी नहीं थी। इसलिए उनसे भी उसे कोई अधिक फर्क नहीं पड़ता था। प्रत्यक्ष रूप से कोई असाइनमेंट किये बहुत दिन हो गये थे। वह कुछ नया करना चाहता था।
इस बार पत्रकार प्रत्यक्ष रूप से किसी नई स्टोरी के असाइनमेंट की तलाश में था। वह कुछ ऐसे किरदारों से मिलना चाहता था, जो उसे कोई सनसनीखेज़ ख़बर की जानकारी दें। जिससे पत्रिका के संपादक के सामने उसकी कर्मठ छवि का निर्माण हो। उसके मन में किसी दूसरे शहर जाने का विचार भी आया, लेकिन नयी जगह जाकर फिर नया संघर्ष, वह इसके बारे में केवल सोचता ही रहा।
खाली पेट तो दिमाग़ भी सुन्न हो जाता है। सुबह जब घर से निकला था, तो पास की बेकरी से एक बन मस्का और ठेला बंडी (गाड़ी) से दो केले, नाश्ते के तौर पर बस इतने पर ही उसे संतोष करना पड़ा था। घर में तो झिड़कियाँ और ताने ही खाने पड़ते थे। माँ बूढ़ी हो चुकी थी और भाभियों के लिए वह किसी बोझ से कम नहीं था। इसलिए अकसर सुबह बिना नाश्ते के ही घर से निकल जाता था।
वह चाय से गुज़ार लेना चाहता था, लेकिन कुछ भूख सी महसूस हुई तो उसने समोसे आर्डर किये। होटल के मालिक ने उसे एक प्लास्टिक की प्लेट में पेपर पर समोसे परोसे। होटल का मालिक ही वहां, रसोइए और बैरे दोनों काम करता था। कभी-कभी उसकी पत्नी कुछ देर के लिए उसका साथ देने चली आती थी।
समोसे खत्म हुए तो पत्रकार ने अपनी उंगलियों पर लगा समोसों का तेल साफ करने के लिए प्लेट में रखा हुआ पेपर का टुकड़ा उठा लिया। वह दो दिन पहले के ही न्यूज पेपर का फटा हुआ हिस्सा था। उसपर किसी म्युनिसिपालटी के चुनाव की खबर थी। ख़बर बड़ी रोचक थी। पास के शहर साहेबनगर में तीन प्रमुख पार्टियों के बीच जमकर मुकाबला हो रहा है। विशेष बात यह कि धर्मपुरी और मज़हबनगर के वार्डों के मतदाता निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं। खबर पढ़ते हुए पत्रकार के मन में विचार और मज़बूत हुआ कि वह इस शहर में अपना नया असाइमेंट कर सकता है। अपनी नई न्यूज़ स्टोरी के किरदारों से मिल सकता है। पत्रकार ने दिल ही दिल में साहेबनगर जाने का इरादा पक्का कर लिया। उसने पत्रिका के संपादक को फोन मिलाया और साहेबनगर की जानकारी दी। यह इत्तफाक ही था कि संपादक को वहाँ रिपोर्टिंग के लिए कार्यालय से किसी को भेजना था, लेकिन सभी रिपोर्टर शहर के चुनाव में व्यस्त थे। उसने तय किया कि कस्बे के पत्रकार को ही वहाँ भेजा जाए। इस तरह कस्बे के पत्रकार के मन की मुराद पूरी हो गयी।
दूसरे दिन सुबह वह अपने कस्बे से दूर उस शहर में था, जहाँ वह कभी-कभार ही किसी दावत में हो आया था। उसने एक लॉज के कमरे में रुकने का निर्णय लिया। शहर तो शहर था और वह भी चुनाव के हंगामों से भरपूर। हंगामा ही हंगामा, चारों तरफ शोर-गुल, सुबह से लेकर शाम तक रैलियाँ, भाषण, नारे बाज़ी और बहुत कुछ हो रहा था। सड़कों के किनारे की सारी दीवीरें पोस्टरों से अटी थी। बैनर, होर्डिंग, यहाँ वहाँ बिखरे पैम्फलेट हर जगह चुनाव प्रचार सामग्री। दिन भर यहाँ वहाँ घूमकर जब वह होटल लौटा तो दस बज रहे थे। उसने महसूस किया कि अचानक सारे लाउडस्पीकर बंद हो गये हैं। लॉज के रिसेप्शनिस्ट ने बताया कि रात दस बजे के बाद सब कुछ बंद हो जाता है।
पत्रकार को सुनाने के अंदाज़ में रिसेप्शनिस्ट कहता चला गया, “रात में लोग अपने बिस्तरों पर जाते हुए चुनाव आयोग के नियमों का आभार जताते हैं और सोचते हैं कि यह नियम साल भर क्यों नहीं लागू होता कि रात दस बजे के बाद सारे हंगामे बंद हो जाएँ। आम दिनों में पास का क्रिकेट ग्राउंड, उधर कुछ दूरी पर मुहल्ले की तथाकथित सांस्कृतिक मंडली, वहाँ मैरेज हाल के पास ढोल और ताशों का शोर और बारात के सामने फटते-फूटते पटाखे, सब कुछ ऐसा कि किसी शांतिप्रिय व्यक्ति के मन में भी बार-बार वनवास का विचार पैदा हो।”
पत्रकार उसकी हाँ में हाँ मिलाता रहा। बातों-बातों में उसने पूछा, “क्या शहर में कोई ईमानदार नेता है, जो चुनाव की वास्तविक स्थिति बता सके?”
रिसेप्शनिस्ट ने फटाक से, लेकिन कुछ व्यंग्य भरे अंदाज़ में जवाब देते हुए कहा, “ईमानदार आदमी कहाँ मिलते हैं साहब, वह भी नेता, मुश्किल है। वह तो दुर्लभ हो गये हैं। हाँ आप किसी ईमानदार आदमी की तलाश में हैं तो वह आपको किताबों में ही मिल सकता है।”
पत्रकार सोचने लगा कि आम आदमी भी अब यह समझने लगा कि है शहरों ने ईमानदार लोग पैदा करने बंद कर दिये हैं। अब यह जिम्मेदारी भी लेखकों पर ही आ गयी है कि अपनी किताबों में ईमानदार किरदार पैदा करते रहें, इसलिए कि कम से कम आम लोगों का यह विश्वास बना रहे कि किताबों में ईमानदार लोग मिलते हैं। इसलिए भी की समाज को मायूस होने से बचाने का काम लेखक का ही है। वह मुड़कर अपने कमरे की तरफ जा ही रहा था कि काउंटर पर रखे अखबार पर उसकी नज़र पड़ी कि अगले दिन ‘मीट दि प्रेस’ में दो पार्टियों के नेता आमने सामने होंगे। उसने तय किया कि वह झोला उठाकर उस ‘मीट’ में जाएगा।
संपादक भी उसके छोटी-छोटी खबरों से खुश थे, लेकिन वह कुछ बड़ा करना चाहता था। उसे उम्मीद थी कि मीट दि प्रेस में कोई अच्छी स्टोरी उसे मिल जाएगी। शहर के ऐतिहासिक टाउन हॉल में स्थानीय पत्रकार संघ द्वारा चुनाव पूर्व ‘मीट दि प्रेस’ का कार्यक्रम था। मंच पर तीन कुर्सियाँ रखी गयी थीं। संचालक ने राजन सिंह और साजन अली को आमंत्रित किया। राजन धर्मपुरी और साजन मज़हब नगर से चुनाव मैदान में थे। हालांकि दोनों नेता परिषद से बाहर कम ही एक मंच पर देखे गये थे। संचालक ने दोनों नेताओं का परिचय दिया और फिर सामने बैठे पत्रकारों और विभिन्न पार्टी के कार्यकर्ताओं को सूचित करने वाले अंदाज़ में कहा, “यह मंच बहस का नहीं, बल्कि उत्तरदायित्व की स्पष्टता का है। दोनों नेताओं की बात शांति से सुनी जाएगी। कोई नारे नहीं लगाएगा और ना ही तालियाँ बजेंगी।”
संचालक के अनुरोध पर राजन ने अपनी बात शुरू की, “मित्रों, नगरपालिका का चुनाव दिखने में छोटा लगता है, पर यहीं से शहर की आत्मा तय होती है। हमने पिछले पाँच वर्षों में क्या किया यह गिनाने के लिए समय कम पड़ जाएगा। सड़कें बनीं, जल निकासी सुधरी, मंदिरों का संरक्षण हुआ, सांस्कृतिक आयोजन बड़े स्तर पर हुए, लेकिन मैं आज हिसाब देने नहीं, दिशा बताने आया हूँ। हम मानते हैं कि पहचान और विकास अलग-अलग रास्ते नहीं हैं। अगर एक समाज अपनी जड़ों से कट जाए, तो विकास खोखला हो जाता है। इसलिए पहचान ज़रूरी है। हम चाहते हैं कि हर वार्ड में बुनियादी सुविधाएँ समान हों, धार्मिक स्थलों का संरक्षण हो। मैं साफ कहना चाहता हूँ कि तुष्टिकरण से शहर नहीं चलता, व्यवस्था से चलता है।”
अब साजन की बारी थी। उसने कहा, “दोस्तो! राजन जी ने संतुलन की बात की। मैं भी उसी संतुलन की बात करता हूँ, लेकिन एक फर्क के साथ। संतुलन तब बनता है जब तराज़ू के दोनों पलड़े बराबर हों। अगर एक पलड़ा भारी हो, तो संतुलन सिर्फ शब्द बनकर रह जाता है। इस शहर में ऐसे कई इलाके हैं, जहाँ नालियाँ आज भी जाम हैं, सड़कों पर गंदा पानी बह रहा है। स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं। युवा नौकरी के लिए दर-बदर भटक रहे हैं। और ये इलाके कौन से हैं, यह आप सब जानते हैं। मैं यहाँ किसी धर्म की राजनीति करने नहीं आया। मैं यहाँ यह कहने आया हूँ कि विकास का अधिकार किसी की पहचान देखकर नहीं मिलना चाहिए।”
राजन ने बीच में हस्तक्षेप करते हुए कहा, “तो क्या आप मानते हैं कि हमने भेदभाव किया है?”
साजन बिना अपनी बात रोके कहता चला गया, “मैं आरोप नहीं लगा रहा, मैं अनुभव बता रहा हूँ। अगर आपको लगता है कि सब बराबर है, तो चलिए, उन बस्तियों में साथ चलते हैं, जहाँ आज भी लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।”
जब दोनों ने अपनी बात रखी तो एक पत्रकार ने राजन से साजन की चुनौती के बारे में पूछा, “क्या आप गली मुहल्लों में चलकर देखने के लिए तैयार हैं?”
राजन ने उत्तर में कहा, “समस्याएँ हर समाज में हैं। पर क्या आपने कभी यह सोचा कि कुछ समस्याएँ व्यवस्था की हैं, और कुछ समाज की भी जिम्मेदारी होती हैं? हमने योजनाएँ दीं, लेकिन क्या उनका पूरा लाभ लिया गया? हमने स्कूल बनाए, पर क्या उपस्थिति सुनिश्चित हुई? सरकार रास्ता बना सकती है, चलना समाज को ही होता है।”
संचालक ने माइक साजन को दिया और इसकी प्रतिक्रिया जाननी चाही। साजन कहने लगा, “और सरकार का काम यह भी है कि रास्ता ऐसा हो जिस पर हर कोई चल सके। अगर रास्ता ही ऊबड़-खाबड़ हो, तो लोग गिरेंगे ही। आप जिम्मेदारी की बात करते हैं, मैं समान अवसर की बात करता हूँ। अगर एक बच्चा अच्छे स्कूल में पढ़े और दूसरा बदहाल स्कूल में, तो दोनों से एक जैसा प्रदर्शन कैसे उम्मीद करेंगे?”
संचालक ने स्थिति को आमने सामने की बहस से बचाते हुए मीट दि प्रेस कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की। उसने कहा, “बहुत महत्वपूर्ण बिंदु उठे हैं। पर जनता जानना चाहती है आगे क्या? हमें बहस नहीं, भरोसा चाहिए। दोनों नेताओं को यह मानना होगा कि आपका पहला धर्म शहर होगा।”
कस्बे का पत्रकार महसूस कर रहा था कि सबकुछ बनावटी है। चाहे वह धर्मपुरी हो या फिर मज़हब नगर… सब मतदाताओं में सांप्रदायिक रंग भरकर अपना उल्लू सीधा करना चाहते हैं। आपस में मेलजोल और मुहब्बत से रहने वालों के बीच नफ़रत के बीज बोए जा रहे हैं। चुनाव के दौरान वह मंदिर, मस्जिद, चर्च और गुरुद्वारे सहित सभी जगहों पर घूम आया। उसने देखा कि सभी प्रार्थना स्थलों की दीवारों के भीतर नफ़रत के लिए कोई जगह नहीं है। वहाँ तो अपने इष्ट से प्रेम ही सिखाया जा रहा है, लेकिन उन्हीं धर्म स्थलों के नाम पर बाहर नफ़रत फैलाई जा रही है।
पत्रकार ने सोचा कि चलो उस पार्टी को भी देखा जाए, जो धर्मनिरपेक्षता के नाम पर चुनाव लड़ रही है। चुनाव प्रचार अंतिम चरण में था। उसने विकास पार्टी के नेता सुजान से भेंट की। सुजान से पहला सवाल था, “आपकी पार्टी खुद को धर्मनिरपेक्ष बताती है। आप धर्म समर्थक और मज़हब समर्थक दोनों पार्टियों की लगातार आलोचना करते रहे हैं। ऐसे में चुनाव के बाद अगर त्रिशंकु स्थिति बनी, तो आप किसका समर्थन लेंगे या किसको समर्थन देंगे?”
सुजान ने हल्की मुस्कान चेहरे पर बिखेरते हुए कहा, “देखिए, हमारी लड़ाई किसी धर्म से नहीं, उस सोच से है, जो राजनीति को धर्म के चश्मे से देखती है।”
पत्रकार का अगला सवाल था, “लेकिन सवाल सीधा है, जरूरत पड़ी तो समर्थन किससे लेंगे?”
सुजान ने उत्तर दिया, “हम किसी धर्म के खिलाफ नहीं, धर्म के नाम पर होने वाली राजनीति के खिलाफ हैं। हम शहर की भलाई देखेंगे, जिससे शहर का भला हो, साझेदारी उनके साथ ही होगी। हमारे लिए कुर्सी नहीं, काम ज़रूरी है।”
फिर एक सवाल, “मतलब आप दोनों में से किसी के साथ भी जा सकते हैं?”
सुजान ने अपने को संभालते हुए कहा, “अभी कुछ कहना समय से पहले होगा।”
पत्रकार पहले से तैयार बैठा था, उसने पूछा, “तो आपकी विचारधारा कहाँ गई? क्या ये समझा जाए कि सत्ता के लिए समझौता कर लेंगे?”
“अगर अपनी जिद पर अड़े रहें और शहर का विकास रुक जाएगा।”
पत्रकार ने फिर पूछा, “तो क्या जनता यह माने कि ‘धर्मनिरपेक्ष’ सिर्फ एक चुनावी शब्द है?”
सुजान के उत्तर अब सधा हुआ था, “नहीं, धर्मनिरपेक्षता हमारे लिए नारा नहीं, नज़रिया है। नज़रिया ये कहता है कि शहर पहले, राजनीति बाद में। अगर किसी से हाथ मिलाने से नफरत कम होती है और काम आगे बढ़ता है, तो वह समझौता नहीं, समझदारी है।”
पत्रकार ने फिर से चोट की, “लेकिन लोग इसे अवसरवाद भी कह सकते हैं।”
सुजान अब पूरी तर से राजनीतिक चोला पहन चुका था, उसने कहा, “राजनीति में दो ही रास्ते होते हैं, या तो आप कुर्सी बचाने के लिए समझौते करते हैं, या जनता के काम के लिए। फर्क नीयत में होता है, और वो वक्त तय करता है।”
पत्रकार को नई स्टोरी के लिए ज़बर्दस्त कंटेंट मिल गया था। वह चुनाव के परिणाम के दिन तक लगातार अपनी स्टोरी से जुड़े पात्रों की बारीक से बारीक चीज़ें नोट करता रहा। जैसा कि उसने पता किया था, परिणाम त्रिशंकु ही आये थे। उसने यहाँ वहाँ से पता कर लिया कि सुजान और साजन एक हो सकते हैं। क्योंकि सुजान और राजन तो एक साथ आने से रहे। पत्रकार के सामने यह बात भी स्पष्ट थी कि सुजान की पार्टी खुलकर राजन के साथ नहीं जाएगी।
आज जबकि पत्रकारिता में प्यार, मुहब्बत तो सिर्फ शब्द हैं, भाव नहीं। वहाँ तो सनसनी ही ज्यादा मायने रखती है। पत्रकार अपनी उस चुनावी यात्रा में बहुत कुछ देख चुका था। वह चाहता था कि राजनीति के किरदारों पर नयी स्टोरी लिखे, जहाँ न आदर्श हैं, न उसूल। कौन कब किस नज़रिये का समर्थक हो जाए, पता ही नहीं चलता। इसके बावजूद उसने साजन और सुजान की सत्ता के लिए मिलीभगत पर एक कहानी तैयार करने का इरादा कर लिया और इसके लिए एक ड्राफ्ट भी तैयार कर लिया। पत्रकार जिस मक़सद से कस्बे से शहर आया था, उसे लगा कि अब उसका काम हो गया है। सुबह वह अपनी स्टोरी पत्रिका को भेज देगा। अब तो परिणाम भी सामने आ गये थे। वह रात अपने कमरे पर पहुंचा और गहरी नींद सो गया।
पत्रकार ने सपने में भी नहीं सोचा था कि वह सत्ता की रात है, उसे जागते रहना चाहिए था, क्योंकि एक ओर नींद उसे थपकियाँ दे रही थी तो दूसरी ओर शहर के एक पुराने गेस्ट हाउस के बंद कमरे में एक नया खेल शुरू हो गया था, जिसके बारे में पूरे चुनाव के दौरान किसी ने नहीं सोचा था। गेस्ट हाउस के बाहर सन्नाटा, भीतर हल्की पीली रोशनी। दीवार घड़ी रात के दो बजा रही थी।
टेबल पर चुनाव परिणाम की फाइलें, चाय के अधभरे कप और कमरे में सिर्फ दो लोग राजन सिंह और साजन अली। खामोशी राजन ने तोड़ी, वह धीरे से ठहराव के साथ कहने लगा, “जनता ने फैसला तो दिया है… पर स्पष्ट नहीं दिया। शायद वह भी देखना चाहती है कि हम क्या करते हैं। टकराते हैं, या रास्ता निकालते हैं।”
साजन ने सहमती के अंदाज़ में कहा, “या शायद जनता ने यह संदेश दिया है कि अब अकेले कोई नहीं चलेगा। हर रास्ता साझेदारी से ही निकलेगा… चाहे मन से हो या मजबूरी से।”
राजन ने हल्की मुस्कान के साथ अपनी बात रखी, “मजबूरी भी राजनीति में एक तरह की सच्चाई होती है, साजन साहब।”
साजन ने कहा, “और सच्चाई यह भी है कि तीसरा दल इंतज़ार कर रहा है…उसे लगता है कि हम अलग-अलग रहेंगे, तो वह सत्ता में आ जाएगा।”
राजन ने सीधे मुद्दे पर आते हुए तीर छोडा,“तो क्या हम उसे यह मौका देंगे?”
दोनों गंभीर मुद्रा में एक दूसरे को ताकते रहे कुछ देर बाद साजन ने कहा, “हमने चुनाव में एक-दूसरे के खिलाफ बहुत कुछ कहा…आपने हमें तुष्टिकरण कहा, हमने आपको विभाजनकारी कहा।
अब सवाल यह है कि क्या वह सब सिर्फ मंच तक सीमित था?”
साजन का उत्तर मौजूद था, “मंच पर कही गई बातें… जनता के लिए होती हैं जनाब, लेकिन यह कमरा… फैसलों के लिए है। और फैसला यह है कि शहर को सरकार चाहिए, ठहराव नहीं।”
साजन अंधेरे में तीर फेंकने के अंदाज़ में कहने लगा, “अगर हम साथ आते हैं… तो सिर्फ कुर्सी बाँटने के लिए नहीं आ सकते। हमें यह तय करना होगा कि आपके मतदाता और मेरे मतदाता, दोनों को लगे कि हमने उन्हें धोखा नहीं दिया।”
राजन ने कहा, “बिल्कुल। इसलिए मैं सीधी बात करता हूँ। महापौर की कुर्सी हमारे पास हो… और उपमहापौर आपकी पार्टी को। नीतियाँ—साझा होंगी, फैसले—सहमति से होंगे।”
साजन ने मुस्कुराते हुए कहा, “आप सीधे मुद्दे पर आ गए… लेकिन राजनीति सिर्फ गणित नहीं होती, मनोविज्ञान भी होती है। मेरे समर्थक पूछेंगे कि ‘जिनके खिलाफ हमने वोट दिया, उनके साथ क्यों?’”
शायद राजन के पास इसका उत्तर पहले से मौजूद था, “और मेरे लोग भी यही पूछेंगे, लेकिन जवाब एक ही होगा, हमने शहर को चुना, टकराव को नहीं। हम यह जता देंगे कि किसी भी समुदाय के साथ भेदभाव नहीं होगा। विकास योजनाएँ पारदर्शी होंगी। कोई भी बयान ऐसा न होगा कि जो आग भड़काए।”
“मंजूर है।” साजन की सहमती के बाद दोनों अब सहज हो गये थे। कमरे में थोड़ी सहजता आ गयी थी और गेस्ट हाउस से कुछ दूरी पर कुत्ते के भौंकने की आवाज़ें तेज़ हो गयी थीं। हालाँकि दोनों को ये डर था कि अगर खबर लीक हो गयी तो लोग इसे सौदा कहेंगे, लेकिन दोनों को ये पता था कि कुछ दिनों में बात आई गयी हो जाएगी। दोनों के बीच चाय का एक और दोर चला और फिर महापौर और उप महापौर के नामों को अंतिम रूप देकर दोनों वहाँ से रवाना हो गये।
इधर जब पत्रकार ने आँखें मलते हुए सुबह का स्वागत किया और टीवी के रिमोट पर स्थानीय समाचार चैनल का बटन दबाया तो शहर की राजनीति की दुनिया पलट चुकी थी। होटल से बाहर कुछ दूरी पर नगरपालिका के कार्यालय के पास ढोल-नगाड़े बज रहे थे। पत्रकार की आंखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गयीं, जब उसने देखा कि उसकी कहानी के ड्राफ्ट में दो नकारात्मक किरदार राजन और साजन आपस में मिलकर सकारात्मक हो चुके थे। धर्मनिरपेक्षता कहीं दूर बैठकर अधखुली आँखों से यह सब तमाशा देख रही थी। दोनों की पार्टियों के अलग अलग झंडे एक ही रैली में लहरा रहे थे। सूरज जैसे-जैसे ऊपर चढ़ रहा था, गर्मी तेज़ हो रही थी। पत्रकार का मन उचाट हो चला था। वह कस्बे की ओर जाने वाली एक बस में कोने की सीट पर बैठा अपनी दुनिया में लौट रहा था। छोट-मोटी ख़बरों की दुनिया में।
- एफ एम सलीम
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मूल रूप से पत्रकार, कहानी, कविता, ललित निबंध एवं आलोचना सहित विभिन्न विधाओं में लेखन, 13 पुस्तकें प्रकाशित।
