Saturday, July 4, 2026
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डॉ. मुक्ति शर्मा की कविता-आशियाना

बनाया था
एक आशियाना…
ख़ुद को
आंधियों और तूफानों
से बचाने को।
क्या उसे
बचा पाई?

यहां हंसती-खेलती
दुल्हन आई।
आंखों में आंसू
लिए रातों-रात
छूट गया… घर !
पलक झपकते
ही टूट गया
आशियाना !

जो था अपना
रेत की तरह
फिसल गया
हाथों से…
हो गया खंडहर
जो कभी घर था।

“बंटू के पापा…
गहने तो उठा लेते।”
“तुझे गहनों की पड़ी है।
यहां सामने मौत खड़ी है!”

वो संदूक… जिसमें
यादें थीं मायके की।
पुकारता होगा आज भी।
चाबी लेकर आई थी।
पर अब… मालिक
कोई और होगा।

सेहरा शगुन की चुनरी
यादें… बस यादें रह गईं!
हम अलग
देश में आ गए।
होंठों की हंसी
कहीं खो गई।

कहने को तो अब
नया आशियाना बनाया है।
कहने को तो
यह देश अपनाया है।
फिर भी
लगता पराया है।

अपनी मिट्टी की
खुशबू खो गई।
आंगन का शजर
गुम हो गया।
चेहरे की
मुस्कुराहट खो गई।

कहने को तो
आशियाना बनाया है।
वो सुकून ना
खरीद पाई ।
बड़े-बड़े बाजारों में,
सांस ना ले पाई
घुटन भरी दीवारों में।

कहने को तो
आशियाना बनाया है।
पराए लोगों में
खो कर रह गई।
अपनी संस्कृति
से हाथ धोकर रह गई।
अब तो पूरी ही
उस देश की हो गई।
रूह की पुकार
कहीं खो गई।
कहने को तो
बनाया है… आशियाना।

  • डॉ मुक्ति शर्मा
    मट्टन – कश्मीर
डॉ. मुक्ति शर्मा
डॉ. मुक्ति शर्मा
संपर्क - 9797780901
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8 टिप्पणी

  1. विस्थापन की त्रासदी को व्यक्त करती बहुत ही सुन्दर व मार्मिक रचना ।

  2. पहले संपादक जी का समय आलेख पढा और फिर आपकी कविता ने समय के मिजाज की पुष्टि कर दी। यही शायद भाग्य है कर्म की रेखा से ऊपर… जीवन में सोचते कुछ है होता कुछ और है सारी योजनाएं धरी रह जाती है। वक्त और भाग्य का मिजाज पढ़ना मुश्किल है। बस कहते रह जाते हैं – जो ईश्वर को मंजूर। सच कहा आपने सुंदर कविता।

  3. विस्थापन के दर्द को बयां करती ,सशक्त और भाव प्रवण रचना ।
    हार्दिक शुभकामनाएं और बधाई हो।

  4. विस्थापन की पीड़ा को व्यक्त करती मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति। सुंदर कविता। हार्दिक बधाई एवं शुभकामनाएँ ।

  5. मुक्ति जी!
    आपकी कविता पढ़ तो उसी दिन ली थी लेकिन कुछ व्यस्तताओं के चलते लिख नहीं पाये।
    आज ध्यान आया कि नई पत्रिका लगेगी तो कविता याद आ गई।

    अच्छी कविता है। प्रवास का आपका दर्द महसूस हुआ। विदेश जाने का सुख अलग है और अपनी धरती से जुदा होने का दुख अलग।
    कुछ समय के लिये जाना और घूम फिर के वापस आ जाना एक अलग बात होती है, लेकिन एक पूरी तरह से अलग संस्कृति, नियम,कानून और देश के साथ सामंजस्य स्थापित करने में वक्त लगता है। और चाहे जितना भी मन लग जाए फिर भी कुछ छूटा हुआ सा महसूस होता है।
    एक अच्छी कविता के लिए बहुत-बहुत बधाई आपको।

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