बनाया था
एक आशियाना…
ख़ुद को
आंधियों और तूफानों
से बचाने को।
क्या उसे
बचा पाई?
यहां हंसती-खेलती
दुल्हन आई।
आंखों में आंसू
लिए रातों-रात
छूट गया… घर !
पलक झपकते
ही टूट गया
आशियाना !
जो था अपना
रेत की तरह
फिसल गया
हाथों से…
हो गया खंडहर
जो कभी घर था।
“बंटू के पापा…
गहने तो उठा लेते।”
“तुझे गहनों की पड़ी है।
यहां सामने मौत खड़ी है!”
वो संदूक… जिसमें
यादें थीं मायके की।
पुकारता होगा आज भी।
चाबी लेकर आई थी।
पर अब… मालिक
कोई और होगा।
सेहरा शगुन की चुनरी
यादें… बस यादें रह गईं!
हम अलग
देश में आ गए।
होंठों की हंसी
कहीं खो गई।
कहने को तो अब
नया आशियाना बनाया है।
कहने को तो
यह देश अपनाया है।
फिर भी
लगता पराया है।
अपनी मिट्टी की
खुशबू खो गई।
आंगन का शजर
गुम हो गया।
चेहरे की
मुस्कुराहट खो गई।
कहने को तो
आशियाना बनाया है।
वो सुकून ना
खरीद पाई ।
बड़े-बड़े बाजारों में,
सांस ना ले पाई
घुटन भरी दीवारों में।
कहने को तो
आशियाना बनाया है।
पराए लोगों में
खो कर रह गई।
अपनी संस्कृति
से हाथ धोकर रह गई।
अब तो पूरी ही
उस देश की हो गई।
रूह की पुकार
कहीं खो गई।
कहने को तो
बनाया है… आशियाना।
- डॉ मुक्ति शर्मा
मट्टन – कश्मीर
