1.लो न निर्झर
बोलो न निर्झर
दूध-सा नीर लिये
सँकरे गलियारों से निकल
कहाँ से आते हो तुम
उत्तुंग शिखरों के उस पार
कौन रहता है तुम्हारा,
जिससे होकर प्रेरित
निरंतर रहते हो गतिशील
पत्थरों की चोटें सहते हो
फिर भी हमारे लिए बहते हो।
2. मैं और पवन
छुआ हवा का झोंका
धीरे से उतरी
हवा की छुअन
मन की सतह में उठी उमंग
मैं भी हो ली उसके संग।
शांत वातावरण में
न शोर, ना चाह
गूँज रहा है,
एक मौन संगीत
बह रहा है,
मन के भीतर।
गा रहे हैं विहग
सुर लय-ताल में
मिल पवन के संग।
नाचे डालियाँ, थिरके अंग
छेड़ गया बाँसुरी कोई
उठी
शांत हृदय में तरंग।
सूरज की सुनहरी किरणें
बुनतीं स्वप्नों के रंग
प्रकृति के इस राग में
मन हुआ पूर्णत: अभंग।
3. नीली झील
चुप्पियों में डूबी
नीली एक झील,
जैसे धरती ने अपनी साँसें थाम ली हों।
हर लहर में
कोई अधूरी बात,
हर गहराई में छिपा कोई भाव।
पेड़ों की परछाइयाँ
उस पर लिखती हैं
दिन भर की कहानियाँ,
और चाँदनी रात में
वो सब कुछ धीरे से पढ़ लेती है
झील —जो कुछ नहीं कहती,
पर सब जानती है।
4. प्रेम पथिक -सी
पीहर पर्वत छोड़ चली वो,
उन्मुक्त वेग लिए जल-धारा।
अल्हड़ जैसे नवयुवती -सी,
झीना वसन, तरल अंग सारा।
काया उसकी पारदर्शी,
हर बूँद में सौंदर्य समाया।
रुकती नहीं, थमती नहीं
वो, साध्वी-सी
मन में धीर समाया।
घाटी-वन-पथ पार करती,
विजन वनों से निकलती जाती।
अनजाना, लंबा यह रस्ता,
हर बाधा को लांघ वो आती।
सागर ससुराल बाहें खोले,
करता उसका तन्मय इंतज़ार।
नीरा सदा बहती रहती,
प्रेम-पथिक सी,
निश्चल, अपार।
5- खिलते रहना गुलमोहर
मेरे आँगन में
फिर से उग आया है गुलमोहर —
वही लालिमा लिए,
बचपन में तेरी शाखों पर झूलते हुए
मैंने जाना था साहस का स्वाद,
तेरे फूलों की लाली में एक जादू था —
जो मेरे भीतर भर देता था सूरज
अब समय की धूप तेज़ और
मन की ज़मीन बंजर हो गई है ।
मुझे अब
तेरे जैसा धैर्य और सहनशीलता की
ज़रूरत है।
खिलते रहना, गुलमोहर —
कि तुझसे -मैं फिर से सीख सकूँ
जीना, झूमना, झरना
और फिर से खिल जाना।
- सुदर्शन रत्नाकर,
ई-29, नेहरु ग्राउंड,फरीदाबाद 121001
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