कविता-1
क्यों कपट की सुरंगों में धर्म अपना स्वर खो रहा है।
और चित्त की निर्मलता सिक्कों की खनक में घुल रही है।
धर्म बन गया वस्त्र,
और राजनीति उसका कुशल दर्जी।
युद्धक्षेत्रों में अब कोई कर्ण नहीं गिरता,
बल्कि गिरती हैं भीड़ें,
जिन्हें धर्म के नाम पर उकसाया जाता है,
राजनीति की अदृश्य वीणा पर।
वेदी पर अब कोई श्यामकर्ण अश्व नहीं बंधा,
बल्कि बंधी हैं हमारी अंतरात्माएँ,
जाति, वंश, मत, और रक्तरेखाओं से।
राज्य अब कोई आदर्श नहीं,
बल्कि यज्ञकुंड है जहाँ नेता,
अधूरी आस्थाओं की बलि चढ़ाते हैं,
और देवता बन बैठते हैं स्वयं।
जहॉं होना था आत्मा का गहन उद्गम,
अब शोर है नारों का,
दीवारों पर लिखे रक्त-पत्रों का।
जहॉं होना था व्रत सेवा का,
अब कुटिल यंत्रणा है,
मंदिरों और संसदों के बीच चलती एक अदृश्य डोर।
ओ वसुंधरा!
तेरे आँचल में बोई थी प्रेम की ऋचाएँ,
किन्तु अब बारूद उग रहें हैं,
और चिंगारियों से सनी हवाओं में
भविष्य जलने को आतुर है।
वह दिन दूर नहीं जब
धर्म और राजनीति की अंतिम ग्रंथि फूटेगी,
और शेष बचेगा….
केवल एक ध्वस्त सभ्यता का मौन विलाप।
कविता-2
पद और धन का घमंड क्या,
आज यहाँ… कल कहाँ है?
कौन कब ठहरा रहा है?
मीठे बोल और सच्चा व्यवहार,
यही तो है जीवन का असली श्रृंगार।
छाया जैसी दुनिया सारी,
कभी उजली, कभी अंधियारी,
घटती-बढ़ती हर एक बात,
कुछ भी नहीं यहाँ स्थिर दिन हो या हो रात।
रहट सा चलता जीवन का चक्कर,
भरता-रितता हर एक बरतन,
कभी खुशी तो कभी है गम
यही समय का गहरा सच।
न पद रहता, न धन ठहरता,
सब कुछ समय के संग ही बहता,
जो दिलों में छाप बना जाए
बस वही सदा याद में रहता।
कविता-3
सुनो सरकार,
तुमने प्रजा को
पहले भीड़ बनाया,
फिर उस भीड़ को..
जातियों की कतारों में बाँटा,
जातियों को नारों में ढाला,
और नारों को..
मतपेटियों की कैद में रख दिया।
उसे नागरिक कभी न माना।
सुनो सत्ता के रखवालों ..
तुमने आँकड़ों की ऐसी फ़सल बोई
कि काग़ज़ पर,
हर मौसम सुनहरा दिखता है,
मगर किसान की हथेली में
आज भी,
सूखी मिट्टी की दरारें
धड़कती रहती हैं।
जिन हाथों ने
धरती की कोख से
अन्न निकाला,
वही हाथ
रात को
भूख की सलवटों में
मुड़कर सो जाते हैं,
और जिन्हें मिट्टी की गंध से
हमेशा परहेज़ रहा,
वे ..मंचों पर खड़े होकर
मेहनत का अर्थ समझाते हैं।
ओ राजतंत्र के पहरेदारों…
तुमने सवाल पूछने वालों को
शक की निगाह से देखा,
और सिर झुकाने वालों को..
वफ़ादारी का तमगा दे दिया,
मानो यह मुल्क
सीने की धड़कनों में नहीं,
घुटनों की मोड़ में बसता हो।
ओ राज तंत्र के रखवालों…
जो कल तक
गलियों में नारे लगाते थे,
आज वही
मख़मली कुर्सियों पर टिककर,
जनता के टूटे हुए सपनों पर
नए भाषणों का
कालीन बिछाते हैं।
हमने माना कि ,
तुम बड़े हो,
क़ानून के रखवाले हो,
मगर चौपाल अब भी जानती है
कि कुछ फ़ैसले
स्याही से नहीं,
सियाही से लिखे जाते हैं।
और सुनिए सत्ता के सिपेहसालारों…
ये जो हाथ
अब तक
आपके हर वाक्य पर
ताली बजाते रहे,
यही हाथ
किसी सुबह
मुट्ठी बनकर
हवा का रुख़ बदल सकते हैं।
ये जो चेहरे
आपको भीड़ लगते हैं,
इन्हीं चेहरों की छाया पर
आपकी कुर्सी टिकी है,
इन्हीं चेहरों की ख़ामोशी में
आपका कल छिपा है।
क्योंकि
जनता जब जागती है,
तो सिर्फ़ आँखें नहीं खुलतीं,
सदियाँ करवट लेती हैं,
तख़्त हिलते हैं,
ताज फिसलते हैं,
और इतिहास
फिर से
अपना नाम लिखता है।
- डॉ. इंदु बारौठ
एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, साहित्यकार एवं हिन्दी-संस्कृत की समर्पित प्रचारक हैं। राजस्थान के सीकर में जन्मी डॉ. बारोठ ने हिन्दी, संस्कृत और कम्प्यूटर विज्ञान में उच्च शिक्षा प्राप्त कर संस्कृत में पी.एच.डी. की उपाधि अर्जित की। आपकी रचनाएँ देश-विदेश की अनेक प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं तथा हिन्दी सेवा एवं शिक्षण के लिए आपको कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मान प्रदान किये गये हैं। वर्तमान में आप कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय, इंग्लैंड में हिन्दी एवं संस्कृत की मूल्यांकन विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं और ‘गुरुकुल यूके’ संस्था के माध्यम से भारतीय भाषा और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय भूमिका निभा रही हैं।
