1.
यह पिछली सदी के
थकान से भरे आख़िरी दिनों की बात है
जब दुनिया बदलने की घोषणाएँ
अख़बारों और भाषणों में बहुत थीं
पर आदमी भीतर से
धीरे-धीरे पत्थर होता जा रहा था।
तभी तुम मिले थे मुझे
अपने कंधों पर घरों की चिन्ताएँ ढोते हुए
आँखों में अधूरी नींद
और जेब में कुछ टूटे हुए सपने लिए।
तुम्हें देखकर लगा था
अब भी बची हुई है पृथ्वी पर
थोड़ी-सी मनुष्यता।
कि अब भी कोई पुरुष
सिर्फ़ कमाने की मशीन नहीं हुआ
अब भी उसके भीतर
एक बच्चा छिपा बैठा है
जो बारिश में भीगना चाहता है
और बिना डरे रो लेना चाहता है।
मुझे लगा था
एक दिन ऐसा आएगा
जब पुरुषों को
लोहे की तरह मज़बूत होने की शर्त पर
स्वीकार नहीं किया जाएगा।
जब उनसे नहीं कहा जाएगा
“मर्द हो, दर्द मत दिखाओ।”
और वे
अपने पिता की तरह
चुप्पियों में बूढ़े नहीं होंगे।
2.
तुम मेरे जीवन में
किसी पुराने बरगद की छाँव की तरह आए थे।
धीरे-धीरे जाना मैंने
कि पुरुष होना
सिर्फ़ अधिकार नहीं होता
वह एक लम्बी थकान भी है।
घर की दीवारों पर
जितनी उम्मीदें टँगी होती हैं
उनका वज़न
अक्सर एक पुरुष की पीठ पर रखा जाता है।
वह मुस्कुराता है
ताकि घर में भय कम लगे
वह हारकर भी कहता है
“सब ठीक हो जाएगा।”
जबकि भीतर
बहुत कुछ टूट रहा होता है।
तुम्हारी हथेलियों में
मैंने श्रम की कठोर रेखाएँ देखीं
और उन रेखाओं के बीच
एक अजीब-सी कोमलता भी।
तुम बहुत कम बोलते थे
शायद इसलिए कि
तुम्हें सिखाया गया था
भावनाएँ कमज़ोरी होती हैं।
मैं तब कहाँ समझती थी
कि पुरुषों की चुप्पी भी
एक भाषा होती है।
3..
अब इतने बरस बाद
जब समय और अधिक निर्मम हो गया है
मैं देखती हूँ
पुरुष लगातार
अपने भीतर से निर्वासित किए जा रहे हैं।
उनकी संवेदनाएँ
मज़ाक में बदल दी गई हैं
उनके आँसू
असफलता मान लिए गए हैं।
वे प्रेम करते हैं
पर स्वीकार नहीं करते
वे टूटते हैं
पर बिखरने की अनुमति नहीं पाते।
समाज ने उनके लिए
कुछ तयशुदा चेहरे बना दिए हैं
कमाने वाला चेहरा
मज़बूत चेहरा
निर्णय लेने वाला चेहरा।
इन चेहरों के पीछे
जो थका हुआ मनुष्य है
उसे कोई नहीं देखता।
और फिर भी
वे हर सुबह उठते हैं
अपने भीतर के अँधेरे को
जेब में रखकर।
प्रेम आज भी
उन्हें बचा सकता है
अगर कोई
उनकी चुप्पियों को सुन सके।
अगर कोई कह सके
तुम्हें हर समय मज़बूत होने की ज़रूरत नहीं।
चार
मैं आज भी मानती हूँ
दुनिया तब बेहतर होगी
जब पुरुषों को भी
मनुष्य होने की पूरी छूट मिलेगी।
जब वे
अपनी थकान कह सकेंगे
अपने डर स्वीकार सकेंगे
और प्रेम को
कमज़ोरी नहीं समझेंगे।
उस दिन शायद
युद्ध थोड़े कम होंगे
और घरों में
थोड़ी अधिक रोशनी होगी।
क्योंकि संवेदनहीन पुरुष
सिर्फ़ स्वयं को नहीं
पूरे समाज को कठोर बना देते हैं।
और प्रेम
वह आज भी
सबसे बड़ा प्रतिरोध है।
4…
दियों के किनारे बैठी
पृथ्वी रो रही है
वन कट रहे हैं
पहाड़ टूट रहे हैं
नदियाँ सूख रही हैं
हिमखंड पिघल रहे हैं
ऋतुएँ मर रही हैं…
संवेदनाएँ मर रही हैं
नागरिको!
मनुष्य हार रहा है
डूब रही है करुणा
विश्वास डूब रहा है
संबंध डूब रहे हैं
भाषाएँ डूब रही हैं
लोकगीत डूब रहे हैं
भविष्य के बच्चों की हँसी
कारखानों के धुएँ में घुट रही है…
नगरों में
काँच की इमारतों के भीतर
अकेलापन चीख रहा है
गाँवों की पगडंडियों पर
भूख नंगे पाँव चल रही है
विद्यालयों के बाहर
अपने सपनों को बेच रहे हैं बच्चे
अस्पतालों की कतारों में
मृत्यु टिकट बाँट रही है…
विज्ञान के हाथों में
विनाश के औज़ार हैं
राजनीति के मुख पर।
झूठ का उत्सव है
धर्म के बाज़ारों में
ईश्वर नीलाम हो रहा है,
सभाएँ मौन हैं
संविधान थका हुआ है
न्यायालयों की सीढ़ियों पर
सत्य घायल पड़ा है…
समुद्रों में
तेल के साथ बह रही हैं मछलियाँ
आकाश में
धुएँ के साथ उड़ रही हैं चिड़ियाँ
धरती के सीने पर
बारूद बो रहे हैं शासक,
सीमाओं पर
युवाओं की देह से
राष्ट्रगान लिखा जा रहा है…
सब कुछ टूट रहा है
मनुष्यो!
सभ्यता अपने ही हाथों
अपनी कब्र खोद रही है।
कब जागेगी हमारी चेतना?
हम कब सीखेंगे
एक दूसरे की आँखों में
मनुष्य को पढ़ना?
कब रोकेंगे
घृणा की मशीनें?
कब बचाएँगे
पृथ्वी की अंतिम हरियाली?
सूरज तप रहा है
नदियाँ रो रही हैं
आकाश बीमार है
हवाएँ जल रही हैं।
- बबिता कुमावत
सहायक प्रोफेसर, राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय, नीमकाथाना, सीकर(राजस्थान)
ई मेल- [email protected]
प्रोफेसर बबिता की कविताएँ (काव्य संग्रह) प्रकाशित और विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में रचनाएं प्रकाशित।
