Sunday, May 31, 2026
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मनवीन कौर पाहवा की दो लघुकथाएँ

ए. आई.

अरविंद ने ऑफिस में प्रवेश करते ही पाया कि चारों तरफ़ सन्नाटा है। सभी कुर्सियाँ ख़ाली हैं। उसने घड़ी की तरफ़ नज़र दौड़ाई। समय तो हो गया है, फिर कोई ऑफिस क्यों नहीं पहुँचा? कहीं आज छुट्टी तो नहीं?

यही सोचते हुए वह अपने केबिन के पास पहुँचा और ठिठक गया। उसकी कुर्सी पर कोई और बैठा था।
“तुम कौन हो और मेरी सीट पर बैठकर क्या कर रहे हो?” अरविंद ने गुस्से और हैरानी से पूछा।

उस आकृति ने कुर्सी घुमाई। उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं था। एक बेहद शांत और मशीनी आवाज़ गूंजी, “लगता है आपने कल रात से अपना मेल चेक नहीं किया है।”

“कल रात मुझे शादी से लौटने में देर हो गई थी, तो…” कहते हुए अरविंद ने जल्दी से अपने मोबाइल पर मेल खोला। पढ़ते ही उसकी आँखें फटी रह गईं, “क्या?…. मुझे और मेरी पूरी टीम को जॉब से निकाल दिया गया है! वो भी बिना किसी सूचना के?”

“मेरा नाम ए.आई. है,” सामने बैठे सिस्टम ने उसी ठंडे स्वर में कहा। “मैं यहाँ का नया बॉस हूँ। जो काम आप और आपकी 140 लोगों की टीम मिलकर एक महीने में करती थी, वह मैं अकेला चंद सेकंड में बिना किसी त्रुटि के कर सकता हूँ। ना मुझे तनख्वाह चाहिए, ना कोई छुट्टी। कंपनी के मुनाफे के लिए अब आप लोगों की आवश्यकता नहीं है। कृपया अपना सामान उठाएं और केबिन खाली करें।”

अरविंद स्तब्ध था। घर वापस जाते हुए उसका दिमाग सुन्न पड़ चुका था। 140 लोगों की एक झटके में गई नौकरी, भविष्य की अनिश्चितता और घर की ईएमआई का खयाल उसका दम घोंट रहा था। भारी कदमों से उसने अपने घर का दरवाज़ा खोला।

सामने उसकी पत्नी सूजी हुई आँखों के साथ बेहद उदास बैठी थी।
“तुम आज ऑफिस नहीं गईं?” अरविंद ने घबराते हुए पूछा।
पत्नी ने बिना कुछ कहे, अपनी जॉब छिन जाने का ईमेल उसके सामने कर दिया।

2. बंधन

एयरपोर्ट से लौटते समय कार्य बोझ से थके निशांत ने पाया कि सड़क के दोनों ओर लगे वृक्षों की टहनियाँ आपस में मिलकर एक छत सा एहसास करवा रही हैं ।

एक प्यारा सा बंधन । जिसकी छाया के नीचे से गुजरते हुए परम सुकून का अनुभव हो रहा है ।

निशांत सोचने लगा । कार्य की व्यस्तता के रहते निष्ठा को समय ही नहीं दे पा रहा हूँ .. अच्छा हुआ आज फ्लाइट मिस हो गई , आज शाम को साथ बैठेंगे …

कहीं स्नेह सिंचन की कमी से दूसरे छोर का वृक्ष सूख ना जाये ।

गाड़ी जब घर के गेट पर रुकी तो उसने देखा सामने निष्ठा अपने मित्र अर्णव के कंधों पर सिर रख कर सुकून से बैठी हुई है और अर्नव की बाहें उस नाजुक वृक्ष को प्यार से अपनी बाहों में समेटे हुए है।

मनवीन कौर पाहवा
संभाजी नगर
M.: 8600017018

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