Sunday, July 12, 2026
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दीपक शर्मा की कहानी-ऊंची छलांग

जब एक बड़े शहर के जाने- माने अस्पताल में मेरी नियुक्ति हुई तो मैं फूली न समायी।

ख्याति- प्राप्त डा.मिश्रा हमारे मनोविकृति-विज्ञान विभाग के अध्यक्ष थे। देश- विदेश की कई महत्वपूर्ण चिकित्सा- पत्रिकाओं तथा संस्थाओं से वह सम्बद्ध थे और उनके सम्पर्क मेरी पुस्तक ‘सोशल क्लांबिंग’ अथवा ‘सामाजिक आरोहण’ की सामग्री एकत्रित करने में मेरी सहायता की अच्छी संभावना रखते थे।

  परंतु उस अस्पताल में जब मेरी भेंट शशि दी से एक रोगिणी के रूप में हुई तो मैं स्तब्ध रह गई।

 माथे पर चढ़ी भौंहैं लिए विस्फारित नेत्रों वाला क्लांत, पीला तथा स्थूल चेहरा क्या उन्हीं शशि दी का था जो आज से सात साल पहले अनूठा सौंदर्य व जीवंतता छलकाया करता था? लबालब?

उन के चेहरे पर व्याप्त इस संत्रास व बोझिलता के लिए कहीं हमारे विभाग की प्रगाढ़ चिकित्सा- पद्धति ही तो उत्तरदायी नहीं थी?

 “शशि दी?” आश्चर्य मिश्रित अपने क्षोभ को मैं ने दबाना चाहा, “मैं कुसुम…..”

 “हां,” वह उत्तेजित हो उठीं, “तुम तो जानती हो मेरा परिवार दरिद्र नहीं था?”

“आप क्या कह रही हैं?” मैं हक्की- बक्की रह गई, “ शैक्षिक क्षेत्र में आप के परिवार की साख तो हमारे पूरे कस्बापुर में मशहूर है….”

“डा. मिश्रा,आज बिजली लगाने में इतनी देर क्यों हो रही है?” तभी राजा- सरीखे एक सज्जन हमारे कमरे में चले आए।

“सब कुछ तैयार है,” डा.मिश्रा विनीत स्वर में अपनी सफ़ाई देने लगे, “मेरी नई सहायिका, कुसुम जोशी, आप की पत्नी के शहर की निकल आयीं तो मैं ने उन्हें गपशप कर लेने दी….”

 “कुसुम जानती है मेरी मां सरकारी इंटर कॉलेज की प्रिंसीपल हैं,” शशि दी के हाथ-पैर उन की उत्तेजना के कारण व्यवस्थित नहीं रह पा रहे थे, “और मेरे बाबूजी ने अर्थशास्त्र में ऐसा शोध- ग्रंथ लिख रखा है जिसे….”

“बड़े दुर्भाग्य की बात है मेरी पत्नी का रोग घटने की बजाए बढ़ता ही जा रहा है,” राजा- सरीखे सज्जन के चेहरे पर घोर चिंता घिर आई, “अपने माता- पिता और अपनी बातें कभी खत्म नहीं होने देती। कभी-कभी तो मुझे आशंका होने लगती है मेरी उद्विग्नता जल्दी ही निराशा का रूप धारण कर लेगी….”

“नहीं, आप ऐसा न सोचिए,” डा. मिश्रा अपना भेद- सूचक स्वर प्रयोग में ले आए, “यदि प्रघात अपना चमत्कार न दिखा पाए तो हम कोई नई राह खोज निकालेंगे। कुछ दिन अपने यहां इनडोर पेशंट बना कर सुधार ले आंएगे….”

“तुम मुझे बचा लो,कुसुम,” शशि दी विह्वल हो कर कांपने लगीं, “तुम भी डाक्टर हो। तुम भली- भांति जानती हो बिजली लगाने से मानसिक रोग….”

“आप दूसरे कमरे में चली जाइए,” राजा- सरीखे सज्जन ने शशि दी का बाकी वाक्य मुझे सुनने न दिया।

“हां, तुम अभी लाइब्रेरी में बैठो,” डा. मिश्रा ने उन सज्जन का अर्थ- गर्भित संकेत तुरंत पकड़ लिया और न चाहते हुए भी मुझे उस कमरे से बाहर जाना पड़ा।

अगले दिन जैसे ही मैं ने अपने विभाग में पग धरा,डा.मिश्रा ने मुझे अपने कमरे में बुलवा भेजा और आदेश दिया, “तुम्हें अभी आलोक प्रसाद के यहां जाना होगा। उन्हों ने तुम्हारे लिए अपनी गाड़ी भिजवाई है ताकि बिना किसी हो- हल्ले के तुम उन की पत्नी, शशि, को यहां लिवा लाओ।वह उसे हमारे अस्पताल में दाखिल कराना चाहते हैं। तुम्हें वह जानती हैं और तुम्हारे संग सहज ही चली आंएगीं….”

“क्या उन का केस इतनी गंभीर प्रकृति का है?” मैं चौंकी।
“इस पर बाद में बात करेंगे,” डा.मिश्रा मुझे टाल गए, “शिज़ोफ़्रेनिया इतना जटिल विषय है कि वह जल्दबाज़ी में निपटाया नहीं जा सकता।”
“जी,सर,” मैं ने तुरंत जाने की तत्परता प्रकट कर दी, “उन की गाड़ी कौन सी है?”
“मेरा चपरासी तुम्हें गाड़ी तक पहुंचा देगा।”

(2)

परी- कथाओं में जैसे विवाह हुआ करते हैं, लगभग सात वर्ष पहले शशि दी का विवाह भी वैसा ही हुआ था। सरकारी अतिथि- गृह शशि दी के घर के सामने पड़ता था और उन्हीं दिनों राजकुमार- सरीखा एक नवयुवक अपने एक मित्र के साथ वहां ठहरा हुआ था। जब भी वह अपने कमरे की खिड़की खोलता उसे शशि दी दिखाई दे जातीं। और फिर वह उन्हें ब्याह कर अपने घर ले गया।

डाक्टरी की अपनी पढ़ाई के लिए कस्बापुर छोड़ने तक शशि दी के विवाहित जीवन के बारे मैं इस से आगे कुछ न जानती थी और उन्हें उन की वर्तमान स्थिति में देखना मेरे लिए किसी झटके से कम न था।

गाड़ी एक बहुत बड़े बंगले के आगे रुकी। ड्राइवर के रुकते ही बाहर खड़े चौकीदार ने आगे बढ़ कर लोहे का फ़ाटक खोला। बागीचे और लौन के दोनों मालियों के हाथ पल भर को रुके और फिर कार्यरत हो गए। चौकीदार ने सलाम के साथ मुझे बरामदे में रखी कुर्सियां दिखाईं और लोप हो गया।

अगले ही क्षण उन में से एक पर बैठने का मुझे निमंत्रण मिला। निमंत्रण देने वाली एक अधेड़ महिला थीं। उन के बाल स्याह काले थे। उन की साड़ी कीमती टस्सर की थी और कानों में डाल रखे बड़े आकार के उन के हीरे खालिस मालूम देते थे।

“आलोक ने कल बताया,” वह एक साथ उत्तेजित व व्यग्र लग रही थीं, “तुम शशि के कस्बे की हो।”
“हमारे शहर का पूरा नाम कस्बापुर है,” मैं ने उन की भूल सुधारी।

 “शशि को अभी पता नहीं चलना चाहिए कि तुम उसे लिवाने आयी हो,” उन्हों ने मेरी आपत्ति पर तनिक कान न धरा, “वह बहुत जल्दी चिल्लाने लगती है। साधारण परिवारों से आई औरतें चीखतीं बहुत हैं। स्त्री- सुलभ संकोच व शालीनता से उन्हें परहेज़ रहता है।”

 “इन्हें वहां बैठक में क्यों नहीं बिठाया?” तभी एक वृद्ध सज्जन बरामदे में चले आए। उन के बाल भी स्याह काले थे। उन्हों ने अपनी सभी उंगलियों में अंगूठियां पहन रखीं थीं। जिन के नग उन की विभिन्न आशंकाओं को प्रकट कर रहे थे।

 “आप शोरूम जा रहे थे। क्या हुआ?” अधेड़ महिला पति पर झल्लायी।

 “शोरूम में क्या आग लग गई है जो मेरा वहां तत्काल पहुंचना ज़रूरी है?” उन के स्वर का चुलबुलापन मुझे गुदगुदा गया।

 “कल नलिनी हमारे शोरूम पर गई थी। कह रही थी डिस्काउंट सेल के बावजूद भी खास बिक्री नहीं हो पा रही,” अधेड़ महिला ने कारोबार की बात चला कर पति के आमोद-प्रमोद की चेष्टाएं धराशाई करनी चाहीं।

 “बेबी, तुम डाक्टर नहीं हो सकती,” वृद्ध सज्जन ने मगर दुगुने उल्लसित स्वर के साथ मेरी ओर देखा, “तुम तो बिल्कुल बच्ची हो। आलोक ने कल बताया शशि के अस्पताल में काम करने तुम अभी हाल ही में आयी हो….:

 “आप को सुबह से कितनी बार बोल चुकी हूं आपका शोरूम में उपस्थित रहना बहुत ज़रूरी है। अब आप वहां जा क्यों नहीं रहे?” अधेड़ महिला के स्वर की कटुता व हठधर्मिता ने उन के विवाहित जीवन के पूरे इतिहास को मेरे सामने उधेड़ कर रख दिया। वह अवश्य ही अधिक सम्पन्न परिवार से थीं जो बात- बात पर पति को लताड़तीं रहतीं थीं। शायद वह नहीं जानती थीं पति को नीचा दिखाने के उन के विभिन्न प्रयास ही पति के हठीलेपन को बढ़ावा देते थे। अपने पुरुषत्व तथा अहम- भाव को अक्षुण्ण बनाए रखने का यही रास्ता उन के पति को जंचा होगा क्योंकि उसी के द्वारा वह पत्नी को निरंतर ठेस पहुंचाते रहने में सफ़ल हो सकते थे।

 “चलो,अंदर बैठेंगे,” वृद्ध सज्जन ने मेरा हाथ पकड़ा और मुझे गोलाकार एक बड़े कमरे में ले आए।

 राजसी ठाठ लिए बेहद सुरुचिपूर्ण उस कमरे के एक बड़े सोफ़े पर मुझे बैठ जाने का संकेत देकर वृद्ध सज्जन ने पूछा, “तुम क्या लोगी? शर्बत या किसी फल का रस?”

 “पुत्तीलाल को मैं ने चाय बनाने के लिए कह रखा है,” अधेड़ महिला भी हमारे साथ अंदर आ चुकी थीं, “आप बेफ़िक्र हो कर शोरूम हो आइए।”

 “तुम ने फ़ैसला लिया तुम क्या लोगी?” वृद्ध सज्जन ने पत्नी की बात अनसुनी कर दी, “फ़ालसे का शर्बत या सेब का रस?”

 “आप यहां क्या कर रहे हैं,” अधेड़ महिला का स्वर फिर तन गया, “शोरूम तक हो क्यों नहीं आते?”

 “यह मेरे कस्बापुर की है,” तभी शशि दी वहां आ पहुंचीं, “यह जानती है कस्बापुर में मेरी मां की कितनी इज्ज़त है, मेरे बाबूजी को लोग कितना मानते हैं….”

 “यह लड़की हमारे अनुकूल न थी,” अधेड़ महिला मेरे कान में फुसफुसाई, “भूल से बेचारी ऊंची छलांग लगा बैठी। इस के मां-बाप ने सोचा होगा, जमाई इकलौता वारिस है,सब के वारे- न्यारे हो जांएगे….”

 “क्यों इस बच्ची को चाय के लिए तैयार कर रही हो?” वृद्ध सज्जन ने पत्नी को चिढ़ाना जारी रखा, “तुम असमंजस में क्यों पड़ती हो,बेबी? तकल्लुफ़ छोड़ती क्यों नहीं? यदि मेरी पत्नी ने तुम्हें बर्फ़ के नुकसान बता कर डरा दिया है तो गर्म कॉफ़ी ही पी लो….”

 “क्या तुम्हें याद है वाद- विवाद प्रतियोगिताओं में मैं हमेशा प्रथम पुरस्कार पाया करती थी?” शशि दी की आंखों में उन्माद फैलने लगा, “टेबल- टेनिस में कितने ही कप जीत रखे थे मैं ने? इंटर की फ़ेयरवेल पार्टी में स्वप्न- सुंदरी मुझी को चुना गया था? और गर्ल- गाइडिंग में बेस्ट गर्ल गाइड का सर्टिफ़िकेट मुझे मुख्यमंत्री ने अपने हाथों से दिया था?”

 “आपको भैया जी अंदर बुला रहे हैं,” तभी एक नौकर अधेड़ महिला के पास आ खड़ा हुआ।
“आप भी चलिए,” अधेड़ महिला ने पति को अर्थपूर्ण ढंग से देखा।
“फिर मिलेंगे,” वृद्ध सज्जन मेरी ओर देख कर मुस्कराए और पत्नी के साथ कमरे से बाहर चले गए।

 “तुम आज दिन भर मेरे साथ यहीं रहना,” शशि दी मेरे पास खिसक आयीं, “आज शाम कोई खास मेहमान आ रहे हैं। मेरी सास को अपने बेटे का दूसरा ब्याह रचाने की बहुत जल्दी है। सच तो यह है कि ये लोग मुझे पागल करार करने की योजना बनाए बैठें हैं ताकि इसी आधार पर इन के इकलौते को तलाक मिल जाए। मुझे खाने- पीने, पहनने- ओढ़ने, सजने- संवरने का कोई अधिकार नहीं क्योंकि मेरे पिता इन के लिए भारी-भरकम दहेज नहीं जुटा पाए।

जब तक मेरी सेवा- सुश्रुषा ने आलोक की रईस नानी को जीवित रखा, मेरे शील,संकोच, त्याग और सेवा-भाव को तूल मिलता रहा। परंतु उस के ओझल होते ही मेरी प्रासंगिकता खत्म हो गई। अब सास मुझ से दुःसह दुर्व्यवहार करती है। ससुर आपत्तिजनक बोली- ठोली छोड़ते हैं।पति जघन्य अवहेलना करते हैं। बेटे बदतमीज़ी से बात करते हैं। नौकर- चाकर गुस्ताखी दिखाते हैं। इस पर मैं तिलमिलाती हूं तो मुझे बावली करार दे कर बिजली लगवा दी जाती है….”

 “आप कुछ दिनों के लिए कस्बापुर क्यों नहीं चली जातीं?” मैं ने पूछा।

 “माता- पिता का प्यार और स्वीकार मुझे इस पीड़ा से मुक्ति तो दिला सकता है परंतु मेरे अधिकारों की रक्षा नहीं कर सकता। मेरे बेटों को मेरे निकट नहीं ला सकता। और मैं यह भी जानती हूं मैं यहां से एक दिन के लिए भी हट गई तो फिर इस घर के दरवाज़े मुझे बंद मिलेंगे….”

 “आप चिंता न करें,” शशि दी की वेदना का आप्लावन मुझे अस्थिर कर गया, “मैं अपने विभागाध्यक्ष को वास्तविकता से अवगत कराऊंगी। जल्दी ही आपके अधिकार पुनः स्थापित हो जाएंगे और सुख आप की झोली में फिर से आन गिरेगा….”

 “सच?” शशि दी हंसी तो उन के गालों के गड्ढे गहरा उठे। उनकी आंखों का उद्वेग चमक में बदल लिया और उन का रोम- रोम उत्कंठा से पुलकने लगा।

 “मैं शोरूम तक जा रहा हूं,” तभी राजा- सरीखे सज्जन कमरे में चले आए, “जाने से पहले तुम्हारी सहेली को अस्पताल तक छोड़ सकता हूं। चाहो तो तुम भी संग चल सकती हो। कुछ घंटे अपनी सहेली के साथ बिता सकती हो।”

 “कुसुम शाम तक यहीं रहेगी,” शशि दी पूर्णतया आश्वस्त तथा प्रसन्न बनी रहीं।

 “क्या तुम्हारी सहेली भूल गई डा.मिश्रा की आज्ञा के बिना यदि वह दिन भर यहां रह गई तो उसे अहितकर टिप्पणी के साथ तुरंत बर्खास्त भी किया जा सकता है?”  राजा- सरीखे सज्जन ने मुझे धमकी दी।

 “शायद हमारा यहां से जाना ही बेहतर रहेगा,” मैं तुरंत उठ खड़ी हुई।  मैं अपनी नौकरी को जोखिम में नहीं डाल सकती थी।

(3)

जब डा. मिश्रा ने शशि दी को अस्पताल में भर्ती  करने की सभी औपचारिकताएं पूरी कर लीं तो वेटिंग रूम में बैठीं शशि दी को मेरे साथ अंदर उन के कमरे में बुलाया गया।

 “मेरा सहयोग आपको सदैव उपलब्ध रहेगा,” डा. मिश्रा राजा-सरीखे सज्जन से वहां गोपनीय स्वर में बात करते मिले।

 “इनकी देखभाल का ज़िम्मा आप पर छोड़ कर मैं भार- मुक्त हुआ,” राजा- सरीखे सज्जन ने डा.मिश्रा को एक प्रशस्त मुस्कान दी।

 फिर मेरी ओर मुड़ कर मुझ से बोले, “क्षमा करिए, आज मैं आप का स्वागत करने में असमर्थ रहा। जब से मेरी पत्नी अस्वस्थ रहने लगी है मैं बुरी तरह चूक जाता हूं। आप तो समझदार डाक्टर हैं।  समझती हैं जिस किसी का पारिवारिक जीवन छिन्न-भिन्न रहेगा, वह विक्षिप्त तो हो ही जाएगा।”

 “तुम इन्हें संभालो,” डा. मिश्रा मेरी ओर देखे, “मैं इन्हें बाहर तक छोड़ने जा रहा हूं….”

 “मेरे पति मुझे यहां छोड़ कर नहीं जा सकते। मैं यहां नहीं रहूंगी,” शशि दी उग्र हो आयीं, “मैं कोई टिड्डी-मकड़ी नहीं जिसे रौंद कर तुम अपनी राह चल दोगे। कोई आलू- बैंगन नहीं जिसे तुम चबा डालोगे। कोई नींबू- संतरा नहीं जिसे तुम चूस कर फेंक सकोगे। कोई मुरगी- हिरणी नहीं जिस का मांस तुम नोच कर भून दोगे। मैं मनुष्य जाति का मुख्यांश हूं। मुख्याधार हूं।श्रद्धेय नारी हूं….”

 “आप की सहेली के लिए कुछ दिन यहां रहना बहुत ज़रूरी है,” राजा- सरीखे सज्जन अपनी प्रफ़ुल्लता छिपाने में असफ़ल रहे, “मुझे अब जाना होगा।”

“सर,” मैं ने डा. मिश्रा को रोकना चाहा।
“मैं अभी आया,” डा. मिश्रा ने मुझे ढाढ़स बंधाया, “तुम घबराना नहीं।”
“जी,सर,”मैं ने सिर हिला दिया। वह मेरे विभागाध्यक्ष थे। उन का विरोध करना मेरे लिए असंभव था।

 “तुम अच्छी लड़की नहीं हो,” शशि दी मुझ पर बरस पड़ीं,  “तुम एक ज़िम्मेदार डाक्टर भी नहीं। तुम बहरी हो। तभी तो अपनी आत्मा की आवाज़ सुन नहीं पाती। तुम अंधी हो। तभी तो अन्याय तुम्हें दिखाई नहीं देता। तुम गूंगी हो। तभी तो न्याय के पक्ष में अपनी आवाज़ बुलंद नहीं कर सकती।तुम पत्थर दिल हो। तभी तो मेरा दुख तुम्हें सालता नहीं….”

मैं पत्थर दिल नहीं थी फिर भी मेरे रोंगटे खड़े न हुए….
मैं गूंगी नहीं थी, फिर भी अवाक बनी रही….
मैं अंधी नहीं थी फिर भी शशि दी के आंसुओं ने मेरी निष्क्रियता नहीं तोड़ी….
मैं बहरी नहीं थी,फिर भी निश्चल सांस लेती रही….
मुझे काठ मार गया था।

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
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