- नीलिमा शर्मा का लेख
मैं उससे क्यों बात करूँ जो मुझसे ख़फ़ा है
वह उसकी अदा है और यह मेरी अदा है
कभी किसी अनजान की लिखी यह पंक्तियाँ पढ़ी थी और जो मेरे द्वारा लिखी जा रही कहानी के पात्र पर सटीक बैठ रही हैं, लेकिन आजकल कहानियों के पात्रों में इतना अभिमान क्यों आ रहा है, यह सोचने बैठी तो समझ आया कि इन पंक्तियों में एक गहरा संघर्ष छिपा हैं,जो लिखने वाले के भीतर लंबे समय से चल रहा होगा Iसंवाद और मौन के बीच का संघर्ष, आत्मसम्मान और अहं के बीच की महीन रेखा का संघर्ष। बचपन में हमने अपने मातापिता, अध्यापकों बुजुर्गों से सुना था…“एक चुप सौ सुख”, पर जैसे-जैसे जीवन अपने अनुभवों के पन्ने खोलता है, यह कहावत अपने अर्थ बदलने लगती है। हर चुप्पी सुख नहीं देती, कई बार यही मौन भीतर एक ऐसा शून्य रच देता है, जिसमें पश्चाताप की गूंज लंबे समय तक सुनाई देती रहती है।
साहित्य इस मौन और संवाद के द्वंद्व को बहुत पहले से पहचानता रहा है। मुंशी प्रेमचंद की कहानियों में पात्र अक्सर अपनी भावनाओं को दबाते हुए दिखाई देते हैं। ‘कफ़न’ का घीसू और माधव भले ही सामाजिक क्रूरता का प्रतीक बनकर उभरते हों, पर उनके भीतर का मौन भी एक तरह का आत्मरक्षा का कवच है,एक ऐसा मौन, जिसने संवेदनाओं को कुंद कर दिया है। वहीं महादेवी वर्मा के ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्री का मौन केवल सामाजिक बंधनों का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का संकेत है, जहाँ कहने की इच्छा और न कह पाने की विवशता साथ-साथ चलती है।
यह मौन केवल पात्रों तक सीमित नहीं रहा, कई साहित्यकारों के जीवन में भी यह एक टीस की तरह उपस्थित रहा है। हरिवंश राय बच्चन ने अपनी आत्मकथा में कई ऐसे प्रसंग लिखे हैं जहाँ समय पर न कहे गए शब्दों का पश्चाताप जीवन भर साथ रहा। उनके लेखन में यह स्वीकारोक्ति बार-बार उभरती है कि जीवन में कुछ रिश्ते केवल इसलिए अधूरे रह गए क्योंकि संवाद का साहस नहीं जुटाया जा सका। इसी तरह अमृता प्रीतम का जीवन भी अधूरे संवाद की कहानी रहा। साहिर लुधियानवी के प्रति उनका भाव, जो पूरी तरह शब्दों में ढल नहीं सका, उनके भीतर एक स्थायी आत्मालाप बनकर रह गया…एक ऐसा मौन, जो उनकी कविताओं में बार-बार बोलता है।
समाज के बदलते स्वरूप ने इस मौन को एक नई दिशा दी है। आज का व्यक्ति संवाद से अधिक अपनी ‘स्थिति’ को महत्व देता है। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति को और तीखा कर दिया है, जहाँ संबंधों की गहराई की जगह उनकी प्रस्तुति अधिक महत्वपूर्ण हो गई है। अब लोग सीधे संवाद करने की बजाय संकेतों, स्टेटस और चुप्पियों के माध्यम से अपनी बात कहते हैं। “वह उसकी अदा है और यह मेरी अदा है” यह वाक्य अब केवल एक भाव नहीं, बल्कि एक सार्वजनिक मुद्रा बन गया है, जिसमें अपने अहं को एक शैली की तरह प्रस्तुत किया जाता है।
परंतु इस चुप्पी का मनोवैज्ञानिक प्रभाव गहरा होता है। जब हम निंदा के डर से या आहत अहं के कारण चुप रहते हैं, तो भीतर एक अनकहा संवाद लगातार चलता रहता है। यही आत्मालाप धीरे-धीरे मानसिक थकान, असंतोष और कभी-कभी अवसाद का कारण बन जाता है। साहित्य में ऐसे अनेक पात्र मिलते हैं, जो बोल न पाने की पीड़ा में भीतर ही भीतर टूटते रहते हैं। निर्मल वर्मा की कहानियों में यह मौन एक सूक्ष्म उदासी के रूप में उपस्थित है…उनके पात्र संवाद की कमी से उपजी दूरी को गहराई से महसूस करते हैं, पर उसे तोड़ने का साहस नहीं जुटा पाते।
फिर भी, हर मौन नकारात्मक नहीं होता। जीवन हमें यह भी सिखाता है कि कब चुप रहना आवश्यक है। आत्मसम्मान की रक्षा के लिए चुना गया मौन एक शक्ति है, कमजोरी नहीं। परंतु इस मौन तक पहुँचने से पहले संवाद का एक अवसर देना जरूरी है। जिनसे हम आहत होते हैं, उनसे एक बार यह कहना कि उनकी किसी आदत या व्यवहार ने हमें चोट पहुँचाई है…यह केवल शिकायत नहीं, बल्कि संबंध को बचाने का प्रयास है। यदि इसके बाद भी स्थिति नहीं बदलती, तब मौन एक गरिमामय दूरी बन जाता है।
समस्या तब उत्पन्न होती है जब हम हर परिस्थिति में मौन को ही अपनी ‘अदा’ बना लेते हैं। यह अदा धीरे-धीरे एक दीवार बन जाती है, जो हमें दूसरों से ही नहीं, स्वयं से भी अलग कर देती है। हम अपने ही भीतर कैद हो जाते हैं, जहाँ केवल आत्मालाप शेष रह जाता है। यही वह स्थिति है, जहाँ “एक चुप सौ सुख” की कहावत अपना अर्थ खो देती है।
आज के समय में आवश्यकता इस बात की है कि हम मौन और संवाद के बीच संतुलन स्थापित करें। जहाँ बोलना आवश्यक हो, वहाँ चुप रहना अपने अस्तित्व को दबाना है, और जहाँ चुप रहना गरिमा हो, वहाँ बोलना स्वयं को आहत करना। यह संतुलन ही जीवन की परिपक्वता का संकेत है।
अंततः, “मैं क्यों बात करूँ” यह प्रश्न वास्तव में हमारे भीतर के द्वंद्व का प्रतिबिंब है। यदि हम इसे बदलकर “मैं क्यों न बात करूँ” कर सकें, तो शायद कई संबंध टूटने से बच जाएँ। और यदि कभी यह संभव न हो, तो मौन को अपनाते हुए भी यह याद रखना आवश्यक है कि वह मौन भीतर पश्चाताप का कारण न बने, बल्कि आत्मसम्मान की एक शांत, दृढ़ अभिव्यक्ति हो।
जीवन शब्द और चुप्पी के बीच झूलता हुआ एक सेतु है,जहाँ हर अनकहा शब्द एक कहानी बन सकता है, और हर सही समय पर कहा गया वाक्य एक संबंध को नया जीवन दे सकता है। यही संतुलन ही मनुष्य की सबसे बड़ी साधना है, और यही उसकी सबसे सुंदर अभिव्यक्ति भी।
…और शायद तब “मैं उससे क्यों बात करूँ” जैसी पंक्तियाँ केवल शायरी बनकर रह जाएँ, जीवन का सच नहीं। क्योंकि अंततः रिश्ते जीतने से नहीं, निभाने से बचते हैं। कई बार पहला शब्द बोलने वाला हारता नहीं, वही सबसे अधिक परिपक्व होता है।और हाँ…
“मैं उससे क्यों बात करूँ, जो मुझसे ख़फ़ा है…” शायद इसलिए कि कभी-कभी एक संवाद, दोनों की ख़ामोशी से बड़ा होता है।
और सच कहूँ, यह लेख लिखते-लिखते मैंने भी अपने भीतर की एक पुरानी चुप्पी से संवाद किया है।
- नीलिमा शर्मा
फोन. 8510801365

बहुत अच्छा सार्थक व सारगर्भित लेखन नीलिमा जी।सचमुच मौन और संवाद के बीचनके महत्व को समझना होगा।अभिव्यक्ति जरुरी है पर अपनी मर्यादा के भीतर। स्त्रियां जल्दी मुखर नहीं हो पातीं क्योंकि उन्हे बचपन से मौन श्रेयस्कर है बताया गया।महादेवी की रचनात्मक अभिव्यक्ति कहती है जैसा आपने लिखा”महादेवी वर्मा के ‘श्रृंखला की कड़ियाँ’ में स्त्री का मौन केवल सामाजिक बंधनों का परिणाम नहीं, बल्कि एक गहरे आंतरिक द्वंद्व का संकेत है, जहाँ कहने की इच्छा और न कह पाने की विवशता साथ-साथ चलती है।”
बिल्कुल सही,सटीक व यथार्थ है यह कथन।
हार्दिक बधाई, शुभ कामनाएं इस अति सुन्दर सृजन के लिए।
दिल से धन्यवाद पद्मा जी
शुक्रिया पद्मा दीदी
मौन और संवाद-बहुत गहरी, महत्वपूर्ण और व्यवहारिक बात को आपने बहुत सुंदर ढंग से अभिव्यक्ति दी है। आज के परिप्रेक्ष्य में इस बात को समझना तो और भी आवश्यक है। बहुत बढ़िया आलेख । हार्दिक बधाई नीलिमा जी
शुक्रिया दीदी
सही समय पर किया गया संवाद रिश्ता बचा सकता है सही और गलत की पहचान करा सकता है… ठीक उसी तरह सही समय पर साध लिया गया मौन भी रिश्तों को टूटने से बचा सकता है लेकिन इसी मौन को लोग अक्सर कमज़ोरी समझ लेते है. किन्तु यही मौन यदि गलत समय पर धारण कर लिया जाये तो यह उम्र भर का पश्चाताप बन सकता है. इसलिए बड़े बूढ़ो ने कहा है “तोल मोल के बोल”
विचारणीय आलेख
नीलिमा शर्मा जी !
यह लेख पिछली पत्रिका में आया था। पढ़ तो तभी लिया था और लिख भी लिया था; बस पूरा आज हुआ।
पूरे लेख में जहाँ-जहाँ ध्यान केंद्रित हुआ-
*मैं उससे बात क्यों करूँ जो मुझसे खफा है।*
इसे पढ़ते हुए चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।
*संवाद और मौन के बीच का संघर्ष*
यह अंतर्द्वंद्व की स्थिति बनती है।
*आत्मसम्मान और अहम् के बीच की महीन रेखा का संघर्ष।*
यह रेखा महीन तो होती है उतनी ही महत्वपूर्ण भी होती है। यही महीन रेखा आगे जाकर अहंकार बनती है।
यह बहुत मायने रखता है कि हमारे आत्मसम्मान के आड़े कौन है?
*एक चुप सौ सुख*
यह कहावत पहली बार सुनी।
*एक चुप सौ को हराए।*
हमने अब तक यही जाना था पर अर्थ की दृष्टि से दोनों ही कीमती हैं।
आपका लेख संवाद बनाम मौन है जो पश्चाताप की स्थिति तक न पहुँच पाए यह संकेत करता है।
सच पूछा जाए तो विषय काफी गंभीर है।साहित्य,संवेदना और भावनाओं की बारीक से बारीक गलियों से होकर गुजरता है।
हर साहित्यकार अपने समय को रचता है। वह जिस परिवेश में रहता है, जो देखता है, सुनता है, समझता है और पढ़ता है,वही उसका अनुभव होते है।
आपने अच्छे उदाहरणों का उल्लेख किया है।
हरिवंश राय जी बच्चन ने सही कहा कि कई बार ऐसा होता है कि हमारी चुप्पी पश्चाताप बन जाती है। ऐसी चुप्पी नुकसानदेह होती है।
वास्तव में ऐसी चुप्पी से बचने की जरूरत है।
प्रेमचंद का समय ऐसा था कि उस समय की नारियाँ चुप्पियों को तोड़ने का साहस नहीं कर पाईं। वर्तमान में नारी मुक्ति की बात है
तो स्वतंत्रता धीरे-धीरे स्वच्छंदता बनती जा रही है। वास्तव में आज व्यक्ति संवाद से अधिक, स्थिति पर हावी है।
जहाँ आपने यह कहा है कि *”निंदा के डर से या आहत अहम् के कारण लोग चुप रहते हैं।”*
हमें लगता है निंदा से अधिक *लोकभय* हावी रहता है। लोग क्या कहेंगे?
आत्मालाप की मानसिक स्थिति बहुत तकलीफदेह होती है, जब बोल न पाने की पीड़ा के कारण इंसान अंदर ही अंदर टूटता रहता है।
निश्चित रूप से मौन की अपनी महत्ता है।
मौन वास्तव में शक्ति है। बस इंसान को पता होना चाहिए कि कहाँ और कब उसके लिए मौन रहना जरूरी है।
आपकी यह बात काबिले गौर है कि हम सबको यह सोचना चाहिए कि *मैं बात क्यों ना करूँ?*
और यह हमारे मन की बात है।
आपका यह लेख हमें बहुत पसंद आया। लेख हमें कहानियों से भी अधिक प्रिय हैं। वह बात अलग है कि वह ठहरकर शांति से पढ़ने वाली विधा है उसे एक नजर में पढ़ना उसके साथ अन्याय है।
पर कई दिनों से कुछ स्थितियाँ ऐसी रहीं कि ठीक से पढ़ नहीं पा रहे हैं। पढ़ भी लें तो लिख नहीं पा रहे।
इसे भी पढ़ तो काफी पहले लिया था और थोड़ा बहुत लिख भी लिया था बस पूरा नहीं कर पाए थे।
यह बात 100% सही कही आपने कि मौन और संवाद के बीच में तादात्म्य स्थापित किया जाए।यह बहुत जरूरी है।
पहली बार इस विधा में प्रवेश आपको मुबारक हो।
आपके इस बेहतरीन लेख के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई।
संपादक मंडल का शुक्रिया तो बनता है।