Monday, June 15, 2026
होमलेखअहंकार के जूते, त्याग के पाँव

अहंकार के जूते, त्याग के पाँव

बैठकखाने की दीवार पर टंगे बाबूजी के सनद, उनकी डिग्रियां ऐसे चमकती हैं जैसे किसी सामंती राजा के जीते हुए किले के नक्शे हों। बाबूजी एम.ए., एलएल.बी. हैं। उनका रुआब ऐसा है कि जब वे चाय मांगते हैं, तो लगता है जैसे हाईकोर्ट का कोई समन जारी हुआ हो। अम्मा उस समन की तामील रसोई के उस तंग, चार-बाय-चार के ब्लैक होल में करती हैं, जहां से लगातार छौंक की गंध और मसालों की जुगलबंदी उठती रहती है। वह कड़ाही और करछुल के बीच ऐसे युद्ध लड़ती हैं जैसे पानीपत की चौथी लड़ाई उन्हीं के जिम्मे हो। दाल में नमक जरा सा कम हुआ नहीं कि बाबूजी कानूनी किताब के पन्नों की तरह फड़फड़ाने लगते हैंं। अम्मा बस आंचल का कोना उंगली पर लपेटती हैं, थोड़ा मुस्कुराती हैं और एक चुटकी नमक डालकर पूरे केस को रफा-दफा कर देती हैं। मध्यवर्गीय घरों में डिग्रियां दीवारों पर मुस्कुराती हैं और योग्यता रसोई के बर्तनों के मांजने की आवाज में छिपी रहती है। बाबूजी महीने के आखिरी हफ्ते में बजट का रोना रोते हुए ऐसे दिखते हैं जैसे देश के वित्त मंत्री बिना रिजर्व बैंक के बैठे हों, लेकिन अम्मा अपनी फटी हुई मखमली डिबिया से चुपके से दो सौ के मुड़े-गले नोट निकाल लाती हैं। उनका यह अर्थशास्त्र एडम स्मिथ की छाती पर मूंग दलने के लिए काफी है, पर वे कभी इसका क्रेडिट नहीं लेतीं।

“ये पैसे कहां से आए?” बाबूजी ऐनक के ऊपर से घूरते।
“बस, ऐसे ही… बिल्ली के भाग्य से छींका टूट गया,” अम्मा नजरें चुराकर कहतीं।
“तुम्हें तो अर्थशास्त्र का ककहरा भी नहीं पता, बस तुक्का लग जाता है,” बाबूजी फाइल समेटते हुए बड़बड़ाते।

बाबूजी की नजर में अम्मा एक ऐसी अनपढ़ मशीन थीं, जो बिना किसी तेल-पानी के बस चलती जा रही थीं। जब अम्मा को सूखी खांसी उठती, तो डॉक्टर साहब ने पांच सौ की फीस और दो हजार की दवाइयां लिख दी थीं। बाबूजी ने बटुआ देखा, फिर अम्मा को। अम्मा ने पर्चा लिया, उसे मुट्ठी में भींचकर सीधे कचरे डिब्बे के सुपुर्द कर दिया। रात को दांत के नीचे एक लौंग दबाई और सुबह तक खांसी का पूरा साम्राज्य ध्वस्त हो गया। बाबूजी ने कहा, “यह सिर्फ अंधविश्वास और देहाती तुक्का है, मेडिकल साइंस के आगे इसकी क्या औकात!” अम्मा चुप रहीं। वे हमेशा चुप रहती थीं, जैसे मौन ही उनका सबसे बड़ा थीसिस हो। जब घर का सिंगल बेडरूम स्पेस क्रंच की बीमारी से जूझता, तो अम्मा पुरानी बोतलों को काटकर उसमें मनीप्लांट ऐसे टांग देती थीं, मानो किसी पांच सितारा होटल की लॉबी हो। बाबूजी इसे ‘कबाड़ का जमावड़ा’ कहते। अम्मा तब भी हंसती थीं। उनकी हंसी में एक अजीब सा दर्शन था। वे हर त्रासदी को एक मंद मुस्कान से निगल जाती थीं, जैसे नीलकंठ ने विष पिया हो।

“अम्मा, तुमने कहां तक पढ़ाई की है?” एक शाम मैंने उनकी फटी बिवाइयों वाले पैरों को देखते हुए पूछ ही लिया।
“अरे, हम तो बस छठी गिलासी हैं बाबू,” उन्होंने अपनी साड़ी के पैबंद लगे छोर से माथा पोंछते हुए कहा।
“फिर यह सब कैसे कर लेती हो?”
“पेट की पाठशाला में कोई क्लास नहीं होती बेटा, वहां सीधे इम्तिहान होता है” उन्होंने कड़ाही चढ़ाते हुए कहा।

बाबूजी की वकालत और ऊंची डिग्रियां तब धरी की धरी रह गईं, जब अचानक उनकी रीढ़ की हड्डी ने जवाब दे दिया। डॉक्टरों ने हाथ खड़े कर दिए और कहा कि अब यह कभी बिस्तर से नहीं उठ पाएंगे। घर की डिग्रियां अचानक मूक दर्शक बन गईं। तब अम्मा ने अपनी उस ‘छठी गिलासी’ वाली देह को एक खूंटे की तरह गाड़ दिया। वे दिन-रात बाबूजी के बिस्तर के पास बैठी रहतीं, उनके घाव धोतीं, उन्हें गोद में उठाकर वैसे ही सहलातीं जैसे किसी नवजात शिशु को संभाला जाता है। बाबूजी की आंखों का अहंकार अब पानी बनकर बह रहा था। एक रात, जब पूरा घर सन्नाटे की चादर ओढ़े सोया था, मैंने अम्मा को बाबूजी के सिरहाने बैठकर उनकी बरसों पुरानी सुनहरी जिल्द वाली एलएल.बी. की डिग्री को हाथ में लिए देखा। रोशनी मद्धिम थी। अम्मा बड़े ध्यान से उस डिग्री पर उंगलियां फेर रही थीं। मुझे लगा कि शायद वे बाबूजी के गौरव को याद कर रो रही हैं। अम्मा रो नहीं रही थीं। वे तो बस अपनी साड़ी के उसी पैबंद लगे छोर से बाबूजी का मुँह पोंछ रही थीं। तभी बाबूजी ने आँखें खोलीं और अम्मा का वह फटी बिवाइयों वाला खुरदरा हाथ पकड़कर अपने गाल से चिपका लिया। बरसों का वह कड़क रुआब और फासला उस एक छुअन में पिघलकर बह गया। बाबूजी की काँपती आवाज़ में बस इतना निकला, “मुझसे बहुत भूल हुई…”

अम्मा ने कुछ नहीं कहा, उन्होंने झट से अपना दूसरा हाथ बाबूजी के होंठों पर रख दिया, मानो कह रही हों कि अब बस करो। उन्होंने बाबूजी को थोड़ा और समेटकर अपने सीने से लगा लिया। बिल्कुल वैसे ही, जैसे कोई माँ अपने रोते हुए बच्चे को सुलाती है। उस रात समझ आया कि दुनिया की हर बड़ी अदालत हार सकती है, पर उस चार-बाय-चार के ब्लैक होल से निकली ममता की करुणा कभी नहीं हारती।

  • डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा ‘उरतृप्त’

व्यंग्यकार, कवि और बाल साहित्य लेखक, व्यंग्य-संग्रह ‘एक तिनका इक्यावन आँखें’  ‘किताबों की अंतिम यात्रा’  ‘म्यान एक, तलवार अनेक’, ‘गपोड़ी अड्डा’, ‘सब रंग में मेरे रंग’  व्यंग्य संग्रह और ‘इधर-उधर के बीच में’ व्यंग्य उपन्यास प्रकाशित। कई पुस्तकों का संपादन, अनेक पुरस्कारों से सम्मानित।

RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest