भारत की शक्ति उसकी विविधता में निहित है। यहाँ भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि संस्कृति, स्मृति, परंपरा और आत्मसम्मान का आधार भी है। इसी सच्चाई को ध्यान में रखते हुए राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने बहुभाषिकता को शिक्षा का केंद्रीय तत्व बनाया है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व में बनी इस नीति में मातृभाषा, स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय भाषा के माध्यम से शिक्षा को विशेष महत्व दिया गया है। नीति यह भी स्पष्ट करती है कि किसी विद्यार्थी या राज्य पर कोई भाषा थोपी नहीं जाएगी। यह दृष्टि भारतीय शिक्षा को अधिक संवेदनशील, अधिक समावेशी और अधिक जीवनोपयोगी बनाती है।
त्रिभाषा नीति का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह बच्चे को उसकी जड़ों से जोड़ती है। जब विद्यार्थी अपनी परिचित भाषा में सीखता है, तो वह केवल पाठ याद नहीं करता, बल्कि अवधारणा को समझता है। समझ पर आधारित शिक्षा स्मरण-शक्ति, विचार-क्षमता और अभिव्यक्ति को मजबूत बनाती है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 ने प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा या स्थानीय भाषा के उपयोग पर बल देकर इसी वैज्ञानिक और मानवीय दृष्टिकोण को आगे बढ़ाया है। यह व्यवस्था विशेष रूप से उन बच्चों के लिए लाभकारी है जो घर में एक भाषा बोलते हैं और विद्यालय में दूसरी भाषा का सामना करते हैं। ऐसे में भाषा सीखने की बाधा कम होती है और सीखने में आत्मविश्वास बढ़ता है।
प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने बार-बार इस बात पर बल दिया है कि मातृभाषा में शिक्षा बच्चों के लिए न्याय और अवसर का प्रश्न है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय शिक्षा को केवल परीक्षा-केंद्रित नहीं, बल्कि जीवन-केंद्रित बनाता है। जब किसी बच्चे को उसकी भाषा में पढ़ने का अवसर मिलता है, तो वह अपने विचार अधिक सहजता से व्यक्त कर पाता है और अपनी क्षमता को बेहतर ढंग से विकसित कर सकता है। यह केवल शैक्षिक सुधार नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक बड़ा कदम है। प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भाषा को बाधा नहीं, बल्कि अवसर के रूप में देखने की जो सोच विकसित हुई है, वह देश के दूरस्थ और वंचित वर्गों के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध हो रही है।
केन्द्रीय शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान जी ने भी बहुभाषिकता को भारत की पहचान और भविष्य की शक्ति बताया है। उन्होंने कहा है कि बहुभाषिकता हमारी विविधता का मूल है और भाषा तथा पुस्तकें विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को साकार करने की संपदा हैं। यह विचार अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह भाषा को केवल अकादमिक विषय नहीं, बल्कि राष्ट्रीय निर्माण का साधन मानता है। जिस देश की भाषाएँ मजबूत होती हैं, उसकी बौद्धिक परंपरा भी मजबूत होती है। इसलिए भारतीय भाषाओं में पाठ्य-सामग्री, बाल साहित्य, पाठ्य-पुस्तकें और शिक्षण-संसाधन तैयार करना समय की आवश्यकता है। यह कार्य बच्चों को अपनी भाषा में सीखने का अवसर देता है और उन्हें अपनी संस्कृति पर गर्व करना सिखाता है।
त्रिभाषा नीति राष्ट्रीय एकता को भी सशक्त करती है। विभिन्न भारतीय भाषाओं के अध्ययन से विद्यार्थी देश के अलग-अलग अंचलों, साहित्य, लोकजीवन और परंपराओं को समझते हैं। इससे पारस्परिक सम्मान बढ़ता है और सांस्कृतिक दूरी कम होती है। भाषा सीखना यहाँ केवल व्याकरण का अभ्यास नहीं, बल्कि भारत को भीतर से समझने का माध्यम बन जाता है। यही कारण है कि यह नीति विविधता में एकता की भारतीय भावना को नया बल देती है। जब एक बच्चा अपनी मातृभाषा के साथ दूसरी और तीसरी भाषा भी सीखता है, तो वह अधिक व्यापक दृष्टि वाला, अधिक संवेदनशील और अधिक सक्षम नागरिक बनता है।
आज जब देश विकसित भारत 2047 की ओर बढ़ रहा है, तब त्रिभाषा नीति का महत्व और भी बढ़ जाता है। यह नीति विद्यार्थियों को केवल भाषाई दक्षता नहीं देती, बल्कि उन्हें आत्मविश्वास, सामाजिक समरसता और राष्ट्रीय चेतना भी प्रदान करती है। यह शिक्षा को अधिक मानवीय, अधिक भारतीय और अधिक भविष्योन्मुख बनाती है। प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में और शिक्षा मंत्री श्री धर्मेंद्र प्रधान के सतत प्रयासों से बहुभाषिकता को जो सम्मान मिला है, वह आने वाली पीढ़ियों के लिए एक सुदृढ़ आधार तैयार कर रहा है। यह आधार ही ऐसे भारत का निर्माण करेगा जो अपनी भाषाई जड़ों से जुड़ा हुआ, सांस्कृतिक रूप से समृद्ध और ज्ञान के क्षेत्र में विश्वसनीय नेतृत्व देने में सक्षम होगा।

- प्रोफेसर अखिलेश मिश्र
अध्यक्ष, राष्ट्रीय मुक्त विद्यालयी शिक्षा संस्थान
ई-मेल – [email protected]

जहां तक मुझे मालूम है त्रिभाषा का चलन बहुत पुराना है। मेरे बच्चे १९७० में चेन्नई में पढ़ते थे और उन्हें प्रांतिय भाषा तामिल, अंग्रेजी और मातृभाषा हिंदी पढ़ाई जाती थी, हालांकि यह प्रयोग बहुत सफल रहा हो यह मैं नहीं कह सकता।
आदरणीय अखिलेश जी!
आपका लेख पढ़ा,” *त्रिभाषा नीति : समावेशी शिक्षा और राष्ट्रीय एकता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम”*
पढ़ते हुए प्रश्न उठा- किस तरह?
त्रिभाषा नीति तो प्रारंभ से ही चली आ रही है। हमने भी अपने समय में प्रथम भाषा हिंदी द्वितीय भाषा अंग्रेजी तृतीय भाषा संस्कृत पढ़ी।आज भी मध्य प्रदेश सहित कई राज्यों में इसी क्रम में तीन भाषाएँ पढ़ाई जा रही हैं।
प्रांतीय स्तर पर प्रांतीय भाषाएँ होती हैं शायद प्रायमरी तक कम्पलसरी।
स्थानीय और क्षेत्रीय भाषा वाली बात हमें समझ में नहीं आई।
स्थानीय क्षेत्र में बोली जाने वाली भाषा ‘बोली’ ही कहलाती है। उसका क्षेत्र बहुत सीमित होता है।
क्षेत्रीय के लिए थोड़े विस्तार की बात हो सकती है पर पाठ्यक्रम सबके लिए एक सा निर्धारित होता है प्रांतीय स्तर पर।
इस विषय पर हमने कुछ भी लिखने के पूर्व दिल्ली, देशबंधु कॉलेज के हिंदी के प्रोफेसर बजरंग बिहारी तिवारी जी से बात की।
उनका भी कहना था कि-
“त्रिभाषा फार्मूला पुराना है।उसमें हिंदी, अंग्रेजी तथा संस्कृत ये तीन भाषाएँ हुआ करती थीं/हैं।
हिंदी के ज़रिए विद्यार्थी राष्ट्र से, अंग्रेजी के ज़रिए विश्व से तथा संस्कृत के ज़रिए भारत के सांस्कृतिक वैभव व विरासत से परिचित होते थे।
दक्षिण भारत, पश्चिम भारत आदि में संस्कृत के स्थान पर वहाँ की प्रांतीय भाषाएँ पढ़ाई जाती थीं।
तिवारी जी के अनुसार-
नए फार्मूले में नया क्या है ?”
मातृभाषा, स्थानीय भाषा और क्षेत्रीय भाषा।
वे समझाते हुए कहते हैं-
उदाहरण के तौर पर-
कल्पना कीजिए- कोचीन की एक युवती को,जो प्रशिक्षित नर्स है, जयपुर के किसी अस्पताल में नौकरी मिल जाती है। उसकी संतान को वहीं के सरकारी स्कूल में दाखिला मिलता है। उस पर नया त्रिभाषा फॉर्मूला इस तरह लागू होगा-
मलयालम+ढूँढाड़ी+राजस्थानी
स्थिति यह है कि जयपुर के उस प्राइमरी स्कूल में न मलयालम के शिक्षक हैं, न ढूँढाड़ी के और न राजस्थानी के। हैं तो हिंदी और अंग्रेजी के। यहाँ त्रिभाषा फॉर्मूला कैसे लागू होगा?
मलयालम के शिक्षक की नियुक्ति होगी?
ढूँढाड़ी की शिक्षिका अपॉइंट होगी?
राजस्थानी में टेक्स्ट बुक ही नहीं हैं, शिक्षक कब आएँगे?
ऐसी स्थिति में नया त्रिभाषा फॉर्मूला कैसे लागू होगा?
उस नर्स की बेटी जिस क्लास में पढ़ती है उसकी एक सहपाठी की माँ बांग्ला भाषी है, दूसरी की मातृभाषा भोजपुरी है, तीसरे की संथाली। सरकारी विद्यालय का भवन जर्जर है, शौचालय ठीक से काम नहीं कर रहे, पुस्तकालय की कल्पना भी नहीं है।
शिक्षा का बजट निरंतर कम किया जा रहा है। सरकारी स्कूल बंद किए जा रहे हैं। सैनिक स्कूल कभी राष्ट्र का गौरव हुआ करते थे, उन्हें अडाणी को सौंप दिया गया है।
क्या प्राइवेट स्कूलों पर त्रिभाषा फॉर्मूला लागू करना संभव होगा?
लगता नहीं।
यह नया त्रिभाषा फॉर्मूला बजट में अतिरिक्त प्रावधान के बिना ख़याली पुलाव से ज़्यादा कुछ नहीं होगा।”
हम तिवारी जी से सहमत हैं! क्योंकि प्रत्यक्ष को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती।