मेरे लिए दरवाज़ा बहन ने खोला।
“और कौन आया है?” अंदर के बरामदे में अपना सामान पटक कर मैं ने पूछा।
“कोई नहीं। पापा ने किसी को नहीं बुलाया,” बहन ने कहा।
“मुझे क्यों बुलाया?”
तख्त पर बैठ कर मैं ने अपने जूते- मोज़े उतारे ही थे कि मां मेरी आवाज़ सुन कर वहीं बरामदे में चली आयीं।
“डी- लक्स में ठहरने और खाने का इंतज़ाम रखा है,” मां मेरे पास रखी एक कुर्सी पर बैठ गईं।
“कितने लोग रहेंगे?”
“सात। वह लड़का। उस का भाई। और उस की चार बहनें।”
सभी की तस्वीरें बहन मुझे मेरे मोबाइल पर भेज चुकी थी।
“क्यों? लड़के की मां क्यों नहीं आ रही?”
मुझे बताया जा चुका था लड़के के पिता नहीं रहे थे और अपने भाई-बहनों में वही सब से बड़ा था।
“वह अपने घर पर रहेंगी।”
“मोटरों का इंतज़ाम हो गया?”
“हां। मनोहर लाल की दो मोटरें कल सुबह यहां पहुंच जांएगी।”
“ठीक है,” मैं तख्त पर लेट गया। मोटर चलाना और मोटर में बैठना मुझे बेहद भाता था।अपनी बारहवीं के इम्तिहान के बाद आयी लंबी छुट्टियों में मैं ने ड्राइविंग क्लब से बाकायदा मोटर चलाना सीखने के बाद अपना ड्राइविंग लाइसेंस भी बनवा रखा था।
“मैं चाय बनाती हूं,” मां उठीं।
“नहीं,मैं अभी चाय नहीं पिऊंगा। पापा के आने पर पहले खाना खांऊगा।”
“क्या बहुत नाराज़ हो?” मां के रसोई में चले जाने पर बहन ने बात शुरू की।
“हां,” मैं ने कहा।
“पर क्यों?”
“वहां जिस दोस्त के भाई के साथ मैं ने तुम्हारे लिए बात चलाई थी वह तो अब मेरा दुश्मन बन जाएगा न!”
जिस मेडीकल कालेज के चौथे साल में मैं पढ़ता था, वहीं मेरे समजातीय एक सहपाठी का डाक्टर भाई अविवाहित था। मेरे संकेत उस ने उत्साही ढंग से ग्रहण किए थे और मुझे पूरा विश्वास था मेरे आगामी प्रयत्न ज़रूर ठोस परिणाम देंगे।
“इस लड़के को मैं जानती हूं,” बहन ने कहा, “यह लड़का ज़्यादा ठीक रहेगा।”
“ठीक कैसे रहेगा?” मैं तुनका, “शादी- ब्याह अपनी बिरादरी में हो, तो ठीक रहता है।”
“तुम लड़के से मिलोगे तो निराश नहीं हो॓ओगे,” बहन ने फिर प्रतिवाद किया।
“पर तुम्हें इतनी जल्दी क्यों थी? कुछ देर और नहीं रुक सकतीं थीं क्या?”
“वह लड़का बुरा नहीं है।”
“क्या तुम उस से प्रेम करती हो?” मैं तख्त से उठ बैठा।
“हीर- रांझे वाला प्रेम नहीं। सुभीते का प्रेम। उस के साथ लेन- देन का कोई चक्कर नहीं रहेगा। पापा ने उस के सामने शर्त रखी थी। यह शादी न तो कचहरी में होगी और न ही उस की बिरादरी के रीति-रिवाज के अनुसार। शादी होगी तो हमारे घर में होगी और हमारी बिरादरी के रीति-रिवाज के अनुसार होगी। उस ने पापा की शर्त मान ली है….”
“मानता कैसे नहीं?” मैं झल्लाया, “तुम ऊंची पढ़ी- लिखी हो। अच्छा कमाती हो….”
“वह मुझ से ज़्यादा तनख्वाह पाता है। मुझ से ऊंची नौकरी पर है,” बहन हंसी।
“हरीश,” मां ने मुझे रसोई से आवाज़ दी, “तुम्हारे पापा तम्बू वालों को ले आए हैं। जा कर बताना तो तम्बू कहां सही रहेंगे?”
रसोई की एक खिड़की बाहर के गेट की तरफ़ खुलती थी।
“यह सब क्या है?” पापा को देखते ही मैं उन्हें एकांत में ले गया, “सारी बिरादरी हमें बायकाट कर देगी। एक ही लड़की थी सो उसे भी दहेज न देने के चक्कर में बेगानी बिरादरी के सिर मढ़ दिया।”
“बिरादरी साथ रहे, न रहे, सब बराबर है,” पापा शांत स्वर में बोले, “मैं सब को परख चुका हूं। हर किसी से मिक्की की बात चलायी और हर किसी ने मुंह फाड़ कर अपनी बोली लगा दी….”
“बिरादरी से मेरा मतलब उन दो- चार घरों से न था जिन्हें आप जानते हैं। मैं तो अपनी उस बिरादरी की बात कर रहा था जो अखबारों में शादी के इश्तिहार देते और देखते हैं….”
“इश्तिहारों का क्या है? उनमें तो कुछ भी दिया जा सकता है। इश्तिहारों की वजह से गच्चा खा चुके कई लोगों को मैं जानता हूं। यहां सब देखा- भाला है। लड़का देखने- सुनने में अच्छा है। समान बिरादरी का नहीं। पर समान वर्ग का है। समान विचार रखता है। समान….”
“मैं आप की कक्षा का विद्यार्थी अब नहीं रहा, पापा। मुझे यह सतही तर्क मत दीजिए। ये मेरा गुस्सा बढ़ाते हैं….”
छब्बीस साल की अपनी आयु से पापा एक इंटर कॉलेज में पिछले पैंंतीस साल से गणित शास्त्र पढ़ा रहे थे और मेरे अध्यापक रह चुके थे।
“आज हमारे विचार मेल नहीं खाते। पर एक दिन तुम भी स्पष्ट अनुभव करोगे हमारा यह निर्णय सही था। दिमाग में यह बात भी रखने लायक है अगले साल मैं रिटायर होने वाला हूं….”
“मगर सही नहीं है यह। इसे क्या शादी कहते हैं? बाराती नहीं। घराती नहीं। ढोलक नहीं। बाजा नहीं….”
“यह मिक्की की शादी है। इस में मिक्की की मर्ज़ी चलेगी। तुम्हारी मर्ज़ी तुम्हारी शादी में चलेगी….”
अगली सुबह मनोहर लाल की भेजी हुई दोनो मोटरों को देख कर मुझे घोर निराशा हुई। मारुति की बलेनो पुरानी थी और वैन नयी होने के बावजूद थी तो वैन ही।
मनोहर लाल मां का फुफेरा भाई था। तीन साल पहले तक केबल बनाने वाले एक मामूली कारखाने का मालिक रहा था। परंतु इधर जब शेयर मार्केट में एकाएक बाज़ार गर्म हुआ था तो वर्षों पहले खरीदे उस के शेयर उसे करोड़पति बना गए थे। केबल बनाना छोड़ कर फिर उस ने अपने दो बेटों के साथ एक मौल बाज़ार खोल लिया था।
उस की मामूली कोठी अब तीन गैराज वाले बंगले में परिवर्तित हो गई थी। जहां प्रत्येक गैराज में एक मोटर आ खड़ी हुई थी।
“मोटरें कब तक लौटानी हैं?” मैं ने मां से पूछा।
“इधर काम डेढ़-दो दिन तक निपट जाएगा,” मां ने कहा, “फिर मोटरों को यहां सजा कर क्या करेंगे? लंच के एकदम बाद बलेनो मिक्की और लड़के को ले कर इलाहाबाद के लिए रवाना हो जाएगी और बाकी लोग वहां होटल में शाम तक ठहर लेंगे। वैन उन्हें पांच बजे वाली त्रिवेणी में बिठा कर फूफा जी के पास लौट जाएगी।”
“विदाई के लिए बलेनो तैयार करवानी होगी?क्यों?” मैं ने पापा से पूछा।
“हां। सब तय हो चुका है। अभी इन मोटरों को स्टेशन पहुंचना है। स्टेशन से उन लोगों को होटल तक पहुंचाना है। होटल में उन के नाश्ते के बाद उन्हें यहां घर लाना है। शादी और लंच के दौरान किसी समय भी बलेनो विदाई के लिए तैयार हो जाएगी।”
“ठीक है,” मैं ने कहा, “मैं मोटरों के साथ स्टेशन पहुंचता हूं। और इलाहाबाद से आने वाली जिस किसी गाड़ी में सात लोग एक साथ उतरते दिखाई देंगे मैं समझ लूंगा वही लोग हैं….”
इलाहाबाद से जो दो गाड़ियां समय पर आयीं,उन में से एक पर भी लड़के वाले नहीं आए। लड़के का मोबाइल नंबर लेने की न मुझे सूझी थी न पापा को मुझे वह नंबर देने की।
इलाहाबाद से आने वाली तीसरी गाड़ी एक घंटा लेट थी।
उस एक घंटे के बीच मैं घर आया तो बहन को लाल साड़ी व ज़ेवर में देख कर चकरा गया। सामान्यतः बहन बहुत सादे कपड़े पहना करती थी।
“क्या वे लोग अभी आए नहीं?” मां ने पूछा।
“नहीं,” मैं ने कहा।
“इलाहाबाद से सुबह बहुत गाड़ियां आती हैं,” बहन ने कहा, “मेेरे मोबाइल पर मैसेज आया है,वे लोग इसी लेट पहुंचने वाली गाड़ी से आ रहे हैं….”
“मैं उन्हें देखने फिर जाता हूं।”
इलाहाबाद से सुबह आने वाली इस तीसरी गाड़ी में वे सभी रहे। उमंग और जोश से भरे हुए। आगंतुकों में लड़के ने अपनी करीज़दार पतलून के साथ पूरी बाहों वाली सफ़ेद कमीज़ पहन रखी थी। बहनों में दो स्कर्ट पहने रही थीं। एक सलवार सूट तथा एक साड़ी। भाई टी- शर्ट के साथ जीनज़ पहने था।
“मैं मालविका का भाई हूं,” आगे बढ़ कर मैं ने उन का स्वागत किया।
“और मैं उस का दूल्हा,” लड़के ने मेरी ओर सरगर्मी से अपना हाथ बढ़ाया।
मैं ने उस की ओर हाथ बढ़ाया तो उस ने मुझे अपने अंक में भर लिया।
बलेनो में भी वह मेरे साथ सट कर बैठा। अपने प्रति उस का उत्साह मुझे श्रमसाध्य व सुविचारित लगा। स्वाभाविक व सहज नहीं।
डी- लक्स होटल में उन्हें पहुंचा कर मैं सीधे घर गया।
बहन रसोई की खिड़की से चिपकी खड़ी थी।
“वे लोग पहुंच गए हैं,” मैं पहले रसोई में गया।
“लड़का ठीक है न!” बहन ने पूछा।
“उस में आत्मीयता नहीं। बेगानगी बहुुत है,” मैं ने कहा।
“मगर उस ने तो कहा था वह तुम्हें अतिरिक्त स्नेह से मिलेगा….”
“उस का स्नेह- प्रदर्शन तो ठीक रहा। मगर उस का सौहार्द मुझे सायास लगा और उस की विनम्रता कृत्रिम।”
“तुम्हारे पापा क्या उन के साथ होटल में हैं?” मां रसोई में चली आयीं।
“हां, पापा उन्हें नाश्ता करवा रहे हैं….”
“लड़का तुम्हें कैसा लगा?” मां उत्सुक हो आयीं।
“अच्छा है,” मैं ने बहन की ओर देखा।
“अब बिरादरी में हमारी शर्तों के साथ ठीक लड़का नहीं मिला तो क्या करते?” मां ने सफ़ाई दी, “और फिर बड़ी बात, मिक्की को मानता है।”
“हां,लड़का अच्छा है,” मैं ने कहा, “मिक्की को आराम से रखेगा। उसे आदर- सम्मान देगा….”
सहसा बहन मुंह ढांप कर रोने लगी।
“अब किस बात पर रोती हो?” मां की मुद्रा तनिक ठन गई, “सब तुम्हारी मर्ज़ी पर छोड़ तो दिया है।”
“तुम अब मंडप का सामान तैयार रखो,मां। मैं लड़के वालों को लेकर लौट रहा हूं….”
लड़के को जयमाला पहनाते समय बहन का चेहरा म्लान रहा l
“कौन कहेगा यह शादी आप अपने प्रेमी से कर रही हैं? तनिक मुस्कराइए तो!” लड़के का भाई उच्छृखल हो उठा।
“हमारी ओर भले ही मुस्कराइए, न मुस्कराइए, भाभी,” लड़के की मंझली बहन ने अपना मोबाइल बहन की दिशा में लहरा कर ठिठोली की, “मगर हमारे मोबाइल को तो एक मुस्कराहट दे ही डालिए….”
मुस्कराने की बजाए बहन रोने लगी।
“मुक्कू,” पापा ने बहन के मनुहार वाले नाम से उसे पुकारा, “ चियर अप, मुक्कू। तुम यही तो चाहतीं थीं….”
मगर शादी के शुरू से अंत तक बहन रोती ही रही।कभी मां के गले लग कर। कभी पापा के। कभी मेरे।
विदाई के अवसर पर शादी के आयोजन में सम्मिलित होने आयीं पड़ोसिनों में से किसी एक ने विदाई गीत गुनगुनाना शुरू किया भी तो कहीं से कोई प्रोत्साहन न पा कर वह तत्काल चुप कर गई ।
मां के कहने पर मैं बहन को इलाहाबाद तक छोड़ने गया।
पहले किलोमीटर के दौरान लड़के ने हम से दो- तीन बार बात करने की चेष्टा भी की परन्तु बहन और मैं किसी वार्तालाप के लिए तैयार न रहे। बाकी का पूरा रास्ता सम्पूरित चुप्पी में कटा।
“तुम मुझे मिलते रहोगे न?” बहन की ससुराल से जब मैं चलने लगा तो बहन मुझ से लिपट कर फिर रोने लगी।
बहन की हूक मेरे कलेजे में उतर गई।
“हां,” मैं धाड़मार कर रो पड़ा, “तुम खुश रहना। हमारी चिंता न करना। मां और पापा का मैं पूरा ख्याल रखूंगा….”
“आप मोटर चलाना चाहें तो यहां आ जाइए,” वापसी में ड्राइवर ने कई बार मेरे सामने अपना प्रस्ताव रखा।
पर हर बार मेरा उत्तर संक्षिप्त व समरूप रहा, “नहीं।”
- दीपक शर्मा

कहानी से क्या कहना चाहते हैं? कुछ समझ में नहीं आया।