Sunday, July 19, 2026
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संविधान और हिंदी भाषा

हमें भारतीय संविधान के केवल पाठ को ही नहीं, बल्कि उसकी भावना को भी पढ़ना चाहिए। जब संविधान मौन में बोलता है। भारत एक जीवंत बहुभाषी संस्कृति का निवास है, फिर भी, हमारे संविधान की परिकल्पना में एक भाषा को विशेष स्थान दिया गया है। वह भाषा हिंदी है, जिसे सीधे तौर पर “राष्ट्रीय भाषा” घोषित नहीं किया गया है, लेकिन अनुच्छेद 351 के तहत इसे एक राष्ट्रीय उद्देश्य अवश्य सौंपा गया है।
जबकि राजनीतिक और सामाजिक वर्ग आधिकारिक और राष्ट्रीय भाषा के बीच बहस करते हैं और विद्वान भी अंतर बताते नही थकते हैं। पर हमारा संविधान चुपचाप हिंदी को भारत की मिश्रित सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व सौंपता है। अनुच्छेद 351 हिंदी को वास्तविक राष्ट्रभाषा बनाता है – नाम से नहीं, बल्कि संवैधानिक संरचना के द्वारा।

अनुच्छेद 351 के सटीक शब्दों में अस्पष्टता की गुंजाइश बहुत कम है। इसमें कहा गया है:
“संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा दे, उसका विकास करे ताकि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और आठवीं अनुसूची में निर्दिष्ट हिंदुस्तानी और भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूपों, शैलियों और अभिव्यक्तियों को बिना उनकी मूल भावना को प्रभावित किए आत्मसात करके उसे समृद्ध करे तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो, उसकी शब्दावली के लिए मुख्य रूप से संस्कृत और द्वितीयक रूप से अन्य भाषाओं का उपयोग करे।

यह कोई मात्र प्रतीकात्मक या औपचारिक उल्लेख भर नहीं है। बल्कि यह संघ सरकार का संवैधानिक दायित्व है। यह संघ सरकार को यह सुनिश्चित करने का अधिकार देता है कि हिंदी का न केवल उपयोग हो, बल्कि उसका विकास, आधुनिकीकरण और संवर्धन भी हो , ताकि वह भारत की विविधतापूर्ण पहचान की आवाज बन सके ।

बहुधा लोगों के मन में यह प्रश्न उत्पन्न होता है कि संविधान ने केवल हिंदी को ही क्यों चुना?

आठवीं अनुसूची में सूचीबद्ध 22 अधिसूचित भाषाओं में से केवल हिंदी को ही इस प्रकार का संवैधानिक प्रोत्साहन दिया गया है। इसे संयोग या चूक नहीं माना जा सकता। संविधान निर्माताओं ने सोच -समझकर हिंदी को चुना – जो भारत के बड़े हिस्से में पहले से ही बोली, समझी जाने वाली भाषा है – ताकि क्षेत्रीय, भाषाई और सांस्कृतिक बाधाओं को पार करते हुए राष्ट्रीय संवाद को एकीकृत करने के लिए हिंदी सबसे उपयुक्त माध्यम हो। इसके पीछे एक पुनीत उद्देश्य था, न कि अन्य भाषाओं को दबाना, बल्कि एक साझी अभिव्यक्ति के माध्यम से भारत की भाषाई विविधता में सामंजस्य स्थापित करना था।
भले ही भारत आधिकारिक तौर पर यह कहता हो कि उसकी कोई “राष्ट्रीय भाषा” नहीं है, फिर भी हिंदी अपने कार्यों , उपयोग और संवैधानिक समर्थन के कारण एक राष्ट्रीय भाषा की तरह यह कार्य करती आई है। संसद में, केंद्रीय सरकारी पत्राचार में, राष्ट्रीय प्रसारण में, बॉलीवुड, मीडिया आदि के सांस्कृतिक हस्तियों में और राष्ट्रीय योजनाओं, अदालतों और सार्वजनिक चर्चा में प्रयुक्त होने वाली प्राथमिक भाषा भी है। राष्ट्रभाषा के एक नाम के अलावा, हिंदी एक राष्ट्रीय भाषा के सभी कर्तव्यों का निर्वाह करती है।

जब भी कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हिंदी में राष्ट्र को संबोधित करता है, जब भी किसी अदालती फैसले का हिंदी में अनुवाद होता है, और जब भी कोई केंद्रीय कानून द्विभाषी रूप से प्रकाशित होता है, तब इस स्थिति की पुष्टि होती है। हिंदी को “आधिकारिक तौर पर” राष्ट्रीय भाषा घोषित न करना एक तकनीकी मसला हो सकता है, भारत की भाषिक वास्तविकता का प्रतिबिंब नहीं।

  • डॉ. साकेत सहाय
    मुख्य प्रबंधक (राजभाषा)
    पंजाब नैशनल बैंक, हैदराबाद
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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय डॉ.साकेत सहाय सर!

    आपका यह लेख शब्दशः बहुत महत्वपूर्ण लगा।
    वास्तव में संविधान के अर्थ को भावना सहित पढ़ना जरूरी है।

    भारत में बहुभाषी संस्कृति है। इसमें हिंदी का महत्वपूर्ण स्थान होना जायज़ भी है।
    इस लेख में अनुच्छेद 351 के बारे में पढ़ने के बाद यह सोच दृढ़ हुई कि संविधान की कम से कम महत्वपूर्ण जानकारियों को, नियमों व अनुच्छेदों की जानकारियाँ
    पाठ्यक्रम में सम्मिलित करना ही चाहिये।

    यद्यपि हिंदी को सीधे तौर पर “राष्ट्रीय भाषा” घोषित नहीं किया गया है, लेकिन *अनुच्छेद 351 के तहत इसे एक राष्ट्रीय उद्देश्य अवश्य सौंपा गया है।*
    यह लेख बताता है कि यह सही है कि राजनीतिक और सामाजिक वर्ग के लोग आधिकारिक और राष्ट्रीय भाषा के बीच बहस करते हैं। विद्वज्जन भी अंतर बताते थकते नहीं, किंतु हमारा संविधान खामोशी से हिंदी को भारत की मिश्रित सांस्कृतिक पहचान का प्रतिनिधित्व करने का दायित्व सौंपता है।

    *अनुच्छेद 351 हिंदी को वास्तविक राष्ट्रभाषा बनाता है – नाम से नहीं, बल्कि संवैधानिक संरचना के द्वारा।*

    अनुच्छेद 351 के सटीक शब्दों में अस्पष्टता की गुंजाइश बहुत कम है। इसमें कहा गया है:
    *“संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा के प्रसार को बढ़ावा दे, उसका विकास करे ताकि वह भारत की मिश्रित संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके और आठवीं अनुसूची में निर्दिष्ट हिंदुस्तानी और भारत की अन्य भाषाओं में प्रयुक्त रूपों, शैलियों और अभिव्यक्तियों को बिना उनकी मूल भावना को प्रभावित किए आत्मसात करके उसे समृद्ध करे तथा जहां आवश्यक या वांछनीय हो, उसकी शब्दावली के लिए मुख्य रूप से संस्कृत और द्वितीयक रूप से अन्य भाषाओं का उपयोग करे।*

    निश्चित रूप से यह प्रतीकात्मक या औपचारिक उल्लेख भर नहीं है बल्कि यह *संघ सरकार का संवैधानिक दायित्व है।*

    यह संघ सरकार को अधिकार देता है कि हिंदी का न केवल उपयोग हो, बल्कि उसका विकास, आधुनिकीकरण और संवर्धन भी हो , ताकि वह भारत की विविधतापूर्ण पहचान की आवाज बन सके ।
    यह महत्वपूर्ण बात है।

    हिंदी को ही क्यों चुनना? प्रश्न स्वाभाविक है।

    आठवीं अनुसूची में अधिसूचित भाषाओं में से केवल हिंदी को ही चुनना निश्चित ही संयोग या चूक नहीं। संविधान निर्माताओं ने सोच -समझकर हिंदी को चुना – जो भारत के बड़े हिस्से में पहले से ही बोली,समझी और पढ़ी जाने वाली भाषा है ।
    यह भी सच है कि क्षेत्रीय व राष्ट्रीय संवाद को एकीकृत करने के लिए हिंदी सबसे उपयुक्त माध्यम है।

    आपका स्पष्ट करना कि, *इसके पीछे एक पुनीत उद्देश्य था, न कि अन्य भाषाओं को दबाना, बल्कि एक साझी अभिव्यक्ति के माध्यम से भारत की भाषाई विविधता में सामंजस्य स्थापित करना था।* महत्वपूर्ण लगा।
    यह तो सभी कहते हैं कि आधिकारिक तौर पर भारत की कोई “राष्ट्रभाषा” नहीं है।

    पर यह भी सच है जैसा कि आप ने कहा- *हिंदी अपने कार्यों , उपयोग और संवैधानिक समर्थन के कारण एक राष्ट्रीय भाषा की तरह यह कार्य करती आई है। संसद में, केंद्रीय सरकारी पत्राचार में, राष्ट्रीय प्रसारण में, बॉलीवुड, मीडिया आदि के सांस्कृतिक हस्तियों में और राष्ट्रीय योजनाओं, अदालतों और सार्वजनिक चर्चा में प्रयुक्त होने वाली प्राथमिक भाषा भी है। राष्ट्रभाषा के एक नाम के अलावा, हिंदी एक राष्ट्रीय भाषा के सभी कर्तव्यों का निर्वाह करती है।”*

    इससे भी इन्कार नहीं कि जब भी कोई राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री हिंदी में राष्ट्र को संबोधित करता है, जब भी किसी अदालती फैसले का हिंदी में अनुवाद होता है, और जब भी कोई केंद्रीय कानून द्विभाषी रूप से प्रकाशित होता है, तब इस स्थिति की पुष्टि होती है।

    आप सच कहते हैं सर कि –
    *हिंदी को “आधिकारिक तौर पर” राष्ट्रीय भाषा घोषित न करना एक तकनीकी मसला हो सकता है, भारत की भाषिक वास्तविकता का प्रतिबिंब नहीं।*

    इस महत्वपूर्ण लेख के लिये आपका बहुत-बहुत शुक्रिया सर! क्योंकि यह अक्सर विवादित विषय रहा।पर काफी कुछ स्पष्ट हुआ।
    संपादकीय मंडल का दिल से ,मन से आभारइस चयन के लिये।

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