समय अपनी जगह से हिलने का नाम नही लेता। ऐसे भारी भरकम लम्हे कठोर शिला की तरह अपनी जगह पर स्थिर हो जाते जिन्हें ओट में रख पाना आसान नही। अजीब सी दास्तां है ये, जहां ईर्ष्या की आग में धधकते इंसान को कुछ सूझता ही नही, सिवाए दूसरों को कष्ट पहुंचाने के। उसके अंदर कुछ सालों से रचा बसा दर्द इतने वेग से बढ़ता गया, जिसे उलीचने के लिए वह गाहे बगाह बरस पड़ती। अचानक मां को देखते ही उसका मूड उखड़ गया और दबाया गुस्सा भड़क पड़ा।
–मेरे मना करने के बावजूद क्यों किेया आपने पापा को फोन ? आखिर क्यों मेरे बारे में उनसे कुछ बात की ? जिस आदमी का कैरेक्टर खुद संदिग्ध हो, वो मुझे खाक सुधार पाएगा ? मुझे क्योंकर समझना चाहेगा वो ? मुझसे पूछा, पैसे चाहिए हों तो भेज दें। नही चाहिए मुझे उनके पैसे की भीख, नैवर। कुछ भी करके कमा लूंगी मगर उनसे फूटी कौड़ी नही लेनी। आइंदा से उनसे कोई बात करने की जरूरत नही। हां, कहे देती हूं वरना ठीक नही होगा।’
गुस्से में बोली तेज आवाजें पूरे घर में गूंज रही थी। लगा जैसे बाहर से अंदर कदम रखता आगंतुक नवल वहीं से लौट गया। सुनाई पड़ा- ओफ, इतना हॉट एक्सचेंज, ये पढ़े लिखे सभ्य सुसंस्कृत समाज के लोग कहलाते हैं? फिर वही आवाजें, वही तिरस्कार, वही अपशब्द, वही अवहेलना, वही अवसाद के काले चैप्टर नए सिरे से इतिहास रचने लगे। जिरह के दौरान उसे किसी वकील की तरह पेश आना पड़ा-
‘बेटी नीति, नवल मेरा अच्छा मित्र है, वैलविशर है, नथिंग एल्स’ . बेटी के मन को पढ़ने की कोशिश करते हुए वे फिर से अपनी सफाई देने लगीं।
‘ही इज नॉट जस्ट ए फ्रेंड, आई नो। यू विहेव हिम इन सच ए वे, आई कांट टॉलरेट,’ आगे बोलने से उसने खुद को रोकना चाहा मगर मुंह से कडुवे बोल फिर से निकल पड़े-
‘ममा, पापा इज ए ग्रेट चीटर, यू नो। आप अपने या हमारे बारे में किसी से भी कुछ शेयर क्यों करने लगती हो ? किसी पर भी इतनी जल्दी भरोसा करने की क्या जरूरत है ? एक बार धोखा खाने के बाद हाउ कैन यू ट्रस्ट एनीवन ? आई नेवर ट्रस्ट एनीवडी. .सारी दुनिया ही धोखेबाज लगने लगी।‘
टूटी फूटी हिंदी अंग्रेजी में वह देर तक बड़बड़ाती रही। दुख, निराशा, हताशा और भग्न मन के परखच्चे उड़कर उन दोनों पर फिकते रहे। जीवन में चारों तरफ काला धुआं भरता जा रहा था। हताशा भरे जीवन की तालाब जैसे सूखता गया, जिसकी तली में कंकड़ पत्थर साफ साफ नजर आ रहे थे। बेटी चाहती तो मां के शुभचिंतक नवल के प्रति कृतज्ञ हो सकती थी, जिसने उन दोनों के लिए कितना कुछ किया मगर अपने गुरूर, दंभ और अहम की पराकाष्ठा में डूबी चेतना अपने सिवा किसी और के वजूद को स्वीकारने को तैयार ही नही। मैं, मैं और सिर्फ मैं, यही आवाजें उसके जीवन का एकमात्र सत्य बनकर उसी को डराने लगीं। नितांत अकेलेपन से जूझती वह बौखलाहट में जो जी में आए, वह बिना किसी संकोच के बके जा रही थी। जिंदगी पूरे नंगेपन में अपनी धज्जियां उधेड़ने लगी थी। एक बार जब आवरण निकल जाए तो नंगे वजूद को किसी की शर्म लिहाज नही रह जाती। वह पूरी तरह अनावृत्त होकर रौद्र रूप में अपनी हिंसा – प्रतिहिंसा का क्रूर खेल खेलने लगती। पता नही ये क्रूरता कब तक चलेगी ? कब खत्म होगा उसकी ये बकवास। सब कुछ समझ से परे, सोच से परे, अविश्वसनीय और अकल्पनीय।
‘ममा, आप जब भी किसी से बात करतीं हैं तो मेरे दिमाग में कुछ और चलने लगता। ये सब अच्छी बातें जरा भी रास नही आती। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ पापा की हरकतें याद आने लगतीं। उनके जैसा काइयां और खुदगर्ज आदमी कहीं और नही देखा। इस उम्र में उनकी ऐसी घटिया हरकतें, सरेआम की गई करतूतें, आई कांट टॉलरेट. . . भीतर खौलता लावा बरस पड़ा।
‘बेटी, ये सब सोचने की जरूरत नही। खामहखां ऊंटपटांग सोचकर माथा खराब कर रही। अरे, अभी तक कुछ खाया नही तूने ? खाना ठंडा हो रहा है।‘ उन्होंने उसके सिर पर नरमी से हाथ फेरा।
‘मुझे भूख नही है। लिसन, मैं बाहर जा रही हूं सो देर से लौटूंगी, डिनर पर इंतजार मत करना। और कहीं घूमने मत चली जाना।‘ गुस्से से भरी आवाज में दुबारा बोल पड़ी- ‘कहीं आपके मन में भी पापा जैसा कुछ करने की प्लानिंग तो नहीं ? हां, बता देना साफ साफ, मुझे अंधेरे में मत रखना, हां, कहे देती हूं।‘
‘मुझे कहीं नहीं जाना, न ही पापा जैसा कोई स्टेप उठाना है, एक बात को कितनी बार दुहराती रहूं?’ बोलते हुए आवाज लडखड़ाने लगी।
पिता के बारे में जितना सोचती, तनाव घेरने लगता। पापा जिस किसी से फ्लर्ट करने से कभी नही चूकते। उनकी ये रंगबाजी या लड़कीबाजी के किस्से किसी से छिपे नही है। बेशक पापा की पर्सनैली में स्मार्टनैस है, खूबसूरत हैं वे, कायदे से बात करते हुए अदा से मुस्कराते हुए हैंडसम लगते हैं, तभी तो ये सब . . . सोचते हुए रह रहकर फिर से पापा की काली करतूतें क्यों नही भूल पाती मैं ? होली पर पड़ोसन के गले में हाथ डालकर रंग लगाते पापा, मां के विरोध के बावजूद उन्हीं के घर पर देर तक पड़े रहते पापा, मां के सामने ही उन्हें किस करते पापा, उनकी शर्ट पर लिपिस्टिक के निशान दिखाती मां. . .
‘शादीशुदा होने के बावजूद ये सब करते हुए जरा भी शर्म लिहाज नही बची आपके अंदर? मां की तीखी बातें सुनकर वे तैश में आकर उल्टा सीधा बकने लगते- ‘तू एक ही बात की माला क्यों फेरती रहती? जो दिखाए सो कर । डायवोर्स लेना है तो ले ले। किसने रोका है?’
एकांत कमरे में घड़ी की टिक टिक सुनते हुए वह जोर जोर से चीखना चाहती- मगर बगल में लेटी मां की सिसकियां सुनकर चुप लगा जाती। बेचारी मां, इस उम्र में डायवोर्स लेकर भी कहां जाएंगी? अनायास अपनी जिम्मेदारी का अहसास जगते ही नीति फिर से स्टडी में एकाग्र होने की कोशिश करती। ये उसका फाइनल ईअर है, उसके बाद कंपटीटिव एक्जैम्स की तैयारी करने बाहर निकलना ही पड़ेगा। मां की उम्मीदें मुझ पर टिकी है मगर कैसे समझाऊं कि किताबें खोलते ही पन्नों पर पापा की नीचता भरी बातें याद आने लगतीं। न जाने क्या क्या मैसेज मां ने दिखाए थे मुझे पापा के मोबाइल से, सोचकर तनाव बढ़ता जाता। सांप जैसे फुंफकारते जहरीले संबंधों की पिटारी का मुंह जितनी ताकत से वह बंद करना चाहती, वो सांप दुगुने वेग से मुंह बाए फन फैलाकर घेर लेते उसके वजूद को।
मां के रोने धोने, चीखने चिल्लाने, डांटने फटकारने या ब्लेकमेलिंग की किसी भी धमकी का कोई असर नही पड़ा उन पर। अपनी रिसर्च स्टूडेंट से उनके संबंध बदस्तूर चलते रहे। पापा को उसका खुलकर साथ देना पड़ा- न, ये पूरा सच कतई नही। पापा भी उसके बिना कहां चैन से रह पाते थे ? आखिरकार वही हुआ जो वे चाहते थे। लगातार बड़बड़ाने से पागल करार दी गयी आंसू टपकाती मां की एक न चली और वे हमें अकेला छोड़कर खुल्लमखुल्ला उसके साथ रहने लगे। दुनिया का कोई भी कानून उनका कुछ न बिगाड़ सका। आफ्टरऑल ये उनका निजी मसला है, कहकर हर कोई पल्ला झाड़ लेता।
दादा, दादी की बातें या नसीहतें सुनकर अनसुनी कर देते पापा। मां के भाई से पापा से जोर शोर से कहासुनी जरूर हुई मगर नतीजा शून्य। दोनों तरफ की कानफोडू आवाजें सुनकर लगा जैसे एक एक लफ्ज हथौड़ा बनकर सीधे सीने पर पड़ रहा हो। आर्थिक रूप से कमजोर मां ने मायके की संपत्ति में अपना हिस्सा मांगा तो वे अनसुनी करके चलते बने। तब उनके सारे सुझाव हवाहवाई लगने लगे थे तब।
‘अलग होकर एलीमनी मांगो। अपने बारे में सोचना शुरू करो। अभी भी अपनी जिंदगी नए सिरे से शुरू कर सकती हो. . अंतत: यही सब समझाबुझाकर चलते बने, तब मैंने मां को समझाया-
‘पापा को हमारे साथ नही रहना तो उन्हें हम जबरदस्ती अपने साथ नही रख सकते। पापा ने ये घर जरूर हमें रहने को दे दिया, यही मेहरबानी समझो, मैंने मां को कई तर्को से कन्विंस करना चाहा लेकिन अपने अकेले पड़ते चले जाने की बेबसी पर वे बात बात पर रोने लगतीं।
पति से अलग होकर सामाजिक तौर पर मां अलग थलग पड़ती गईं। धीरे धीरे बेहद चिड़चिड़ी होती गयी। न जाने किस किसके पास सांत्वना का लेप लगवाने चलीं जातीं, सोचकर मन खट्टा होने लगा। चर्चा के चक्रव्यूह में फंसी मां की तकलीफ देखकर अच्छा नही लगता। गुस्सा भी आता, जब वे जिस किसी से सहानुभूति बटोरने चलीं जातीं। पीठ पीछे लोग बातें जरूर बनाते मगर काम कोई नही आता, ऐसी धारणा समय के साथ साथ पुष्ट होती गयी।
‘मेरी बच्ची कैसी कुम्हला गयी, खोयी खोयी सी रहने लगी। जब भी कोई बात करो, चिड़चिड़ाने लगती। किसी भी बात पर उखड़ जाती। एक बात के सौ जवाब देगी। पढ़ने में मन ही नही लगता।‘
सुनते ही मैं चीख पड़ी थी- ‘दिन रात किताबें घोंटने से कोई फायदा नही। यू नो, पापा के रंगीन मिजाजी के किस्से याद करके पढ़ाई से मन उचाट होने लगता। वैसे मॉडलिंग, फोटोग्राफी में पैसा है, ट्राई कर रही। कुछ पैसे हो जाएं तो बाहर जाने का कोई मौका मिले।‘
‘क्या कहा? तू मॉडलिंग करेगी?’ वे आश्चर्य से भरी आंखों से मुझे ताकने लगीं।
‘क्या बुराई है? फिगर अच्छा है, इंग्लिश बोल लेती हूं, देखने में ठीक ठाक हूं, लंबी, पतली टांगें हैं, और . ..
‘बस कर। प्लीज, ये सब बातें सोचना भी मत। ऐसी टेम्परेरी नौकरियों से कितना कमा लोगी ? कोई सुनेगा तो क्या सोचेगा हमारे बारे में? कायदे से पढ़ाई पूरी करके सरकारी नौकरी पकड़ ले। उसके बाद जो अच्छा लगे, करना।‘ भावावेश में बोलते बोलते वे रोने लगीं- ‘हे भगवान, कैसी दोहरी सजा दे रहे आप। कम से कम औलाद को सुख तो दे देते। नीति, तू पहले ठीक से नौकरी कर, उसके बाद ही शादी करना। मेरी तरह नही कि बीए के बाद ही मेरे मां बाप ने शादी की रट लगा दी थी।‘
‘कान खोलकर सुन लो, मेरी शादी की बात तो भूल ही जाओ। आपकी शादी का अंजाम देख लिया न, सो अब शादी करने का कोई इरादा कतई नही, नैवर। इन छोटी मोटी नौकरियों से काम तो चल रहा है मेरा। हां, आपका कहना ठीक है, डिग्री ले लूंगी मगर आगे के करियर के बारे में बाद में देखा जाएगा।‘ पलटवार करने से उसे कोई गुरेज नही था लेकिन मां का नसीहत देना बदस्तूर चलता रहा- ‘बेटी, तेरे भविष्य को लेकर फिक्रमंद रहती हूं। अभी भी सुधर जा, वरना जिंदगी भर हाथ मलती रह जाएगी। जिन लड़कों संग तू रात विरात घूमती रहती, वे तुझे बर्बाद करके छोड़ देंगे, फिर खाक में मिल जाएगी हमारी इज्जत।‘
‘ये किस इज्जत की रट लगा रखी आपने, आई डैम केयर, वाद द वे, ये मेरी लाइफ है, जिसे अपने तरीके से जीने का हक मुझे भी है, जैसे पापा को था। पापा की तरह जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर फ्री कौन नही रहना चाहता ? आपको जो करना हो, करिए, हू केयर्स?’
एक झटके से बोलते हुए वह कुर्सी से उठकर खड़ी हो गयी, फिर एक पैर से कुर्सी को परे धकेल फर्श पर पड़े रिमोट को पैर से दबाकर टीवी ऑन कर दिया। अब वह किसी और की कोई आवाज नही सुनना चाहती थी। न चाहते हुए भी वह फिर से अपनी दुनिया के आर पार देखने लगी, अपने ही अक्स के बरक्स- कुछ दिन ये भी आजमाकर देख लिया उसने।
कितनी विचित्र है ये चकाचौंधी दुनिया मॉडलिंग फोटोग्राफी की। फोटो शूट के दौरान पता चला कि किस तरह भवें उठाकर आंखें चौड़ी करनी है, चेहरे की बदलती भावभंगिमा से संगत मिलाते हुए गर्दन को खास अंदाज में झटके से यूं टर्न देना है, खुमारी और मदहोशी से भरी आंखों में कब किस तरह विशेष चमक भरनी है, जानबूझकर गिराई बालों की लटों को पीछे करती उंगलियों को कितनी देर बालों में घुमाना है, कभी आंखों के जरिए अपने एक्शन में गुरूर और दंभ की झलक, तो कभी मासूमियत को दर्शाने वाले हावभाव। यू टर्न देकर कमर को पीछे ले जाते हुए होठों पर नपी तुली मुस्कान को चिपकाए रखना, यही है देह की असल पूंजी। टू पीस में पोज देते हुए दांतों को होठों से ढाकते हुए आहिस्ते से जीभ को यहां वहां बेमतलब फिराना है। इशारा मिलते ही छाती की तरफ अधमुंदी पलकों से पोज देते वक्त सेक्स अपील दर्शाना मगर फूहड़पन कतई नही। अजीबोगरीब किस्म की लड़कियों को देखकर उसे लगा, जैसे वह किसी बुत में तब्दील होती जा रही। ऐसी अश्लील तस्वीरें खिचवाकर बेचकर प्रॉफिट कमाना ही इनका एकमात्र मकसद है, बस। इन तस्वीरों को देखने के लिए लालायित है पब्लिक। हाथोंहाथ बिकतीं हैं ऐसी नंगी, अधनंगी तस्वीरें।
कैमरामैन बताने लगा- तंग जींस में पोज देते वक्त स्वत:स्फूर्त आवेग से भरी लड़की ने खुद जिप खोलकर पोज दिया था, हाथोंहाथ बिकी थी वो तस्वीर। मोर सेल, मोर प्रॉफिट, यही है एकमात्र उसूल हमारी कामयाबी का। वैसे नई लड़कियों को कैसा भी पोज देने में गुरेज नही, पुरानी जमी जमाईं मॉडल्स बड़े नखरे करतीं हैं।
उसे याद आया, जैसे ही वह पोज देकर हटने लगी कि एक अनजान से लड़के ने उसकी जांघ पर हाथ धरा तो वह गुस्से से चीख पड़ी- ‘ये क्या बदतमीजी है?’
‘पैसा मिलेगा तुम्हें इसका … वह पूरी बेशर्मी से हंसने लगा।
‘भाड़ में जाए पैसा, कान खोलकर सुन लो, मैं पार्टटाइम मॉडलिंग करने आई हूं, रंडीवाजी करने नही। आई बात समझ में?’ वह गुस्से से थर थर कांपने लगी।
‘ज्यादा सतीसावित्री बनने का ढोंग मत करो1 सौ सौ चूहे खाय बिल्ली हज को चली. . .पता है, कुछ सालों का सफर होता है यहां, जल्दी ही बूढी लगने लगोगी तो कोई घास भी नही डालेगा। बड़ी आई नौटंकी करने, हुंह …
अचानक पीछे से आवाज आई- रिलैक्स मूड में पोज देना है, . . .
चारों तरफ शब्द ही शब्द बारिश की तरह पीठ पर पड़ने लगते, ऐन मौके पर मां की बातें याद आने लगतीं- स्टडी पर फोकस करो, सबसे जरूरी है करियर। छोटे मोटे काम करके चंद पैसे कमाना कोई बड़ी बात नही। ये सब तो बाद में सोचेंगे मगर ये बंदा तो इतनी जल्दी बूढी बनने की धमकी दे रहा था। कितना सोचा था कि देश से बाहर निकल जाएंगे, वहां कुछ भी कमाकर जी लेंगे मगर इसके लिए कुछ एक्सट्रा पैसे तो जोड़ लें जो इस लाइन में जल्दी से संभव नजर नही आ रहा। कितने लोगों से कितनी तरह के समझौते करने पड़ेंगे यहां, वो सब कतई नही होगा मुझसे, सोचकर इस दुनिया को गुडवाय करने का फैसला लेने में पल भर की देरी नही की।
थके कदमों से घर की तरफ मुड़ने लगी। मां बाप के बीच की कडुवी बातें याद करते करते उम्र का 30वां पहिया निकल गया। पिता के फोन पर नसीहतें सुनकर ऐसा लगा, जैसे गर्म तेल सीधे बदन पर डाला जा रहा हो- मैं तुम्हारे भले के लिए ही सोचता रहता हूं। मुझे गलत मत समझो। जो करियर बनाना चाहो, बनाओ। तुम्हारा पढाई का खर्चा उठाने को तैयार हूं।‘ भावुकता का लेप लगाने का अधूरी कोशिश को उसने अनसुना कर दिया और बीच में ही बिफर पड़ी- ‘नो हमदर्दी प्लीज। गो एंड इंजॉय योर लाइफ। अपनी जिंदगी का भला बुरा मैं खुद समझती हूं। बड़े आए मेरा भला चाहने वाले। हुंह, आपको क्या लेना देना मुझसे?’
पापा के नाम से चिढ़न होने लगती। उनकी करतूतें रिवाइंड होती रहती। मां को उल्टा सीधा बकते बड़बड़ाते पापा के बोल कैसे भूल सकती है वह, नो नैवर।
उन दिनों पापा की पसंदीदा छात्रा हुआ करती थी वह, जो नोट्स लेने बेखटके घर आ धमकती। यस सर, यू आर सो स्वीट’ नरमाई और बड़े अदब से बोलते हुए मुस्कराती रहती वह। फिर तो वह हमारे चौके में दखल देने लगी। मां का हाथ बंटाते हुए नई नई रेसिपी बनाने लगी। बात बात पर हंसते हुए कहती- ‘लाइए, मैं बनाती हूं आज का स्पेशल नाश्ता। ऐसे स्पेशल डोसे बनाऊंगी कि सब चाटते रह जाएंगे, ऐसी चटनी तो आपने कभी खाई नही होगी। अभी सब तैयार करती हूं, बस आधा घंटा दीजिए।‘ कहते हुए अधिकार भाव से रसोई में जाती रही। गजब की फुर्ती थी उसमें। इधर पापा भी उसकी हर फरमाइश को पूरी करने में जी जान से जुटे रहते। क्या फर्राटेदार अंग्रेजी बोलती और कितने सलीके से कॉटन की स्टाइलिश साडि़यां पहनती। खूब बन ठनके रहने का शौक था। उसका रूप, रंग, तेवर और आत्मविश्वास देखकर पापा मर मिटे उस पर, आंखों में मोटा काजल, माथे पर बड़ी बिंदी, मैचिंग कड़े बुंदे, जूड़े में महकते गजरा सूंघते हुए पापा सुध बुध गंवा बैठे। बगल वाली आंटी ने मां को चेताया था- सुनो, इससे खबरदार रहना। मिठबोली है, काम निकालने की कला में माहिर। न जाने कौन सा मंतर फूंकती है कि मर्द इसके आगे पीछे घूमते। इसका घर में आना जाना बंद करो। संभालो अपने घर को वरना कौन जाने, कल क्या हो जाए, अभी देर नही हुई।‘
लेकिन देर तो हो चुकी थी। देखते देखते हमारा सालों पुराना घर संसार छीन लिया गया और हम तमाशबीनों की तरह लुटते पिटते रहे। उस दिन का वाकया तो कभी नही भूल सकते।
हम सबको 4 दिन के लिए मुंडन प्रोग्राम में कानपुर जाना पड़ा। पापा उसी दिन देर रात निकल लिए- जरूरी काम आ गया। जब कि हमें कुछ दिन और रूकना था। पता नही क्यों, मां के दिमाग में फितूर आया कि हम भी अगले दिन पापा को बिना बताए निकल लेंगे।
ओफ, रोंगटे खड़े कर देने वाले उस रात का मंजर कभी नही भूल सकती। रंगीन बल्बों के नीचे रेशमी नाइटी से उघड़े बदन को ढापने की कोशिश करती मेधा को देखकर तो मां को जैसे दौरा सा पड़ गया। बदहवास हालत में वे पूरी ताकत से गला फाड़फाड़कर चीखने चिल्लाने लगी- ‘ओ चुड़ैल, तूने जिस थाली में खाया, उसी में छेद करने में जरा भी लाज शर्म नही आई? मौके का फायदा उठाने में तूने कोई कसर नही छोड़ी। जवानी की आग लगी थी तो शादी क्येां नही की? ’बौखलाई मां की आंखों से अंगारे फिक रहे थे लेकिन गर्दन नवाए पापा सिगरेट पर सिगरेट फूंकते रहे। जैसे ही मां झपट्टा मारने उसकी तरफ दौड़ी, पापा की खामोशी दहाड़ में बदल गयी- ‘तुम जो ये सब देख रही हो, इसमें मैं भी शामिल हूं। तुम इसे यूं धक्के मारकर इस घर से नही निकाल सकती। ये मेरा घर है, आई बात समझ में ?’ पापा एक एक शब्द नाप तौलकर बोले।
‘एकदम चुप हो जाओ। ज्यादा तमाशा दिखाने की जरूरत नही। शांत हो जाओ, कहते हुए पापा हमारे सामने उसका हाथ थामे उसी वक्त कार से उसे छोड़ने निकल गए1 मां की जलती आंखों से लापरवाह वह लंबे लंबे डग भरते हुए सर्र से बाहर निकल गयी।
नीति के अंदर उल्टा पहिया घूमने लगा, कितनों से उसकी दोस्ती हुई मगर कहीं बात शादी तक पहुंची ही नही। रिश्तों में वैसा कमिटमेंट नही, कोई गहराई नही। सब के सब फ्लर्ट करने वाले दोगुले लड़के जिनके साथ टाइमपास दोस्तियां की जा सकती हैं, मगर बहुत दूर तक या देर तक कोई किसी का साथ नही निभाना चाहता। सबके अपने अपने खटराग हैं। खुद कमाना, खुद पर खर्च करना, किसी से है कोई मतलब ? तनाव की अति होने पर खुद ही बड़बड़ाने लगती- कौन है यहां मेरी परवा करने वाला ? मां की पराधीनता देखकर मन खराब हो जाता। मां के लिए कुछ अच्छा करना होगा, उनकी खुशी के लिए जरूर पढ़ाई पर फोकस करेंगे ,सोचती रही देर तक। वैसे भी पापा मां को सिर टिकाने के लिए घर दे चुके थे, जिसका एक हिस्सा किराये पर चढ़ाकर आराम से मां की जिंदगी चल निकली।
उस दिन पापा की नसीहतों पर देर तक माथापच्ची करती रही। गुस्से में गाड़़ी चलाकर क्लब आने का मन बनाया, चलो, कुछ दोस्तों संग गम को फूंक मारकर उड़ाते हैं, ये उखड़ा मूड चेंज होगा, सोचकर सबके बीच इत्मीनान से बैठ गई। मेज पर शराब की बोतलें खुलीं हैं, सिगरेट पर सिगरेट फूंकते दोस्त। तेज गानों के बीच मदमस्त होकर नाचते कई जोड़े। खुमारी में डूबती पलकों के बीच जाने अनजाने दृश्य रिवाइंड होते रहे।
‘बस करो यार, बहुत पी चुकी।‘ साथ बैठे लड़के ने रोकना चाहा मगर उसकी बुदबुदाहट बदस्तूर चलती रही- ‘ मेरी जिंदगी में सब कुछ खल्लास। जितना ज्यादा सोचती, दिमाग की नसें चटचटाने लगतीं। अब तक घटा सब कुछ भूल जाना चाहती, मगर सब कुछ उतनी शिद्दत से याद आता जा रहा। विचित्र विडंबना है कि भूलने की जबरन कोशिश में और ज्यादा तेजी से धर दबोचती हैं यादें। पार्टी में बातों का सिलसिला भला कभी रूकता है ? पूरे जोश, उत्साह, उमंग और उठान पर चल रही पार्टी में शराब का रंग नसों में घुलकर लोगों के सिर पर जादू बनकर नाच रहा था। बतरस के मानसरोवर में सभी गोते लगा रहे थे-
‘कुछ भी कहो यार, यहां इतने लड़के हैं मगर नीति का किसी से शादी करने का मूड नही है,
‘तो क्या हुआ ? शादी की जरूरत किसे है ? बिना शादी किए भी मजे तो किसी शादीशुदा से कम नही ले रही ? गलत कह रहा क्या ?’
‘सबको अपने अपने ढंग से अपना अपना जीवन जीने का हक है न ? जजमेंटल क्यों होते हो भला ? कितनी तेजी से बदल रहा जमाना। शादी, तलाकशुदा या कुंवारी जैसे टैग गुजरे जमाने के चोंचले बन चुके। आई बात समझ में ?’
कनफुसिया बातें, कानफोड़ू संगीत और हंसी के फौब्वारे के बीच प्लेटों और गिलास की खनखनाहट की आवाजें मिल गईं थीं। नींद में अधमुंदी पलकों के भीतर तमाम चेहरे गड्डमड्ड होते रहे। चारों तरफ पसरे घुप्प अंधेरे को आंखों में भरते हुए वह पूरे इत्मीनान से गाड़ी चलाने लगी। नीति की लड़खड़ाती आवाज जमीन पर टूटकर गिरते बेआवाज पत्तों की तरह झड़ने लगी- नाव आई एम ए फ्री बर्ड, फ्री बर्ड, फ्री फॉर एवर . . . बेतरतीबी से बिखरे बाल आंसुओं में लिथड़कर उसके चेहरे पर चिपक गए। अचानक बुदबुदाने और फिर फफककर रोने की आवाजें रात के सन्नाटे को भेदने लगीं। ऐसा लगा, जैसे नीति की रूआंसी आवाज सुनकर काले धब्बों की तरह बुत बने पेड़ के हिलते डुलते पत्ते भी सहमकर शाखाओं के बीच दुबक गए हों।
घर पर आकर जैसे ही उसने गेट खोलना चाहा, इंतजार करती मां उसे संभालकर कमरे तक ले आईं- बेटी, खुद को संभाल। अभी भी कुछ नही बिगड़ा है, बस, तू किसी तरह खुश रहना सीख ले। मैं हूं न तेरी हर यात्रा में तेरे साथ साथ. .. अपने पर भरोसा कभी मत खोना नीति।‘
‘ ओके मां, मन करता है, फ्री बर्ड बनकर खुले आसमान में उड़ान भरूं और वापस कभी न लौटूं। सच में किसी से कोई अपेक्षा नही रही अब. . .बुझी आवाज किसी तरह गले से निकली। ‘नीति, ध्यान से सुन, किसी एक के जीवन से चले जाने से खुद की जिंदगी कभी रूकती नही, इतनी छोटी सी बात तेरी समझ में क्यों नही आ रही? आजाद है तू मगर एक सीमा के बाद आजादी से उड़ान भरने से तेरे पंख जल सकते हैं, सो खुद को तो बचाना है तुझे। तू रहेगी, तो शायद मैं भी जी लूं वरना मेरे जीने का क्या मतलब?’ बोलते हुए उनकी रूलाई फूट पड़ी।
अनायास नीति के मन में न जाने ऐसा क्या भाव उमड़ा कि वह मां के गले से लिपट गई। गहराती काली रात में भी उसके मुरझाए चेहरे पर बेफिक्री और सुकून के रंग साफ साफ चमकते नजर आए ।
- रजनी गुप्त
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