इंटरनेट की सड़क पर
हमने इंटरनेट की भीड़-भरी
सड़क पर ढूँढ ही लिया
एक छोटा-सा कोना,
बतियाने के लिये।
अब परीक्षा है हमारी
कि बिना चेहरा देखे,
बिना सूँघे,
बिना छुए,
मैं..
तुम्हारे भावों को,
और तुम,
मेरे भागते भावों को कह दो–
“धप्पा”
इस तरह बनाना शुरू करें
सड़क के बीचों बीच उगाये
अपनी दोस्ती के पेड़ पर,
बातों का घोंसला
तिनका-तिनका
… आओ…!!
एक साँस
साँसों की भीड़ में
एक साँस है,
सब साँसों को साँस बनाती
जैसे वो साँस नहीं
एक पेड़ हो ऑक्सीज़न का!
जब दिन की भाग–दौड़ में
साँसें शोर मचाती,
सब कुछ उथल-पुथल कर जाती हैं,
तब मैं आ बैठती हूँ
उसी साँस की छाँह में
जहाँ होते हैं
मैं और तू
बस्स…!
दुनिया भर के काम,
हमारे साउंड प्रूफ़ मन के काँच के पीछे से
चिल्लाते हैं,
घड़ी, भागने का संकेत करती है!
पर कुछ देर के लिये
मैं रुक ही जाती हूँ,
उस साँस की छाँह में,
अपनी..
एक साँस लेने के लिये॥
दृश्य: वर्षा
आज धूप की मुठ्ठी बाँधे
सूरज बादल पीछे दुबका
और हवा की बन आई है
घर-घर
जा कर चुगली करती।
सूरज व्याकुल देख रहा है
पर बादल का परदा भारी
उस पर बरखा
बरस-बरस कर
तड़-तड़
धरती से बतियाती।
रामू झुग्गी भीतर भीगे,
मुनिया थर-थर
काँप रही है
ताप चढ़ा मुनिया की माँ को
चूल्हा तक जलना भारी है।
मुन्ना बुड़-बुड़
बोल रहा है
सूरज ताप दिखाने आओ,
आसमान में
जगमग हो कर
तकिया-बिस्तर आन सुखाओ॥
दृश्य: सुबह
हवा शान्त है,
रात बरसता मेह रुक गया,
सड़कें पानी पीकर लेटीं,
पत्ते सभी नहाये दिखते,
सूरज भी अब बदन पौंछ कर,
आने की तैयारी में लगा हुआ है।
चुन्नू कोने में बैठा है,
माँ से झगड़ा कर रूठा है!
रोटी, सब्जी नहीं चाहिये,
सैंडविच से मन ऊबा है,
पिज़्ज़ा, पास्टा नहीं बनाती,
रोज़ वही खाना देती हैं॥
माँ उलझी है,
कमरे-कमरे, बिखरी-बिखरी,
इसे उठाती, उसे सँभाले,
खाना-कपड़ा सब पकड़ाती
नखरे सबके उठा रही है,
माँ उलझी है॥
आज देर फिर हो जायेगी,
बॉस सुनाएगी फिर दसियों
दिन भर झिड़की सुनते-सुनते
मन खट्टा फिर हो जायेगा,
किसे सुनाऊँ?
सबको अपना काम चाहिये!
मुझको भी आराम चाहिये
चाय घूँट भर पी लेने को,
पल भर का विश्राम चाहिये!
पर चुन्नू फिर रूठा है,
इनके कपड़े, उलटे-सुलटे
गुड़िया बाल बिखेरे बैठी,
घड़ी दौड़ती पागल जैसी
भीतर जैसे मेह गरजता …..!!
बाहर,
लेकिन हवा शांत है,
हवा शान्त है॥
डॉ. शैलजा सक्सेना
Co-Founding Director- Hindi Writers Guild, Canada
………….
