मैं हूँ धुआँ, काला-काला, दैत्याकार,
मुझे उठना है पृथ्वी से आसमान तक;
पल रही है महत्वाकांक्षा मेरे अन्दर-
नील गगन की छत्रछाया में तैरते चाँदी-जैसे बादलों को धकियाना, उन्हें ठिकाने लगा देना;
मैं ढँक दूँगा एक दिन सुदूर आकाश के नीलेपन को;
मेरे भीतर छिपे हैं न जाने कितने भग्नावशेष,
कच्चे-पक्के भवनों के, उनके भीतर पल रहे
असंख्य जीवों के;
मेरे भीतर दब गई है मासूम बच्चों की किलकारियाँ,
स्त्रियों का सम्मोहक हास-परिहास, और वृद्धजनों के प्रार्थना के स्वर;
मैं कर दूँगा विषाक्त पूरे वातावरण को,
और करता रहूँगा आसमान की ओजोन परतों में छेद;
मुझे नफरत है हँसती-खेलती ज़िंदगी से;
मुझे पसंद है गोला-बारूद और हाहाकार मचाते,
पृथ्वी की छाती को रौंदते बमों, मिसाइलों व ड्रोनों से,
जो खूब धुआँ तो उड़ाते हैं पर नहीं देखते
कि मरने वाला कौन था!
मुझे पसंद है आग हर तरह की जो संजोकर रखती है
मुझे अपने अंक में बंद मुठ्ठी की तरह;
मुझे तो फैलाना है अपनी कालिमा को अन्तरिक्ष से भी आगे;
मैं धुआँ हूँ-उड़ना चाहता हूँ बार-बार,
काला-काला दैत्याकार!
- डॉ.राकेश चन्द्रा, लखनऊ
पेशे से प्रशासनिक अधिकारी रहे हैं। साहित्यकार के रूप में आपने नई कविता, हिंदी गज़ल एवं हास्य-व्यंग्य कविताओं को भावाभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। अब तक हिंदी साहित्य की पाँच पुस्तकें, विधि पर पाँच पुस्तकें, हिंदी से अंग्रेजी में अनुवाद की 10 पुस्तकें और अंग्रेजी साहित्य में सात पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं ।
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