Sunday, July 12, 2026
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ब्रजेश कुमार की कविता- जाना एक पिता का

आपके जाने से ज्यादा सालती है
बिस्तर की वह खाली पड़ी जगह
अल्लसुबह पानी के मोटर की घनघनाहट
बाथरूम में खुले नलके के पानी की छनछनाहट
धूप में पड़ी खाली प्लास्टिक की वह कुर्सी
जमीन पर चुपचाप बैठे माइकल की मायूसी
बादाम के उस शाख से कुछ पत्ते भी यूँ ही झड़ जाते हैं
खालीपन की सीढ़ियाँ कुछ कदम भी चढ़ जाते हैं
वैसे तो मशहूर थीं आपके सफर पर जाने की कहानियां
दिनों, महीनों की तैयारियां
होल्डाल में करीने से रखे जाते तकिये,चादरें
औऱ रजाइयाँ
ब्रश, चप्पलें, मंजन और दवाईयां
अबकी जाना आपका ऐसे, किसी को रास नहीं आया
ना जुटे लोग न मचा कोई शोर
चले जाना यूं बिना कुछ कहे
न दिखाए दंश और घाव, जो हृदय ने सहे
न आँखों से नीर बहे
शांत,निःशब्द लिए स्मित हास्य सा भाव
अनंत सफर पर निकले पाँव
नहीं बुने जायेंगे अब वो शब्द और अट्टाहासों के ताने बाने
नहीं गुने जायेंगे अब बेमतलब सी कई बातों के माने
चंद शब्द भर नहीं थे वे किसी उपन्यास के
डोर थे रिश्तों के, विन्यास रहे विश्वास के
हर पन्ने पर उन्हीं के हस्ताक्षर हैं,
हम बस एक एक अक्षर हैं उसी क़िताब के
उनींदी सी धूप फिर टहल कर
आज बैठी रही उसी कुर्सी पर देर तक
गूँजती रही घनधानहट मोटर की सबेर तक

ब्रजेश कुमार
भारतीय  प्रशासनिक सेवा के अधिकारी। संप्रति बिहार सरकार में  राजस्व विभाग के बहु परिमाप निदेशालय अंतर्गत कार्यरत। अपने कार्यों और दायित्वों के साथ कहानी, कविता और वैचारिक लेखन में सक्रिय।

मोबाइल: 9931400758
ईमेल: [email protected]

 

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