द्वितीय विश्व युद्ध समाप्त होने के तीस वर्षों के बाद सोवियत रूस के एक प्रसिद्ध पत्रकार एवं गुप्तचर श्री वसीली मित्रोखिन ने उन वीरों की खोज की जिन्हें तेहरान के एक विशाल जलसे में 1 सितम्बर 1944 को लाल सितारा पदक से सम्मानित किया गया था। उनको पता चला यह दोनों अपने अपने गाँव में खुशहाल थे। इनके नाम थे हवलदार ठाकुर गजेंद्र सिंह और सूबेदार नारायण राव निक्काम। श्री मित्रोखिन ने एक पुस्तक लिखी थी जिसका नाम है “फ्रेंड्स ऑफ़ द सोवियत यूनियन”।
2 मई 1944 को रूसी सेना ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया था और हिटलर की सेना को खदेड़ दिया था। इसी दिन के तीस वर्ष के बाद 1975 में भारत की राजधानी दिल्ली में सोवियत दूतावास में एक जलसा आयोजित किया गया था। वसीली मित्रोखिन इस जलसे में ठाकुर गजेंद्र सिंह और सूबेदार नारायण राव निक्काम को आमंत्रित करने आये थे। भारत आने पर वह स्वयं उनसे उनके गाँव मिलने गए।
मित्रोखिन लिखते हैं कि अवकाश -प्राप्त नायक सूबेदार गजेंद्र सिंह हमारी प्रतीक्षा कर रहे थे। उनका गाँव बेहद सुन्दर था जो पिथौरागढ़ की शोर वादी में स्थित है। द्वितीय विश्व युद्धबंदी के तीस वर्ष के बाद 2 मई 1975 में हम उनको ढूंढते हुए आये थे। दिल्ली से पिथौरागढ़ तक करीब ५०० किलोमीटर तक का फासला था। सड़क की हालत बेहद खराब थी। मगर जब हमने याद किया कि जब ठाकुर गजेंद्र सिंह ने अपनी जान पर खेलकर इससे कहीं अधिक दुश्वार परिस्थितियों में येन केन प्रकारेण लाल कमान के सैनिकों को भोजन सामग्री और युद्ध सामग्री पहुंचाई थी तो हमारे मस्तक श्रद्धा से झुक गए। इसी दिन सन 1944 में रूस ने बर्लिन पर कब्जा कर लिया था। और जर्मनी की हार सुनिश्चित हो गयी थी।
हमारे सामने एक महान पुरुष खड़ा था जिसने लाल कमान को हिटलर को कुचलने में मदद की थी। एक वीर पुरुष जिसे रूस ने अपने सर्वोच्च पदक से गौरवान्वित किया था। देखने में ठाकुर गजेंद्र सिंह उन अनेक सिपाहियों के सामान ही लग रहे थे जो पिथौरागढ़ की उस घाटी में बिखरे आवासों में अपना अवकाशप्राप्त जीवन बिता रहे थे। परन्तु जब उनसे वार्तालाप हुआ तो हमारे समक्ष एक लौह पुरुष था जिसकी बहादुरी की मिसाल नहीं दी जा सकती। उसकी कर्तव्यपरायणता पर अविश्वास नहीं किया जा सकता था। फिर भी वह बेहद विनम्र और सादगी पसंद व्यक्ति थे। उनकी कहानी उन्हीं की जुबानी सुनिए।
ठाकुर गजेंद्र सिंह…
मेरा जन्म 1916 में प्रथम विश्व युद्ध के समय बदलू गाँव में हुआ था। मैंने पिथौरागढ़ और देहरादून में शिक्षा प्राप्त की।1933 में मैंने ‘ रॉयल इंडियन आर्मी सप्लाई कारपोरेशन ‘ में अपना नाम लिखवाया। 1942 में हमारी टुकड़ी को भारत से बाहर बसरा भेजा गया। हमारा हेडक्वार्टर खानिकिन में था अतः बाद में हमें वहीँ लगा दिया गया। मुझे टूटी फूटी गाड़ियों की मरम्मत का काम दिया गया। मई सप्लाई की छकड़ा गाड़ियों को सुधारता था। हमारा प्रमुख काम था लाल कमान को भोजन आदि पहुंचाना। छै टन वाली ट्रक पर खानिकिन से तबरीज़ तक हमादान होते हुए तीन दिन की कठिन यात्रा थी। हमारे अंग्रेज अफसरों ने हमें बताया था की लाल कमान के सिपाहियों को भोजन पहुंचाना कितना जरूरी था क्योंकि वह जर्मन सेना को हमारी खातिर रोक रहे थे ताकि वह भारत पर कब्जा न कर लें। हमने दिन और रात जी तोड़ काम किया। हमने किसी भी खतरे की परवाह नहीं की। हर पहाड़ी के पीछे ,हर पेड़ के ऊपर और हर कोने में जर्मन सिपाही छुपे होते थे। परन्तु हमने अपना सप्लाई का काम जारी रखा। हम तहेदिल से जानते थे कि युद्ध का सामान और असला कितना जरूरी था मोर्चे पर ,न केवल रूस की सुरक्षा के लिए बल्कि हमारे देश की भारत की सुरक्षा के लिए भी। हमारा दुश्मन कितना निष्ठुर और आततायी है इसका हमको अंदाज़ा था। यह लोग न सिर्फ हमारे बल्कि सारी मानव जात के दुश्मन थे। यह सोंच हमको घुट्टी की तरह पिलाई जाती थी और यही हमारे हौसलों को बुलंद रखे हुई थी।
सन 1943 में ऐसे ही एक फेरे में मैं बुरी तरह घायल हो गया। घुप्प अँधेरे में एक रात ,जब हम युद्ध का सामान ट्रक पर से उतार रहे थे तो किसी ने मेरी बायीं जांघ में संगीन भोंक दी। मुझको तुरंत एक मिलिट्री के अस्पताल में बसरा ले जाया गया। वहां के डाक्टरों ने कहा कि मुझे इलाज के लिए तुरंत भारत भेज देना चाहिए। परन्तु मैंने कतई मना कर दिया। मैं अपनी टुकड़ी से अलग नहीं होना चाहता था। इसलिए मैंने अपने कमांडर को बता दिया कि किसी भी हालत में मैं भारत नहीं जाऊंगा। .मेरा इलाज बसरा में रहकर ही होगा अतः मैं चौबीस दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा। ठीक हो जाने पर मैं वहीँ से वापस अपनी ड्यूटी पर चला गया। मेरी ज़िद पर मेरे कमांडर और अन्य लोगों को बहुत आश्चर्य हुआ बीमारी हारी में कौन न स्वदेश जाना पसंद करेगा ? पर मैंने सोंचा कि युद्ध काल में हरेक सिपाही का कितना महत्त्व होता है मोर्चे पर ! मैं कैसे अपने साथी सिपाहियों को अकेला छोड़ देता ? हमारी टुकड़ी ने काम जारी रखा और डेढ़ साल तक हम मोर्चे पर रसद पहुंचाते रहे। उसके बाद हमें इटली में स्थानांतरित कर दिया गया।
भेजी जानेवाली सामग्री का आयतन बहुत विशाल था। प्रति मास 5000 टन युद्ध सामग्री हमने रूस तक पहुंचाई। छह महीने तक बिना रुके इसी ईस्ट पर्सिया रूट से , जो प्राचीन कारवाँ पगडण्डी से बदलकर अब एक पक्की मोटरवे सड़क बन गयी है। रूस को मनों के हिसाब से बोरियाँ , कैनवस , किरमिच का कपड़ा, जूट की रस्सी, वोल्फ्रॉम, सिल्क, टीन, चा , काली मिर्च आदि पहुंचाई। एक फेरे में हमने 1000 टन हार्वेस्ट यार्न और एक फेरे में में 1000 टन निकल रूस तक पहुंचाया। और इतने कम समय में कि उसका रिकॉर्ड दर्ज है। हारवेस्ट यार्न को कलकत्ता जूट मिल्स ने रूस की विशेष मांग पर तैयार किया था। इसको रूस में फसलों की कटाई के समय से पहले पहुंचाना था। और एक फेरे में कलकत्ते से रूस तक 28 दिन लगते थे।
टीन, पारा, वोल्फ्रॉम और रेशम चीन से हवाई जहाज से आते थे और फिर रेलगाड़ी से ज़हीदां तक पहुंचाए जाते थे। उसके बाद हम उनको ट्रकों में लादकर रूस तक ले जाते थे। हज़ारों ट्रक इस काम में जुटे रहते थे और हज़ारों ट्रक इस दौड़ में काम आये मगर ज़हीदां से रूस तक हमारी बनाई इस सड़क को बराबर सही हालत में रखा जाता था ताकि कोई व्यवधान न आने पाए। रूसी सिपाहियों और अफसरों से हमारा संपर्क केवल सामान उतारने के समय होता था। परन्तु वह लोग बहुत दयालु तमीजदार और बहादुर थे। हमें रूसी भाषा नहीं आती थी न ही उनको अंग्रेजी या हिंदी आती थी। हम ईरानी दुभाषिए के माध्यम से बातचीत कर लेते थे। उन लोगों की मित्रता की भावना और आत्मविश्वास ग़जब का था। वह अपनी मातृभूमि को बचाने के लिए किसी भी हद तक जा सकते थे। और नाज़ियों से सख्त नफरत करते थे।
जब मैं पहली बार तबरीज़ पहुंचा तो मैं स्त्री सैनिकों को देखकर बहुत चकित हुआ। वह चौकीदार से लगाकर अफ़सर तक किसी भी क्षेत्र में पुरुषों के संग कंधे से कंधा मिलाकर काम करती थीं। ये स्त्रियां साधारण नहीं थीं। यह सब दुर्गा का अवतार थीं। जिनकी नाज़ियों पर क्रुद्ध दृष्टि थी। मैंने पहली बार स्त्रियों को युद्ध क्षेत्र में लड़ते हुए देखा। मैं बहुत प्रभावित हुआ और मुझे पता है कि जिस राष्ट्र की रक्षिका स्वयं स्त्रियां तक हों वह कभी किसी से हार नहीं सकता। मेरी हार्दिक इच्छा है कि विश्व में कभी भी युद्ध न हो। युद्ध मानवता पर गिरने वाली सबसे भयानक गाज़ है। यदि हिटलर जैसे संहारक हों तो सबको मिलकर उसका दमन करना चाहिए और उसका नामोनिशान मिटा देना चाहिए। इस शुभ अवसर पर , नाज़ी फासिज़्म के अंत की तीसवीं वर्षगाँठ पर मैं रूस की सेना को तहेदिल से अपनी शुभकामनाएं भेजता हूँ।
सन 1944 में मैं इटली में था। वहीँ मुझको मेरे कमांडर ने बताया कि रूसी सरकार ने मुझको मेरी सेवा के लिए सम्मानित किया है। हालांकि मुझे अपने शौर्य के लिए अपने कार्यकाल में 6 पदक मिले थे मगर इस बार जो मुझे प्रसन्नता हुई उसे मैं बता नहीं सकता। रूसी सरकार द्वारा मुझको और सूबेदार नारायण राव निक्काम को लाल सितारा पदक से सम्मानित किया गया था। उतनी ही ख़ुशी मुझे अब हुई जब मुझे आपका पत्र मिला कि आप मुझसे मिलना चाहते हैं।
मैं आपका और रूस के राजदूत वी एफ मालत्सेव का बहुत आभारी हूँ जिन्होंने मुझको 9 मई 1975 को रूसी दूतावास, दिल्ली में होनेवाले जलसे में आमंत्रित किया है। मैं अवश्य आऊंगा।
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अपने वचन के अनुसार श्री गजेंद्र सिंह इस अवसर पर पूरी आनबान के साथ उपस्थित हुए और रूसी राजदूत ने उनका अभूतपूर्व सत्कार किया जिसकी चर्चा उस समय के सभी बड़े अखबारों में हुई।
- कादम्बरी मेहरा, लन्दन
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