Sunday, June 16, 2024
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कन्नड़ लेखक भैरप्पा पर लंदन के नेहरू सेन्टर में भव्य कार्यक्रम

इंदु बैरॉठ

5 अक्टूबर 2019 को लंदन के नेहरु सेंटर में The life and works of S.L. Bhyrappa कार्यक्रम में भैरप्पा जी के हिंदी अनुवादित उपन्यास “आधार” पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में भारतीय विद्या भवन के निदेशक श्री नन्द कुमार, डॉ. शतावधनी, आर. गणेश एवं नेहरू सेन्टर के निदेशक श्री अमिश त्रिपाठी (जो कि स्वयं एक प्रतिष्ठित लेखक हैं) भी मौजूद रहे। मुझे भी इस कार्यक्रम में बोलने का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

भैरप्पा जी ने एक सम्प्राण प्रतिक्रियापूर्ण व्यक्तित्व होने के कारण पुराने से नये में परिवर्तन होते समय, निहित संकट, मानसिक हलचल, संघर्ष आदि अनेक उपन्यासों की कथावस्तु प्रस्तुत की है। भैरप्पा जी ने अपनी सूक्ष्म दृष्टि से दार्शनिक, सामाजिक, धार्मिक, मनोवैज्ञानिक, ऐतहासिक, सांस्कृतिक, पारिवारिक एवं राजनीतिक सभी विषयों को परखा है। आज भैरप्पा जी कन्नड भाषा व साहित्य की परिधि को लांघ कर न सिर्फ अखिल भारतीय स्तर पर बल्कि अन्तर्राष्टीय स्तर पर प्रकाश फैला रहें हैं।

शिवराम कांरत, यू.आर.अन्नतमूर्ति के अलावा भैरप्पा जी ही ऐसे उपन्यासकार हैं जिन्होने हिन्दी पाठकों के बीच लोकप्रियता हासिल की है। भैरप्पा जी के अब तक 22 उपन्यास प्रकाशित हो चुके हैं। आत्मकथा भित्ति तथा आलोचना चिन्तन की दो पुस्तकें छप चुकी हैं। 

“दाटु” के लिये 1995 में सम्मान, चर्चित उपन्यास मंद्र “के लिये 2010 में सरस्वती सम्मान, 2016 में पद्मश्री से सम्मानित हो चुके हैं। केंद्रीय साहित्य अकादेमी तथा कर्नाटक साहित्य अकादेमी (3 बार) का पुरस्कार, भारतीय भाषा परिषद का पुरस्कार-ऐसे ही कई पुरस्कारों से सम्मानित हुए हैं।

भैरप्पा जी का मानना है कि साहित्य सृजन सामूहिक कार्य नही होता हैं, यह एक आन्दोलन भी नहीं है। प्रत्येक लेखक को अपनी भावना को और दृष्टिकोण के अनुसार अपने आप स्वंय लिखने का कार्य करना चाहिये। आधार, नेले 1953 हिन्दी अनुवादित उपन्यास है जिसको बी.आर. नारायण जी ने बडे ही सुन्दर ढंग से अनुवादित किया है। यह गहन व मर्मस्पर्शी कथा का ताना बाना है, जो पाठकों को बखूबी बॉंध देता है। इसमें जीवन व मृत्युपरांत के बारे में चिन्तनपूर्ण रचना है। 

इसमें पात्र जिसका नाम जवाराई है जिसकी मृत्युपरांत उसका पैंसठ वर्षीय मित्र अपने पैतृक गॉंव जाता है, मृतक से सम्बधित अन्य व्यक्तियों के साथ अपनी यादों और बैठकों के माध्यम से वह जीवन सम्बन्धों, नैतिकता और ब्राह्मण सम्बन्धी सवालों के बारे में दर्शाता है। इसमे दार्शनिक ढंग से मृत्यु के छोर पर खडे होकर जीवन का परिवीक्षण करता है। 

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