एयरपोर्ट के बाहर ट्रोली में सामान रखते वक्त मन में जितना डर था वो एयरपोर्ट के अंदर पैर रखते ही जैसे सब गुम हो गया, और उस वक्त तो बिल्कुल भी डर नहीं लगा जब एयरपोर्ट का एटॉमैटिक दरवाजा बंद हुआ और कांच के बाहर से मम्मी-पापा हाथ हिला रहे थे. मुझे लगा था इस पल को मैं रो पडूंगी. पर अब तो रोना दूर-दूर तक मेरे प्लान में नहीं था. इस नई दुनिया का असर मुझ पर पड़ने लगा था. मैं बिना वजह मुस्कुरा रही थी और पता नहीं क्यों इतनी खुशी महसूस हो रही थी.

मम्मी-पापा को बाय करके उन्हें इशारे से जाने के लिए कहने में मुझे कोई दुख नहीं हुआ, बल्कि एक अलग ही उत्साह महसूस हो रहा था. जिंदगी में पहली बार अकेले यात्रा करने की खुशी, वो भी सीधे विदेश यात्रा, वो भी सीधे मॉरीशस. मम्मी तो सख्त खिलाफ थी मेरे इस प्लान के, बोली, “अकेले ही घूमना है तो भारत के ही किसी शहर में जाया. मुन्नी बुआ के पास भोपाल जाया. वैसे भी वो अकेली ही है, उनको भी साथ मिल जाएगा.” वैसे मम्मी भी जानती थी मुन्नी बुआ ना घूमेगी ना घूमने देगी. फिर भी उन्होंने सारे ऑप्शन ट्राय किए मुझे रोकने के. पर पापा, वे तो हमेशा मेरी साइड ले ही लेते हैं. बोले, मुझे मेरी बेटी पर पूरा भरोसा है. ऐसा नहीं है कि मम्मी को भरोसा नहीं है पर मां तो मां होती है.

खैर मुझे आज तक समझ नहीं आया कि भरोसा किस बात का है. पर मैंने अपनी सुरक्षा को लेकर उनसे कई वादे कर दिए थे, जैसे मैं ट्रिप पर अकेले कही नहीं घूमूंगी. शराब-वराब नहीं पिऊंगी..वैसे मैंने कभी पी नहीं थी पर युवाओं के कैंप में दोस्तों के कहने पर लोग पहली बार ट्राय कर ही लेते हैं. पापा ने भी सीग्रेट पहली बार दोस्तों के साथ ही ट्राय की थी. उन्होंने अपना सारा किस्सा इतने खुश होकर सुनाया था, “कि वो भी क्या दिन थे”, और मम्मी ने उन्हें खूब डांटा था कि बेटी को बिगाड़ रहे हो. वैसे मम्मी ने यूथ कैंप के मैंनेजर से सिक्योरिटी डीटेल्स को लेकर खुद बात की थी. मम्मी को यह भी चिंता थी कि भारत से मैं अकेली पार्टीसिपेंट थी. एक दो और होते तो थोड़ी तसल्ली हो जाती. ऐसे मामलों में देश के सभी युवाओं पर विश्वास कर लिया जाता है यह बात भी मेरे समझ के परे है.

बोर्डिंग पास देकर वहां खड़े अटेंडेंट ने मुझे इमिग्रेशन काउंटर की तरफ बढ़ा दिया. पीछे देखा तो मम्मी-पापा अब भी उसी जगह खड़े थे. मुझे पता था जब तक इमिग्रेशन क्लीयर नहीं हो जाता वे नहीं जाएंगे. क्योंकि उन्हें किसी ने बताया था कि इमिग्रेशन तक समस्या हो सकती है, उसके बाद तो वो लोग आपको ढूंढ़कर फ्लाइट तक पहुंचाएंगे. आपके बिना प्लेन नहीं उडाई जाएगी. वैसे मुझे इस बात में थोड़ा शक था. लेकिन इमिग्रेशन क्लीयर होने के बाद मुझे बंद दरवाजों के पीछे की एक अलग दुनिया में भेज दिया गया जहां से मम्मी-पापा और मेरी वो छोटी सी दुनिया कही पीछे छूट गई थी. दिखाई दे रहे थे तो दुनिया के तमाम देशों के भांति-भांति के लोग जिन्हें अब तक सिर्फ टूरिस्ट के रूप में देखा था. रंग-बिरंगे लोग, उनके अलग अलग रंगों के पासपोर्ट और एयरपोर्ट की चकाचौंध कर देंने वाली दुनिया को देखते-देखते ही फ्लाइट का समय हो गया और मुझे एक लाल-सफेद रंग के एयर मॉरीशस के प्लेन में बैठा दिया गया. मुंबई से मॉरीशस 6 घंटे की फ्लाइट है. सुबह 5 बजे की फ्लाइट के चक्कर में रात भर सो नहीं पाई थी इसलिए आंखे भारी हो रही थी.

टेकऑफ होते ही प्लेन बादलों की दुनिया में पहुंच गई जहां से जमीन नजर ही नहीं आ रही थी. जब खिड़की से बाहर कुछ देखने के लिए नहीं बचा तो बादलों को देखते-देखते कब आंख लग गई पता ही नहीं चला. एयर हॉस्टेस ने बीच में दो बार उठाया एक बार नाश्ता करने और दूबारा लंच करने. जब तिसरी बार उठाया तो लैंडिंग हो चुकी थी. मॉरीशस की जमीन को आसमान से देखने की इच्छा मन में ही रह गई. आज पता चला ऐसे ही मेरे घर वाले मुझे कुंभकरण नहीं कहते. खैर वापसी में देख लेंगे, लेकिन सोना तो मुझे सबसे प्यारा है. मॉरीशस की सबसे अच्छी बात यह रही कि एयरपोर्ट पर मेरा काम हिंदी में आराम से चल गया. शक्लें भी सब भारतीयों जैसी बस जब मूंह खोलकर फ्रैंच और क्रियोली भाषा बोलते तब पता चलता, ‘अरे ये तो मॉरीशन है.’ वाईफाई की सहायता से घरवालों को लैंडिंग की जानकारी दी और विडीयो कॉल करके उन्हें भी एयरपोर्ट दिखाया. एयरपोर्ट यहां भी बहुत सुंदर था. बाहर निकलते ही मेरे नाम का बोर्ड लिए एक ड्राइवर मिला जिसने घंटे भर गन्ने के खेतों और छोटे पर सुविधायुक्त गांवों से गुजरते हुए मुझे मेरी मंजिल तक पहुंचा दिया “इंटरनेशनल यूथ कैंप”.

मुख्य सड़क को छोड़ गाड़ी ने एक पगडंडी पकड़ी जहां एक बड़ा सा दरवाजा था जिसके उपर एक बड़ा बैनर लगा था….वेलकम टू इंटरनेशनल यूथ कैंप…. ‘बी यॉरसेल्फ’ यानी जैसे आप हो वैसे ही रहो…इस एक लाइन ने मुझे अंदर तक सहज कर दिया. यहां आए लोगों को मुझसे कोई उम्मीद या आशा नहीं है. यहां जैसी मैं वास्तव में हूं वैसी ही रह सकती हूं. घर में परफेक्ट बेटी, स्कूल में परफेक्ट स्टूडेंट बनते-बनते मैं भूल गई थी कि मैं वास्तव में कैसी हूं. अब अगले एक महीने के लिए मैं वैसे ही रहुंगी जैसी मैं वास्तव में हूं. इन्हीं ख्यालों से गुजरते हुए गाड़ी एक खूले मैंदान में आ पहुंची. चारों तरफ बड़े बड़े पेड़ों की दिवारें और करीब 100 मीटर दूर एक बड़ा सा घर. घर के चारों तरफ इतनी चहल पहल और उत्साह का माहौल था कि उसकी तरंगे बज रहे संगीत के साथ मुझ तक पहुंच रही थी. 

3 महीने पहले जब मैंने इस कैंप में भाग लेने के लिए अप्लाई किया था तब मैं नहीं जानती थी कि यूथ कैंप से मुझे क्या उम्मीद करनी चाहिए. बस मैं विभिन्न देशों के और विभिन्न पृष्ठभूमी के लोगों से मिलना और उन्हें जानना चाहती थी. इन 3 महीनों में मैंने पूरा इंटरनेट खोज निकाला था कैंप्स की जानकारियों को लेकर. लेकिन इस वक्त में लगा जैसे इंटरनेट पर लिखी हजारों बातें आपको वो महसूस नहीं करा सकती जो इस वक्त मैं महसूस कर रही हूं. समुद्र किनारे इस बड़े से घर के सामने जिसे कैंप सेंटर बना दिया गया है. अगले एक महीने के लिए यही मेरा घर है. 

मैंने घर के पास युवाओं की भीड़ देखकर ड्राइवर से पूछा, “क्या मैं सबसे लेट हूं.” उसने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “सबकी फ्लाइट का टाइम अलग होता है. कई लोग तैयारियों में सहायता करने 2 दिन पहले ही पहुंच गए, कुछ कल और कुछ आज सुबह.” मैंने घड़ी देखी भारत के 4 बजे यानी मॉरीशस के ढाई बज गए. मैंने घड़ी का समय मॉरीशन टाइम सेट किया और अपनी एकलौती बैग लेकर गाड़ी से उतरी. घर की तरफ से एक लड़का भागता हुआ आ रहा था. मैंने चारों तरफ नजरें दौड़ाकर देखा वो किस की तरफ आ रहा है. पर वहां पार्किंग में मेरे और ड्राइवर के अलावा कोई नहीं था. वो सीधे मेरे पास आया और जान-पहचान वाली बड़ी सी मुस्कुराहट के साथ हाथ बढ़ाते हुआ कहा, “हाय, तुम राही हो ना हम सुबह से तुम्हारा इंतजार कर रहे हैं. कितनी लेट कर दी तुमने.”

यहां मेरा इंतजार हो रहा था यह सुनकर मुझे बहुत आश्चर्य वाली खुशी हुई. लेकिन जवाब में मैं सिर्फ यही कह पाई…ओह….वो…मैं …फ्लाइट….

उसने मेरी बात सूने बिना ही मेरा आधा बढ़ा हुआ हाथ पकड़ा और मुझ लेकर घर की तरफ बढ़ गया. मैंने मन में सोचा, अरे वाह आते ही दोस्त मिल गए. 

मैंने बैग दूसरे हाथ में लेने के बहाने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया ताकी असभ्य ना लगे. उसने ध्यान नहीं दिया और चलते चलते पूछा “यूथ कैंप में आने का यह तुम्हारा पहला मौका है ना.”
मैने हां मे सर हिलाया.

“चलो ठीक है मैं तुम्हें सारे नियम और प्रोग्राम समझा दुंगा. कैंप में टोटल 80 लोग हैं. सभी को 8-8 लोगों की 10 टीम में बांट दिया गया है. तुम मेरी टीम में हो. अरे मैंने तुम्हें मेरा परिचय तो दिया ही नहीं.” उसने रुककर फिर से हाथ बढ़ाया और बोला, “हाय, मेरा नाम हड़सन है. मैं न्ययॉर्क से हूं और तुम्हारा टीम लीड़र हूं. चुंकी मैं पहले भी इस कैंप में आ चुका हूं इसलिए मुझे चुना गया है टीम लीडर के रोल के लिए.”

मैंने हाथ मिलाया और कहा “आपसे मिलकर अच्छा लगा हड़सन, मेरा नाम राही है.” 

मेरे इस जवाब पर हड़सन जोर-जोर से हंसने लगा. मैंने असहज होते हुए पूछा “क्या हुआ.” हड़सन ने अपनी हंसी रोकते हुए कहा, “राही तुम भूल रही हो, ये यूथ कैंप है और आजकल इतनी फॉरमेलिटी से कौन बात करता है.” मैंने तसल्ली से मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हां तो ठीक है, ये मेरा पहला मौका है, एक दो दिन में मैं भी तुम्हारे जैसी कूल बन जाऊंगी. पहले यहां के माहौल से वाकिफ हो जाउंगी.”

हड़सन ने मेरा रजिस्ट्रेशन करवाया और मुझे हमारे ग्रुप हाउस में ले गया जो एक टेंट था. वहां हमारे ग्रुप के सभी सातों सदस्य बैंठे थे. नाइजेरिया से मैकेली, साउदी से इल्हाम, रशिया से रैशल, मलेशिया से एंजेला और सिल्की, सिंगापुर से मिंगहाउ. 

सभी ने मुझसे हाथ मिलाया और अपना परिचय दिया. अंत में मैकेली ने अपना परिचय दिया और मुझसे गले मिली. वो मुझे तुरंत पसंद आ गई। 

मैंने सभी को अपना परिचय दिया तब तक हड़सन सबके लिए चाय ले आया और बातों का सिलसिला शुरु हो गया. 

हड़सन ने बताया कि वह हर साल अलग-अलग देशों में होने वाले इस यूथ कैंप का बेसब्री से इंतजार करता है. वो इसे मजाक में 11 फॉर 1 कहता है, यानी 11 महीने वो इस 1 महीने के लिए जीता है. उसने बताया कि उसे मॉरीशस की यह बात सबसे अच्छी लगी कि सारी सुख सुविधाओं वाले इस देश में छोटे-छोटे गांव और सामान्य संस्कृति जिंदा है. विभिन्न देशों के इन्हीं सीधे सादे सामान्य लोगों से मिलने वह हर साल यूथ कैंप में आता और हर साल नए दोस्त बनाता है जो उसकी फ्रेंड लिस्ट को ना केवल बढ़ाते बल्कि उसके फ्रेंड्स फॉर लाइफ बन जाते. हड़सन था ही ऐसा. पतला, लंबा, गोरा और लम्बी नाक. टीशर्ट को जैसे हैंगर पर टांग दिया हो. उसका सारा व्यक्तित्व उसकी दिलखोल वाली हंसी पर टिका दिखाई दिया.

चाय पीकर सभी मुझे कैंप साइट दिखाने ले गए. समुद्र किनारे के इस घर को कैंप सेंटर बनाया गया था. जिसके आगे की ओर बड़ा सारा खाली मैदान था जिसमें विभिन्न एक्टिविटीज और वर्कशॉप के लिए छोटे-बड़े टेंट लगाए गए थे. घर के पीछ लकड़ी की सुंदर फेंसिंग लगाई गई थी जिसके पार 30 मीटर की दूरी पर समुद्र का किनारा था. सुंदर नीला आकाश, साफ पानी और क्षितिज की ओर बढ़ता सूरज. चारों और युवाओं की चहल पहल, संगीत की धुन. सब कुछ सुंदर और सपने जैसा लग रहा था. टेंट के बाहर फॉल्डिंग कुर्सियां लगाई गई थी, कैंप फायर के आस-पास छोटे छोटे लकड़ी के कुंदो को सजाकर कइयों ने उनपर अपने और अपने देश के नाम लिख लिए थे. दिन के अंत तक कैंप उर्जा से भर गया था. पहला दिन तो सबसे परिचय और टीमों में बंटने और अपने अपने टेंट और कमरों में सेटेल होने में कैसे निकल गया पता ही नहीं चला. 

हमारी टीम में हड़सन और मैकेली को छोड़कर बाकी सभी युवा पहली बार कैंप में आए थे. चुंकी मैकेली और हड़सन कैंप में काफी लोगों को जानते थे इसलिए उन दोनों का दिन तो बाकियों से गले मिलने और हाल चाल पूछने में ही निकल गया. मैं इन दोनों को देखकर यह सोचती रही कि कुछ दिनों में मेरी भी सबसे ऐसी दोस्ती हो जाएगी. मेरी यह इच्छा शाम को ही पूरी हो गई जब हम आठों कैंप फायर के पास ग्रुप मीटिंग के लिए जमा हुए. भारत में तो गर्मी थी पर मॉरीशस में सर्दियां शुरु हो रही थी. दिन का मौसम तो अच्छा था पर शाम को हल्की ठंड होने से सभी ने रंग-बिरंगे स्वेटर, मफलर और टोपियां पहने रखी थी. हड़सन फिर पूरी टीम के लिए गरमा-गरम चाय ले आया. उसके बातुनी और अनौपचारिक अंदाज ने हम सबके बीच भी जल्दी ही पक्की वाली दोस्ती करा दी. 

सुबह की बातों को आगे बढ़ाते हुए सभी अपने अपने करियर की बातें करने लगे थे. जब आप एक दूसरे के बारे में अधिक नहीं जानते हो तब बात शुरु करने के आसान से टॉपिक होते हैं करियर, खाना, कपड़े, गांव शहर. हमने करियर को चुना था. 

रूस से आई नीली आंखों और सीधे सुनहरी बोलों वाली रैशल ने मुझसे पूछा, “राही बैचलर्स पूरा करने के बाद तुम क्या करोगी.” 

इस सावल से मेरी छोटी-छोटी आंखे बड़ी हो गई. आंखों में वे सारे सपने तैर गए जो मैंने काफी समय से एक-एक कर जोड़े थे. उत्साहित होकर मैंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “मैं दुनियां घूमूंगी. मेरा नाम ही राही है जिसका मतलब होता है ट्रैवलर. दुनियां के सारे 195 देश देखना और वहां की संस्कृति के बारे में लिखूंगी. एक ऐसी किताब लिखना चाहती हूं जो पूरी दुनियां की संस्कृति का एनसाइक्लोपीडिया हो. जिसमें ये बातें हो कि एक देश से दूसरे देश में जाने पर रिती रिवाज कैसे बदल जाते हैं. पडोसी देशों के रिवाज आपस में कितने मिलते जुलते हैं और कितने भिन्न हैं. और यह भिन्नता किन कारणों से है. जैसे मेरे ननिहाल उत्तराखंड में जल पूजन के लिए नदी या धारे जाते हैं जबकि दादी के यहां राजस्थान में कुए की पूजा का प्रचलन है, क्योंकि वहां नदियां है ही नहीं. स्थानीय भूगोल के रिवाजों पर प्रभाव का अध्ययन करना चाहती हूं. ऐसे ही दुनियांभर के अनोखे रिती-रिवाजों को सबके सामने एक किताब के रूप में पेश करना चाहती हूं.” 

मैं जब चुप हुई तो मुझे अहसास हुआ कि कैंप फायर के पास बैठे सभी लोग मेरी बात ध्यान से सुन रहे थे. सब इतना ध्यान से सुन रहे थे इसका मतलब मेरा प्लान अच्छा है और पूरा भी किया जा सकता है. 

“वाह, बहुत अच्छा सब्जेक्ट है राही, पर तुम दुनिया घूमोगी कैसे. मेरा मतलब है इतने पैसे कहां से आएंगे” रैशल ने अपने खूले बालों को क्लेचर से बांधा और टोपी पहनली. रात चढ़ते-चढ़ते ठंड बढ़ रही थी. इसके विपरीत रैशल के इस व्यवहारिक से सवाल से मेरे शरीर का तापमान बढ़ गया क्योंकि मैंने अभी इस बारे में कुछ सोचा नहीं था. फाइनल एग्जाम में अभी 6 महीने बाकी थे और डिसर्शन भी सब्मिट करना था. पर 6 महीने बाद क्या होगा इसकी चिंता अभी से मुझे सताने लगी थी. 

अपनी धुंआ निकलती चाय की चुस्की लेते हुए हड़सन मेरे पास रखी कुर्सी पर आ बैठा. 8 लोगों की इस टीम में उम्र में हड़सन सबसे छोटा था पर इतनी ही देर में मुझे अहसास हो गया था कि वो अनुभव में हम सबसे आगे है. हमेशा हंसता रहता है और बातों के बीच-बीच में अब तक की हुई अपनी 40 देशों की यात्राओं के किस्से सुनाता रहता है. घुम्मकड़ी उसे अपने पिता से विरासत में मिली थी. पहले वो उनके साथ ही घूमता था पर पिछले 10 देशों की यात्रा उसने अकेले की थी इसलिए अपनी उम्र से अधिक समझदार भी था. दुनिया घूमने को लेकर वह मुझे सुबह से कई काम की टिप्स दे चुका था. हड़सन ने मेरी तरफ देखकर कहा, “हां राही ये बड़ा वाजिब सवाल है. क्योंकि प्लान तो तुम्हारा बहुत अच्छा है और हो सकता है एक दो देशों पर कुछ लिखने के बाद तुम्हें स्पोंसर्स भी मिल जाए लेकिन शुरुआती फंडिंग तो तुम्हें खुद ही करनी पडेगी. वो कहां से आएगी.” 

मेरे उतरे हुए चेहरे और लोगों की इस विषय पर हो रही चर्चा के बीच नाइजेरिया से आई मैकली ने एक गहरी सांस भरी तो सभी लोगों का ध्यान उसकी और चला गया. हंसने और हंसाने वाली मैकली को मैंने सुबह से अब तक इतना गंभीर नहीं देखा था. इस कैंप में शामिल होने के लिए उसने बहुत मेहनत की थी. रात दिन प्रॉजेक्ट और रिसर्च किए थे. नाइजेरिया आने वाले कई बड़े रिसर्चर्स के लिए उसने ट्रांसलेटर का काम किया था. यह उसका विदेश में 5वां कैंप था. उम्र में मेरे जितनी ही थी पर नाइजेरिया जेसे देश में मेहनत और लगन के दम पर ही वो इस मुकाम तक पहुंची थी कि ऐसे कैंप्स में उसे इनवाइट किया जाता था ताकी नए युवा उससे कुछ सीख सके. 

सबको अपनी ओर देखता देख मैकली ने मुझे देखा और पूछा, “195 देश देखने के लिए वीजा कहा से लाओगी राही….जहां तक मुझे ध्यान है इंडिया को केवल 65 देशों का फ्री वीजा है बाकी 133 देशों के लिए तुम्हें वीजा अप्लाई करना पड़ेगा.”

और सब ठहाका मारकर हंसने लगे सिर्फ मैकेली और मैं नहीं हंसी. मैकेली इसलिए क्योंकि बड़े बड़े रिसर्चर्स के सम्पर्क में होने के बावजूद उसे आज भी कई देशों के वीजा मिलने में समस्याओं का सामना करना पड़ रहा था क्योंकि वो नाइजेरिया जैसे पिछड़े देश से है और मैंने सबकी हंसी में इसलिए साथ नहीं दिया क्योंकि हड़सन और मैकेली के सवालों से मुझे अपना सपना धुंधला होता नजर आ रहा था. वो सपना जो मैं ग्रेजुएशन के पहले दिन से बुन रही थी. इसलिए तो मैंने मुंबई यूनिवर्सिटी के ‘बैचलर्स इन हेरिटेज मैनेजमेंट’ के कोर्स में एडमिशन लिया था. 

इन्हीं हंसते और लटके चेहरों के बीच रशैल ने मेरे कंधे पर सांत्वना से हाथ रखते हुए कहा, “बेबी यह सपना पूरा करने के लिए तुम्हें सिंगापुर में जन्म लेना चाहिए था. क्योंकि वहां तुम्हे 126 देशों का फ्री वीजा मिलता, 37 देश में वीजा ऑन अराइवल मिलता और सिर्फ 32 देशों के लिए तुम्हें वीजा अप्लाइ करने की जरूरत होती. तो ये दुनिया घूमने की बात तो थोड़ी मुश्किल है. हां अगर तुम अपनी प्लानिंग में थोड़ी एडिटिंग कर लो तो तुम्हारा सपना पूरा हो सकता है. जैसे तुम पूरी दुनिया की जगह सिर्फ अफ्रिका के रिती रिवाजों की स्टडी करो तो काम बन सकता है. वैसे अफ्रीका के हर देश का वीजा मिलना आसान है.” 

हड़सन ने रैशल की बात बीच में काटते हुए कहा, “बस वहां से जिंदा वापस आना मुश्किल है.” और सब तालियां बजाकर अफ्रीका के हालत पर ठहाका लगाकर हंस पड़े. 

मैकेली ने हड़सन को गुस्से से देखा तो उसने धीरे से मैकेली को ‘सॉरी’ कहा और सब शांत हो गए. सब जानते थे कि हंसमुख मैकेली अफ्रीका के हालत को लेकर बहुत ही संवेदनशील है और वहा को लेकर छोटा मोटा मजाक भी उसे पसंद नहीं. यह बात मुझे हड़सन ने उसका परिचय देते वक्त ही बता दी थी.

हड़सन ने गंभीर हुए माहौल को फिर से सामान्य करने के लिए हंसकर कहा, “अच्छा ये सब बातें छोड़ों, राही मैं तुम्हें अपना कम्बोडिया वाला अनुभव सुनाता हूं. वीजा को लेकर यह मेरा सबसे बुरा अनुभव था. अब क्योंकि मैं अमेरिकन हूं इसलिए मुझे कुछ दिनों पहले तक लगता था कि मैं बैग उठाकर किसी भी देश में घुस सकता हूं, कोई मुझे रोकेगा नहीं. लेकिन पिछले दिनों मैं कम्बोडिया घूमने गया तो मुझे मेरा सबक मिल गया. मैंने कम्बोडिया से वियतनाम के लिए बस की बुकिंग की थी. मैं आराम से बस में बैठकर 7 घंटे का सफर तय कर जैसे ही वियतनाम बॉर्डर पर पहुंचा तब मुझे पता चला कि बॉर्डर पार करने के लिए वीजा की जरूरत है, जिसके लिए मुझे एक सप्ताह पहले ही अप्लाइ करना चाहिए था. मुझे बस से उतार दिया गया और मेरे जेब में सिर्फ 25 डॉलर थे और सर पर तपता सूरज. उस बॉर्डर से दूर-दूर तक कोई गांव नहीं था ना ही कोई एटीएम मशीन. मैं वापस कम्बोडिया कैसे पहुंचा मैं ही जानता हूं.” 

हड़सन की कहानी ने फिर सबके चेहरे पर मुस्कान बिखेर दी थी. इसी मुस्कान के बीच साऊदी से आए इल्हाम ने अपनी कहानी शुरु की. “पता है मेरे मम्मी-पापा फ्रांस में मेरे ग्रेजुएशन डे में सिर्फ इसलिए नहीं आ पाए क्योंकि ऐन वक्त पर उनका वीजा रिजेक्ट हो गया. मैंने तो उन्हें मजाक में कहा भी कि रिफ्यूजी बनकर यूरोप में घुस जाओ पर ये आईडिया थोड़ा रिस्की लगा.” मिंगहाउ ने गंभीर होकर कहा, “इल्हाम रिफ्यूजियों के बारे में इतनी असंवेदनशील बातें मत करो प्लीज. वैसे मुझे आज पहली बार ही पता चला कि सिंगापुर में सिर्फ पैदा होने से ही मुझे कितने विशेष अधिकार प्राप्त हैं. जिनकी मैंने कभी परवाह भी नहीं की. हम अपने देश को हमेशा कोसते ही रहते हैं. ट्रैफिक, पॉल्यूशन, बेरोजगारी जैसी समस्याओं के लिए.”

एंजेला ने कहा, “किस्मत वाले हो तुम मिंगहाउ, पता है मेरे ऑस्ट्रेलियन बॉयफ्रेंड के घर वाले पहले मुझे हमेशा अपने साथ छुट्टीयों पर ले जाते थे. फिर धीरे धीरे उन्होंने मुझे अपने प्रोग्राम के बारे में बताना ही बंद कर दिया क्योंकि मेरे वीजा की वजह से उन्हें एक-दो बार अपने प्रोग्राम बदलने पड़े. अब मेरे बॉयफ्रेंड की मॉम मुझे कहती है कि हम घूमने जाएं तो तुम अपने पेरेंट्स से मिलने मलेशिया चली जाया करो.”

सिल्की ने एंजेला के कंधे पर सहानुभूति भरा हाथ रखते हुए कहा, “याद है पिछले साल जब मैंने सैनफ्रांसिस्को की कोलंबियन एम्बेसी में वीजा के लिए एप्लाइ किया था तो उनको मेरे पासपोर्ट में लगा यूएस स्टूडेंट वीजा समझ में ही नहीं आया और बोले की तुम तो यहां इल्लीगल तरीके से रह रही हो. मन तो किया एक पंच लगाऊं. फिर थोड़ा शांत होकर कहा कि किसी पढ़े लिखे आदमी को बुलाइए प्लीज.” 

इल्हाम ने हंसते हुए कहा, “ये तो फिर भी ठीक है हम अरब वालों को यूएस एम्बेसी इतना टॉर्चर करके भी वीजा नहीं देती. क्या-क्या डॉक्यूमेंट नहीं लेते वो लोग. यहां तक की बैंक स्टेटमेंट, सेलेरी स्लीप, इंटरव्यू भी लेते हैं और 160 डॉलर फीस लेकर भी वीजा रिजेक्ट कर देते हैं. हमारे यहां यूएस-यूके का वीजा मिलना किसी बड़ी उपलब्धी से कम नहीं है.” 

मेरे मुंह से तुरंत निकला “हमारे यहां भी.” जोर के ठहाकों के बीच मुझे लगा चलों इस नाव में मैं अकेली नहीं हूं.

रात का भोजन करके जब मैं अपने कमरे में पहुंची तो मेरी चारों रूममेट्स को पड़ते ही नींद आ गई. मैं भी लेट तो गई, लेकिन शरीर थका होने के बावजूद  मन में नींद दूर दूर तक नहीं थी. कल्चर वाला प्रोजेक्ट बिना दुनिया घूमे संभव नहीं है और दुनिया घूमने के लिए पैसा चाहिए और सबसे बड़ी बात वीजा चाहिए. वैसे तो पापा अच्छा खासा कमाते है. एकलौती बेटी के लिए वे सब करेंगे लेकिन पापा ने ही स्वाभिमान का पाठ भी पढ़ाया है इसलिए ज्यादा से ज्यादा काम अपने दम पर करना चाहती हूं. प्लान बनाना पड़ेगा राही. कुछ सोच कुछ कर. फिर ध्यान आया डायरी का. धीरे से उठकर मैंने टेबल लैंप जलाया और पापा की दी हुई डायरी निकाली. पापा ने यह कहते हुए दी थी कि दिनभर की बातें लिखना ताकी हम इसे पढ़कर तुम्हारे साथ कैंप में होने का अनुभव महसूस कर सके.

इतनी सुंदर डायरी में अपनी बेकार हैंडराइटिंग में लिखना मुझे अच्छा नहीं लगा पर लिखने की सख्त हिदायत दी थी पापा ने. चलो लिखा जाए. दिनभर की बातें लिखने लगी तो वे बातें भी जूम होकर दिखने लगी जो दिनभर बैकग्राऊंड में चल रही थी. जैसे वो मॉरीशन कुक जो किसी से इंग्लिश, किसी से फ्रेंच और मुझसे भोजपूरी में बात कर रहा था. हिन्दी भी ठीक ही थी उसकी. हर मॉरीशन कम से कम इन तीनों भाषाओं में बात कर सकता है यह बहुत बड़ी बात लगी मुझे. 

शाम को दोस्तों के साथ हुई बातों का विशेष वर्णन किया कि कैसे एक दिन में दुनियाभर की कितनी नई बातें जानने को मिली. डीटेल में हर बात लिखी. जब सब कुछ लिख चुकी थी तो मुझे भी पड़ते ही नींद आ गई. नींद में जाने से पहले सिर्फ यह अहसास था कि लिखने से मन हल्का हो गया है.

अगले सारे दिन विभिन्न वर्कशॉप्स, ट्रेनिंग, हाइकिंग, वॉटर स्पोर्ट्स आदि गतिविधियों में गुजरे. हमको आस-पास के एरिया में घूमने की छूट थी बशर्ते हम ग्रुप में जाएं. इसका फायदा उठाते हुए मैंने आसपास के गांवों में जाकर स्थानीय लोगों से बाते की. कैसे उनके पूर्वज बंधुआ मजदूर बनाकर भारत से मॉरीशस लाए गए. कैसे उन्होंने इतने वर्षों तक अपने रीति रिवाज संभालकर रखे. उनसे मिलकर मन में एक ख्याल आया. फाइनल ईयर के लिए जो डिसर्शन तैयार करना है क्यों ना वो मॉरीशस के उपर बनाऊं “मॉरीशस में कैसे और क्यों बदले भारतीय रिती-रिवाज”. कितना इंटरनेशनल टॉपिक होगा. सर भी खुश हो जाएंगे सबको बताएंगे कि मेरे स्टूडेंट ने मॉरीशस पर डिसर्शन सब्मिट किया है.

अब राही रोज समय निकालकर इन स्थानीय लोगों से मिलती और अपना प्रोजेक्ट भी तैयार करती जाती. साथ ही साथ कैंप में आए 45 देशों के 80 युवाओं से भी उसने काफी बातें की कल्चर को लेकर. अब कैंप में राही को सब “मिस कल्चर” के नाम से बुलाने लगे थे. राही खुश थी, बहुत खुश. इसलिए उसने भविष्य, पैसों और वीजा जैसी बातों के बारे में सोचना बंद कर दिया था. राही के पिता ने उसे बहुत पहले एक बात कही थी जो उन्होंने उनके फेवरेट माइथॉलॉजी सीरियल में सुनी थी और उन्हें बहुत पसंद आई थी. जिसका अर्थ तो राही ने समझ लिया था पर आशय आज समझ आया था. पिता ने कहा था “योग्यता स्वंय अपने स्वामी का वरण करती है”. राही ने सोचा कि अब वो भी अपने को योग्य बनाने की कोशिश करेगी बाकी जो होगा बाद में देखा जाएगा. उसने इस एक महीने का पूरा फायदा उठाया था.

“खुशिया जल्दी बीत जाती है या खुशी में समय का अहसास नहीं होता” ऐसी कई बातों का आशय राही इस एक महीने में समझी थी. कैंप का आखरी दिन भी आ गया और राही की डायरी में भी एक ही खाली पेज बचा था. राही ज्यादातर समय डायरी अपने साथ ही रखती और जब भी कोई काम की बात मिलती झट लिख लेती. आखरी दिन के लिए विशेष कैंप फायर बनाया गया था. सभी 80 युवा और ट्रेनर्स वहां जमा थे. खूब नाच गाना हो रहा था. सब अपने देश के अलग अलग गानें सुना रहे थे, नाच रहे थे. राही का भी मन हुआ इस उत्सव में हिस्सा लेने का. उसने डायरी पास की चेयर पर रखी और खो गई उन अनजान भाषाओं के भावों पर झूमने.

सुबह 2 बजे तक उत्सव चला. कुछ युवा थककर अपने अपने कमरों में सोने चले गए. जिनकी सवेरे की फ्लाइट थी वे वहीं कैंप फायर के पास बैठे बतियाते रहे. कुछ वहीं कैंप फायरे के पास रखी बैंचों पर रजाइयां ओड़कर लेट गए. राही की फ्लाइट सुबह जल्दी थी इसलिए वो अपना बैग जंचाकर सबसे मिलने लगी. प्रो.मैकवेथ से उसे विशेष लगाव हो गया था. वे सिडनी यूनिवर्सिटी में कल्चरल स्टडीज के प्रोफेसर थे और इन इंटरनेशनल कैंप्स में बतौर ट्रैनर आते थे. उन्होंने उसे ना केवल उसके प्रोजेक्ट्स के लिए अच्छे सुझाव दिए थे बल्कि उसे कई करियर ऑप्शन भी बताए थे.

प्रोफेसर से मिलकर राही जब पार्किगं में पहुंची वहां हड़सन और मैकेली उसका इंतजार कर रहे थे. हालांकि राही ने अपने सभी ग्रुप मेम्बर्स को रात में ही गुडबाय कह दिया था पर इन दोनों को पार्किंग में देखकर उसे बेहद खुशी हुई.

पता है मैं सोच ही रही थी कि मैंने तुम लोगों को अच्छे से गुड़बाय नहीं कहा. 

और राही ने हड़सन और मैकेली को एक साथ गले लगा लिया और धीरे से कहा थैंक्यू.

हड़सन ने अपने को दोनों से छुड़ाते हुए कहा तुम इंडियन बहुत इमोशनल होते हो. मैकेली ने राही को जोर से झप्पी देते हुए कहा हम अफ्रिकन भी. 

पार्किंग में उसकी प्रतिक्षा कर रहे ड्राइवर के साथ राही एयरपोर्ट पहुंची और आसमान से मॉरीशस और मुंबई को देखते हुए वापस घर लौट आई. घर पहुंचकर जब वो मम्मी-पापा को अपने अनुभव सुना रही थी तब उसे याद आय़ा कि उसने अपनी डायरी तो वहीं कैंप फायर के पास चेयर पर छोड़ दी. प्रो.मैकवेथ को फोन करना ही उसे सबसे उपयुक्त लगा क्योंकि उसे उम्मीद थी कि वे उसे कॉरीयर से वापस भेज देंगे. प्रो.मैकवेथ ने उसे जल्द ही भेजने के वादा किया तो उसे इस बात की अधिक खुशी हुई कि वो इसी बहाने प्रोफेसर के सम्पर्क में रह पाएगी. हालांकि राही को डायरी में लिखी सारी बातें मुंह जबानी याद थी लेकिन डायरी में उसने पॉइन्ट वाइज पूरा प्रोजेक्ट तैयार किया था और उसे उस डायरी से लगाव भी हो गया था.

कुछ ही दिन गुजरे कि राही के नाम से एक कुरियर आया. कुरियर प्रो.मैकवेथ की तरफ से था. अपनी डायरी वापस पाकर राही बहुत खुश हुई. यह डायरी उसके लिए किसी खजाने से कम नहीं थी. पर जैसे ही कुरियर खोला तो उसमें डायरी के साथ एक लेटर भी था. लेटर प्रो.मैकवेथ के ऑफिशियल लेटर पैड पर प्रिंट किया हुआ था और नीचे उनके सिग्नेचर थे जिसे राही पहचानती थी. उसके कैंप से जुड़े सर्टिफिकेट्स पर प्रोफेसर के ही साइन थे. उसने लेटर पढ़ना शुरु किया तो उसकी आंखे खुली की खुली और सांसे जहां थी वहीं अटक गई. राही के पापा हॉल में आए और उसके हाथ में डायरी देखकर कहा, “अरे वाह डायरी आ गई.” जब राही ने कोई जवाब नहीं दिया तब उनका ध्यान राही के चेहरे पर गया जो बिल्कुल जम गया था. पापा ने घबराकर पूछा “क्या हुआ राही किस चीज का कागज है” राही ने कोई जवाब नहीं दिया पर लेटर को देखती रही. पापा ने उसका कंधा पकड़कर हिलाया, “राही…क्या हुआ.”

“प्रोफेसर मैकवेथ का लेटर आया है.” 

“वो तो दिख रहा है मुझे आगे बताओ..”

“उन्होंने मेरी डायरी पढ़ी. उन्हें मेरा मॉरीशन क्लचर वाले पॉइन्ट्स बेहद पसंद आए. वे चाहते हैं कि उनके अगले यूरोप और अफ्रीका प्रॉजेक्ट्स पर मैं उन्हें एसिस्ट करूं.” 

इतने में राही के पिता ने “अरे सुनती हो…”कहते हुए पत्नि को भी हॉल में बुला लिया. 

“रिसर्च में एसिस्ट करने के एवज में मुझे रहने खाने का साथ साथ 2 हजार यूएस डॉलर प्रतिमाह का स्टाइपंड भी देंगे.” मां-पापा दोनों की आंखे भर आई और राही की भी. भरे गले से राही ने आगे कहा, “अगर मैं उनका ऑफर स्वीकार करती हूं तो मुझे 15 देशों का रिसर्च-वीजा भी दिया जाएगा.” इस आखरी लाइन ने राही के सपनों के आगे जमी सारी धुंध को आंसुओं के साथ बहा दिया.

1 टिप्पणी

  1. सविता तिवारी की “वीजा” एक बड़े सपने की रोचक कहानी है जो अपबे आखिरी शब्द तक लिए चलती है ।
    बहुत बधाई.

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