Wednesday, February 11, 2026
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डॉ मुकेश असीमित का व्यंग्य – टिकट विंडो की लाइन : एक संस्मरण

रेलवे स्टेशन की टिकट विंडो आजकल किसी आध्यात्मिक तप जैसा लगता है। अमृत योजना का थोड़ा-बहुत बजट खर्च कर चार खिड़कियाँ बना दी गई हैं, पर चारों के सामने उतनी ही लंबी लाइनेंमानो चार अलग-अलग धर्मपंथ हों और भक्त सभी जगह समान संख्या में हों।
मैं बड़ी होशियारी से सबसे छोटी लाइन में लगा, और जैसे ही लगाक़िस्मत मेरी  गर्दन पकड़कर मुझ पर हंस रही हो जैसे । मेरी लाइन कछुए की चाल, और बाजू वाली लाइन खरगोश की मधुमक्खी-गति से फुर्र-फुर्र बढ़ती जा रही थी।
खिड़की पर एक बुजुर्ग बाबू थेशायद रिटायरमेंट के ठीक पहले के अंतिम बर्ष  में। चश्मा उतारते, लगाते, की बोर्ड को किसी वेद-पाठ की तरह एक-एक अक्षर छूते। स्क्रीन पर अक्षर प्रकट होता तो उनके चेहरे की झुर्रियाँ भी खिल उठतींमानो तकनीकी उन्नयन का चमत्कार उन्हें रोज़ नई जवानी दे रहा हो। रेलवे ने शायद फैसला कर रखा है कि ये महाशय अपना अंतिम प्रण और अंतिम प्रणयदोनों इसी खिड़की पर छोड़ेंगे।
इतने में एक पतला दुबला अधेड़ मेरी कोहनी पसलियों में गड़ाता हुआ फुसफुसाया
कौनसी ट्रेन चाहिए साहब? बोलो तो जुगाड़ कर दूँअन्दर तक पहुँच है। बस सौ का एक नोट एक्स्ट्रा।
मैंने विनम्रता से मना किया। विनम्रता पर उसने जर्दे-भीगे होंठों से मोबाइल और मुझे संयुक्त रूप से एक गाली दी और फुर्र हो गयाउसका अपमान नहीं हुआ , कोई  एक डील होते होते रह गई हो।
मोबाइल ही आजकल इन लंबी लाइनों का आधुनिक तपो-साधन हैसभी यात्री उसमें गुम। मैं भी व्हाट्सएप्प की दुनिया में तल्लीन था, तभी आगे शोर हुआ। एक यात्री जिसकी ट्रेन छूटने वाली थी, लाइन तोड़कर हथेली खिड़की के नानो साइज़  के  छेद में घुसा चुका था कि दूसरा यात्री अपना हाथ निकाल ही नहीं पा रहा था। अब विवाद यह नहीं कि किसकी बारी, बल्कि यह कि सबसे पहले हाथ कौन निकाले!
बाबू ने सीटी बजाई। दो पुलिसकर्मी अपनी तोंदें बाल्टी की तरह लटकाते हुए आए। लाठी को हवा में घुमाते हुए स्थानीय भाषा में माँबहन का ऐसा समन्वित गान किया कि लाइन तुरंत सीधी हो गई। दोनों यात्रियों के हाथ बड़ी मुश्किल से निकाले गए। इस खींचतान में एक की हस्त-धारित भारतीय मुद्रा  फट गईं, और उसके मुंह से निकली गालियाँ लोकतंत्र की संपूर्ण संस्थाओं को समर्पित थींरेलवे, सरकार, मंत्री से लेकर कुली तक कोई नहीं छूटा।
मैं फिर मोबाइल में चला गया। दिवाली आने में महीना है लेकिन कंपनियाँ जैसे चाहती हैं कि इस बार मैं चार नए कपड़ों, दो नई चॉकलेटों और पाँच नए कूपनों से लैस रहूँ। ऑफ़र ऐसे कि लगता है हर कंपनी ने मेरे लिए ही सुकुमारी ब्रांड की मॉडल को विज्ञापन में खड़ा किया है। एक बार जल्दबाज़ी में मैंने सुकुमारी के मोहपाश में बंधे  सब्सक्रिप्शन डाल दिया थातभी से वह मेरे जीवन की स्थाई सदस्य बन चुकी है।
मोबाइल भी क्या करे। कंपनियाँ चाहती हैं कि आप दिन-रात उसी से चिपके रहो। कभी धमाका सेल, कभी फ्लैश सेल, कभी लास्ट स्टॉकहड़प लो!
नई पीढ़ी को ये सेल-ऑफ़र ऐसे जकड़ते हैं कि किसी उल्टे-सीधे काम में ऊर्जा लगे उससे अच्छा है कि स्क्रीन पर अंगूठा फिसलाते रहो। गेम्स, जुआ, सट्टा, लॉटरीसब आपके दरवाज़े पर नहीं, आपकी जेब में बैठा है।
इधर मेरा मोबाइल भी मेरा पूरा जीवन समझता है
कब रिचार्ज खत्म होगा,
कब बीमा एक्सपायर होगा,
कब कार की सर्विसिंग है,
कब पुरानी कार बेचकर चार साल हो गए
सब याद दिला रहा है।
सच कहूँ तो मोबाइल ने आदमी को अकेला किया, या अकेलापन आदमी को मोबाइल तक ले गयाये तफ़रीक अब मैं भी नहीं कर पाता।
मोबाइल पर आध्यात्मिक गुरुओं के संदेश, प्रेरक कथन और भविष्यवाणियाँ भी तड़ातड़ आ रहे हैं। सुबह सुबह इतनी ज्ञान-वर्षाकि दिमाग की हार्ड डिस्क फुल होकर ओवरहीट हो जाए।
पर सही कहूं
रेलवे की लाइनें और मोबाइलदोनों ही हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था की लाइफ़लाइन हैं।
एक में लगकर देश चलता है और दूसरे में खोकर आदमी।
इतने में मेरी लाइन भी दो-चार इंच आगे बढ़ गई।
शायद मेरे नंबर का भी समय आ रहा था
और मोबाइल पर एक नया मैसेज भी।
डॉ मुकेश असीमित
मेल ईद  [email protected]
Mobile NUmber 9785007828
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