हम सब ने बचपन मैं एक कहानी सुनी है, आलसी कौवे की जिसमे वो कहता है “तू चल मैं आता हू ,चुपड़ी रोटी खाता हूं, ठंडा पानी पीता हूँ,” ऐसा कहते कहते वो पूरा साल निकाल देता है और उसके बाद बरसात शुरू हो जाती है, उसके पास खाने को कुछ नहीं होता | भूखे रहने और रोने के अलावा अब कोई चारा नहीं था | आप लोग ये सोच रहे होंगे कि मैं आपको ये कहानी क्यों सुना रही हूँ, भला आप कोई बच्चे थोड़े ही है |
अरे भाई मैं तो बस ये समझाना चाहती हूँ कि हमारे देश में कौवा सोच वाले लोग हर प्रदेश की नगरपालिका तथा अन्य सरकारी कार्यालय में बैठे हैं जो पूरे साल चुपड़ी रोटी खाकर ठंडा पानी पीते हैं और समय रहते ना तो नालों की सफाई करवाते हैं ना ही सड़कों की मरम्मत | बरसात की पहली बंद गिरते ही इन्हे याद आता है नालों और सीवर सफाई का काम सो गंदगी निकाल कर आधी सड़क भर डालते हैं । बरसात आती है और सारे मलबे को यथा स्थान वापिस पहुंचा देती है।
अर्चना चतुर्वेदी की चुटकी - तू चल मैं आता हूँ 3जनता जब इनके कर्मों पर सवाल करती तो रोनी सूरत बना लेते हैं और दायें बाएं हो जाते हैं । हमारे देश की जनता बेहाल होती है तो होती रहे इन आलसी कौवो पर कोई असर नहीं होता
सालों से हथिनी कुंड बैराज की मरम्मत नहीं हुई | मुंबई एक बरसात में पानी पानी हो जाये ,दिल्ली में जगह जगह जाम लगें,कोलकाता के लोग सीवर में डूबें पर उस सबसे इन्हें क्या ? ये तो आपस में तू चल में आता हूँ कर कर के साल निकाल देते हैं और फिर अगली बरसात से पहले सब ठीक करने वादा करके गायब हो जाते हैं| इनकी कौवा प्रवृति की वजह से लोगों को घंटो ट्रेफिक में सड़क पर गुजारने पड़ते हैं | हर टीवी चैनल पर पानी में डूबी सड़कों के हालात दिखाए जाते हैं | इन कौवों को तसल्ली से कोसा जाता है पर इनका वही जबाब ‘हमने काम किया है ,हम काम कर रहे हैं और आगे से कभी कोई परेशानी नहीं होगी |
बस इतना कहकर इतिश्री करने वाले ये कौवे सिर्फ कागजों पर नालों की सफाई और सड़कों की मरम्मत करवाते रहते हैं और चुपड़ी रोटी,ठंडा पानी अपने वातानुकूलित कमरे में खाते रहते हैं और इनके आलसी कर्मो की सजा हम भुगतते हैं क्योंकि हम इनका विरोध नहीं कर सकते एकजुट नहीं हो सकते | हम भी तो एक दूसरे से ही उम्मीद करते हैं | मैं क्यों करूँ कोई और कर ले टाइप, सोच तो हमारी भी वही है “तू चल मैं आता हूँ”

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