सम्मान किसे अच्छा नहीं लगता? सम्माननीय कहलाने का हक सिर्फ उन्हें है, जो सम्मानित हो चुके हैं। अब सम्मानित होने के लिए सम्मान करने वाली कमेटी हो, कमेटी में आपकी जान-पहचान हो, मंच हो, आपका बुलावा हो, ये सब ज़रूरी है। आप जिस शहर में रहते हैं, वहाँ के आपके सगे-संबंधी, रिश्तेदार, दोस्त, नातेदारों से आप यह अपेक्षा करो कि वे आपको सम्मानित करेंगे, भाई तो भूल जाओ, वैसे भी उन्हें आपकी चड्डी-पुराण से लेकर शादी-पुराण तक सब कच्चा चिट्ठा याद है। मुझे नहीं पता क्यों, सम्मान के नाम से बुखार चढ़ जाता है जब सम्मानित करने वाला पूछता है, “आपको कैसा लग रहा है सम्मानित होते हुए?” अगर मैं कह दूँ कि आपकी मेहरबानी है, तो उत्तर मिलेगा, “नहीं जी, ये तो आपकी काबिलियत से मिला है। आप हम पर तोहमत लगा रहे हैं कि हमने भाई-भतीजावाद अपनाकर आपको सम्मान दिलाया है!” और अगर मैं कह दूँ कि मेरी काबिलियत का सम्मान किया गया है, तो नाराज़ होकर बोलेगा, “यार, आदमी तो तुम धेले भर के थे। ये तो हमने तुम पर अहसान किया है।” वैसे भी, आगे भी संबंध बनाए रखने के लिए तुम जेब ढीली करते ही रहोगे, ऐसी उम्मीद है।“
मेरे घर में श्रीमती जी नाराज़ होती हैं इन सम्मान में मिले १०० रुपए के शालों को रखते-रखते परेशान। बोलीं, “सर्दियों में गरीबों को बाँटने जाएं, तो वो भी नाक-मुँह सिकोड़ते हैं।” जिस दिन सम्मान मिलना होता है, उस के पहले वाली रात को नींद नहीं आती। आभार वचन रटते-रटते परेशान, और कौन-कौन सी विभूतियाँ आ रही हैं, उनके नाम का उच्चारण ठीक ढंग से याद करना सबसे बड़ी परेशानी। एक महोदय थे, तखल्लुस था ‘विमल‘, उन्हें ‘विकल‘ बोल दिया। एक महोदय ‘धक्कड़‘ थे, उन्हें ‘फक्कड़‘ बोल दिया। एक बार आभार वचन में एक का नाम गलत उच्चारण कर दिया, तो मंच से उठकर चले गए। आयोजकों में खलबली मच गई। अतिथि के योगदान से ही शालों का जुगाड़ हुआ था। वह तो गनीमत थी कि जाते-जाते शॉल लेकर नहीं गए, नहीं तो उस दिन शॉल से भी वंचित रह जाते।
दूसरे दिन अखबार में फोटो के साथ न्यूज छपी थी। मैं श्रीमती जी के सामने अकड़ में मटकते हुए अपने सम्मानित होने की खबर मुँह पर दे मारी। श्रीमती जी बोलीं, “किसका सम्मान हो रहा है? तुम तो कहीं दिखाई ही नहीं दे रहे!” ध्यान से फोटो देखा तो आयोजकों की भीड़ के बीच मेरा शरीर दबा हुआ पड़ा था और शॉल कुछ इस तरह से ओढ़ाया गया था कि पूरा चेहरा ही ढँक गया था। खैर, सम्मान का फोटो होना चाहिए, सम्मानित होने वाले का नहीं। शॉल हैं ना, सम्मानित होने की निशानी – अजर और अमर! सम्मान कभी मरता नहीं, चाहे पुराने संदूकों में धूल फाँकता हुआ, मकड़ी के जालों के बीच पड़ा हो। ज़रूरी नहीं कि जिसको ओढ़ाया गया हो, वह आज हो, कल हो न हो…कल कोई और होगा।
श्रीमती जी से अब ये भी नहीं कह सकता कि १०० रुपए के शॉल के सम्मान के लिए २००० का नया सूट सिलवाया जाए। शादी का ही सूट काम आ रहा है। श्रीमती जी कहती हैं, “ये शॉल ओढ़ने के बाद शादी का सूट हो या नया, क्या फर्क पड़ता है?”
आजकल तो गली-मोहल्लों में सम्मान देने के लिए संस्थाएँ और समितियाँ उग आई हैं । सम्मानित करने का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। कुछ पुराने असंदर्भित लेखक, साहित्यकार, प्रकाशक, आलोचक, समीक्षक भी अब संस्थाएँ या समितियाँ बना लेते हैं। क्या करें, बड़े जो मठ हैं, वे दुर्गम किले बन चुके हैं। बुर्ज इतने ऊँचे कि कोई सेंधमारी कर ही नहीं सकता। अब मेरे जैसे साहित्य के रेंगते कीड़े कहाँ पहुँच सकेंगे! अगर पहुँच भी गए, तो कहीं किसी हट्टे-कट्टे मठाधीश के हाथों से मसला न जाऊँ। लिखना क्या है, यह भी पता नहीं। अब सरकार के खिलाफ लिखोगे और सरकार से ही उम्मीद करोगे कि तुम्हें सरकारी कार्यक्रम में बुलाकर सम्मानित करें! भाई, आ बैल मुझे मार! मुँगेरीलाल के हसीन सपने पालने का शौक है, तो पालो।
अखबार वाले भी अब फुर्सत में इस धंधे को अपना रहे हैं। एक अखबार वाले हर साल आयोजन करते हैं, राज्य स्तरीय। इस बार भी खुद के अखबार में खुद की ही विज्ञापन ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह छपी हुई थी। जिस किसी भी क्षेत्र में हो, उसके शिरोमणि बनने का हक दिलाने के लिए प्रविष्टियाँ माँगी जा रही थीं। हमने भी सोचा, अपनी भेज देते हैं… साहित्य के क्षेत्र में। उधर से रिप्लाई आया, “आप पहले कहीं सम्मानित हो चुके हैं?” मैंने कहा, “नहीं जी, आपको पहला मौका दे रहा हूँ।” बोले, “नहीं हो पाएगा। सम्मानित उन्हें करते हैं जो पहले से सम्मानित हो चुके हैं।” ये तो बिल्कुल वही बात हो गई, लोन उसी को मिलेगा जो पहले से लोन लेने में अनुभवी हो। गौरतलब बात यह है कि लोन लेने में हो, चुकाने में हो या नहीं, तभी तो नीरव मोदी और माल्या जैसे बैंक के लाड़ले होते हैं। लोन लेना और सम्मान लेना, दोनों का एक ही क्राइटेरिया है। सम्मान लेने वाला भी सम्मान पकड़ कहाँ देश में टिकता है! अंतरराष्ट्रीय हिंदी समृद्धि करने के लिए विदेशों में भागता रहता है। कई बार वहां स्थायी रूप से भी सेटल हो जाता है, हिंदी का ब्रांड एम्बेसडर बनकर।
एक बार एक न्यूज़पेपर वाले आ धमके, “आपको राजस्थान का गौरव बना दें, सीएम के हाथों सम्मानित?” मैंने कहा, “किस क्षेत्र में?” बोले, “ये तो आप चुनो किस क्षेत्र में लेना है।” मैंने कहा, “साहित्य क्षेत्र में दिला दो।” बोले, “डॉक्टर साहब, आप ऐड नहीं देते, इसलिए २ लाख का खर्चा आएगा। जो रेगुलर ऐड देते हैं, उनको तो हमने फ्री कर रखा है।” सीएम के हाथों सम्मानित होने का हसीन सपना टूट ही गया। बस इंतजार है, किसी दिन शहर के सभी सम्मानित हो जाएँ और… ताकि कुछ हम जैसे तलछट बचे रह जाएँ, उन्हें भी अखबार वालों के रहमो-करम पर कुछ सम्मान मिल जाए।
चड्डी-पुराण?
मतलब लेखन के नाम पर कुछ भी अभद्रता चलेगी? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना लेखन धर्म के अंतर्गत नहीं आता। इसमें लेखक के साथ-साथ संपादक का भी दोष है जो ऐसी रचनाओं को स्वीकृति देते हैं जो जन भावना को आहत करें।
बेहद शर्मनाक…
चड्डी-पुराण?
मतलब लेखन के नाम पर कुछ भी अभद्रता चलेगी? धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाना लेखन धर्म के अंतर्गत नहीं आता। इसमें लेखक के साथ-साथ संपादक का भी दोष है जो ऐसी रचनाओं को स्वीकृति देते हैं जो जन भावना को आहत करें।
बेहद शर्मनाक…