Friday, June 21, 2024
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अनिल प्रभा कुमार की कहानी – महीन-सी हद

तिलिस्मी माहौल बातों से भी रचा जा सकता है।
रीमा रच रही थी। बातों के गोल-गोल लच्छे।उनमें अटका हुआ एक अप्रत्याशित, अनजाना और कुछ नया रोमांच। तय जैसा कुछ नहीं, फिर भी कुछ तो है।
“बस , कुछ देर और!  इंतज़ार।“ रीमा धीरे से मुस्करायी। रहस्य- रंगी  मुस्कराहट।
सुनने वाले भकुए से देख -सुन रहे थे उसे। उसकी आँखों की चमक में शरारत और संजीदगी एक साथ टिमटिमाती हुई। चेहरे के भावों पर कांपती मुस्कराहट। आवाज़ में उत्तेजना !जिसे फुसफुसाहट में दबाकर वह आगे बढ़ गई।
छोटे से हॉल का सु्रमई अन्धेरा। मद्धम रोशनी सहलाती हुई। गिलासों की मीठी झनझनाहट। हल्की –सी हंसी जैसे धीमे से टकरा कर बिखर गई हो।
एक देसी पार्टी चल रही है, रोहन के पचासवें जन्मदिन की।
मर्द और औरतें इधर से उधर बहते हुए से और साथ ही मचलती हुई कपड़ों की सरसराहटें। उलझी हुई मुस्कराहटें और गड्डमड्ड करती विदेशी परफ़्यूम की  ख़ुशबूएं।
वेटर हाथ में स्नैक्स की ट्रे लिए लोगों के बीच में तैरते हुए से गुज़र रहे हैं।
नीम अन्धेरे में बजता संगीत। एक वही ध्वनि है जिसका कुछ मतलब है। शेष सिर्फ़ बेमतलब का शोर।
“दीदी, कब शुरु होगा?” सिम्मी ने बहन के पास आकर धीमे से पूछा।
“श्श्श….।“ रीमा ने होठों पर उंगली  रख दी।
“जिज्जू तो हैरान रह जाएंगे।“ वे दोनों एक साजिश में शामिल थीं।
“नहीं। रोहन को सब मालूम है।“
सिम्मी का चेहरा उतर गया।
एकदम से हॉल की रोशनी मद्धम हो गई।
चुप्पी। लोग छायाओं में बदल गए। रोशनी का तनाव ढीला पड़ चुका था।
नेपथ्य में एक आवाज़ गूँजी।
“लेडीज़ एंड जेंटलमैन! ज़ोरदार तालियों से स्वागत कीजिए। हेअर कम्स मोस्ट ब्यूटी्फ़ुल एंड टेलेंटड- सेरेफ़िना!”
हॉल के दायें दरवाज़े से दाख़िल होती एक आकृति पर रोशनी का गोला जा टिका। चेहरे घूमे और उत्सुक नज़रें फैल गईं।
संगीत की धुन बदल गई। या हबीबी… या हबीबी….।
मध्यपूर्वी संगीत पर थिरकती, बिजली की तरह कौंधती एक अप्सरा, तिरती हुई डांस फ़्लोर की ओर आ रही थी।
भारतीयों की किसी भी पार्टी में बैली-डांसर लोगों ने पहली बार देखी।
झिलमिलाती हूर! शायद ऐसी ही होती होगी! इन्द्रधनुषी कोहरा। कोहरे में पिघलते चेहरे। हल्के अन्धेरे का तैरता बादल बहुत सुकूनदेह होता है। मन में छिपे अन्धेरे भी उसके साथ घुल मिल सकते हैं। 
किसी एक का अन्धेरा किसी दूसरे को नहीं दिखता। अपने अपने अन्धेरों के साथ सभी एक बड़े अन्धेरे के साये में छिपने लगे।
हल्की सी ख़ुशी, उत्तेजना भरी दबी हुई चीख़ इस माहौल में आकर घुल गई।
रोहन आज मेज़बान था। उसने गर्व के साथ अपने पास खड़े दोस्तों और रिश्तेदारों को देखा। वह एक ऎसा भाव था जो केवल एक मर्द के चेहरे पर ही न्यूनतम कपड़ों में नाचती औरत को देखकर आ सकता था।
“मैं कुछ नया चाहता था। बोरिंग पार्टी नहीं कि बस खाओ, पियो और बहुत हुआ तो डी.जे ने म्यूज़िक बजा दिया। थोड़ा डांस किया और हो गई पार्टी। सभी एक जैसीं।
“ये बात हुई न रईसों वाली।“ कहकर राहुल ने छोटे भाई की पीठ पर धौल जमा दी।
 भारी-भरकम भाई के हाथ की धौल भी दमदार थी। रोहन थोड़ा सा लड़खड़ा गया।
“ आख़िर इतना पैसा किसलिए कमाया है? थोड़ा मनोरंजन, थोड़ी मस्ती तो होनी ही चाहिए।“
“ख़ासकर जब नये-नये अमीर हुए हो।” अमित ने धीरे से कुढ़ कर कहा। कह कर वह इधर –उधर देखने लगा जैसे किसी और ने यह फ़िकरा कसा हो।
अब तक औरतों और आदमियों के अपने आप ही खिसकते हुए दो झुंड बन चुके थे। हर देसी पार्टी की तरह। रीमा क्योंकि मेज़बान थी तो आज उसके पास एक ख़ास हक़ था जिसका इस्तेमाल वह मेहमानों पर जी भर कर शान का रंग फेंकने में कर सकती थी।
“मैने लाँग- आयलैंड की एक पार्टी में सेरेफ़िना को डांस करते देखा था। रोहन की तो उससे आँख ही नहीं हट रही थी। मैने तभी सोच लिया था कि इसके पचासवें बर्थ-डे पर मैं इसे ही  बुलाऊंगी।“
पार्टी में बातें आपस में हो रही थीं पर आँखें नर्तकी पर। जहाँ कुछ की नज़रों की लार छिप नही पा रही थी तो दूसरी ओर कुछ लोग ऐसे भी थे जो वहाँ से हटकर पीछे की मेज़ों पर जा बैठे।
 कुछ मर्दों की आँखें उसके उघड़े हुए बदन को छील रही थीं तो दूसरी ओर औरतें असहज और संकुचित होने लगीं। उनकी निगाहें लुका-छिपी खेलती लगीं। उन्होंने ज़िन्दगी में पहले कभी जीती-जागती बैली-डांसर नहीं देखी थी। वे देखना चाहती थीं।
एक ख़ूबसूरत औरत भड़कीले लिबास में थिरक रही थी। उसके पेट की माँसपेशिया इतने नियंत्रित तरीक़े से संचालित हो रही थीं जैसे छोटा-सा समुद्र-मंथन हो रहा हो। उसमें से हलाहल का फेन निकलकर बिखरने को बेचैन!
अधढका बदन कामुकता की लहरें फेंकता हुआ सा। 
उपस्थित महिलाएँ दूर से ही देख रही थीं। उन्हें अपने बदन ठहरे हुए तट से लगे जिनमें शायद कभी हिलोरें उठी ही नहीं। न कभी तन यूँ लहराया और न ही मन कभी ऐसा हरियाआ। फिर भी डांसर के प्रति कहीं उनमें कोमलता ही थी। जैसे अल्प वस्त्रों में उनकी ख़ुद की देह ही बेपर्दा हो रही हो। है तो हम जैसी ही।
महिलाएँ दबे-दबे अपने साथियों के चेहरे पढ़ने की क़ोशिश भी करतीं और फिर नज़रें सेरेफ़िना की ओर घूम जातीं।
बलखाती देह, कमर के हिलोरे, नितम्बों का तीव्र कम्पन और उसका वक्ष को झटका देना, देखने वालों को भी बिजली का सा झटका लगा जाता। उस स्त्री का तरल चाँदी सा चमकता बदन, गुलाबी  परिधान में कौंध-कौंध जाता। हल्के रेशमी कपड़े की बनी लम्बी स्कर्ट के ऊपर उसने सलमे-सितारे जड़ी कंचुकी जैसा कुछ छोटा वस्त्र पहना हुआ था। स्कर्ट और कंचुकी के बीच की लम्बी सफ़ेद चिकनी त्वचा। स्कर्ट कूल्हों की  हड्डियों पर नज़ाकत से टिकी थी। वह पूरी तरह उघड़ी हुई नहीं थी और न ही पूरी तरह ढकी हुई। जब वह नाचते नाचते क़दम आगे बढ़ाती तो पूरी दायीं टाँग लिशकारा मार जाती।
स्कर्ट सादी थी और उसके ऊपर थी एक ख़ास तरह की बेल्ट। सेरेफ़िना हिलोर लेती और बेल्ट में लगे सितारे झनझनाते। एक ख़ास तरह की मंत्र-बिद्ध करती ध्वनि।
दोनों हाथों में सिम्बल बजाते हुए सेरेफ़िना लगातार थिरक रही थी। उसके नितम्बों का कम्पन एक सधी हुई ताल के साथ,  संगीत की धुन की ही तरह अपना संगीत रचता। मदिर और मादक।
बीच-बीच में वह  वक्ष की थिरकन से एक ऐसा वातावरण पैदा कर देती जैसे मद्धम गति से बहते पानी में एक बड़ा सा पत्थर फेंक कर भँवर पैदा कर रही हो। सोयी चेतना लड़खड़ा कर उसमें धँसने लगती। वृत्तों की ओर निगाहें डूबने लगतीं जो जितने चोली के भीतर थे उतने ही बाहर। भीगी त्वचा के ऊपर रंग बिरंगी चमकी। रात नशे में डूबती जा रही थी।
सेरेफ़िना का बेहद ख़ूबसूरत चेहरा जो शायद किसी मिस्त्र की हूर जैसा होना चाहिए था, पर नहीं था। नाच उसका बेशक मध्य-पूर्व का ही था।
खिलती हुई गहरी लाल लिपस्टिक और सफ़ेद जगमगाते दांतों के बीच उसने  नाप कर मुस्कान धरी  हुई थी। सारा वक्त उसका नाप वही रहा। न सूत भर ज़्यादा न कम। 
उसे अपनी हर तैयारी की ताकत का अहसास है। आँखों पर घनी नकली पलकें। पलकों पर हीरों के चूरे जैसा कुछ। चंचल पुतलियाँ, चारों ओर तैरती मछलियाँ पानी की गहराई थाहती हुईं। वह जलपरी सी अपनी नृत्यकला का प्रदर्शन करती रही। हर भंगिमा, थिरकन, बलखाना, लहराना-सब सधे हुए। बरसों की मेहनत और तैयारी।
वह देखती कि आँखें उसके अधखुले वक्ष पर चिपक रही हैं। अपने लम्बे लहराते बालों को  एक झटका देकर वह आगे कर लेती।फिर थिरकती हुई दूसरी दिशा में बढ़ जाती।
अब आदमी और औरतें अपने अलग-अलग गोल बनाकर खड़े थे। मर्द लोग अपने को तोल रहे थे, तैयार कर रहे थे इस ख़ूबसूरत मेनका के पास जाकर नाचने के लिए।
“कमाल ! कितनी जल्दी यह वापिस अपने शेप में आ गई है। कौन कह सकता है कि इसका तीन महीने का बच्चा है!”
“तुम्हें कैसे पता ?” कुछ सिर हैरत में घूम गए।
“ मैने ही तो इसके साथ कॉन्ट्रैक्ट साइन किया है। असल में यह इटालियन है और अच्छे परिवार की। नृत्यकला की शौक़ीन थी। इसके पापा ने पहले तो यह डांस सीखने के लिए मना किया था फिर इसका जुनून देखकर मान गए।“
“कितने पैसे लेती है?” एक उत्सुकता जो दबी थी, बाहर आ ही गई।
“तीन सौ डॉलरस एक घंटे के। सौ आने-जाने के और टिप्स अलग से। वैसे यह कौन से कपड़े पहनेगी,हम चुनेंगे और म्यूज़िक भी हमारा बॉलीवुड का ही होगा । यह सब रोहन ने पहले ही बात कर ली थी।“
संगीत बदला। इस बार बॉलीवुड का गाना।
सेरेफ़िना पाँच मिनट में कपड़े बदल कर दूसरे भाग के लिए हॉल में दाख़िल हो रही थी।
“महबूबा ओ महबूबा…”
बादलों में बिजली। नीले शिफ़ॉन के अन्दर चमकती चाँदनी। इस बार उसके परिधान में नीले पंख थे, उसकी बाहों के इशारे पर नाचते हुए। जादुई पंख चारों ओर घूम रहे थे।
कुछ सुगबुगाहट सी हुई।
कोई भी दुस्साहस करने का अकेले आदमी में साहस नहीं होता।झुंड का हाँका उकसाता है निषेध वाले रोमांच का घिराव करने के लिए। कुछ है आँखो से जो टपक रहा है। एक ने दूसरे की ओर देखा। दूसरे ने तीसरे। फिर चौथा भी शामिल। 
सभी एक झुंड बनाकर डांस फ़्लोर पर उतरे। हिम्मत आई एक दूसरे को देखकर।
किसी ने जैकेट उतार कर कुर्सी पर फेंकी। किसी ने टाई। तीसरे ने शर्ट की बाहें ऊपर चढ़ाईं और चौथे ने अगुवाई की।
एक घेरा बन गया नर्तकी के पास। वह मुस्करा रही है। थिरक रही है। वे और पास आ गए।
सेरेफ़िना की  नज़रों में मनाही का सिग्नल जल उठा। अनदेखा कर दिया गया।
नितम्बों की थिरकन, कमर पर बंधी घंटियाँ झनझनाती हैं। उन्हें लगता है कि पास आने का बुलावा दे रही हैं। राहुल पास आ कर खड़ा हो गया। वह इस समूह का सबसे रईस आदमी था और भारी-भरकम भी। बेपरवाह और आज़ाद था अपनी पत्नी से। कौन पैदा हुआ है उसे रोकने वाला।
धीरे-धीरे ठुमकता हुआ वह बैली-डांसर के पास आ गया। जेब से कुछ डॉलर निकाले और  सेरेफ़िना के सिर  के ऊपर उनकी हल्की सी बारिश कर दी।
सेरेफ़िना  पंखों को लहराते वहीं खड़ी हो गई। एक नज़र में पहचान गई। एक-एक के ही डॉलर थे। वह उन गिरे हुए डॉलरों पर थिरकती रही। डॉलरों की बूँदा-बाँदी शुरु हो चुकी थी।
यूँ झुककर पैसे उठाना उसके पेशे की तौहीन थी। बाद में अपने आप कोई वेटर या मेज़बान उसे इकट्ठे करके दे देगा।वह डॉलरों पर से फिसलती हुई आगे निकल गई।
अब तह डांस-फ़्लोर पर कई मर्द  उतर आए थे। धीमे- धीमे धुन पर नाचते हुए। 
महबूबा ऎ महबूबा..हूउउउऊ
राहुल बीन बजाने की नकल करने लगा। बाक़ी आदमी भी उसके साथ लग कर नाचने लगे।
सेरेफिना सतर्क हो गई। उसने रीमा को बता तो दिया था कि वह स्ट्रिप- डांसर नहीं है। पेशेवर बैली-डांसर है। पुरुष उसके साथ नाच तो सकते हैं, पर छू नहीं सकते।
महबूबा ऎ महबूबा..हूउउउऊ
गुलशन में गुल खिलते हैं
जब सेहरा में मिलते हैं
मैं और तूऊऊऊऊउ
गाना ख़त्म हो गया। सेरेफ़िना फिर उसी दरवाज़े से बाहर निकल गई। रोशनियां तेज़ जल उठीं।
फुसफुसाहटें थोड़ी साफ़ और हिम्मतें बुलन्द होने लगीं।
रोहन हीरो था आज का।
“अरे तेरी गोदी में नहीं बैठेगी क्या?”
“नहीं यार। इन बैली-डांसर के कुछ अपने ही क़ायदे-क़ानून  हैं।“
“ऐसी की तैसी… इनके नियमों की।“ राहुल की आवाज़ लड़खड़ा रही थी। वह भी उसी दरचाज़े से बाहर की ओर निकल गया जहाँ से अभी सेरेफ़िना निकली थी।
रोशनियाँ फिर मद्धम हुईं। 
“ मय्या मय्या” गुरु फ़िल्म का गाना छा गया सारे माहौल पर। डी.जे के इशारे पर रोशनी का ग्लोब आँख-मिचौनी सी खेलने लगा।
सेरेफिना थिरकती हुई दाख़िल हुई-  तलवार के साथ।  नाचते-नाचते तलवार उसने माथे पर रख ली और कमर पीछे की ओर मोड़ ली।
सब अपनी-अपनी जगहों पर थम गए। वह एक सुन्दर देह के अलावा प्रशिक्षित कलाकार भी है। नकार नहीं सकते थे।
“तू नील समन्दर है, मैं रेत का साहिल हूँ।”
उसने दोनों पैर ज़मीन पर टिका दिए। एक हाथ को ऊपर रस्सी खींचने जैसे भाव से ऊपर की ओर उठाकर दूसरे से ज़मीन का सहारा लिया। उसकी कमर निरंतर बल खा रही थी।
“मय्या मय्या।“ 
न गाने के बोल उसे समझ आ रहे थे न वहाँ उपस्थित लोगों को। फिर भी धुन पर झूमे जा रहे थे।
“अरे, मल्लिका शेरावत जैसी बात नहीं इसमें।“ कहकर कोई दो क़दम पीछे हट गया।
डी.जे ने घोषणा की , “आज की शाम का आख़िरी डांस।फिर गिला नहीं करना। जी भर कर आनन्द लीजिए।“
 संगीत बदला। सेरेफ़िना ने तलवार एक ओर रख दी। सिम्बल उठा लिए।
“माशाल्लाह माशाल्लाह….”
सेरेफ़िना की बलखाती देह हिचकोले खा रही है। थिरकन जैसे बदन में बिजली का करेंट दौड़ रहा हो। नागिन जैसी तड़प देह में। स्थिर मुस्कान चेहरे पर। मादकता देह में, मासूमियत चेहरे पर।
वे लोग उसका चेहरा नहीं देख रहे। घेर बाँधकर आगे बढ़ रहे हैं। स्कर्ट के बीच से झांकती टाँग को देख रहे हैं। उसके वक्ष के झटकों को महसूस कर रहे हैं। उसके गोरे अर्द्ध-वृत उनके भीतर सोये पशु को हड़का रहे हैं।
शराब के घूँटों के साथ कामुकता निगल रहे हैं।
“माशाल्लाह माशाल्लाह” पर झूमते लोग। बस यही कुछ पल हैं। फिर नृत्य ख़त्म। यह हूर चली जाएगी। जन्नत का तमाशा ख़त्म।
हॉल भरा है। बीबियाँ उन्हें देख रही हैं। क्या परवाह? कौन किसको देख रहा है?
 यह अवसर मस्ती करने का ही तो है। खुल कर नाचो, निहारो। उन्माद!
माशाल्लाह माशाल्लाह
चेहरा है माशाल्लाह
नैनों पे नैनों का
पहरा है माशाल्लाह….”
सभी साथ हैं। घेरा बनाकर बढ़्ते क़दम साथ।
सरूर चढ़ रहा है। झूम रहे हैं। थिरकन बेताल है। छटपटा रहे हैं हाथ छूने को।
जेब से नोट निकालकर कांपते हाथों से उसकी कमर की तरफ़ बढ़ रहे हैं।
सिर पर शराब के गिलास का संतुलन बनाए, मुँह में बीस डॉलर का नोट दबाए राहुल पास आता जा रहा था।
 माशाल्लाह माशाल्लाह।
रोहन ने पहल की।  एक नोट ठूँस दिया बैली-डांसर की सितारों जड़ी बेल्ट में।
दूसरे हाथ का भी हौसला बढ़ा। फिर तीसरा।
सेरेफ़िना घूम रही है-गोल-गोल। वह पकड़ना चाहती है उन बढ़ते हाथों के मालिक की शक्ल को।  
राजेश ने डॉलरों की बौछार तेज़ कर दी। सेरेफ़िना के हाथों में बजते सिम्बल की रफ़्तार भी तेज़ हो गई। उसके घुमाव बेचैन हो गए। थिरकन और झटके रुक से गए।
भँवर में घिर जाने जैसे हाथ-पाँव मार रही है वह। नृत्य की लय बिखर रही है किसी ने नहीं जाना।
“तू चीज़ बड़ी है मस्त- मस्त
नहीं मुझको कोई होश-होश।“
होश है पूरा, सचेत और बेहोशी का नाटक करते हुए बढ़ना है।
सबके बीच, भरी महफ़िल में। शराफ़त के मुखौटे को सम्भालते हुए।
वे पास आने लगे। पास और पास। हाथों में नोट फड़पड़ा रहे थे। क़ैद पक्षियों की तरह।
राहुल का हाथ उसके सीने की तरफ़ बढ़ा। सेरेफ़िना पीछे हटी। मुस्कान बरक़रार थी पर अब उनमें लाल रंग की बत्ती जल उठी। 
पुरुषों का दायरा उसके इर्द-गिर्द संकरा होता जा रहा था।
मस्त- मस्त। झूमते हुए लोग।
बस, यही कुछ पल हैं। फिर नृत्य ख़त्म। यह हूर चली जाएगी। जन्नत का तमाशा भी ख़त्म।
फड़फड़ाते नोटों का झुंड  सेरेफ़िना के जिस्म के गिर्द चक्कर काट रहा है। कमर पेटी के निशाने की ओर बढ़ते हाथ उसकी कमर से रगड़ खा जाते।
सेरेफ़िना घिर गई। लोग इतने इतने पास आ गए कि उसकी स्कर्ट और उनकी पैंटो की सरसराहट घिच-मिच होने लगी।
सेरेफ़िना पलटी। क्रुद्ध नागिन सी। दायें- बायें फन पटकती हुई। उसे लगा कोई हाथ उसे ग़लत तरीक़े से छू रहा है। वक्ष पर पड़े बाल झटके नहीं जा रहे। नाचना जारी है। ताल और लय सब गूँगी- बहरी हुए जा रही है।
बैठे हुए मेहमानों को सेरेफ़िना दिखनी बन्द हो गई।
सेरेफ़िना ने अपनी दोनो बाहें सिर के ऊपर कर लीं, जैसे डूब रही हो।
महिलाओं में थोड़ी घबराहट फैल गई। एक-दूसरे को देखा।कुछ ग़लत लग रहा है।
“पीछे हटो सभी लोग।“  रीमा कुर्सी पर खड़ी होकर चिल्लाई।
“ दूरी बनाकर रखनी है। आप ऐसा बिलकुल नहीं कर सकते।”
रीमा दौड़कर उस दायरे को तोड़ने लगी। रोहन को बाहर खींचा।
बायीं तरफ़ जगह पाकर सेरेफ़िना ने उसी दिशा में बांह बढ़ा दी। सिम्बल अब भी धीमे-धीमे बज रहे थे। मुस्कान अभी भी चिपकी हुई थी। हल्के हल्के थिरकते हुए वह उस दरवाज़े की तरफ़ बढ़ी जहाँ ’एग्ज़िट’ का लाल निशान चमक रहा था।
लेडीज़ बाथरूम में जाकर जल्दी से उसने स्कर्ट  बदलकर जीन्स पहन ली। सीना भारी हो गया था। उसे अपने ब्लाउज़ में कुछ गीलापन महसूस हुआ।
“जोई भूखा होगा।“ उसकी मुस्कराहट ग़ायब हो चुकी थी। जल्दी से उसने उसी ब्लाउज़ के ऊपर बटनों वाली शर्ट पहन ली।
दरवाज़े पर सिम्मी दिखी। वह फ़र्श पर पड़े सभी डॉलरस समेट कर लाई थी।
सेरेफ़िना जल्दी- जल्दी अपना सारा सामान  इकट्ठा करके छोटे से अटैची में डालने लगी।
सिम्मी चुपचाप खड़ी होकर उसे देख रही थी। सेरेफ़िना को उसकी नज़रों में बहनापा नज़र आया। जवाब में वह मुस्करायी।
“तुम बहुत सुन्दर हो और गजब का नाचती भी हो।“
“थैंक्स” वह फिर मुस्करायी।
“तुम्हें असुविधा नहीं होती। कुछ मर्द लोग तो तुमसे ग़लत बातें भी करते होंगे।“
“हाँ, होती है।“ सेरेफ़िना ने सिर ऊपर उठाकर देखा।
“आज भी हुई। वह एक आदमी था न जो सिर पर गिलास रखकर डांस कर रहा था….।“
 सिम्मी के ज़ेहन में राहुल का चेहरा कौंधा।
“वह थोड़ा भारी-सा? वह बहुत अमीर व्यवसायी है। रोहन का बड़ा भाई।“
सेरेफ़िना का चेहरा तमतमा उठा।
“जब मैं डांस के एक सेट के बाद, दूसरे के लिए तैयार होने के लिए बाहर आ रही थी तो वह भी मेरे पीछे आ गया। पता है उसने मुझे क्या कहा?”
सेरेफ़िना अपमान से हाँफ़ रही थी।
“उसने मुझसे पूछा कि मैं एक रात का कितना लेती हूँ? मैने कहा कि मैं एक प्रोफ़ैशनल डांसर हूँ, कुछ और नहीं।“
सिम्मी ने शर्म और झेंप से आँखे झुका लीं। 
“उसने कहा, मैं तुम्हें दस हज़ार डॉलर दूँगा।“
“पिए हुए होगा।“ सिम्मी ने सेरेफ़िना के घाव को पोंछना चाहा।
“कोई बात नहीं । हमें ऐसे लोगों से निबटने की आदत है।“
——-
तेज़ रफ़्तार से गाड़ी चलाते हुए, सेरेफ़िना ने खिड़की का शीशा नीचे कर दिया। हवा के झोंके से थोड़ी राहत मिली।
‘जोई!’ बस उसी का भूखा चेहरा आँखों के सामने घूम रहा था।
आज सुबह से ही वह ढीला था। अगर कई दिन पहले ही इस कॉन्ट्रैक्ट पर दस्तख़त न कर दिए होते तो शायद वह आती ही नहीं।
“मैं संभाल लूँगा, तुम चिन्ता न करो।“ माइक ने उसे तसल्ली देते हुए कहा।
“ रोये या बदन गर्म लगे तो ‘बेबी मोट्रिन’ की तीन बूंदे दे देना।“
माइक ने हामी में सिर हिला दिया। फिर भी वह रुकी रही।
“गोद में उठाकर घूमना। धीमे-धीमे थपकियाँ देना।“
“जाओ बाबा !”
“और सुनो…।“ वह  थोड़ा उखड़ सी गई।
“वह बेबी फ़ॉर्मूला है न ! अगर भूखा हो तो बनाकर दे देना। वैसे ज़रूरत नहीं पड़ेगी। मैं जितनी जल्दी हो सका, आ जाऊँगी।“
“जाओ स्वीटहार्ट। अपने शो पर ध्यान दो। एन्जॉय इट।“
बाप-बेटे दोनों की ओर हवाई-चुम्बन फेंककर वह निकल आई थी।
कितना अच्छा है माइक। कितना समझता है उसे। पिछले चार महीनों से बेरोज़गार है। काम भी ढूँढता है और उसकी मदद भी करता है।
आज उसका काम पर जाना ज़रूरी था। पैसे तो चाहिए ही । बिना कहे वे दोनों समझते हैं। जोई के पैदा होने से पहले भी तो नहीं जा सकी।
बैली-डांस है ही उदर की मांस पेशियों का जादुई नर्त्तन। लचकीली कमर बलखाती और लहराती हुई। पेट और कमर की लहरियों से एक मादक स्पन्दन रचता नृत्य।
 संगीत की ताल में थिरकते, बल खाते, लहराते उतार-चढ़ाव में दर्शकों की सारी चेतना को नियंत्रित कर लेता मदिर नृत्य। कला है यह। पाँच वर्षों के कठिन परिश्रम से सीखा है उसने।
उत्तेजना और उन्माद से भरे इस नृत्य में डूबकर वह सब कुछ भूल जाती है। धुन पर उसका पोर-पोर थिरकता है।
बच्चा था पेट में। वह अपने पेट पर उंगलियां फिराकर उसको हिलता महसूस करती। छू छू कर मुस्कराती। यह तो बिना सीखे ही डांस करता है।
“अब तुम कुछ समय तक बिलकुल डांस नहीं करोगी। इसी को करने दो।“
वे दोनों हंसते। अगर माइक की नौकरी नहीं छूट जाती तो वह शायद इतनी जल्दी डांस –फ़्लोर पर उतरती भी नहीं।
वह कितनी घबरायी हुई थी अपने बदन को लेकर। आदमी तो सिर्फ़ उसके नितम्बोंका हरहराना देखते हैं या उनकी निगाहें हलचल पैदा करती अधखुली गोलाइयों पर अटक जाती हैं।मगर औरतें देखती हैं तिल-तिल, ख़ुर्दबीन लेकर। कितनी कठोर तोलती हुई नज़रें।
सुन्दर देहयष्टि । एक और दबाव, कला की महारत के साथ-साथ।
उसने बालों को अवहेलना के साथ झटका। बुरा तो नहीं रहा आज का दिन।
काफ़ी आमदनी हो गई।
घर के सामने कार पार्क करते ही वह अपना बैग उठाकर  भागने सी लगी।
अपॉर्टमेंट के बाहर से ही जोई के ज़ोर-ज़ोर से रोने की आवाज़ आ रही थी।
सेरेफ़िना ने चाबी लगाकर जल्दी से दरवाज़ा खोला। सीधे बेडरूम की ओर लपकी।
जोई को कंधे से लगाकर माइक कमरे के चक्कर काट रहा था।
सेरेफ़िना ने बच्चे को उसके हाथों से झपट लिया।
वहीं फ़र्श पर बैठ गई। जल्दी से शर्ट के ऊपरी बटन खोल दिए।
“भीगा तौलिया देना।“ माइक को कहकर उसने बच्चे का चेहरा शर्ट के अन्दर कर लिया।
रोता बच्चा एकदम चुप  होकर माँ के सीने में सिर घुमाने लगा।
सेरेफ़िना ने उसका सिर सहलाया फिर सिर चूमना शुरु कर दिया। उसकी आँखें भीग आईं।
“आय’म सॉरी। आय’म सॉरी।“
बच्चा सिर पीछे पटककर ज़ोर से चीख पड़ा।
घबराकर सेरेफ़िना ने उसे देखा। एकदम सन्न।
बच्चे के मुँह पर एक गीला-मुचड़ा बीस डॉलर का नोट चिपका हुआ था।
वह घूरती रही उस दूध की गंध वाले , भीगे हुए कागज के टुकड़े को |
फिर अंगूठे और उंगली से उसने उस नोट को ऐसे उठाया जैसे किसी बिच्छू को पकड़ रही हो | दुनिया की सबसे गंदी और घिनौनी चीज़ | दूर फेंक दिया |
बच्चा बुरी तरह बिलख रहा था |
सेरेफ़िना की आंखें दुनाली हो गईं | एक बैली डांसर और मां के बीच की महीन-सी हद के बीच उसकी देह ठिठकी थी |
उसने बच्चे को बेबसी से देखा | सीने से लगाकर सहलाने लगी , उसे चूमते और पुचकारते हुए धीरे -धीरे वह शिथिल होने लगी | 
बच्चा चुप था | सेरेफ़िना पता नहीं किन अन्धेरों में घिरी काँप रही थी |
अनिल प्रभा कुमार
ईमेल : Aksk414@hotmail.com
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मोबाइल:  973  978  3719


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1 टिप्पणी

  1. आपकी कहानी पढ़ी। पैसे की चमक में इंसान अपने हद भूल जाता है। इंसान को कला की कद्र करना आना चाहिये। हर कलाकार बिकाऊ नहीं होता और ना ही हरदेव बिकने के लिए होती है।
    हर डांस की अपनी एक ड्रेस होती है। बैले डांस की अपनी परंपरा और ड्रेस है।
    कभी-कभी स्त्री पर मजबूरियां हावी होती हैं। जैसा कि इस कहानी के अंत में दिखाई दिया।

    अच्छी कहानी है आपकी

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