बाहर बहुत तेज़ बिजली की कौंध हुई है, क्षण भर बाद ही कान के पर्दे फाड़ते हुए गड़गड़ाहट का स्वर गूँजा। बादल के गरजने के साथ ही बाहर बरसात की रफ़्तार भी तेज़ हो गयी। नेहा आज सुबह ही इस होटल में आकर रुकी है। उसकी कम्पनी मध्य प्रदेश की एक उभरती हुई होटल कम्पनी है। प्रदेश के कुछ पर्यटन स्थलों पर इस कम्पनी के होटल आ चुके हैं, बाक़ी बचे पर्यटन स्थलों पर भी कम्पनी होटल खोलने के प्रयास में लगी हुई है। कुछ पर्यटन स्थल ऐसे हैं, जहाँ ज़मीन की दरें आसमान को छू चुकी, इसीलिए उन पर्यटन स्थलों के आस-पास के स्थानों पर कम्पनी संभावनाएँ तलाश कर रही है। मध्य प्रदेश का एक प्रमुख पर्यटन स्थल है ‘खजुराहो’, दुनिया भर में मैथुन मूर्तिर्यों वाले मंदिरों के लिए चर्चित। चंदेल राजाओं द्वारा दसवीं से बारहवीं शताब्दी के मध्य के अपने शासनकाल के दौरान खजुराहो में मंदिरों का निर्माण करवाया गया था। 
खजुराहो तो नहीं लेकिन खजुराहो से लगभग पचास किलोमीटर की दूरी पर स्थित ज़िला मुख्यालय छतरपुर में, एक पुरानी हवेली के बारे में जानकारी लेने आयी है नेहा। यह हवेली पहले से ही एक होटल के रूप में संचालित है। इसका मालिक पहले अपने परिवार के साथ इसी हवेली में रहता था। पूर्वज छतरपुर के राजा के यहाँ मुनीम का काम करते थे, हवेली उसी ​अधिकार से मिली हुई थी। बाद में राजा-रजवाड़े तो समाप्त हो गये, पर हवेली मुनीम के परिवार के पास ही बनी रही। फिर चार-पाँच साल पहले अचानक वे लोग छतरपुर छोड़ कर दिल्ली में बस गये, तो इसे होटल में बदल दिया। होटल का नाम भी ‘हवेली’ ही रहने ​दिया। हवेली के मालिक दिल्ली जाते समय अपनी एक-दो कारें और हवेली के कर्मचारियों को यहीं छोड़ गये थे। कारें होटल में ठहरने वाले गेस्ट्स के काम आती है, और कर्मचारी हवेली से होटल के कर्मचारी बन गये हैं। यह हवेली होटल कुछ ख़ास चल नहीं रही है, तो मालिक अब इसे बेचना चाहता है। नेहा होटल ‘हवेली’ की पहली मंज़िल पर स्थित एक सुईट में रुकी हुई है। सुबह यहाँ पहुँचने के बाद नेहा ने पूरी हवेली को घूम कर देखा। पीले बलुआ पत्थरों से बनी हुई यह हवेली राजस्थानी हवेलियों की ही तरह है। वही झरोखे, मेहराबें, छज्जे, गलियारे, दालान, बारजे, आले और वैसे ही नक़्क़ाशीदार दरवाज़े, खिड़कियाँ, खम्बे और मुँडेरें। घूमते हुए नेहा ने देखा कि एक या दो कमरों को छोड़ कर मैनेजर ने सारे कमरे उसे खोल-खोल कर दिखलाये। इसका मतलब लगभग पूरा होटल ख़ाली पड़ा है, अर्थात् होटल सचमुच ही ठीक से नहीं चल रहा है अभी। 
नेहा और उसका पति विनय दोनों ने ही टूर एण्ड ट्रेवल्स में एम.बी.ए. किया हुआ है। इन्दौर से एम.बी.ए. करने के दौरान ही प्रेम हुआ और फिर जॉब लगते ही दोनों ने शादी भी कर ली। शादी को भी अब चार-पाँच साल हो चुके हैं। अभी दो से तीन नहीं हुए हैं दोनों। भविष्य को लेकर जो प्लानिंग दोनों ने की है, उसमें बच्चा है तो, मगर अभी नहीं है, कुछ सालों बाद के लिए उसे योजना में शामिल किया हुआ है। विनय एक एयरलाइंस कम्पनी में ग्राउण्ड स्टाफ में है। फिलहाल पुणे में पोस्टेड है। दोनों बहुत कोशिश कर रहे हैं कि किसी तरह एक ही शहर में रह सकें, लेकिन संभव नहीं हो पा रहा है। फिलहाल मशीन की तरह पैसा कमाने में लगे हैं दोनों। इन्दौर में कहीं किसी अपार्टमेंट में फ़्लैट भी बुक कर दिया है, बीस साल के लोन पर। उसकी भी किश्तें शुरू हो चुकी हैं। नेहा ने लोन पर ही कार भी ली हुई है, उसकी भी किश्तें जाती हैं। 
बरसात तेज़ हो गयी तो खिड़की के पास से हट कर नेहा कमरे में आयी और रीडिंग टेबल के पास रखी कुर्सी पर बैठ गयी। टेबल के पीछे दीवार पर एक छोटा-सा बुक-शैल्फ है, जिसमें कुछ किताबें रखी हैं। बुक-शैल्फ़ के सबसे नीचे वाले खाने के आधे हिस्से में कुछ किताबें खड़ी रखी हैं और बाक़ी के आधे ख़ाली हिस्से पर एक डायरी आड़ी रखी हुई है। भूरे-कत्थई रंग की पुरानी सी डायरी। नेहा की घूमती हुई नज़रें डायरी पर आकर स्थिर हो गयीं। उसने उत्सुकता के साथ उस डायरी को उठा लिया। कुछ देर तक उसके कवर पर हाथ फेरती रही, फिर उसे खोल लिया। 
डायरी के पहले ही पन्ने पर ही कुछ रेखाचित्र बने हुए हैं। इन रेखाचित्रों में कुछ आकृतियाँ, कुछ चेहरे से दिख रहे हैं, पर सब कुछ बहुत जटिल है। नेहा कुछ देर तक उन रेखाचित्रों को देखती रही, फिर उसने पन्ने को पलट दिया। अगले पन्ने पर किसी ने धुँआ या बादल जैसा कुछ रेखाचित्र बनाने की कोशिश की है, और ऐसा लग रहा है जैसे बनाते-बनाते छोड़ दिया है। फिर नीचे लिखा है- ‘मैं ख़्वाब देख रही हूँ कि वो पुकारता है, और अपने जिस्म से बाहर निकल रही हूँ मैं’। लिखने वाले ने कैलीग्राफी करने की कोशिश की है शेर को लिखते समय। नेहा ने पन्ना पलट दिया। अगले पन्ने पर स्त्री का अधूरा-सा, हवा में घुलता हुआ रेखाचित्र बनाया गया है, और नीचे एक और शे’र लिखा है- ‘तेरे बदन की ख़लाओं में आँख खुलती है, हवा के जिस्म से जब-जब लिपट के सोती हूँ’। 
दूसरे शे’र को भी पहले जैसा ही पाकर नेहा की उत्सुकता बढ़ गयी है। क्या है यह सब ? किसकी डायरी है यह ? और यदि किसी की निजी डायरी है, तो यहाँ क्यों रखी है ? नेहा के दिमाग़ में कई सारे सवाल एक साथ पैदा हो गये। सवालों में उलझे हुए ही उसने पन्ना पलट दिया। अगले पन्ने पर खजुराहो की एक मैथुन मूर्ति का रेखाचित्र है, मगर यहाँ मूर्ति के रेखाचित्र के साये की तरह एक और रेखाचित्र है, स्त्री और पुरुष का। जैसे मूर्ति का ही प्रतिबिम्ब हो। नीचे लिखा है- ‘बदन के दोनों किनारों से जल रही हूँ मैं, कि छू रही हूँ तुझे और पिघल रही हूँ मैं’। नेहा को इतना तो समझ आ गया है कि यह डायरी किसी स्त्री की है, मगर किसकी ? उत्कंठित मन से उसने पन्ना पलटा। अगले पन्ने पर फिर एक रेखाचित्र है, मगर यहाँ रेखाचित्र में शामिल पीठ किये हुए पुरुष का कमर से ऊपर का हिस्सा शिल्प-रूप में है, मगर कमर से नीचे का हिस्सा रेखाचित्र बनाने वाले ने इंसानी शरीर की ही तरह बना कर पूरा कर दिया है। पुरुष के कूल्हों की गोलाइयाँ, जंघाओं की मांसपेशियाँ, पिंडलियाँ, एड़ियाँ सब सुडोलता के साथ रेखाचित्र में बना दी गयी हैं। नीचे लिखा है- ‘सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है, कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं’। नेहा ने डायरी बंद कर टेबल पर रख दी, जैसे किसी निषिद्ध क्षेत्र में ग़लती से प्रवेश करने के बाद क़दम वापस खींच ले कोई। कुछ देर तक टेबल पर रखी डायरी को देखती रही, फिर कुर्सी से उठ कर बालकनी की तरफ़ बढ़ गयी। 
बालकनी, असल में एक झरोखा है, जिसमें नक़्क़ाशीदार खम्भों पर मेहराबदार छत है। यह झरोखा जिस तरफ़ खुलता है, उसी तरफ़ कुछ दूर से होकर रेल की पटरी है। थोड़ी-थोड़ी देर में जहाँ से ट्रेन गुजरती रहती हैं। आस-पास के कमरों के झरोखे भी इसी तरफ़ खुले हुए हैं। इन झरोखों के बीच बहुत अधिक दूरी नहीं है। नेहा झरोखे में आकर कुर्सी पर बैठ गयी और सामने की तरफ़ के दृश्य को देखने लगी।  
कुछ देर तक वैसे ही बैठे रहने के बाद जब नेहा की नज़रें घूमती हुई बगल के झरोखे पर आयीं, तो उसने देखा वहाँ भी कुर्सी पर एक स्त्री बैठी हुई है। वह स्त्री उसी की तरफ़ देख रही है। जैसे ही नेहा की नज़रें उस स्त्री से मिलीं, तो उस स्त्री के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी। प्रत्युत्तर में नेहा भी सौजन्यतावश मुस्कुरा दी। नेहा ने देखा वह स्त्री तीस-पैंतीस वर्ष की है, सफ़ेद ब्लाउज़ के साथ गहरे हरे रंग की साड़ी पहने हुए है। 
‘नमस्ते…!’ नेहा का अवलोकन स्त्री द्वारा किये गये अभिवादन से टूट गया। 
‘जी नमस्ते…!’ नेहा ने मुस्कुराते हुए अभिवादन का उत्तर दिया। 
‘इन्दौर से आयी हैं न आप?’ स्त्री ने बात को आगे बढ़ाया।  
‘जी मैं इन्दौर से आयी हूँ। और आप…?’ नेहा ने उत्तर के साथ प्रश्न भी किया। 
‘मैं वैसे तो भोपाल की हूँ, पर अब तो यहीं की हूँ।’ उस स्त्री ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
‘मेरा नाम नेहा है, मैं अपनी कम्पनी की तरफ़ से इस हवेली को देखने आयी हूँ। हमारी कम्पनी इस होटल को टेक-ओवर करना चाहती है।’ नेहा ने अपना परिचय दिया। 
‘जी मुझे पता है। मुझे होटल के स्टाफ ने बताया था आपके बारे में कि आपकी कम्पनी इस होटल को ख़रीदने वाली है। चलिए अच्छा है, आपकी कम्पनी ख़रीद लेगी तो हवेली बच जायेगी।’ उस स्त्री ने कुछ ठहरे हुए स्वर में कहा। 
‘आप…?’ नेहा ने अपने प्रश्न को हवा में छोड़ दिया। 
‘ओह ! सॉरी ! मैंने अपना परिचय नहीं दिया। मेरा नाम सुजाता है, मैं इतिहास पढ़ाती हूँ। इतिहास खोजती भी हूँ। इसलिए अक्सर यहाँ आती रहती हूँ। हमेशा यहीं ठहरती हूँ। दिन भर इतिहास की खोज में भटकती हूँ, रात को लौट आती हूँ। हाँ इस बार मुझे अपना पसंदीदा सुईट नहीं मिल पाया, क्योंकि वह आपके लिए बुक था। मैं हमेशा उसी में ठहरती हूँ। और हाँ ड्रायवर और कार भी इस बार आपके कारण मुझे नहीं मिल पाये, मुझे बाहर से हायर करना पड़े।’ उस स्त्री ने कुछ अपनेपन से शिकायत की। 
‘सॉरी सुजाता जी, मेरे कारण आपको परेशानी हुई इस बार।’ नेहा ने विनम्रतापूर्वक कहा। 
‘अरे नहीं, मैं तो मज़ाक कर रही थी। मुझे तो ख़ुशी है कि आपकी कम्पनी इस होटल को ख़रीद रही है, नहीं तो मुझे लगता था कि जल्द ही मुझे किसी नये होटल की तलाश करनी पड़ेगी।’ उस स्त्री ने मुस्कुराते हुए कहा। नेहा भी बस मुस्कुरा दी। 
‘वहाँ बुक-शैल्फ में कोई डायरी है अभी भी ?’ नेहा के कुछ नहीं कहने पर उस स्त्री ने पूछा। 
‘जी है।’ नेहा ने कुछ आश्चर्य के साथ उत्तर दिया। 
‘आपने पढ़ी..?’ उस स्त्री ने प्रश्न किया। 
‘बस खोली ही थी, शुरू के तीन-चार पेज पढ़े, किसी की पर्सनल बातें लिखी हैं, और थोड़ी अजीब-सी बातें हैं, इसलिए आगे पढ़ने की हिम्मत नहीं कर पायी।’ नेहा ने उत्तर दिया। 
‘ऐसा क्यों कह रही हैं ? मैंने तो पूरी पढ़ी है, अच्छी है, आप भी पढ़िये। आप पढ़ लेंगी, तो फिर बात करेंगे उस पर। किसी भी किताब को पढ़े बिना उसे ख़ारिज कर देना ठीक नहीं है। सहमति या असहमति एक अलग बात होती है।’ उस स्त्री ने कुछ गंभीर स्वर में कहा। नेहा कुछ उलझन में रही, कोई उत्तर नहीं दिया। 
‘कल दिन में तो आप शायद खजुराहो जायेंगी। आज रात पढ़ने की कोशिश कीजिएगा फिर कल रात को बात करेंगे उस पर।’ उस स्त्री ने नेहा को चुप देख कर कहा।
‘जी आप कह रही हैं, तो आज रात सोने से पहले पढ़ने की कोशिश करूँगी। पता नहीं कितनी पढ़ पाती हूँ। आदत छूट गयी है पढ़ने की।’ नेहा ने उत्तर दिया। 
‘आदतें छूटती नहीं हैं, बस होता यह है कि नयी आदतों के पीछे पुरानी आदतें छिप जाती हैं, दब जाती हैं। ज़रा कुरेदो तो राख में से चिंगारी चमक उठती है।’ उस स्त्री ने कहा। नेहा ने कोई उत्तर नहीं दिया। 
‘सोच रही होगी तुम कि न जान न पहचान और बस मैं आदेश दिये जा रही हूँ। क्या करूँ, एक तो शिक्षक हूँ और दूसरा तुमसे पाँच-छह साल बड़ी भी हूँ।’ उस स्त्री ने मुस्कुराते हुए कहा ‘और अब एक आदेश और ले लो, कमरे में जाकर खाना ऑर्डर कर दो, नहीं तो बचा-खुचा ही मिलेगा। इस होटल सबसे बड़ी समस्या है खाना, तुम्हारी कम्पनी जब टेक-ओवर करे, तो सबसे पहले इसी समस्या को दूर करना।’ उस स्त्री ने कुर्सी से उठते हुए कहा। स्त्री ने अचानक ही नेहा को आप की जगह तुम कह कर संबोधित करना शुरू कर दिया है। 
‘जी चिंता मत कीजिए, आगे से आपको कोई परेशानी नहीं होगी, हमारे होटल्स का सबसे मज़बूत पक्ष हमारा ‘एफ़ एण्ड बी’ ही होता है।’ कहते हुए नेहा भी उठ कर खड़ी हो गयी। उस स्त्री ने मुस्कुरा कर सीधे हाथ का अँगूठा ऊँचा किया और पलट कर अंदर चली गयी। नेहा कुछ देर तक उस तरफ़ देखती रही फिर वह भी पलट कर कमरे में चली गयी।
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रात को खाना खाने के बाद जब नेहा सोने के लिए बिस्तर पर आयी, तो उस डायरी को भी साथ ले आयी। शाम को जहाँ तक डायरी को देख चुकी थी, उसके आगे का पन्ना खोला। तीन चार पन्नों में रेखाचित्र ही बने हैं। कुछ विचित्र-से रेखाचित्र, रेखाएँ, वलय, त्रिकोण और बिन्दुओं को एक दूसरे में गूँथ कर बनाये गये रेखाचित्र। हर रेखाचित्र में प्रश्नवाचक चिह्न ज़रूर है। हर प्रश्नवाचक चिह्न के ऊपर के अपूर्ण गोलाकार हिस्से में कुछ चेहरे हैं। कहीं-कहीं कुछ हाथ भी हैं, हवा में उठे हुए हाथ, कुछ थामने को आतुर हाथ। नेहा ग़ौर से उन रेखाचित्रों को देखती रही। तीन-चार पन्नों के बाद एक बार फिर रेखाचित्र और शे’र का समन्वय मिला नेहा को। बायाँ पन्ना कोरा है, मगर दायें पन्ने पर ठीक बीच में एक शे’र लिखा है- ‘मोहब्बत के ठिकाने ढूँढ़ती है, बदन की ला-मकानी मौसमों में’। शे’र के ठीक ऊपर एक लेटी हुई स्त्री का रेखाचित्र है। पीठ किये हुए लेटी स्त्री का रेखाचित्र। स्त्री के खुले हुए बाल शे’र के अक्षरों, शब्दों से होकर नीचे की तरफ लटके हुए हैं। कुछ देर तक नेहा रेखाचित्र को देखती रही फिर उसने पन्ना पलट दिया। एक बार फिर बायाँ पन्ना ख़ाली है, मगर दायाँ पन्ना सुंदर हस्तलिपि से लिखी हुई इबारत से भरा हुआ है। नेहा ने पढ़ना शुरू कर दिया।
‘हर बार एक अधूरापन छूट जाता है। ऐसा लगता है जैसे अब यही अधूरापन नियति बन चुका है। हर बार मंज़िल से दो क़दम दूर ही सफ़र समाप्त हो जाता है। कितनी रातें उस मंज़िल के पत्थर को छूने की उम्मीद में गुज़र चुकी हैं। और आगे भी जाने कितनी इसी तरह से बीतनी हैं। वही सन्नाटा, वही सूनापन और वही अधूरापन अंत में दामन में लिये लौट आती हूँ। उन अधूरे सपनों के फूलों को सुबह उठ कर मन की नदी के तेज़ बहाव में छोड़ देती हूँ। पता नहीं वे कहाँ पहुँचते हैं। हर शाम एक उम्मीद की शाम होती है, लेकिन हर सुबह उस उम्मीद की किरचों को बटोरने में बीतती है। लेकिन किरचें भी पूरी तरह से कहाँ साफ हो पाती हैं। कहीं न कहीं बची रह जाती हैं, चुभी रह जाती हैं। मन के अंदर कहीं गहरे चुभी रहती हैं। किसी न किसी नासूर को जन्म देने के लिए। तन के नासूर तो ठीक हो जाते हैं, लेकिन मन के नासूर कहाँ ठीक हो पाते हैं। मन चाहता है कि पहाड़ की चोटी पर पहुँचे, चोटी पर हो रहे ज्वालामुखी विस्फोट को महसूस करे और, पिघले हुए लावे के उड़ते फूलों की चोट साथ लिये शिखर से वापस लौटे, लेकिन ये सब कुछ बस एक बड़े से काश का हिस्सा होते जा रहे हैं… काश… काश… काश….।’ 
पूरा पन्ना पढ़ने के बाद नेहा कुछ देर को सोचती रही फिर उसने पन्ना पलट दिया। दायाँ पन्ना फिर पिछले पन्ने की तरह इबारत से भरा हुआ है। लेकिन इस बार कुछ बोल्ड अक्षरों में इबारत का एक शीर्षक भी है- ‘दुनिया का सबसे अपवित्र शब्द ‘पवित्र’ है’ शीर्षक को दो-तीन बार लिख कर बोल्ड किया गया है और नीचे अंडरलाइन भी है। नेहा ने पढ़ना शुरू किया – ‘हमारे जीवन में सबसे ज़्यादा परेशानी हमें एक ही शब्द के कारण होती है, ‘पवित्र’ शब्द के कारण। अगर यह शब्द हमारे अंदर, हमारे दिमाग़ में बचपन से ही नहीं डाली जाये, तो हमारी जीवन बहुत आसान हो। हम कुछ भी अपने मन का करने आगे बढ़ते हैं तो सबसे पहले पवित्र और अपवित्र का द्वंद्व सामने आकर खड़ा हो जाता है। किसने तय किया है कि क्या पवित्र है और क्या अपवित्र है। जो हमारे मन को भा रहा है, जो कुछ करना हमें अच्छा लग रहा है और उससे किसी दूसरे को कोई नुक़सान भी नहीं हो रहा है, वह अपवित्र कैसे हो सकता है। हम ख़ुद क्यों तय नहीं कर सकते कि हमारे लिए कौन सा कार्य पवित्र और कौन सा अपवित्र। क्यों सदियों पुरानी परंपराएँ हमारे लिए तय करती हैं कि हमारे लिए क्या सही है और क्या ग़लत। हमसे अच्छे तो पशु-पक्षी हैं, जो सब कुछ अपनी मर्ज़ी से करते हैं। हम सबके हाथों में परंपराओं की हथकड़ियाँ और पैरों में बेड़ियाँ डाल कर हमसे कहा जा रहा है कि ऐसे ही जीना है। मेरा मन इन दिनों वह सब कुछ करने को बहुत उतावला होता है, जिसे अपवित्र कहा जाता है। मन का भी क्या क़सूर, जो प​वित्र है उससे तो कुछ नहीं मिल रहा है मुझे। तो फिर क्यों न अपवित्र ही हो जाया जाये?’
पहला पन्ना पढ़ने के बाद नेहा को समझ नहीं आ रहा था कि लिखने वाला क्या लिखना चाह रहा है, मगर अब इस दूसरे पन्ने ने कहानी को थोड़ा खोल दिया है। नेहा ने उत्सुकता से अगला पन्ना खोला।
‘प्यास बढ़ती जा रही है बहता दरिया देख कर, भागती जाती हैं लहरें ये तमाशा देख कर, क्या अजब खेल है कि हमारे आस-पास कितने ही ​दरिया बह रहे हैं, मगर हमसे कहा गया है कि नहीं नियम है कि तुमको बस एक ही दरिया से पानी पीना है, एक ही दरिया में बहना है। क्या सितम है कि हमारा ही दरिया सूखा पड़ा है। हमारी प्यास बढ़ती ही जा रही है। जब भी खजुराहो से लौटती हूँ, तो अपने अंदर एक बाग़ी मन लेकर लौटती हूँ। मन, जो हर प्रतिमा को साकार देखना चाहता है, साकार करना चाहता है। इन मूर्तियों में सबसे ज़्यादा आकर्षित मुझे जो एक बात करती है, वह है इन मूर्तियों के चेहरों पर का आनंदमय उल्लास। कैसा अद्भुत उल्लास है उन चेहरों पर। मेरा मन उसी उल्लास में डूबना चाहता है। कल क्यू.एच. दरिया के पास आयी तो मेरे मन ने किया कि कैसा ख़ूबसूरत दरिया है, इसका पानी तो तमाम उम्र की तिश्नगी को मिटा देगा। मन ने कहा पैर बढ़ा और उतर जा दरिया में, मगर फिर दिमाग़ ने ऐन मौक़े पर आकर रोक दिया कि नहीं यह तो गुनाह है। दरिया बहता हुआ चला गया और मैं वहीं की वहीं खड़ी रह गयी। इन दिनों यह दरिया मेरे आस-पास से होकर ही बहता है और मैं बस बैठी हुई देखती रहती हूँ। इंतज़ार कर रही हूँ कि मेरे अपने ​दरिया में कब पानी आता है। और उतने वेग से आता है कि उसके पानी की उछाल मेरे अंदर की प्रतीक्षारत उछाल से मिल कर सम पर आये और उस उछाल की उँगलियाँ पकड़ कर मैं आसमान को छू लूँ। कम से कम एक बार तो छू लूँ।’
डायरी पन्ना-दर-पन्ना अपने आप को खोल रही है। उसका रहस्य धीरे-धीरे उजागर हो रहा है। नेहा सोच रही है कि आख़िरी बार कब उसने और विनय ने…, इन दिनों सब कुछ तो औपचारिक-सा हो कर रह गया है। महीनों बीत जाते हैं बीच में। डायरी लिखने वाली की तरह उसका मन भी तो भटकता है। पुरुष देहयष्टियाँ उसे भी इसी तरह अपनी तरफ़ खींचती हैं। कितनी ही बार उसने भी तो शायद ऐसा ही सोचा है, मगर हर बार…। डायरी ने जैसे उसके अंदर रखी एक बंद डायरी को भी खोल दिया है। 
नेहा ने डायरी का अगला पन्ना खोल लिया। यहाँ दायें पन्ने के सबसे ऊपर एक विचित्र सा रेखाचित्र बना है, जिसमें कुछ तितलियाँ हैं, जिनके पंख आधे-अधूरे हैं। रेखाचित्र के नीचे बहुत से बिंदु हैं, और नीचे अंडरलाइन कर के लिखा है- ‘तुम उस के पास हो जिस को तुम्हारी चाह न थी, कहाँ पे प्यास थी दरिया कहाँ बनाया गया’। कुछ लाइनें छोड़ कर कुछ नीचे से लिखना शुरू किया गया है ‘आज जब डी.एस. दरिया ने हवा के झोंके की तरह अचानक कमरे में प्रवेश किया, तो कमरे की फ़िज़ा एकदम से बदल गयी। ऐसा लगा जैसे रेगिस्तान के बीचों-बीच तपती धूप में बने हुए इस कमरे में अचानक फूल ही फूल खिल गये हैं, ति​तलियाँ उड़ने लगी हैं। तितलियों के परों की आवाज़ सुनाई दे रही है। हवा में मोर पंख बिखर गये हैं, जो जिस्म को अपनी छुअन से सहलाते हुए तैर रहे हैं। मन कर रहा है कि इस छुअन का पैरहन बना लूँ। मैं चाह रही हूँ कि हवा में तैरने लगूँ उन तितलियों और मोर पंखों के बीच, उनका एक-एक लम्स बीज लूँ अपने पर। मगर मैं ऐसा नहीं कर पा रही हूँ। ऐसा लग रहा है कि यह सब एक सपना है, मैं चाह कर भी सपने को थाम नहीं पा रही। तितलियाँ हवा में घुल रही हैं, मोर पंख धुँआ हो रहे हैं। कमरे में अचानक बह आया दरिया हवा के झोंके की तरह चला गया है। मैं फिर अकेली रह गयी हूँ।’
पूरा पन्ना पढ़ कर नेहा ने डायरी के खुले हुए हिस्से में अपनी उँगली रख कर डायरी को बंद कर दिया। डायरी पर सिर टिका कर सोचने लगी। इन यात्राओं में कितनी ही बार उसे भी तो लगता है कि कभी कोई एक रात अपने लिए भी जी ले। छह महीने पहले जब कम्पनी के काम से दिल्ली गयी थी, तो रात के समय कमरे में खाना लेकर आये उस सुंदर नौजवान वेटर को देख कर उसने भी तो ऐसा ही कुछ सोचा था, जैसा इस डायरी में लिखा है। हम क्यों आगे बढ़ कर थाम नहीं पाते अपने सपने को। क्यों रुक जाते हैं ? नेहा डायरी पर सिर टिकाये सोच रही है। सोच रही है कि क्या विनय के साथ भी ऐसा ही कुछ होता होगा? क्या उसके अंदर भी कहीं, किसी को देख कर ऐसी ही चाहतें जन्म लेती होंगी? 
डायरी को फिर से खोल कर नेहा ने अगला पन्ना खोल लिया। इस पन्ने पर पन्ने के किनारे-किनारे कुछ रेखाएँ बनी हैं, जैसे कोई शरीर बनाते-बनाते छोड़ दिया गया हो। रेखाओं से बची हुई जगह पर लिखा हुआ है- ‘दो दरिया भी जब आपस में मिलते हैं, दोनों अपनी-अपनी प्यास बुझाते हैं। आज सब डोरियाँ खोल दीं। बहने के लिए सबसे ज़रूरी है डोरियाँ खोल देना। शायद आज का दिन अनुकूल भी था इसके लिए। चारों तरफ़ सहरा ही सहरा था आज, एकदम सुनसान और ख़ामोश सहरा। इंसान तो क्या हवा की भी आवाज़ नहीं, आहट नहीं। और ऐसे में क्यू.एच. दरिया मेरे कमरे में बह आया। मैं कुछ देर दरिया को देखती रही, फिर बिना कुछ सोचे-समझे दरिया की लहरों में कूद गयी। दरिया कुछ देर तक तो हैरत में रहा, फिर धीरे-धीरे उसकी लहरों की रवानगी मुझे अपने साथ लेते हुए बहने लगी। उफ़्फ़…! क्यों इतने दिनों की देर की मैंने ? क्यों नहीं पहले हिम्मत की। दरिया की लहरों में जो वेग था, उसी की तलाश थी शायद मुझे। स्पर्शों की बूँदें कहाँ-कहाँ गिरीं, अब तो याद भी नहीं मुझे। पर इतना याद है कि हर उस जगह पर गिरीं, जहाँ मैं चाहती थी। जैसे उस दरिया में तेज़ मूसलाधार बरसातों का पानी था। पहाड़ों से उतरता हुआ। इतना उफान, इतना वेग, इतनी प्रचण्डता। मगर उसके बाद भी जिस्म पर जैसे कोई मोर पंख तैर रहा था। उस दरिया की लहरों की छुअन हर उस जगह तक गयी, जहाँ बरसों से कोई नहीं गया था। और फिर जैसे कई युगों बाद मेरे अंदर खजुराहो-विस्फोट हुआ। दरिया मेरे अंदर के परम विस्फोट को सम करते हुए आसमान की तरफ़ उठता चला गया, उठता चला गया, आसमान को छूकर हम बरसात की तरह बिखर गये। मेरी आँखें खुलीं तो मैंने देखा कि मैं वर्षा ऋतु की पृथ्वी की तरह हरी हो चुकी हूँ। जैसे युगों बाद मैंने इस हरेपन को महसूस किया।’ 
नेहा ने बेचैन होकर डायरी को बंद कर दिया। उसे लगा जैसे उसका गला सूख रहा है। नेहा पलंग से उठी और कमरे में रखी टेबल पर रखी पानी की बोतल से ग्लास में पानी डालने लगी। पानी लेकर वह झरोखे की तरफ़ बढ़ गयी। झरोखे के बाहर रात नि:शब्द बह रही है। झरोखे में खड़े होकर नेहा पानी पीती रही। कुछ देर बाद वापस लौट आयी। 
पलंग पर आकर नेहा ने एक बार फिर डायरी को खोल लिया। जहाँ छोड़ा था वहाँ से अगले पन्ने पर पढ़ना शुरू कर दिया। इस पन्ने पर सीधे ही ऊपर से लिखना शुरू कर दिया गया है- ‘आज फिर मुझ से कहा दरिया ने, क्या इरादा है बहा ले जाऊँ। क्यू.एच. दरिया बार-बार मेरी रूह के रास्ते से होकर बह जाता है इन दिनों। हर बार यह सफ़र एक विस्फोट के साथ समाप्त हो जाता है। इन दिनों जब मैं क्यू.एच. के साथ परवाज़ भरती हूँ, तो मुझे पता चलता है कि आसमान कितना विस्तृत है। उससे कहीं ज़्यादा विस्तृत जितना देखने के लिए हमें बाध्य रखा जाता है। उड़ना और बहना जीवन में बहुत ज़रूरी है, उड़े बिना पता नहीं चलता कि आकाश का विस्तार कितना है और बहे बिना पता नहीं चलता कि पृथ्वी की सीमाएँ कहाँ-कहाँ तक हैं। हमारे हिस्से का दरिया हमें कहीं बहा कर नहीं ले जा सकता, नहीं ले जा सकता क्योंकि वह हमें बहाते-बहाते थकने लगता है, ऊबने लगता है। एकरसता किसी को भी उबा देती है। क्यू.एच. दरिया ने मुझे एक बार फिर जीवन से भर दिया है। मैं बह रही हूँ, बहती ही जा रही हूँ, दिशाओं का पता नहीं, पर दिशाएँ याद रखने की अब इच्छा भी नहीं है। बहते ही रहना चाहती हूँ, इसी तरह…।’
नेहा कुछ देर तक सोचती रही, फिर उसने खुले हुए पन्नों की तरफ़ से डायरी को पलंग के एक किनारे पर उल्टा रख दिया। पलंग पर रखे हुए सारे तकियों को रख कर एक ऊँचा सिरहाने सा बनाया और उस पर सिर और पीठ को टिका कर लेट गयी। फिर डायरी को उठा कर अगला पन्ना खोल लिया। पन्ने के एक किनारे पर किसी पुरुष की पीठ का दायाँ हिस्सा, कँधे से कोहनी तक हाथ और गर्दन का थोड़ा सा हिस्सा बना हुआ। ऊपर गर्दन बिंदुओं में विलीन हो रही है। पीठ और हाथ की मांसपेशियों को बहुत सुडोलता के साथ गढ़ा गया है। पन्ने के बाक़ी बचे हिस्से में लिखा गया है। 
‘ढूँढ़ती हूँ मैं ज़मीं अच्छी सी, ये बदन जिस में उतारा जाए, आज अंदर की पूरी हिम्मत जुटा कर डी.एस. दरिया में छलाँग लगा दी। दरिया मेरे कमरे में था और मैं असमंजस में थी। किसी निर्णय पर पहुँचने के लिए अपने आप से लड़ती हुई। पहली बार के लिए अपने अंदर की पूरी हिम्मत को एक बिंदु पर बटोर कर एकत्र करना होता है। जो कुछ पहली बार हो रहा होता है, बस वही निर्णायक होता है। फिर मैंने देखा कि दरिया बाहर जाने के लिए दरवाज़े की तरफ़ बह रहा है। मैंने अपनी आँखें बंद की और बस… उसके बाद बस बहाव था और मैं थी। हर दरिया के बहाव में, उसके पानी में, उसकी गति में, उसके बहने के तरीक़े में कितना फ़र्क़ होता है। यह दरिया क्यू.एच. दरिया की तरह पहाड़ों से उतर कर बहने वाला तेज़ दरिया नहीं था। यह दरिया मंथर गति से बहने वाला दरिया था। मद्धम-मद्धम बहने वाला। किंतु इसके मद्धम होने का भी एक आनंद था। यह दरिया सरापा जलतरंग बजाते हुए बह रहा था। जैसे चंदन वन में खड़े दरख़्तों पर विषधर बिना आवाज़ किये चुपचाप बहते हैं। हर दरिया की बहन और छुअन अलग होती है। बहते हुए सोच रही थी कि शायद इसीलिए कहा जाता है कि दरिया को किनारे पर बैठ कर देखते रहने से कुछ नहीं होता, दरिया क्या है, यह समझने के लिए दरिया में उतरना पड़ता है। कितने दिनों से दोनों दरियाओं को बहते हुए देख रही थी, तब कहाँ पता था कि हर दरिया दूसरे दरिया से अलग होता है। बाहर से देखने पर नहीं, अंदर उतर कर देखने पर। उस दरिया की तीव्र गति में जो आनंद था, वही आनंद इस दरिया मंथर गति में हैं। दरिया के साथ बहते-बहते एक लहर को थाम कर मैं ऊपर उछल गयी, जहाँ चाँद था। चाँद को छूकर, उस पर अपनी उँगलियों के निशान छोड़ती हुई ज़मीन पर आ गयी। यूँ चाँद को छू लेना, कब से मेरे मुल्तवी सपनों में था। मेरी उँगलियाँ चाँद की ख़ुशबू से अब भी महक रही हैं। मेरे अंदर चाँद की गंध बस गयी है शायद।’
‘क्या है यह सब ? किसने लिखा है यह सब? यह सब सच है या केवल किसी की कल्पना ही है।’ कुछ देर तक नेहा अपने विचारों में खोई रही, फिर उसने पन्ने को पलट दिया। जो पन्ना सामने आया उस पर ऊपर की तरफ़ कई लकीरें बनी हैं, बेतरतीब-सी लकीरें। लकीरों के नीचे कुछ बोल्ड कर के लिखा गया है- ‘रास्ता दे कि मोहब्बत में बदन शामिल है, मैं फ़क़त रूह नहीं हूँ मुझे हल्का न समझ’। फिर नीचे तरंग सी बनी है, जो पन्ने के इस सिरे से उस सिरे तक गयी है। तरंग के नीचे लिखा हुआ है- ‘मैं प्रेम में नहीं हूँ, मैं इस समय देह में हूँ। प्रेम जैसा कुछ नहीं होता, बस देह होती है। लेकिन क्या होगा जब मेरे दरिया को पता चलेगा कि मैं दूसरे ​दरियाओं से भी गुज़रती रह रही हूँ। शायद वह मुझे समाप्त ही कर देना चाहे। भूल जायेगा कि मैंने उससे कभी नहीं पूछा कि वह कहाँ-कहाँ से गुज़रता रहा है। इन दिनों मैंने सोचना बंद कर दिया है और बस जी रही हूँ। जी रही हूँ उस समय को जो मेरे हिस्से में आया है। जिसमें कई स्थगित सपनों को मेरी आँखें फिर से देख रही हैं। मुझे नहीं पता यह समय मेरे हिस्से में कब तक है। लेकिन अभी नहीं सोचना चाहती, बस जीना चाहती हूँ। अगर यह मेरा अंत है तो अंत के पहले भरपूर जीना चाहती हूँ। मैं मरते हुए जीना नहीं चाहती, जीते हुए मरना चाहती हूँ।’ नेहा ने आख़िरी पंक्ति को तीन-चार बार पढ़ा- ‘मैं मरते हुए जीना नहीं चाहती, जीते हुए मरना चाहती हूँ।’ उस पंक्ति पर अपनी उँगलियाँ फिराती रही। फिर डायरी को उल्टा कर अपने सीने पर रख लिया। नेहा के दिमाग़ में बहुत कुछ चल रहा है। सोच के साथ नींद भी अपना प्रभाव दिखा रही है, पलकों का भारीपन बढ़ रहा है। 
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अगले दिन खजुराहो के लिए निकलते हुए देर हो गयी नेहा को। रात में देर तक डायरी पढ़ती रही, इसलिए सुबह देर से नींद खुली। खजुराहो में नेहा को बस एक सर्वे करना है कि वहाँ जो होटल हैं, वे क्या फूड सर्व करते हैं, उनके टैरिफ प्लान्स क्या हैं और गेस्ट को क्या सुविधाएँ वे प्रदान करते हैं। अपना असली परिचय दिये बिना बात करनी है होटल के कर्मचारियों से, पर्यटकों से और हर उस व्यक्ति से जिससे जानकारी मिल सकती है। सर्वे के लिए ज़रूरी जानकारी।
‘मैडम पहले किस मंदिर पर जाना है।’ ड्रायवर ने कुछ अदब के साथ पूछा। ड्रायवर सत्ताईस-अट्ठाईस साल का युवक है। 
‘नहीं मियाँ, किसी मंदिर नहीं जाना है। हमको कुछ होटल्स में जाना है। शाम तक समय बचा तो एकाध मंदिर पर जाकर कुछ टूरिस्ट से बात कर लेंगे।’ नेहा ने उत्तर दिया। होटल के ड्रायवर को होटल के सारे कर्मचारी मियाँ कहते हैं, इसलिए नेहा भी कल से वही कह कर पुकार रही है।
दिन भर नेहा खजुराहो की होटलों के चक्कर काटती रही। हर जगह ​थोड़ा कुछ ऑर्डर कर मँगवाती और खाती रही। जहाँ संभव हुआ, वहाँ अपने आप को टूरिस्ट बता कर होटल के कमरे भी देखे। होटल के कर्मचारियों से बातों-बातों में जानकारियाँ लेती रही। वापस गाड़ी में आकर अपनी डायरी में सब कुछ नोट कर लेती। शाम होने से पहले उसका काम पूरा हो गया। कुछ पर्यटकों से बात करने के लिए किसी मंदिर जाना ज़रूरी है, इसलिए उसने मियाँ को किसी ऐसे मंदिर चलने को कहा जहाँ ज़्यादा पर्यटक आते हों। मियाँ ने कार को कन्दारिया महादेव मंदिर की तरफ़ मोड़ दिया। 
कार से उतर कर मंदिर की तरफ़ जाते हुए नेहा ने मियाँ को भी साथ ले लिया। कन्दारिया महादेव मंदिर जिस ऊँचे चबूतरे पर बना है, उस पर पहुँच कर नेहा बाहर की दीवारों पर बनी हुई मूर्तियाँ देखने लगी। यहाँ एक बार पहले भी आ चुकी है, मगर कल रात पढ़ी गयी डायरी के उजाले में हर मूर्ति उसे नयी और अलग दिख रही है। नेहा एक-एक मूर्ति को ध्यान से देखती रही और सोचती रही कि कितना कुछ है इस देह में एक्सप्लोर करने का और मर जाने तक हम कितना कर पाते हैं। कल रात पढ़ी हुई डायरी के बाद खजुराहो एकदम नये रूप में नेहा के सामने आ रहा है। जैसे उस डायरी ने इन मंदिरों, इन मूर्तियों को डिकोड कर दिया हो नेहा के लिए। मंदिर की सबसे प्रसिद्ध मूर्ति जिसमें स्त्री तथा पुरुष दोनों अपने एक-एक पैर पर खड़े हैं तथा दूसरे पैर को एक-दूसरे की कमर पर पाश बना कर लपेटा हुआ है, को देख कर नेहा ठिठक गयी। मूर्ति में स्त्री और पुरुष की भंगिमाओं को देखती रही। स्त्री किसी नाव की तरह है और पुरुष उसे दरिया की तरह अपनी लहरों के सहारे सँभाले हुए है। एक हाथ से स्त्री की पाशवत जंघा को और दूसरे से उसकी पीठ को। जैसे दरिया की दो लहरें किसी कश्ती को सँभाले हुए हों। दरिया… नेहा को फिर डायरी की याद आ गयी। याद आया कि इसी मूर्ति का एक रेखाचित्र डायरी के शुरू के पेजों पर बनाया हुआ है। नेहा वहीं रुकी हुई है, नज़र मूर्ति पर है लेकिन दिमाग़ में कुछ और चल रहा है। कुछ देर बात जब नेहा को याद आया कि मियाँ भी उसके पीछे चल रहा है, और वह नेहा को इस मूर्ति में उलझे हुए देख कर पीछे रुका हुआ है, तो नेहा हड़बड़ा कर आगे बढ़ गयी।  
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रात का खाना खाकर कॉफ़ी का मग लेकर जब नेहा झरोखे में आयी, तो देखा कि सुजाता पास वाले झरोखे में, नेहा के झरोखे की तरफ़ कुर्सी रख कर बैठी हुई है। नेहा की तरफ़ ही देख रही है। सुजाता ने आज भी गहरे हरे रंग की साड़ी पहनी हुई है, ब्लाउज़ कल की तरह सफ़ेद न होकर काला है। बाहर का मौसम बरसात से भीगा हुआ है। बहुत तेज़ बरसात नहीं हो रही है, मद्धम-मद्धम बौछारें गिर रही हैं।
‘नमस्ते सुजाता जी।’ नेहा ने सुजाता से नज़रें मिलते ही कहा। 
‘नमस्ते नेहा, कहो कैसा रहा तुम्हारा आज का दिन?’ सुजाता ने मुस्कुराते हुए कहा। 
‘बस ठीक रहा, जिस काम से आयी थी, वह काम हो गया पूरा। अब शायद कल निकल जाऊँगी। पहले सोचा था कि चार-पाँच दिन रुकना पड़ेगा, पर दो दिन में ही काम पूरा हो गया। कल फर्स्ट हाफ में थोड़ा काम निपटा कर दोपहर बाद की ट्रेन से लौट जाऊँगी।’ नेहा ने भी मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। 
‘अच्छा ? बहुत जल्द पूरा हो गया काम।’ सुजाता ने प्रश्न किया।
‘जी सुजाता जी, हम तो कार्पोरेट के ग़ुलाम हैं, वह गाना आपने सुना होगा न- ‘बैठ जा, बैठ गयी, खड़ी हो जा, खड़ी हो गयी’ बस हम भी यही करते रहते हैं। अभी तक की रिपोर्ट मेल की तो जवाब आया कि इतना काफी है, लौट आओ। बस वापस जा रही हूँ, हम तो मैनेजमेंट की हवा के इशारे पर बहते रहते हैं।’ नेहा ने उत्तर दिया। सुजाता ने कुछ नहीं कहा बस चुपचाप नेहा की तरफ़ देखती रही। नेहा ने अपने झरोखे में रखी हुई कुर्सी को उठा कर सुजाता के झरोखे की तरफ़ बिलकुल किनारे तक ले आयी, और वहाँ कुर्सी को रख कर उस पर बैठ गयी।
‘आपको हरा रंग बहुत पसंद है।’ नेहा ने बैठते ही पूछा।
‘हम ​स्त्रियाँ पृथ्वी होती हैं, हम पर हरा रंग ही सबसे ज़्यादा सूट करता है।’ सुजाता ने कुछ गहरे स्वर में उत्तर दिया। नेहा कुछ नहीं बोली चुपचाप सुजाता की तरफ़ देखती रही।
‘डायरी पढ़ी…?’ कुछ देर की चुप्पी के बाद सुजाता ने पूछा।
‘हाँ, कुछ पन्ने पढ़े कल। पूरी तो नहीं पढ़ पायी।’ नेहा ने उत्तर दिया। 
‘क्या सोचती हो उसके बारे में?’ सुजाता ने पूछा। 
‘मुझे कुछ ठीक नहीं लगा कि वह स्त्री विवाहित होने के बाद भी दूसरे पुरुषों के साथ अपने सुख की तलाश कर रही है। अगर हम विवाह नाम के इस बंधन में हैं, तो हमें इसका सम्मान भी करना चाहिए।’ नेहा ने कुछ अटकते हुए उत्तर दिया। 
‘विवाह…?’ सुजाता के चेहरे की मुस्कुराहट कुछ गहरी हो गयी ‘ऐसा क्या मिलता है विवाह से कि कोई इसका सम्मान करे ?’ सुजाता की आवाज़ में थोड़ा उपहास आ गया है।
‘आपको कुछ नहीं मिला?’ नेहा ने एकदम सीधा प्रश्न किया। सुजाता ने कुछ देर तक कोई उत्तर नहीं दिया। 
‘मिला था न, शुरू के एक-दो साल सबको मिलता है। दोनों को मिलता है। एक शरीर, जो पूरी तरह से हमारे लिए होता है। मगर एक शरीर में एक-दो साल से ज़्यादा खोजने लायक कुछ नहीं होता है। उसके बाद हम जानने लग जाते हैं, कि इसके बाद यह होगा, उसके बाद वह होगा… और बस हम ऊबने लगते हैं। हम दोनों ऊबने लगते हैं। पुरुष इस ऊब का विकल्प बाहर कहीं तलाश लेता है, मगर हम तो स्त्री हैं, हम ऐसा नहीं कर सकते, इसीलिए उसके बाद का जीवन हम एक अनंत प्यास के साथ बिताते हैं। पुरुष यदि स्वतंत्र है, तो स्त्री को वह स्वतंत्रता क्यों प्राप्त नहीं।’ कुछ उपहास के स्वर में कहा सुजाता ने।
‘उस स्वतंत्रता से क्या हो जायेगा? पुरुष यदि बाहर स्वतंत्र है, तो उससे क्या मिल रहा है उसे?’ नेहा का प्रतिरोध बस प्रश्न पूछने तक सीमित होता जा रहा है। 
‘क्या मिल रहा है? तुम्हारा पति तुम्हारे साथ कुछ नया करने की कोशिश नहीं करता होगा, क्यों ? क्योंकि वह नया सब बाहर ट्राय करता है। तुम्हारे पास वह बस ‘काम’ निपटाने के लिए आता है। कुछ सालों बाद सारे पति बस हफ़्ते-पन्द्रह दिन में देह के रजिस्टर पर हस्ताक्षर कर अपनी उपस्थिति दर्ज करने आते हैं। उनको तुम्हारे विस्फोट से कोई लेना-देना नहीं होता, वे तो अपना विस्फोट होते ही कौड़ियाले साँप की तरह सरक कर बिला जाते हैं। तुम्हारे साथ केवल ‘काम’ करने आया हुआ तुम्हारा पति, बाहर उस ‘काम’ में ‘कला’ भी जोड़ता होगा। सुनो नेहा, यह जो ‘काम’ है न, यह बिलकुल बेमानी होता है अगर इसमें कोई एडवेंचर न हो। तुम्हारी ज़िंदगी में भले ही अब एडवेंचर नहीं है, पर मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि तुम्हारे पति के जीवन में भरपूर एडवेंचर होगा।’ सुजाता ने नेहा के प्रश्न का उत्तर पूरी तरह से नेहा पर ही केंद्रित कर दिया। नेहा बात को अपनी तरफ़ मुड़ते देख एकदम कुछ नहीं कह पायी बस थोड़ा सिटपिटा कर रह गयी।
‘तुमने मुझसे एक सीधा प्रश्न किया था, अब मैं पूछती हूँ। क्या उस डायरी को पढ़ते हुए तुमको ऐसा नहीं लगा कि काश यह डायरी मेरी होती।’ सुजाता ने कुछ देर की चुप्पी के बाद पूछा। नेहा इस सीधे प्रश्न से एकदम सिटपिटा गयी, कुछ उत्तर नहीं दे पायी। 
‘मिल गया मुझे उत्तर। अब बस एक और प्रश्न का उत्तर दो, डायरी पढ़ते हुए तुम्हें अपने आस-पास की कुछ पुरुष देहयष्टियाँ याद नहीं आयीं?’ सुजाता ने नेहा को चुप देख कर प्रश्न किया। नेहा ने इस बार भी कोई उत्तर नहीं दिया।
‘अब आप विवाह में नहीं हो ?’ नेहा ने कुछ देर की चुप्पी के बाद प्रश्न किया।    
‘मैंने निकाल लिया अपने आपको उससे बाहर। बहुत दिनों तक सुनती रही कि मेरे साथ उत्तेजना के आकाश में उड़ते समय वह मेरे स्थान पर दूसरी ​स्त्रियों के नाम लेता है। बाद में पूछने पर मुकरने के स्थान पर बेशर्मी से भद्दी हँसी हँसता हुआ पूछता है-‘अच्छा मैंने यह नाम लिया था ?’, एक दिन मैंने कहा उससे- ‘सुनो तुम्हारे शरीर के पसीने की सड़े लहसुन-प्याज़ की तरह खट्टी बदबू, तुम्हारी साँसों से आती सड़ाँध और तुम्हारे कमर के नीचे गँधाता हुआ स्मेग्मा… यह सब मुझसे नहीं झेले जाते। मेरा मन करता है कि एक ज़ोरदार लात मार कर तुमको अपने ऊपर से ह​टा दूँ।’ बस मुझे लात मारने की ज़रूरत ही नहीं पड़ी, मेरी कही हुई बात ही उसके ईगो पर लात की तरह पड़ी। हज़ार तरह की बदबुओं से गँधाते हुए आ रहे हो और मुझसे उम्मीद रख रहे हो कि मैं फिर भी सहयोगी भूमिका निभाती रहूँ। मैं केवल एक शरीर नहीं हूँ तुम्हारी तरह। जब तुम दूसरी ​स्त्रियों के पास जा सकते हो, तो मेरे पास भी विकल्प खुला हुआ है।’ सुजाता ने नेहा की बात का कुछ सधे हुए स्वर में उत्तर दिया। सुजाता के उत्तर ने नेहा को असहज कर दिया, वह कुछ और पूछने का साहस नहीं कर पा रही।
‘तुमने अपने अंदर के विस्फोट का सुख अंतिम बार कब प्राप्त किया था नेहा ?’ सुजाता ने कुछ गंभीरता से प्रश्न किया। नेहा एक बार फिर कोई उत्तर दिये बिना रह गयी। सुजाता जिस तरह के आक्रामक प्रश्न पूछ रही है, उनके उत्तर नहीं हैं नेहा के पास। 
‘एक फ़िल्म है, उसे ज़रूर देखना। नाम है- ‘गुड लक टू यू लियो ग्रांडे’। फ़िल्म में एक पचास-पचपन साल की नैन्सी नाम की महिला अपने तीस सालों के वैवाहिक जीवन से नहीं मिल पाये सुख की तलाश के लिए अपने पति की मृत्यु के बाद एक नौजवान सैक्स वर्कर लियो ग्रांडे को हायर करती है। नैन्सी बाक़ायदा एक लिस्ट लियो ग्रांडे को देती है कि उसे क्या-क्या चाहिए। उस लिस्ट में वह विस्फ़ोट भी शामिल रहता है, जिसकी बात उस डायरी में है, जो तुमने कल पढ़ी। जिसके बारे में बातें करना भी अपराध माना जाता है। नैन्सी तीस सालों से उस विस्फ़ोट के लिए मुंतज़िर थी। लियो ग्रांडे जो एक बीस-बाईस साल का नौजवान है, उसे वह सब कुछ प्रदान करता है, जो उसकी लिस्ट में शामिल है। वह नौजवान किसी कुशल खिलाड़ी की तरह नैन्सी की उस लिस्ट को पूरा कर देता है। मैं, तुम और हमारे जैसी लाखों नैन्सियाँ अपनी लिस्ट अपने मन में लिये-लिये ही मर जाती हैं। किसी लियो ग्रांडे से यह कहने का साहस नहीं कर पातीं कि मेरी इस लिस्ट में वांछित वस्तुएँ मुझे प्रदान कर दो।’ सुजाता ने गंभीर स्वर में कहा।  
‘लिस्ट बस ​स्त्रियों की ही होती है, पुरुषों की कोई लिस्ट नहीं होती ? जैसा हम सोचते हैं, वैसा ही वे भी तो सोचते होंगे।’ नेहा ने सुजाता के चुप होते ही प्रश्न किया। 
‘पुरुष की कोई लिस्ट नहीं होती, क्योंकि वह तो किसी इच्छा को लिस्ट में आने का अवसर ही नहीं देता, पहले ही पूरी कर लेता है। तुम्हारे पति की कोई लिस्ट नहीं होगी, तुम ही अपने अंदर इसी तरह की एक लिस्ट लिये हुए कब से घूम रही हो। यहाँ एकपतिव्रत लिए होटल में रुक रही हो, इतना साहस नहीं कर पा रहीं कि जिस ड्रायवर के साथ खजुराहो के मंदिर जा रही हो, उसे अपनी लिस्ट देकर रात को अपने सुईट में बुला सको। तुम्हें करना चाहिए यह साहस। अब भी यह साहस नहीं करोगी, तो यह लिस्ट एक दिन बाक़ियों की तरह तुमको भी मनोरोगी बना देगी। और एक दिन मनोरोगी बन कर किसी मनोचिकित्सक के पास पहुँच जाओगी। उसके बाद का जीवन लाल-पीली दवाइयाँ खाते हुए बिताओगी। दवाइयाँ, जो बस तुम्हारे दिमाग़ के सोचने-समझने की ताक़त को कम करती रहेंगी, ताकि तुम्हारे अंदर इच्छाओं के साँप अपने फन नहीं उठाएँ। जाने कितनी स्त्रियाँ इस लिस्ट को अपने मन पर ढोते हुए मनोरोगी हो चुकी हैं, तुम भी कल शामिल हो जाओगी। एक बात याद रखना- हर मनोरोगी स्त्री के मन के रोग का कारण देह होती है।’ इस बार सुजाता का स्वर थोड़ा मुलायम हो चुका है।
‘आप मुझे डरा रही हैं ?’ नेहा ने इस बार थोड़े मज़बूत स्वर में पूछा। 
‘नहीं नेहा, डरा नहीं रही, सावधान कर रही हूँ। कभी किसी मनोचिकित्सक के क्लीनिक में जाकर देखना, वहाँ बैठे हुए दस मरीज़ों में से नौ मरीज़ महिलाएँ होंगी। हम स्त्रियों के अंदर भी एक मारियाना ट्रेंच है… मारियाना ट्रेंच जानती हो न?’ कहते हुए सुजाता रुक कर नेहा की तरफ़ देखने लगी, नेहा ने नहीं में सिर हिलाया तो सुजाता ने आगे कहा ‘मारियाना ट्रेंच पृथ्वी का सबसे गहरा स्थान है। यह प्रशांत महासागर में स्थित एक खाई है, जिसकी गहराई ग्यारह हज़ार मीटर है, एवरेस्ट से भी लगभग दो हज़ार मीटर अधिक गहरी। यह दो हज़ार मीटर का अंतर स्त्री और पुरुष के बीच हमेशा बना रहता है। पुरुष कभी मारियाना ट्रेंच की गहराई की थाह नहीं पा सकता। मारियाना ट्रेंच का गहरा और ठंडा अँधेरा हमेशा मुं​तज़िर बना रहेगा। हमें ही किसी लियो ग्रांडे को हाथ पकड़ कर ले जाना होगा उस अँधेरे में।’ सुजाता ने बहुत प्यार के साथ गहरे स्वर में उत्तर दिया।  
‘आपने अपना लियो ग्रांडे तलाश लिया ? मेरा मतलब है आपको वह सब मिल गया, जो आपके हिसाब से हर स्त्री को मिलना चाहिए?’ कुछ देर की चुप्पी के बाद नेहा ने प्रश्न किया।
‘यह बस एक चांस की बात है नेहा। चांस, कि आपको मिलने वाला अच्छे से जानता हो इस खेल को डिकोड करना। दुनिया का हर पुरुष सोचता है कि स्त्री देह के बारे में उससे ज़्यादा कोई नहीं जानता। दुनिया का हर पुरुष इस खेल का सबसे माहिर खिलाड़ी होने का दंभ लेकर जीता है। लेकिन हक़ीक़त यह है कि एक हज़ार में कोई एक पुरुष इस खेल को ठीक-ठाक खेलना जानता है और दस हज़ार में कोई एक ही इस खेल का एक्सपर्ट होता है, लियो ग्रांडे होता है। चांस की बात है कि वही लियो ग्रांडे आपको मिल जाये। कितनी स्पर्शातुर ख़लाएँ स्त्री देह में कहाँ-कहाँ छुपी हैं, इन पुरुषों को पूरा जीवन पता नहीं चलता। हम ​स्त्रियाँ सारा जीवन साहिर की उस पंक्ति के सहारे काट देती हैं-‘जो मिल गया उसी को मुक़द्दर समझ लिया’। कितने पुरुष जानते हैं कि ‘पूर्व-प्रणय’ स्त्री देह को उस सम पर ले आता है, जहाँ से वह यह आनंद यात्रा प्रारंभ करती है। पुरुष बस प्रणय चाहता है जबकि स्त्री प्रणय और पूर्व-प्रणय दोनों चाहती है। पता है क्यों ? क्योंकि स्त्री पुरुष की तरह नहीं है कि शरीर के एक ख़ास हिस्से की स्वीकृति मिली और प्रणय प्रारंभ। पुरुष के लिए प्रणय बस एक अंग विशेष तक सीमित रहता है, जबकि स्त्री की पूरी देह इसमें पूरी सक्रियता से भाग लेती है। भाग लेने से पहले देह नींद तोड़ कर जागना चाहती है, उसी कारण वह पूर्व-प्रणय की माँग करती है। जैसे किसी सितार को पहले तैयार करना होता है, ताकि सारे तार सुर में आ जायें। पुरुष केवल एक अंग के स्पर्श तंतुओं के आनंद के लिए शामिल होता है, जबकि स्त्री अपनी पूरी देह के स्पर्श तंतुओं के साथ श्रवण, घ्राण, चक्षु और रसना इन्द्रियों को भी साथ लेकर शामिल होती है।’ सुजाता ने बहुत ठहरे हुए स्वर में उत्तर दिया।
‘इतनी लम्बी बात में मेरे प्रश्न का उत्तर कहाँ है, मैं समझ नहीं पायी। मैंने आपने पूछा था आपने अपना लियो ग्रांडे तलाश लिया?’ नेहा ने कुछ मुस्कुराते हुए कहा। 
‘हाँ… तलाश लिया। ऐसा कह सकती हूँ मैं।’ सुजाता ने भी मुस्कुरा कर उत्तर दिया। नेहा बस मुस्कुरा कर रह गयी। 
‘और यहीं तलाशा।’ सुजाता ने कहा।
‘यहीं…?’ नेहा ने पूछा।
‘यहीं और यही, यही जो तुमको होटल की कार में घुमा रहा है, यही मेरा लियो ग्रांडे है।’ नेहा को चुप देख कर सुजाता ने उत्तर दिया।
‘मियाँ…? यह ड्रायवर…? लेकिन आप तो कह रही थीं मुझे उसके साथ…’ नेहा ने अपनी बात को बीच में ही छोड़ दिया।
‘तो क्या हुआ…? लियो ग्रांडे पर सबका अधिकार होना चाहिए… उन सबका, जो अपनी अधूरी लिस्ट लिये हुए घूम रही हैं। दुनिया में लियो ग्रांडे हैं ही कितने… मैं तो अभी भी कह रही हूँ कि तुम उसको… तुम्हारा खजुराहो-विस्फोट उसी के पास है।’ सुजाता ने बात को बीच-बीच में छोड़ कर कहा। नेहा ने कुछ नहीं कहा, बस उलझन भरा चेहरा लिये बैठी रही।
‘चलो अब सोते हैं, बहुत रात हो गयी, मुझे सुबह जल्दी निकलना है।’ सुजाता ने उठ कर कहा। 
‘कल लंच लें साथ में ?’ नेहा ने भी उठते हुए कहा। 
‘नहीं रे… कल तो मैं किलिंजर जा रही हूँ कुछ रिसर्च के लिए। आते हुए रात हो जायेगी मुझे। कल मैं वापस आऊँगी, तब तक तो तुम जा चुकी होगी, अच्छा… अपना ध्यान रखना। याद रखना कि ख़ुशियाँ तुमसे बस एक कॉल की दूरी पर हैं। गॉड ब्लेस यू… अच्छा शुभरात्रि।’ मुस्कुरा कर इतना कह कर सुजाता पलटी और अंदर चली गयी। नेहा कुछ देर उस तरफ़ देखती रही, फिर वह भी पलट कर कमरे की तरफ़ बढ़ गयी। 
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मियाँ ने नेहा का सामान दो लोगों के लिए बने प्रथम श्रेणी कूपे में सीट के नीचे व्यवस्थित कर दिया, तो नेहा बर्थ पर बैठ गयी। नेहा के बैठते ही मियाँ ने अपने साइड बैग से कुछ काग़ज़ और एक पैकेट निकाल लिया। 
‘मैडम ये मेरी और मैनेजर हम दोनों की एप्लीकेशन है। अगर आपकी कम्पनी इस होटल को ख़रीद लेती है, तो प्लीज़ हमें रख लीजिएगा।’ कुछ अनुनय भरे स्वर में मियाँ ने कुछ काग़ज़ और पैकेट को नेहा की तरफ़ बढ़ाते हुए कहा। नेहा ने काग़ज़ ले लिए।
‘ठीक है, मैं पूरी कोशिश करूँगी। और यह पैकेट क्या है?’ नेहा ने पैकेट को देखते हुए पूछा।
‘जी यह आपके लिए हवेली होटल की तरफ़ से है।’ मियाँ ने कुछ अटकते हुए उत्तर दिया। नेहा ने उस पैकेट को लेकर बर्थ पर रख लिया और पर्स से निकाल कर पाँच सौ रुपये के दो नोट मियाँ की तरफ़ बढ़ा दिये। 
‘अरे नहीं मैडम… इसकी कोई ज़रूरत नहीं है।’ मियाँ ने विरोध करते हुए कहा। 
‘नहीं, रखो चुपचाप, ये मेरा ऑर्डर है, मैं तुम्हारी नयी बॉस होने वाली हूँ समझे।’ नेहा ने प्रेम से डपट कर कहा, तो मियाँ ने सकुचाते हुए पैसे ​ले लिये। 
इतने में एक और महिला भी कूपे में आ गयी। उसके साथ कोई नहीं है, इसलिए मियाँ ने उस महिला का सामान भी सीट के नीचे व्यवस्थित कर दिया। ट्रेन यहाँ पाँच मिनट रुकती है, इसलिए जल्दी नहीं है। नेहा की नीचे की बर्थ है। वह महिला जिसकी ऊपर की बर्थ है, वह खिड़की के पास बैठ गयी।
‘अच्छा चलो अब उतर जाओ, ट्रेन चलने वाली है।’ नेहा के कहते ही मियाँ अदब के साथ नेहा को अभिवादन कर कूपे से बाहर जाने को मुड़ा। मियाँ के मुड़ते ही नेहा मुस्कुराते हुए धीमे स्वर में अपने आप से ही बोली ‘गुड लक टू यू लियो ग्रांडे’। सुन कर बाहर जाते मियाँ ने कूपे के दरवाज़े से पीछे मुड़ कर देखा। नेहा की नज़रें उससे टकरायीं। नेहा ने देखा मियाँ के चेहरे पर एक रहस्मय मुस्कुराहट है। उसने एक-दो पल नेहा को उसी मुस्कुराहट के साथ देखा और फिर दरवाज़े से बाहर चला गया। 
मियाँ के जाने के बाद नेहा ने मुस्कुरा कर बर्थ की दूसरी तरफ़ बैठी महिला को देखा। महिला ने भी मुस्कुरा कर उत्तर दिया। 
‘अभी आपको आराम तो नहीं करना है न? मैं बैठी रहूँ कुछ देर यहाँ?’ महिला ने प्रश्न किया। 
‘अरे बिलकुल बैठे रहिए, मैं इतनी जल्दी नहीं सोती हूँ। और अभी तो शाम भी नहीं हुई है। बस एक काम कीजिए खिड़की का परदा खोल दीजिए पूरा।’ नेहा ने विनम्रता के साथ कहा। 
नेहा द्वारा उत्तर देते ही उस महिला ने घूम कर खिड़की का परदा पूरा खोल दिया। बाहर का उजाला अंदर कूपे में फैल गया। महिला खिड़की के पास पीठ टिका कर नेहा की तरफ़ मुँह कर के बैठ गयी। 
‘आप खजुराहो घूमने आयी थीं।’ उस महिला ने प्रश्न किया। 
‘अरे नहीं, असल में मेरी कम्पनी यहाँ की होटल ‘हवेली’ को ख़रीदना चाहती है, उसका ही सर्वे करने आयी थी मैं।’ नेहा ने उत्तर दिया। 
‘होटल हवेली…?’ उस महिला के चेहरे के भाव कुछ देर को बदले, फिर कुछ सँभलते हुए उसने कहा ‘हाँ, बेच ही देना चाहिए उनको अब उसे।’
‘क्यों…?’ नेहा को महिला के चेहरे के बदले हुए भाव तथा उसकी बात से कुछ अचरज हुआ, तो उसने प्रश्न किया। 
महिला नेहा का प्रश्न सुन कर कुछ देर को चुप रही, फिर जैसे अपने आप से ही बात करते हुए बोली ‘हवेली से पीछा छुड़ाने के लिए।’ महिला के स्वर में कुछ आक्रोश घुला हुआ है। ट्रेन स्टेशन को छोड़ कर धीरे-धीरे गति पकड़ रही है।
‘पीछा छुड़ाने के लिए…?’ नेहा ने संक्षिप्त सा प्रश्न किया। 
‘हवेली मालिक वीरेन्द्र सिंह की पत्नी सुनंदा सिंह बहुत सुंदर थी। बहुत अच्छी चित्रकार थी, बहुत अच्छा गाती थी। वीरेन्द्र ​सिंह की अपनी व्यस्तताएँ थीं, सुनंदा अपना समय खजुराहो और आस-पास के ऐतिहासिक स्थानों को घूम कर, चित्रकारी कर बिताती थी। बहुत सलीक़े से रहती थी, बहुत ग्रेसफुल महिला थी।’ कहते हुए वह महिला रुक गयी। 
‘फिर…?’ नेहा ने उत्सुकता के साथ पूछा। 
‘वीरेन्द्र सिंह अपने व्यापार के चक्कर में अक्सर बाहर ही रहते थे। एक बार जब वे कहीं बाहर थे, उसी समय सुनंदा अचानक रहस्यमय तरीक़े से ग़ायब हो गयी। फिर उसके बाद कुछ नहीं पता चल पाया कि वह कहाँ गयी। कुछ कहते हैं कि ज़िंदा है, कुछ कहते हैं कि मर गयी।’ कहते हुए महिला कुछ देर के लिए रुकी। 
‘वीरेन्द्र सिंह फिर यहाँ नहीं रहे, हवेली को होटल में बदल कर दिल्ली चले गये यहाँ से। अब इसे बेच देना चाहते हैं… सुना है विदेश चले जाना चाह​ते हैं।’ महिला का स्वर कुछ आक्रोश में भर गया। 
‘आप इतना कैसे जानती हैं ? मुझे तो इस बारे में कोई जानकारी नहीं, जबकि मेरी कम्पनी तो इस हवेली को ख़रीदने जा रही है।’ नेहा कुछ हैरानी के साथ कहा। 
‘मैं…? सुनंदा और मैं एक ही कालेज में थे। मैं तो अब भी हूँ, सुनंदा नहीं है। मैं हिन्दी पढ़ाती हूँ, वह इतिहास पढ़ाती थी। कविताएँ, शेरो-शायरी पढ़ने की भी बहुत शौकीन थी वह। बहुत अच्छी थी वह, एकदम ज़िंदगी से भरी हुई। मैं विश्वास नहीं कर सकती कि वह यूँ ही अचानक ग़ायब हो जायेगी।’ कहते हुए वह महिला कुछ देर को रुक गयी। 
‘और आपको तो वही पता होगा न, जो दुनिया को पता है। लेकिन मुझे वह बातें पता हैं, जो किसी को नहीं पता। सुनंदा अपने बहुत सारे सच शेयर करती थी मेरे साथ। वह मुझसे कहती थी- एक बात याद रखना- हर मनोरोगी स्त्री के मन के रोग का कारण देह होती है।’ कुछ उदास स्वर में अपने आप से ही बुदबुदाते हुए कहा उस महिला ने। महिला द्वारा कहे गये अंतिम वाक्य ने नेहा को एकदम चौंका दिया।
‘यह जो आपको अभी छोड़ कर गया, यह हवेली का ही ड्रायवर है न ? क्या नाम है इसका ?’ महिला ने कुछ देर की चुप्पी के बाद प्रश्न किया।
‘पता नहीं, मैं तो बस मियाँ कह कर ही बुलाती रही, असली नाम पूछा ही नहीं।’ नेहा ने उत्तर दिया। 
‘इसका नाम क़मर हसन है, सुनंदा शायद इसी के प्रेम में पड़ गयी थी। और शायद इसी कारण वह…’ महिला ने मानों अपने आप से ही बुदबुदाते हुए कहा।
महिला द्वारा कही बात पर नेहा ने चौंक कर अपने हाथ में पकड़े हुए काग़ज़ों को खोल कर देखा। पहली एप्लीकेशन के नीचे हस्ताक्षर हैं और नीचे अंग्रेज़ी में नाम लिखा है- क़मर हसन। नाम में क़मर का पहला अक्षर ‘क्यू’ और हसन का पहला अक्षर ‘एच’ कैपिटल करके लिखे गये हैं। हैरत में डूबी नेहा ने दूसरा काग़ज को देखा। दूसरी एप्लीकेशन के नीचे की तरफ़ हस्ताक्षर के नीचे अंग्रेज़ी में नाम लिखा है- देवेन्द्र सिंह। नाम में देवेन्द्र का पहला अक्षर ‘डी’ और सिंह का पहला अक्षर ‘एस’ कैपिटल करके लिखे गये हैं। नेहा ने बर्थ पर रखे हुए पैकेट को खोला, तो उसमें वही डायरी है, जो ‘हवेली होटल’ के उसके कमरे के बुक-शैल्फ में थी। कूपे की खिड़की में से नेहा ने देखा ​कि ‘हवेली होटल’ के पास से होकर ट्रेन गुज़र रही है। खिड़की से दिखायी दे रहे हवेली के झरोखों में से एक झरोखे से गहरा हरा आँचल हवा में लहरा रहा है, जैसे मारियाना ट्रेंच के गहरे, ठंडे अँधेरे में हुए किसी विस्फ़ोट से एक गहरा, हरा आँचल किसी परचम की तरह ऊपर उठ रहा है। 
पंकज सुबीर  
उपन्यास- ये वो सहर तो नहीं, अकाल में उत्सव, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था, रूदादे-सफ़र। कहानी संग्रह- ईस्ट इंडिया कम्पनी, महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ, कसाब.गांधी एट यरवदा.इन, चौपड़े की चुड़ैलें, अभी तुम इश्क़ में हो, होली, प्रेम, रिश्ते, हमेशा देर कर देता हूँ मैं। ग़ज़ल संग्रह – अभी तुम इश्क़ में हो, यही तो इश्क़ है। व्यंग्य संग्रह – बुद्धिजीवी सम्मेलन संपादन- नई सदी का कथा समय, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट, विमर्श दृष्टि, बारह चर्चित कहानियाँ।
सम्मान – राजेन्द्र यादव हंस कथा सम्मान, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, स्व. जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, शैलेश मटियानी चित्रा कुमार पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, आचार्य निरंजन नाथ सम्मान, स्पेनिन डॉ. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, शांति गया शिखर सम्मान, व्यंग्य यात्रा सम्मान, सृजन कुंज सम्मान, पूश्किन सम्मान, दुष्यंत संग्रहालय कमलेश्वर सम्मान, शिक्षाविद् पृथ्वीनाथ भान सम्मान। 
संपादक : विभोम स्वर, संपादक : शिवना साहित्यिकी 
पंकज सुबीर, पी.सी. लैब, शॉप नं. 3-4-5-6, सम्राट कॉम्प्लेक्स बेसमेण्ट, बस स्टैण्ड के सामने, सीहोर, मध्य प्रदेश 466001, मोबाइल : 09977855399, दूरभाष : 07562-405545, ई मेल : subeerin@gmail.com

1 टिप्पणी

  1. आपने एक ऐसा मुद्दा उठाया है जो बहुत हद तक सही लगा। लेकिन यही एक मुद्दा है सभी मनोरोग का, ऐसा भी नहीं।
    आप बेहद मजे हुए रचनाकार हैं, कुछ कहना हिमाकत होगी लेकिन आपकी कहनी कन्वर्जन रिएक्शन के ज़माने से पीछे चल कर हिस्टीरिया युग में पहुँच गयी है।

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