साड़ी का पल्लू सही कर सुष्मिता ने ,आँखों में काजल लगाया और दो पल के लिए खुद को देखती रही।आईने पर पहले से चिपकी मैचिंग बिंदी को उतार कर माथे पर लगाया और पर्स उठाकर हॉल में आ गई जहाँ जयंत सोफ़े पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था।
“चलें अब या कोई कसर बाकी है ?”जयंत ने टेबल पर फैलाये हुए अपने पाँव नीचे किये और जूते पहन कर पूछा।
“नहीं  ! चलो अब । “सुष्मिता ने आहिस्ता से कहा और मुख्य दरवाजे की  चाबी उठा ली। ताला लगा कर जैसे ही गाड़ी में बैठने लगी जयंत ने टोका।
“ड्राइवर नहीं हूँ तुम्हारा जो तुम महारानियों की तरह पीछे बैठने चली हो।”
“ड्राइवर नहीं चलेगा क्या आज …?”सुष्मिता ने जयंत की बात सुन पूछा। अक़्सर जयंत  ड्राइवर के साथ आगे ही बैठता था इसलिए वह ख़ुद आदतन ही गाड़ी की पिछली सीट पर बैठने लगी थी ।
“तुम्हें ड्राइवर के साथ जाना है तो तुम उसके साथ जा सकती हो।मैं अलग से चला जाऊँगा।”चिढ़ कर जयंत ने कहा।
“अब …मुझे कहाँ मालूम था कि आज गाड़ी ड्राइवर नहीं तुम चलाओगे। कभी तो आराम से जवाब दे दिया करो।” सुष्मिता हमेशा बहस से बचने का प्रयास करती लेकिन जयंत की कोई न कोई बात उसे जवाब देने को उकसा ही देती।
“मैं तो आराम से ही करता हूँ बात ,तुम्हें आदत हो गई है मेरी हर बात में कमी निकालने की ।”
“अच्छा …? प्यार से भी कह सकते थे न कि मैं आगे तुम्हारे संग बैठ जाऊँ।”
“अब कोई जवान प्रेमी प्रेमिका नहीं रहे हम कि प्यार मुहब्बत का इज़हार करते फिरें।”जयंत ने उखड़े स्वर में कहा।
“इज़हार ..मुहब्बत ..! तुमसे अब उम्मीद भी नहीं बस मुझसे ही बात करते वक़्त जो तुम्हारा लहज़ा बदल जाता है न उसे सही करने को कहा है।इससे ज़्यादा की उम्मीद भी नहीं रखती।”
“अब मैं तो ऐसा ही हूँ और ऐसा ही रहूँगा भई। उम्मीद रखना भी मत ।”गाड़ी को स्टार्ट करते हुए जयंत ने कहा।
 “तुम पहले तो ऐसे नहीं थे ..!”कहकर सुष्मिता  खिड़की से दूसरी तरफ देखने लगी।
“तुम भी कहाँ पहले जैसी …!”बात को अधूरी छोड़ जयंत ने एफ एम चला दिया ।
 ” मैं बात व्यवहार की कर रही हूँ और तुम बात बस घूमा फ़िरा कर वहीं ले आते हो । ख़ैर तुमसे कुछ कहना ही …।”
“फ़िज़ूल है … !” अगला शब्द दिल से जूबां तक आने ही नहीं दिया ।जबकि जयंत की आदत थी की अपने दिल की बात को तो कह देना और फिर कभी अधूरी छोड़ ख़ुद  फ़ोन पर बात करने लग जाना या गाड़ी में बैठे हुए रेडियो चला देना ताकि उसे सुष्मिता के सवालों के जवाब न देने पड़े। इस सब से सुष्मिता चिढ़ती कुढ़ती रहती थी , यह जानते  हुए भी कि जयंत जैसे कुछ पुरुष जो केवल अपनी  बात कहने और मनवाने के आदी होते हैं।सुनने की उनके पास गुंजाइश ही नहीं होती।
बुरे वक्त को तो अच्छे की उम्मीद में झेल लिया जाता है लेकिन बुरे या गलत व्यवहार  के सही होने की उम्मीद में उम्र बीत जाती है।  इंसान किसी अपने को आसानी से बदल नहीं पाता ।सुष्मिता कई बार जयंत को समझाती और हर बार उम्मीद करती कि अब जयंत में बदलाव आएगा लेकिन जब गुस्से और अहंकार से भरे जयंत को फिर उसी रूप में देखती तो माँ की कही बात याद आ जाती कि ” कोई भी इंसान खुद को बदल सकता है ,सामने वाले को नहीं ।” एक ठंडी साँस ले सोचती हुई बस मन मसोस कर रह जाती। फिर कहीं पढ़ा एक वाक्या याद आ जाता कि ” कभी बातों से बात बिगड़ भी जाती है..कभी ख़ामोशी रिश्ता संभाल लेती है ..!” ऐसे सुविचार समाचार पत्रों , धार्मिक किताबों  ,टी वी में पढ़ सुनकर धीरे धीरे उसने रिश्ते को संभालने की खातिर जयंत को  बदलने की कोशिश ही बंद कर दी और खुद को जयंत के हिसाब से ढाल लिया।जयंत का गुस्सा अगर उसका शस्त्र था तो सुष्मिता ने खामोशी को अपना कवच बना लिया था। आज भी वही खामोशी दोनों के बीच फिर पसरी थी ।बस गीतों की आवाज़ थी दोनों के मध्य जो बेवजह सी थी।
“पल्लू ठीक रखना …!” गंतव्य स्थान पर पहुंच कर जयंत ने वही चिर परिचित कटाक्षपूर्ण वाक्य कहा।
“जानती हूँ… बार बार मत कहा करो।”जयंत की बात सुन छलनी मन से पल्लू को ठीक कर लिया।
“अरे भई.. लोग उल जुलूल बातें न करें इसलिए सावधान करता हूँ बाकी तुम्हें खुद ही प्रदर्शन करने का शौक है तो मैं क्या कहूँ !”
“प्रदर्शन का शौक  मुझे नहीं तुम्हें है ..एक सच को छुपाने या फिर बनावटी झूठ दिखाने का !”
इतना सुन बात बदलने की खातिर जयंत ने “नाउ चिल यार “कहा और हाथों में हाथ डाल लिया।पार्टी हॉल आ गया था सो चेहरे पर ज़बरन मुस्कान बिखेरे जयंत का हाथ थामे सुष्मिता पार्टी हॉल में पहुँची जहाँ जयंत के बिज़नेस पार्टनर ने अपनी शादी की सालगिरह में पार्टी रखी थी।
“आइये आइये भाभी जी ..! कैसी हैं आप ?”जयंत के पार्टनर अखिलेश ने दोनों का स्वागत करते हुए कहा।
“जी बढिया ..आप कैसे हैं ?”सुष्मिता भी शिष्टाचार निभाने की खातिर मुस्कुराकर जवाब देती।उसकी मुस्कराहट से भरे इस जवाब से अक्सर जयंत चिढ़ जाता लेकिन महफ़िल में अपनी साख जमाने की उसकी इच्छा उसे कुछ भी कहने से रोक लेती।उस पर शराब पीकर वो ऐसे बर्ताव करता ,ऐसा दिखावा करता कि सुष्मिता से वो सच्ची मुहब्बत करता है।गीतों पर थिरकना ,गुनगुनाना ,शायरी करने के शग़लों से सबकी वाहवाही करवाते हुए सुष्मिता के सामने जयंत की गर्व से फूली छाती होती तब उसके सम्मान को कायम रखने की ज़िम्मेदारी और भी बढ़ जाती सुष्मिता की। ज़बरन मुस्कान बिखेरते हुए एक तरफ बैठ जाती ।
“सुष्मिता जी ..आई मस्ट से देट यू आर सो लकी ! सो लविंग एंड केयरिंग हस्बैंड जयंत इज़ !”अखिलेश की पत्नी हाथ में वाइन का ग्लास थामे हर बार यही कहती ।
“बाय द वे ..ऐसी कंडीशन में भी आप सुंदर दिखती हैं सुष्मिता जी ।”
तारीफ के साथ इस अगले जुमले से सुष्मिता के तन बदन में आग लग जाती।अपनी पत्नी की बात का समर्थन करते हुए अखिलेश भी आ खड़ा होता ।
“यस ..भाभी ..! सही कह रही है रुचि।”
ऐसी कंडीशन ,वैसी कंडीशन ..शब्द सुन सुनकर पक गई सुष्मिता। उसका मन करता या तो  उसी पल वहाँ से भाग जाए  या चिल्ला चिल्ला कर सबको जवाब दे। और नहीं तो एक बार वो भी शराब पीकर अपने मन का गुबार निकाल ले ।कह दे सब दर्द सब दुख ,खोल दे अपने पति की असलियत की परतें जिसके नीचे उसका और जयंत का रिश्ता बोझिल सा पड़ा था।बता दे उस अखिलेश ,उसकी पत्नी को कि जिस जयंत और सुष्मिता को सबने आदर्श जोड़ी का खिताब दिया हुआ दरअसल वो दुनिया की सबसे वाहियात जोड़ी है।वो जयंत..वो जयंत जो महिलाओं का चहेता बना घूमता है और उनके दुख दर्द को सुनता है वो जयंत अपनी पत्नी के दुख को कितना समझता है यह कोई उससे पूछे। वो जयंत अपनी पत्नी का तो आंशिक भी चहेता नहीं बल्कि दुश्मन है ! खूबसूरत औरतों के बदन  का कद्रदान… एक ऐसा इंसान जो अपनी बीवी के बदन के तमाम हिस्सों में से केवल बदसूरती ही ढूँढ पाता है और उसके साथ अंतरंग क्षणों में अपनी पत्नी के समक्ष और औरतों के नाम लेकर अपनी फेंटेसी को जीता है बिना जाने कि उस औरत जो उसको अपनी पत्नी है ,उसके दिल पर क्या गुज़रती होगी और ..और !”
लेकिन सुष्मिता कुछ न कह पाती ।हर बार उसके विरोध का स्वर उसके भीतर ही घुट कर रह जाता।किससे कहती ,क्या कहती ..ऐसी बातें जिन्हें उसे सोचते हुए भी शर्म आ जाती वे बातें वो कैसे किसी को बताती।कभी सोचती कि काश ! यह होश खो देने का बहाना उसे भी मिल जाए अपने मन की भड़ास निकालने के लिए। फिर अगले दिन वो भी अपना बचाव करके के लिए जयंत की ही तरह कह देगी “नशे में थी न ! होश ही नहीं रहा और सॉरी डार्लिंग कहकर बात खत्म कर देगी।”
लेकिन अगले ही पल कुछ सोचकर फिर से अपनी सहनशीलता का मुखौटा ओढ़ लेती कि जयंत के साथ साथ अपमानित होने का दंश तो उसे भी झेलना पड़ेगा।
कशमकश से घिरी सुष्मिता को याद आया कि मिसेज चोपड़ा ने भी तो अपने पति की शराब पीकर पिटने का दर्द सब से साँझा किया था।लेकिन हुआ क्या ..? हालात न तो बदले उनके अलबत्ता बात खुलने से अपमान से गुस्साए चोपड़ा साब का हाथ और खुल गया और साथ में लोगों का मुँह भी जिससे मिसेज चोपड़ा का लोगों में उठना बैठना मुश्किल हो गया।कुछ दिन खुद को दुख ,अपमान और अकेलेपन को झेलते आखिर मिसेज चोपड़ा घर छोड़कर चली गईं।
अपने मन के अंतर्द्वंद से लड़ती ,जूझती  जितनी बार भी जयंत के विरुद्ध कोई कदम उठाने का सोचती ,मिसेज चोपड़ा का दर्द उसकी रगो में  डर बनकर बहने लगता।
ज़िन्दगी का एक पक्ष अंधेरे से ज़र्द था तो दूसरे पक्ष को उसने खुद उजला स्वीकार कर लिया था कि अपने बच्चों को उसने होस्टल भेज दिया था।यही सुकून था कि बच्चे न तो उसके रिश्ते की भयावता को देख पाएँगे न ही जयंत के इस स्वभाव का असर उन पर होगा। एक एहसास था कि बच्चे उसके दिल के करीब थे इसलिए जयंत की दी तकलीफों का लेखा जोखा कम लगता था।बस दुख अवसाद के क्षणों में बच्चों की आवाज़ उसका जीने का सहारा बन उसे उबार लेती।
“जब देखो बस खोई रहती हो ..यह नहीं कि पति की सेवा कर लो।नाईट सूट कहाँ है मेरा ?” पार्टी से लौट कर लड़खड़ाती आवाज़ में जयंत ने पूछा और फिर बिना कपड़े बदले ही बिस्तर पर लेट गया।
“अलमारी में ही तो है ..रुकिए देती हूँ ! कहते हुए उठ खड़ी हुई लेकिन जब तक  नाइट सूट निकाल कर दिया ,जयंत के खर्राटों की आवाज़ आने लगी थी।खुद भी अपने कपड़े बदले और जयंत को कम्बल ओढ़ा कर बाजू में लेट गई।
जयंत के बायीं तरफ सोते हुए ,बिस्तर के बीच पड़ा हुआ तकिया  आज उन दोनों के रिश्ते के बीच की दीवार बन चुका था।यही जयंत वास्तु शास्त्र की दलीलें दिया करता था कि पति पत्नी के पलँग का गद्दा एक ही होना चाहिए ,अलग अलग नहीं ।पति पत्नी का रिश्ता एक ही गद्दे से प्रगाढ़ होता है। दो हंसों का जोड़ा और न जाने क्या क्या कमरे में रख कर अपने रिश्ते के गहरे होने की मुहर लगा कर जताता था कि इन बातों में बहुत दम होता है।विश्वास उसे वास्तु की सारी दलीलों में था , बस अपने रिश्ते में ही नहीं था।
 बीतते वक़्त के साथ इन बाहरी आडम्बरों से निकलने की जल्दी भी जयंत को होने लगी थी क्यूँकि उसे लगने लगा था कि अब  उसका अपना रिश्ता उसकी मुट्ठी से खिसक रहा था।उसे डर लगने लगा कि कहीं कमरे में रखा हँसों का जोड़ा उसका मज़ाक उड़ा रहा है।इसलिए खुंदक में आकर एक  दिन हँसों के उस जोड़े को जाकर कचरे में डाल कर खुद ही हँसने लगा।।
“कुछ नहीं पड़ा सा..ला  इन बातों में।दिमाग खराब करके रखा था ।जब आपकी पत्नी ही ठंडी ,बोरिंग और खड़ूस हो तो ये साली मुहब्बत कहाँ से आएगी।”
सुष्मिता उसकी बातें सुन अपना काम करती रहती।दिल चाहता कि कह दे किसने कहा था इन चीज़ों का सहारा लेने के लिए ? पर कहे कौन ..जयंत से कहना यानी आ बैल मुझे मार।एक ही चार सुनाएगा और फिर वही घर में मौत सा सन्नाटा ! जो कहना है कहता रहे।यह उसकी अपनी ग़लती है कि  ठंडे पड़े रिश्ते से चिंगारी ढूंढ़ने की कोशिश कर रहा है।
घर की निस्तब्धता से घबराकर अकसर सुष्मिता का मन उखड़ने लगता ।कभी कभी मन चाहता कि कुछ समय के लिए कहीं दूर ऐसी जगह चली जाए जहाँ कोई उसे आवाज़ न दे सके न ही वो सुन सके । किसी साउंड प्रूफ जगह में खुद को छुपा ले ताकि सुनकर अनसुना करने के अपराध बोध से खुद को मुक्त भी रख सके।यहाँ इस घर में तो जयंत उसकी खामोशी  का भी चीर फाड़ करने की ज़द्दोज़हद में लगा रहता था।
ओह हाँ … !! चीर फाड़ से याद आया वो भयानक हादसा जब ज़िन्दगी ने उसके सपनों का ,उसके वज़ूद का ,रिश्ते का चीर फाड़ कर दिया था ,जब उसे अपने बदन के एक हिस्से को अलग करना पड़ा था।उसके बदन का वो हिस्सा जो आकर्षक था , उसे सम्पूर्णता प्रदान करता था।जयंत की नज़रें उससे हटती नहीं थीं और सुष्मिता जयंत की नज़रों से उसके प्रेम निवेदन का इशारा समझ मन ही मन इतरा उठती थी अपने नारीत्व पर और जयन्त की मुहब्ब्त पर।
लेकिन अचानक एक दिन जयंत को अपने प्रेम  से बाँध कर रखने वाली बदन की वह इकाई कैंसर से ग्रसित हो गई।सुष्मिता अवाक सुन्न सी खड़ी रह गई और जयंत रिपोर्ट्स को हाथ में पकड़े उलट पलट कर देखता रहा।आखिर सब डॉक्टरी परामर्श के बाद हटा दी गई क्योंकि इसके अलावा सुष्मिता की ज़िंदगी बचाने का कोई चारा नहीं था ।
जिस दिन  सुष्मिता अपने अहम हिस्से को अस्पताल के उस बिस्तर पर छोड़कर आई थी,  उसी दिन से शायद जयंत  की संवेदनाएं भी उसी बिस्तर पर कहीं छूट गईं थीं । जयंत का प्रेम कुछ समय के लिए हमदर्दी का चोला भी न पहन पाया कि पत्नी को दिलासा दे सके या उसे ऐसे नाज़ुक क्षणों में उसे सम्भाल सके और यह विश्वास दिला सके कि क्या हुआ जो शरीर का एक हिस्सा कम हो गया ,मेरा प्रेम तो कम नहीं हुआ ! कह देता कि मुझे तुम्हारे बदन से नहीं तुमसे प्यार है।लेकिन नहीं ..कुछ भी तो नहीं कहा जयंत ने ! बस उसकी मौन आंखों में एक ऐसा एहसास पाया कि सुष्मिता के उस अहम हिस्से के बिना उसकी भी कोई अहमियत नहीं ।
सुष्मिता  यह देख खुद को ही कोसने लगी कि काश ! अपनी जिंदगी का न सही अपनी मौत का निर्णय ही खुद कर लेती।  वह इलाज ही न  करवाती जो उसे खुद से या उसके पति से ही दूर कर रहा था। एक समय अवधि को इस केंसर के साथ ही जी लेती लेकिन टूटते बिखरते रिश्ते की दहशत में तो न जीती। खुशी खुशी इस बीमारी के साथ अलविदा कह देती लेकिन खुद को नफरत के साये में न रहने देती। यही सोचते सोचते सुबह से शाम हो जाती बस लेकिन सोच और आंसुओं का कोई अंत न होता।
इन सब दुश्वारियों के बीच कभी बच्चों से जब जब बात होती तो खुद को बेहद मजबूती से सम्भाल लेती । लेकिन कई बार  लगता कि जयंत की तरह बच्चे बेशक उससे नफरत तो न करते लेकिन क्या वह उनकी हमदर्दी या सहानुभूति झेल पाती? शायद नहीं …! फिर लगता बच्चे उसका अंश हैं और बच्चों को उसके अधूरेपन से क्या मतलब।उनके लिए तो वह एक माँ है बस।एक यही तो पाक पवित्र रिश्ता है माँ और बच्चों के बीच जहाँ दुनिया की कोई कमी या बुराई मायने नहीं रखती। फिर भी अच्छा है कि वो दूर हैं ।कम से कम अपने माता पिता के खोखले रिश्ते को देख तो नहीं पा रहे।यही दिलासा देकर खुद को इस अपने बच्चों के रिश्ते की छाँव में महफूज़ कर लेती।
वक़्त  एक हीलिंग का कार्य करता है तन का भी मन का भी ।सुष्मिता के बदन के घाव सूखने लगे थे पर मन के घाव बढ़ने लगे थे।जयंत कभी कभार नशा करके ही सुष्मिता के करीब आता और जैसे ही शराब और उससे उपजी शरीर की ज़रुरत का नशा उतरता तब सुष्मिता से दूर छिटक जाता मानो नशे में कोई  घोर पाप हुआ हो। सुष्मिता यह देख बार बार टूटती और आखिर एक दिन उसने जयंत को अपने करीब आने से मना कर दिया।
“देखो ..मैं तुम्हारा दिल नहीं तोड़ना चाहता लेकिन मैं शराब का सहारा न लूँ तो मुझे तुम्हारे अधूरेपन से डर लगने लगता है ।तुम समझ रही हो न मैं क्या कहना चाहता हूँ ?”पहली बार अपनी मर्दानगी का लहज़ा छोड़ झिझकते हुए उसने अपनी मजबूरी बताई और पास पड़ा शराब का गिलास एक ही घूँट में खाली कर दिया।
“हाँ ,अच्छी तरह से समझ रही हूँ  और यह डर है या नफरत मेरे शरीर से ही उपजी हुई है, सब समझती हूँ।लेकिन एक बात बताओ कि अगर यह तुम्हारा डर है तो करीब आने की आवश्यकता क्यों है? क्या मुझ पर कोई एहसान कर रहे हो ? खुद पर नहीं तो अपनी नफरत या डर पर ही नियंत्रण रख लिया होता।”
“देखो सुष्मिता ..बड़ी बड़ी बातें करना नहीं जानता।न मैं कोई महान इंसान हूँ कि तुम्हें दिलासा दूँ कि मुझे तुम्हारे बदन से नहीं तुमसे प्यार है ।दरअसल मैं तो यही समझ नही पा रहा कि मैं तुमसे हमदर्दी रखूँ या दूरी रखूँ ..? दोनों ही अवस्थाएँ मेरे लिए मुश्किल हैं।”
जयंत की बात सुन दुख और अपमान के आवेग में आंसुओं को अपने भीतर ज़ज़्ब करते हुए सुष्मिता ने दूसरे कमरे में जाकर कमरा अंदर से बंद कर लिया।
अगले दिन सुष्मिता उठी तब जयन्त आराम से टीवी देखते हुए चाय पी रहा था।उसकी इस सहजता को देख सुष्मिता ने भी तठस्थ भाव से अपने घर के कार्यों में व्यस्त कर लिया। दूरियाँ तो बढ़ने लगीं थी और आहिस्ता आहिस्ता दोनों अपनी दूरियों में सहज होने लगे थे।
  यूँ तो खुशियाँ ,दुख और ज़िन्दगी के उतार चढ़ाव सब क्षणभंगुर होते हैं ।सुष्मिता जिसे जयंत की सहजता समझ रही थी दरअसल जयंत की ज़िंदगी में किसी दूसरे रिश्ते की नींव पैदा कर रही थी। सुष्मिता इस नए परिवर्तन को देख बौखला गई।उसे लगा उसकी खामोशी और मजबूरी का जयंत ने भरपूर फायदा उठाया है।
“तुम ..ऐसा कैसे कर सकते हो जयंत ? हमारे रिश्तों की डोर ज़रा सी कमज़ोर क्या पड़ी तुम अनैतिकता  की राह पर चल पड़े ?कम से कम बड़े होते बच्चों का तो ख़्याल किया होता।”
“देखो , बच्चों का खयाल ही है जो मैं अपनी जरूरत के  लिए किसी कोठे पर नहीं गया और न ही किसी औरत को तुम्हारी सौत बनाकर लाया। तुम अच्छी तरह जानती हो कि हमारी एक दूसरे के प्रति शिकायतें अब हमें कभी करीब आने नहीं देंगी।तो जब मैंने तुम्हें तुम्हारे अधूरेपन के साथ स्वीकार कर लिया है तो तुम भी मेरा नया रिश्ता कहो या ज़रूरत के साधन को स्वीकार कर लो।समझदारी इसी में है ।हमारा परिवार भी नहीं बिखरेगा और हम अपनी अपनी ज़िंदगी में खुश भी रहेंगे। आगे तुम सोच लो तुम्हें क्या करना है।मेरे पास जो रास्ता था वो बता दिया है।”कहकर जयंत ने अपनी सिगरेट सुलगाई और धुंए के कश फेंकते हुए ,आदतुनसार पाँव सोफों के बीच पड़े टेबल पर पसार कर रख दिये।
“ये कौन सा रास्ता है …और यह कैसा स्वीकारना है रिश्ते का  ,परिस्थितियों का कि तुम उसका बोझ उठाने की बजाए मुझ पर ही इल्ज़ाम लगा कर खुद मुक्त होकर जीना चाहते हो?” सुष्मिता ने फिर से पूछा तो जयंत ने अपने कंधे उचका दिए।
” ठीक है फिर अकेले मैं क्यों अपने  इस रिश्ते का बोझ उठाती फिरूँ ? हम अलग भी तो हो सकते हैं न जब रिश्ते को आगे खींच नहीं सकते तो ?”
सुष्मिता ने उम्मीदों के तरकश में से एक तीर निकाल फेंका जो लौट कर उसी के पास आ गया और उसके वज़ूद को छलनी कर गया।
“किसने मना किया ? हो जाओ अलग।लेकिन बच्चों को मुझे बताना होगा सब सच सच …! बच्चे इतने भी नादान नहीं कि समझ न सकें अब।फ़िर मैं तो साफ और सच कहूंगा कि मेरे गलत कदम के लिए तुम्हारी माँ ही उत्तरदायी है।अगर तुम्हें मंज़ूर हो तो जाओ तालाक के पेपर बनवा लो।पर बच्चों को सच बताने के बाद।”
“तुम मेरी मजबूरी को कौन सा सच बनाकर  बच्चों के सामने पेश करना चाहते हो जयंत ?शर्म आनी चाहिए तुम्हें !”
“ऐसा है, मैं तो बेशर्म ही हूँ।दुनिया का हर रिश्ता ज़रुरतों से बंधा है।हमें एक दुकान से अपनी मर्ज़ी का सामान नहीं मिलता तो हम दूसरी दुकान पर जाते हैं और खरीद लेते हैं।सीधा सा फंडा है ज़िन्दगी का भी ज़रूरत का भी।”रिमोट से चैनल बदलते हुए जयंत ने कहा।
“अब देखो ,यहाँ तो अपना मनपसंद प्रोग्राम भी न देख पाएँ  तो हम चैनल बदल देते हैं।”
” ज़िन्दगी कोई चैनल नहीं जो पल पल बदलते रहोगे..! अच्छा ,मेरी एक बात का जवाब दो…जब तुम मेरे अधूरेपन का इतना घिनौना मज़ाक उड़ाते हो ..जब मेरे वज़ूद को नकार कर मेरे बदन के उस अधूरे हिस्से को नकली तरीकों से ढकने को कहते हो ,जब कहीं जाना हो तुम्हारे साथ तब मुझे आँचल को बार बार ढ़ंग से करने की हिदायत देते हो वो क्या है ?
 मुझे तो लगता है  कि तुम ऐसा जानबूझकर करते रहे न ताकि मैं अपने इस अपमान के घूँट पीकर या तो तुम्हारी इस घिनौनी मानसिकता को अपना लूँ  या फिर तुम्हारा विरोध करूँ ताकि तुम्हें एक अधूरी काया ..एक अपंग काया से निज़ात मिल जाये ।”
“समझदार हो ..सब जानती हो फिर इतनी बहस क्यों ?”जयंत ने पूछने के अन्दाज़ में हाथ घुमा दिया।
” ये बहस नहीं है जयंत ..! काफी समय से तुम्हारा अपने प्रति उखड़ा रवैय्या देखकर अंदर से टूट चुकी थी।नासमझ नहीं हूँ ..अंधेरे में भी तुम्हारे ठंडे स्पर्श और हाव भाव से तुम्हारी हमदर्दी तो नहीं तुम्हारी चिढ़ या नफरत समझने लगी हूँ।  अपने वज़ूद को पल पल तार होते नहीं देख सकती थी इसलिए तुम्हारी नफ़रत का विरोध किया था ,तुम्हारा नहीं। लेकिन तुम ठहरे मर्द ! आज तुम्हारे नए और नाज़ायज़ सम्बंधों की बात सुन तुम्हारी ही बात याद आ गई जो तुमने ही मर्दों की शान में कही थी।
“ऐसा क्या कहा था मैंने ..?”” दिमाग पर ज़ोर देते हुए जयंत ने पूछा।
 “जहाँ देखा चारा ,वहाँ मुँह मारा। दरअसल तुम्हें अब कहीं और चारा दिख गया है न !” गुस्से से मानो बिफर गई थी सुष्मिता ।
“अब तुम मज़ाक में कही गई बात को बीच में ले आई हो। ख़ैर जो सच है वो सच है। ईमानदारी से तुम्हें बतला दिया कि मैं तुम्हें तन की इस कमी से स्वीकार नहीं कर पा रहा तो प्रॉब्लम क्या है ? न तुम्हें घर से जाने को कहा ,न तलाक की माँग की।अपनी ज़िंदगी जीने के लिए एक राह इख़्तियार की है जो तुम मान नहीं रही।अब बक्शो मुझे और बताओ तुम क्या चाहती हो?” गुस्से से रिमोट पटक दिया जयंत ने।
“कल को अगर तुम्हारे साथ ऐसी कोई अनहोनी हो जाती तो ? तुम ही मेरे काबिल न रहते तो?”
“तो तुम भी अपनी मर्ज़ी का करने के लिए आज़ाद होती।”
“कहना आसान है जयंत ,अमल करना बहुत मुश्किल।”
“तुम मुझसे  मन से दुखी हो न, मेरे व्यवहार से ? तो जाओ मैं तुम्हें आज़ाद करता हूँ।जाओ जी लो अपनी ज़िंदगी।तुम्हारी तरह संकीर्ण विचारों वाला नहीं।”अपनी महानता का एक नया अध्याय दिखाने का प्रयास करते हुए जयंत ने कहा।
“हाँ !  ताकि अपनी आज़ादी को आराम से मना सको न।
” अब तुम्हें मेरी हर बात ही गलत लग रही है तो मैं क्या कर सकता हूँ।”
अपने कमरे की बत्ती बुझा कर सोने का उपक्रम करने लगा जयंत। सुष्मिता ने फिर से बत्ती जलाते हुए उसकी ओढ़ी हुई चद्दर फेंक दी।
“ऐसे कैसे सो सकते हो आराम से ? मेरी ज़िन्दगी में तूफ़ान खड़ा करके ?”
“देखो बकवास बंद करो अपनी वरना अभी के अभी किसी दोस्त के घर चला जाऊँगा।ज़िन्दगी तो मेरी जहन्नुम हुई है ।”
“मैं तुम्हें आज़ाद कर दूँगी लेकिन पहले आज तुम्हें अपने फैसले से अवगत करवा दूँ क्यूँकि अब पानी सर से ऊपर जा चुका है।”
   “कहो जो कहना है।तुम भी आज अपनी भड़ास निकाल ही लो ..! फिर मौका मिले न मिले ..!”उठकर बैठ कर जयन्त ने अपने गालों पर अपना हाथ रखते हुए मानो ध्यान से सुनने की मुद्रा बना ली।
“ये जो तुम अपनी ज़िंदगी जीने की आड़ में ,और बच्चों को सच बताने की दुहाई दे रहे हो न तो तुम्हें भी बता दूँ कि बच्चों की रगों में मेरा भी खून बह रहा है।अगर वो तुम्हारे सच को सुन सकते हैं तो मेरे सच को बर्दाश्त करने की हिम्मत भी रखते हैं।लेकिन तुम नहीं रख पाओगे इतनी हिम्मत। जैसे तुमने अपनी ज़िंदगी का फ़ैसला लिया है ,मैंने भी एक फैसला लिया है।” अपनी आवाज़ को दृढ़ करते हुए सुष्मिता ने कहा।चेहरे पर एक स्वाभिमान की आभा उभर आई थी ।
जयंत उसके इस रूप को देखकर, हैरानी के भाव  से सुष्मिता को सुनता रहा।
“तुम अपने सच के साथ जीयो ,मैं अपने सच के साथ। सही कहते हो तुम ,अब बचा ही क्या है मेरे भीतर ! शरीर अपंग हो न इंसान मन की मज़बूती के साथ जी लेता है। किस्मत ने मुझे शरीर से अपंग तो तुमने मन से कर दिया है।अब तो खुद में केवल बिखरे हुए टुकड़े ही समेटे हुए हूँ । तुम्हें खुशी मिलेगी भी कैसे।”
फिर एक लंबी साँस ले ,दो पल रुक कर अपने बहते आँसूं पौन्छ सुष्मिता ने पास पड़े पानी को बोतल से पिया तो पानी की कुछ बूंदे उसके गले से लुढ़कते हुए पूरे आँचल को भिगों गईं।
कुछ क्षणों तक लिए अपने आँचल को देखती रही फिर हँस पड़ी।
“अब कुछ सच भी सुन लो जिनका जानना तुम्हारे लिए आवश्यक है।ये  जो तुम्हारा बिज़नेस पार्टनर है न अखिलेश वो जब भी मुझे मिलने पर  बड़ी मुहब्बत से नमस्ते करता है न ,जिसके शिष्टाचार के तुम गुण गाते थकते नहीं वो अपनी ज़ुबाँ से तो नहीं अपनी नज़रों से पेश आता है क्योंकि उसकी नज़रे मेरे सीने ,मेरी छाती पर होती थीं मानो कुछ ढूंढ़ रहा हो। तुम आज तक उसकी नज़रों को भांप नहीं पाए।लेकिन तुम देखते भी कैसे ? मर्द हो न !  तुम तो पार्टियों ,महफिलों में कभी अपनी सेंसेस या होश में नहीं रहे तो पराये मर्दों की नज़रों को कैसे पहचानते।वैसे भी ये इंसानों को पहचानने की न एक सिक्स्थ सेंस औरतों में ही होती है ।वो सामने वाले इंसान की नज़रों और नीयत को ताड़ जाती हैं । खैर छोड़ो ..! जो इंसान ख़ुद ही आँखें गड़ाए दूसरी महिलाओं को देखे वो क्या समझेगा इन बातों को।”
कड़वी यादों से एक और शिकायत ,एक और कड़वी याद आ गई सुष्मिता को।आज सारे ज़ख्म आहिस्ता आहिस्ता ज़ुबाँ की राह पकड़ दिल से निकलने लगे।
” हाँ .. और तुम्हें याद होगा जब  तुम अपनी फेक्ट्री के एम्प्लॉई को भेजते थे न कभी घर से खाना मंगवाने को ..? मैं उसकी बेहूदा नज़रों का भी मैं सामना करती रही क्योंकि तुमने दुनिया वालों को हमदर्दी पाने के लिए सबसे अपना दुख साँझा किया था न कि तुम्हारी पत्नी को ब्रेस्ट केंसर हो गया था और तुम्हारी पत्नी का एक स्तन ऑपेरशन से हटा दिया गया है। उससे तुम्हें कोई फ़ायदा हुआ हो या नहीं मैं नहीं जानती लेकिन मैंने उसके पश्चात हर उस इंसान की बेन्धती नज़रों का सामना किया जब वो मेरे आँचल से ढके हुए सीने में मेरे दोनों हिस्सों को नज़रों से टटोलते थे।देखते थे कि खूबसूरत औरत बिना एक अंग के बदसूरत दिखती है या खूबसूरत ? मैंने तुम्हें बताया भी था जयन्त लेकिन तुमने इसे मेरा वहम कहकर हँसी में उड़ा दिया। “
“अच्छा एक बात बताओ ..ये जो तुम्हारी नई गर्ल फ्रेंड है सुहाना … वाह ! नाम भी सुंदर और  विचार भी सुंदर है उसके ! कायल हो गई मैं उस सुहाना की।”
“मेरी कोई गर्ल फ्रेंड नहीं ..और अब उसे क्यों बीच में ला रही हो ? वो तो खुद ही बड़ी चालू ,घमण्डी है।”
इतनी सब बातें सुन सुहाना का नाम आते ही जयंत ने अपना बचाव करने का प्रयास किया।
“वाह ! क्या बात है ! अपनी पोल पट्टी खुलने की बारी आई तो अपनी राज़दार ,अपनी मित्र के चरित्र का प्रमाण पत्र ही बना डाला। चलो माना कि तुम जैसे मर्दों की फितरत ही ऐसी होती है पर उस बेचारी की बात तो सुन लो वो क्या कहती है ?
“जयंत ..! आज मैं अपना फैसला सुनाने से पहले तुम्हें सारी सच्चाइयों से वाकिफ़ करवा देना चाहती हूँ ताकि मुझे भी कोई मलाल न रहे।आज जैसे तुमने अपने सारे हथियार  लेकर मुझ पर हमला किया न तो बचाव का रास्ता मेरे पास भी होना चाहिए।”
“तो तुम अब बदला लेने पर उतारू हो गई हो?”एक हिकारत भरी नज़र से जयंत ने कहा।
“न रे मेरे प्यारे पति ! न बदला न एहसान न कोई  सौदा न ही मैं बच्चों के नाम का सहारा ले रही हूँ।बस एक आखिरी बात बता दूँ ताकि तुम कहाँ खड़े होते हो तुम जान जाओ।”
“हाँ तो ..मैं बता रही थी कि मिस सुहाना ..जो तुम्हारे साथ मुहब्बत का खेल खेलने की जुगत बिठा रही है या तुम उससे ! उसका कहना है कि तुम ..जयंत सक्सेना ! एक ऐसा मर्द ,एक ऐसा पति जो अपनी पत्नी की शारीरिक अक्षमताओं का ढिंढोरा सरे आम पीटता हो ,जो अपनी पत्नी का नहीं हो सका उसकी दुख तकलीफ़ में वो किसी गैर का कैसे हो सकता है !जानते हो वो दोगुली लड़की पीठ पीछे तुम्हें बददुआएँ देती है।”
“झूठ ..बिल्कुल झूठ ! ये सब तुम्हारे दिमाग की उपज है।बर्गलाओ मत मुझे।समझी? “जयंत ने पास पड़ा तकिया उठाकर फैंक दिया।
“खुद ही पूछ लेना उससे ! नहीं तो अखिलेश की पत्नी रुचि से भी पूछ सकते हो।”
जयंत के चेहरे पर नज़र टिकाए अपनी बात ज़ारी रखते हुए कहा
“ये  तो तुम्हारे पीठ पीछे उसके शब्द थे जो मैंने खुद सुने।अब मेरे सामने ,मुझसे क्या पूछती है वो मैडम सुहाना वो भी बता दूँ ?”
सुष्मिता कहते कहते हाँफने लगी थी ।ज़मीं पर बैठकर दीवार पर टेक लगा कर दुपट्टे के छोर से माथे पर आए पसीने की बूंदों को पौन्छ कर बैठ गई ।
“जानते हो उसने मुझसे क्या कहा ..? उसने कहा नहीं बल्कि  मुझसे पूछा  कि मैं एक ऐसे स्वार्थी  , वासना के भूखे और कमीने इंसान के साथ कैसे रह रही हूँ जो अपने ही घर की ,अपनी पत्नी की इज़्ज़त सरे आम उछाल रहा है। यही नहीं ,उसने मेरी कमजोरी को ही मेरे सामने उजागर किया कि मैं क्यों अपने पति की बात मान ,कृत्रिम अंगों का सहारा ले दुनिया के सामने आती हूँ ताकि किसी को मेरी असमर्थता या अपंग होने का पता न चले।
उसने मुझसे यह … भी ..कहा ..कि जो इंसान अपनी कद्र नहीं कर सकता उसकी कोई कद्र कैसे करेगा ? भगवान ने एक अंग छीन लिया तो क्या हम खुद ही अपना अनादर करने लगें ?”
“नहीं न जयंत ..! जिस सुहाना को तुमने चालू कहा उसने  कड़वा ज़रूर कहा लेकिन सच कहा।उसी ने मुझे मेरी गलती का एहसास करवाया..मुझे मेरे वज़ूद से रूबरू करवाया।और देखा जाए तो ..आज एहसास हुआ कि अधूरी मैं नहीं …अपंग मैं नहीं दरअसल तुम हो !”
“क्या बकवास है ! मैं और अपंग ?लगता है उस सुहाना ने भाषण देकर तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया है।देखो सही सलामत हूँ ,कहाँ से अपंग हूं मैं?”गर्व मिश्रित स्वर में जयंत ने उठकर कहा।
“हाँ अधूरे ,अपंग ! मैं शरीर से और तुम दिलो दिमाग से ! “
“जाओ जाओ ! बेकार की बातें ।सोने दो अब मुझे।”
” बस मेरा फैसला सुन लो फिर आराम से सोना। देखो घर छोड़कर तो मैं जाऊँगी नहीं।तुम अपनी ज़िंदगी जियो जैसे जीना चाहो ।लेकिन अब मुझसे न तो तुम्हारी ये बींधती नज़रे, न ही यह दिखावटी बोझ सहन होता जिसका भार लेकर घूमती रहती हूँ। बार बार ,हर जगह तुम्हारा मुझे पल्लू को सही करने की हिदायत देना और अपमानित होना ..अब मुझे स्वीकार नहीं।”
  ” लेकिन तुम ऐसे कैसे …?”जयंत ने हैरानी से पूछा।
 “बहुत करवा लिया अपमान ! अब मेरी ज़िंदगी ,मेरा शरीर ,मेरा मन और मेरी इच्छा और मेरा ही फैसला होगा। आज से ,अब से …हर डर से ,नफ़रत से और बोझिल रिश्ते से और इस ‘अनचाहे बोझ’ से मुक्ति ही मेरा फ़ैसला है।
इतना कहकर सुष्मिता घर बाहर चौबीस घन्टे दुपटटे से घिरे  तन और मन से उस अनचाहे बोझ को उतार कर फेंक दिया और एक सुकून की साँस ली।
सही मायनों में आज उसे ब्रेस्ट केंसर से मुक्ति मिली थी  ।

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