ईद खत्म होकर आज तीन दिन हो गए थे, पर नूरा का कहीं पता नहीं था । परेशान हालत में डॉक्टर मुईन इस कमरे से उस कमर में टहल रहे थे । बारह-तेरह साल के इस किशोर से उनका कोई रिश्ता न था । पर नूरा उन्हें इतना भा गया था कि उसके घर न आने से उन्हें चैन नहीं पड़ रहा था । बार-बार उसकी छोटी–छोटी बातें याद आ रहीं थीं । उन्हें याद आया एक दिन वे बालकनी में बैठे पेपर पढ़ रहे थे तो नूरा पूछने लगा,
“आप क्या कर रहे हैं…?”
“बेटे, पढ़ रहा हूँ…”
“पढ़ने से क्या होता है …”?
“पढ़ने से आदमी समझदार बनता है, दुनिया जहां की खबर मिलती है… ।
“…आपको पढना किसने सिखाया…?”
“…मेरे अब्बू ने…”
“छोड़ो, मैं तो फिर पढ़ ही नहीं सकता, मेरे अब्बा अब मेरे थोड़े ही हैं” ।  डॉक्टर मुईन कुछ जवाब देते उसके पहले ही नूरा गाड़ी साफ करने भाग गया ।
डॉक्टर मुईन की और नूरा की मुलाक़ात बहुत पुरानी नहीं थी । सबसे पहले उन्होंने उसे क्रास रोड में देखा था, जब वे अपने एक मित्र कैप्टन मल्होत्रा के साथ घड़ी खरीदने गए थे । वे दोनों लिफ्ट के पास खड़े थे कि एक किशोर उम्र का लड़का उनके पास आया और कैप्टन मल्होत्रा के कोट पर लगे अलंकरणों को देखकर पूछने लगा, “साब ये कित्ते के लिए…?” जवाब में हम दोनों हंस पड़े ।
प्रश्न का उत्तर दिये बिना ही कैप्टन मल्होत्रा उससे पूछ बैठे,  “यार तू .. तू वही है न जो मुझे वर्ली सी फेस पर मिला था और मैंने तुझे पुलिस वाले से छुड़वाया था …. ।” लड़के ने सूनी आँखों से हमारी ओर देखा, फिर कुछ सोचते हुए बोला,
“हाँ साब”
“तू यहाँ क्या कर रहा है …?”
“एक सेठ बोला था काम दिलाएगा, इसलिए अपुन इधर आया” ।
डॉ मुईन बोले, “कैप्टन बड़ी पुरानी जान-पहचान जान पड़ती है …” ।
“हाँ यार, पिछले हफ़्ते वर्ली सी फेस पर फुग्गे बेच रहा था तो पुलिस वाले ने इसे पकड़ लिया था। मैंने पुलिस वाले को समझा-बुझा कर इसे छुड़वा दिया था ।” कैप्टन मल्होत्रा लड़के की तरफ देखकर बोले,
“क्या खाएगा …” ?
“मसाला डोसा …”
“और कुछ नहीं …? कैप्टन ने पूछा ।
“नहीं …”
“जा, जाकर ठेले पर खा, मैं नीचे आ रहा हूँ”। पर नूरा वहाँ से खिसक ही नहीं रहा था । डॉ. मुईन, कैप्टन के व्यवहार से प्रभावित हुये बिना न रहे । उन्होने नूरा से पूछा,
“कहाँ रहते हो बेटे…” ?
“कैपिटल सिनेमा के पीछे…”
“तुम्हारे पिताजी क्या करते हैं …?
“मेरा बाप बैग रिपेयर करने का काम करता है, ईद के बाद वह मुझे और मेरी माँ को छोड़कर चला जाएगा” ।
“क्यों…”
“क्योंकि मेरे माँ कुछ काम नहीं करती और उसे दमा की बीमारी है । बाप ने बोला, जितना पैसा इसकी दवा-दारू में जाता है उससे तो अच्छा मैं नई बीवी ले आता हूँ… और वह नई बीवी ले आया है । नई बीवी बीमार भी नहीं रहती है …” ।
इंसानियत से लबालब डॉ. मुईन का कोमल दिल ज़ोर – ज़ोर से धड़कने लगा । उन्होने स्वयं पर काबू करके पूछा,
“क्या नाम है तुम्हारा …”?
“नूरा, मेरे अम्मी कहती हैं तू मेरी आँखों का नूर है, इसलिए उन्होने मेरा नाम नूरा रखा है” ।
बोझिल वातावरण को तोड़ते हुए, नूरा कैप्टन मल्होत्रा से बोला, “साब मुझे सफाई करने का काम दिला दीजिये न ….. वो सफाई का काम इसलिए बोल रहा हूँ कि सुबह सफाई करके चला जाऊंगा, फिर दोपहर को दूसरा कोई काम कर लूँगा ।  अब मेरा बाप मुझे और मेरी माँ को खाना थोड़े ही देगा … ”।
डॉ. मुईन बिना किसी भूमिका के अचानक पूछ बैठे, “मेरे घर काम करोगे …?” और उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना ही बोले, मेरे गाड़ी साफ कर दिया करना और घर की सफाई कर दिया करना । तुम्हें दोनों टाइम का खाना मिलेगा और पाँच हजार रुपए पगार मिलेगा ।”
इस तरह से नूरा डॉ. मुईन के घर आ गया था और आज ईद के बाद तीन दिन से गायब था ।
ईद के दिन जब सब लोग एक दूसरे से गले मिल रहे थे, मिठाइयाँ बाँट रहे थे, तब राबिया बी और नूरा अपनी अंधेरी झोपड़ी में एक दूसरे से गले मिलकर सिसकियाँ बाट रहे थे । नूरा का बाप उन दोनों को छोडकर दूसरे घर में चला गया था, क्योंकि नई बीवी के पीहर वाले ईद पर मिलने के लिए आ सकते थे। ईद के बाद आज तक किसी ने नूरा और उसकी माँ की खबर तक नहीं ली थी । नूरा ने अपनी माँ से पूछा,
“अम्मी, अब्बा हमें छोडकार क्यों चले गए…?”
राबिया बी दु:खी मन से बोलीं, “अल्लाह की मर्ज़ी बेटा, ख़ुदा को यही मंजूर था …”।
नूरा के नन्हे से दिमाग में ये सब बातें नहीं समा रही थीं । वह बोला,
“अम्मी, ऐसी कैसी ख़ुदा की मर्ज़ी, बनवारी चच्चा का लड़का बिना किसी बीमारी के बिस्तर पर पड़ा रहता है, क्या ये भी ख़ुदा की मर्ज़ी है, बूढ़ी हशमत चाची बीमार पड़ी खाँसती रहती हैं, क्या ये भी ख़ुदा की मर्ज़ी है, अब्बा हमें छोडकर चले गए, क्या ये भी ख़ुदा की मर्ज़ी है ? ऐसे अल्लाह ……
“नहीं बेटे, ऐसा नहीं कहते, ख़ुदा कदम-कदम पर अपने बंदों का इम्तिहान लेते हैं, उन्हीं से दुआ करो, वही कोई रास्ता निकालेंगे…” ।
“नहीं अम्मी…, नहीं…, अब मैं कोई दुआ करना वाला नहीं हूँ । रमज़ानी मियां कह रहे थे, मस्जिद के इमाम को थोड़े से पैसे दे दो तो वह उनकी दुआ ख़ुदा तक पहुंचा देते हैं । लेकिन वे अपनी दुआ ख़ुदा तक नहीं पहुंचाएंगे, क्योंकि इमाम साहब तो अब्बा के दोस्त हैं न। अब्बा उनको थोड़ा ज्यादा पैसे दे देंगे तो इमाम साहब तो उनको जन्नत में भी जगह दिलवा देंगे…” ।
राबिया बी के पास नूरा की भोली बातों क कोई जवाब नहीं था ।
डॉ. मुईन को याद आया, नूरा ने बातों–बातों में बताया था कि बड़ी मस्जिद पीछे वाली गली में ही उसका घर है । उन्हें याद आया नूरा ने यह भी कहा था कि हमारी गली के नुक्कड़ पर एक कबाब बेचने वाली की दूकान है ।
आखिर बड़ी मशक़्क़त के बाद उन्होने नूरा का ठिकाना ढूंढ ही निकाला । उन्होने यह भी पता लगा लिया कि नूरा का बाप, नूरा को और उसकी माँ को छोडकर कहीं और चला गया है । डॉक्टर  साहब सोच कर निकले थे कि नूरा को साथ लेकर ही लोटेंगे । उन्होने सोसायटी के वाचमेन को साथ लिया और पूछते-पूछते नूरा के घर पहुँच ही गए । वे अंदर जाने की तजवीज कर ही रहे थे कि घर के अंदर से आती हुई आवाजों में उन्हें अपना नाम सुनाई दिया । नूरा कह रहा था,
  “अम्मी डॉक्टर साहब हैं न ….वे कहते हैं, सबको अपना–अपना काम खुद करना चाहिये, किसी के भरोसे नहीं बैठना चाहिये । जो लोग अपना काम खुद नहीं करते, खुदा उनसे नाराज रहता है । अम्मी मालूम है वे ये भी कहते हैं कि पढ़ने से आदमी समझदार बनता है । अम्मी मैं भी पढ़ूँगा, तुम भी पढ़ना, अपन दोनों पढ़ेंगे और दोनों काम करेंगे …”। मुसीबत के इन दिनों में भी राबिया बी को हंसी आ गई। वे बोली,
“बेटा, मेरा तो पर्दे से बाहर निकलना भी उसूलों के खिलाफ है । थोड़ा–बहुत कुरान पढ़ लेती हूँ यही क्या कम है….”।
“नहीं… अम्मी… नहीं तुम यहाँ से बाहर निकलो, अपन अच्छी साफ–सुथरी जगह पर रहेंगे । डॉक्टर साहब कहते हैं, औरत और आदमी में कुछ फर्क नहीं होता । सबको मिल–जुलकर काम करना चाहिये । अम्मी तू ही सोच, ये भी कोई जिंदगी है, चारों तरफ गरीबी, करने को कुछ काम नहीं, पैसा नहीं । अम्मी ये सब हमारी मर्ज़ी से है, हम चाहें तो ये सब मिटा सकते हैं…” ।
राबिया बी कुछ समझी, कुछ नहीं समझी । फिर भी वे कहने लगी, “बेटे तू क्या कह रहा है, मुझ अनपढ़ को तो कुछ समझ में नहीं आ रहा, पर लग रहा है तू जो कह रहा है, ठीक ही कह रहा है । अब से जैसा तू चाहेगा वैसा ही अपन करेंगे” ।
“सच अम्मी !” नूरा खुशी से चमक उठा और बोला अच्छा अम्मी सुन, मैं डॉक्टर साहब के पास जाता हूँ, वे जरूर हमारी मदद करेंगे । अम्मी मैं पढ़ूँगा, तुम कुछ काम सीखना, हम किसी पर बोझ नहीं बनेंगे । ठीक है ….अम्मी ?
नूरा खुशी–खुशी डॉक्टर साहब से मिलने के लिए जाने की तैयारी करने लगा । डॉक्टर मुईन, जो बाहर खड़े सब बातें सुन रहे थे, उनके मुह से निकला आमीन ! और वे लंबे-लंबे डग भरते हुये अपने घर की तरफ जाने लगे ।  वे जल्दी से जल्दी घर पहुँचना चाहते थे, ताकि नए  नूरा का स्वागत कर सकें ।

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