स्कूलों में जब इंस्पेक्शन टीम आती थी तो स्कूल की हर व्यवस्था दुरुस्त की जाती थी,कोई कमी ना रहे इस बात का पूरा ख्याल रखा जाता था । जिस तरह वो निरीक्षण टीम होती है उसी तरह औरतों की एक स्पेशल निरीक्षण टीम होती है जो शादी हो या मौत हर मौके पर फ्री में बिना किसी पूर्व सूचना के उपलब्ध होती है। इनकी आंखे हाई रिजॉल्यूशन कैमरे और एक्सरे मशीन का मिला जुला रूप होती है। और दिमाग किसी बड़े जासूस का होता है जो सबके रिश्ते और रिश्तेदारों की पूरी सूची से लैस होता है।
इनकी तेज नजर सैकिंड के सौवें हिस्से में ही जान लेती है कि किसने क्या पहना, क्यों पहना, और वो किसकी बहू थी, किसकी बेटी थी। शादियों में तो तुरंत पकड़ कर बकायदा अपनी याददाश्त का परिचय भी देती है।
‘क्यों री यही साड़ी तो तूने बांके के छोरा के ब्याह में पहनी थी‘ वो महिला बेचारी ऐसे अपराध बोध में ग्रस्त हो जाती है मानो साड़ी रिपीट करके किसी की हत्या कर दी हो।बेचारी के हलक से खाना भी नीचे नहीं उतरता पूरे कार्यक्रम में इनसे बचकर चलती है।
या किसी से कहेंगी, “सोने के ना लग रहे तेरे कान के आर्टिफिशल से लग रहे हैं, मेरे तो कान पक जाते हैं पहन लूं तो । ‘ उस बेचारी की को दस लोगों के बीच पका दिया उसका कुछ नहीं।

