हिमोजी, अलबेली, ललमुनिया, चित्रगीत जैसे अभिव्यक्ति के अलग-अलग और मन के साथ जुड़ जाने वाले माध्यमों किरदारों को गढ़ने वाली मिरांडा हाउस हिंदी विभाग के अपराजिता शर्मा इस शरीर को छोड़कर अनंत यात्रा पर चली गईं।उनको विनम्र श्रद्धांजलि। इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक से हुई इनकी मृत्यु ने कुछ दिन पहले हुई टीवी कलाकार सिद्धार्थ शुक्ला के असमय मृत्यु की याद दिला दिया।  सिद्धार्थ शुक्ला की मृत्यु को लेकर कूपर हॉस्पिटल का बयान यह आया कि इनकी मृत्यु हार्ट अटैक से हुई।
बहुत सारे लोग फेसबुक पर अभी लिख रहे हैं की हार्ट के सही ढंग से फंक्शन नहीं करने का कारण शरीर में विटामिन डी एवं कैल्शियम की कमी हो सकती है।
बात केवल अपराजिता शर्मा या सिद्धार्थ शुक्ला की नहीं है। हम यह देख रहे हैं कि पिछले कुछ समय से विशेषकर सन 2000 के बाद से 40 साल या उससे कम उम्र के लोगों में भी हार्ट अटैक की घटनाएं या कार्डियोवैस्कुलर बीमारी बढ़ने की घटनाएं हमारे सामने आ रही हैं।
इसके क्या कारण है? इनकी भी एक चर्चा होनी आवश्यक है। पहले यह कहा जाता था हार्ट अटैक आने का कारण धूम्रपान है, लेकिन अभी हम बहुत से ऐसे लोगों को देख रहे हैं जो लोग धूम्रपान भी नहीं करते, शारीरिक रूप से तंदुरुस्त दिखाई देते हैं जिम जाते हैं या एक्सरसाइज करते रहते हैं, अचानक से ऐसे लोगों में हार्ट अटैक की घटनाएं देखी जा रही हैं और उनमें से अधिकांश लोगों को बचाया नहीं जा सका। इसके पीछे क्या कारण है? क्योंकि ऐसी घटनाओं में लोग कैल्शियम व विटामिन डी की कमी की बात कर रहे हैं, हो सकता है कि यह एक कारण हो। लेकिन एक विशेष कारण पर कहीं चर्चा नहीं हो रही है, जो सबसे महत्वपूर्ण कारण है, भारत के महानगरों में हार्ट डिजीज के संख्या बढ़ने का। और वह कारण है कणीय वायु प्रदूषण, मुख्य रूप से सूक्ष्म कणीय वायु प्रदूषण।
सामान्य तौर पर कणिय वायु प्रदूषण को हम दो प्रकार में विभाजित करते हैं: पीएम 2.5 वाले और सबसे छोटे कण और पीएम 10 वाले एवं उससे से छोटे कण।
यहाँ पीएम 2•5 का अर्थ है ऐसे पार्टिकुलेट मैटर जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर है।
इसमें स्वास्थ्य के दृष्टिकोण से सबसे हानिकारक हैं पीएम 2.5 से छोटे और विशेषकर पीएम 1 से भी छोटे कण।
जैसा आप सभी जानते हैं कि हमारे शरीर में प्रकृति ने बहुत से रक्षा व्यवस्थाओं का निर्माण किया है जो हमें विभिन्न प्रकार के प्रदूषण को से बचाती हैं जैसे नाक के अंदर मौजूद बाल जो बड़े कणों को रोकने में सक्षम होते हैं इसके अतिरिक्त नाक के अंदर मौजूद म्यूकस भी कुछ खास तरह के कणों और प्रदूषकों को रोक सकते हैं, लेकिन यह दोनों बड़े साइज के कणीय प्रदूषकों को रोकने में सक्षम होते हैं।
पीएम 2.5 से छोटे का आसानी से हमारे फेफड़ों तक पहुंच जाते हैं और वहां से हमारे ब्लड स्ट्रीम तक पहुंच जाते हैं और एक बार ब्लड स्ट्रीम में पहुंचने के बाद शरीर से उनके बाहर निकलने की संभावना नगण्य हो जाती है।
धीरे धीरे जब हमारे रक्त परिसंचरण तंत्र में इस तरह के सूक्ष्म कण इकट्ठा होने लगते हैं तो कुछ समय के बाद वह हमारे रक्त परिसंचरण तंत्र के माध्यम से हमारे हृदय को प्रभावित करने लगते हैं और उसकी परिणिति हार्टअटैक के रूप में होती है। आज के समय में वायु प्रदूषण विभिन्न प्रकार के रोगों के लिए जिम्मेदार है और उसमें भी हार्ट एवं लंग्स से संबंधित बीमारियों की संख्या बढ़ाने में इसका बहुत बड़ा योगदान है। अगर हम भविष्य में इस तरह की दुखद घटनाओं को रोकना चाहते हैं तो उसके लिए वायु प्रदूषण को लेकर और सीरियस होने की आवश्यकता है।
(लेखक पर्यावरण विज्ञान में स्नातकोत्तर एवं नेट हैं और स्वस्थ भारत (ट्रस्ट) के न्यासी हैं। सभ्यता अध्ययन केंद्र के साथ अध्येता के रूप में जुड़े हुए हैं  पर्यावरण संबंधी विषयों पर लगातार लिखते रहे हैं और योजना, कुरुक्षेत्र जैसे पत्रिकाओं एवं पत्रों में रचनाएं प्रकाशित होती रही हैं। संपर्क - 7011120200

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