Sunday, April 12, 2026
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डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव का लेख – वर्चुअल प्लेटफार्म और मनोजगत

जब से लॉकडाउन शुरू हुआ तब से दुनिया जैसे स्क्रीन पर ही सिमट आई है | जीवन का स्वरुप डिजिटल बन गया है | जैसे अभिव्यक्तियों को और रास्ता ही न मिल रहा हो और सब इस माध्यम के ज़रिये साकार हो रही हैं | जितनी भी ऊर्जा, जहां भी जिस भी रूप में है अपना क्षेत्र सुनिश्चित करते हुए प्रदर्शित हो रही हैं |
इन सबके पीछे मनुष्य की रागात्मिक वृत्ति की प्रेरणा कहे या कुछ और पर जीवन का घर की चहारदीवारी में सिमट आना कहीं न कहीं मन की दुनिया में कभी तो विकार उत्पन्न करना लग रहा है तो कभी मन की उन ग्रंथियों का प्रत्याक्षीकरण  हो रहा है जो व्यक्ति अक्सर समाज की व्यवहारिक मर्यादाओं के कारण मुखर हो कर उद्घाटित नहीं कर पाता  |  तो क्या समाज के जटिल ताने-बाने वास्तव में व्यक्ति को स्वाभाविकता से परे आडम्बरयुक्त व्यवहार करने के ही आग्रही हैं ? इसके चलते ही तो नहीं तेज़ी से पनपती हुई आत्मप्रकाशन की उत्कंठा के कारण आत्मविमुग्धता की प्रवृत्ति के निदर्शन जहाँ-तहाँ हो रहे हैं |
अपनी एक अलग पहचान या स्वीकृति की इतनी कमी हो गयी है कि इस प्रवृत्ति का विस्तार आज आभासी दुनिया में बहुत अधिक हो रहा है | तमाम संवेदनाएं मानो सिमट कर एमोजी, बिटमोजी और अन्य विविध स्तिकेर्स में उतर आई हैं | कल्पना की मौलिकता और रचनात्मक केवल कुछ पहले से बने-बनाये स्लोगन्स पर टिक गयी है | आट्रीफिशिअल इंटेलिजेंस इंसानी कल्पनाशीलता पर इस कदर हावी होता जा रहा है कि स्वाभाविक और नैसर्गिक बौद्धिक क्षमताएं पंगु होती जा रही हैं |
ऎसी स्थिति में आत्मविमुग्धता किस हद तक आत्मतुष्टि प्रदान कर सकती हैं यह भी विचारणीय है | आत्मप्रकाशन एक स्वस्थ प्रक्रिया हो सकती है पर यदि उसके लिए रचनात्मक आलोचना भी स्वीकार्य हो | आप जो भी प्रकाशित कर रहे हाँ, उसमें आप यदि केवल लाइक्स की उम्मीद कर रहे हैं तो यह स्थिति घातक है | खैर, अंधी महत्वाक्षाओं की चूहा-दौड़ में जीते कौन और हारे कौन, पर अजीबोगरीब प्रतियोगिता की भावना को बेवजह स्थान मिल रहा है, इस वर्चुअल दुनिया में | 
मार्च 2020 से चल रहे लॉक-डाउन के कारण न केवल जीवन शैली में बदलाव आया है, बल्कि इंसानी ज़ज्बातों के अत्यंत मुखरित प्रदर्शन भी हुए हैं | अब तक जिन बातों को कभी नहीं समझा या कहा गया था उन्हें अब महत्त्व दिया गया तो कहीं बेबाकी के पंख फैले हुए ऊंचे आसमान को छूने का प्रयास कर रहे हैं | कलात्मक अभिव्यक्तियों को जितनी जगह इस दौरान मिल पायी वह शायद पहले ज़िन्दगी की उहा-पोह में संभव नहीं हो पाती थी |
न जाने कितनी ही सृजनशीलताओं को इस दौरान थाह मिली जो अपने आप में एक ख़ास उपलब्धि है | यह सब उनके साथ हुआ जो इस बात को समझते हैं कि ‘जो रचता है,वही बचता है’ | जीवन की प्रगतिशीलता और चिरंतर ऊर्जा उनके लिए महत्त्वपूर्ण है, जिसे वे किसी भी स्थिति में बरकरार रखना चाहते हैं | परिवर्तित होती हुई स्थितियों में भी सौन्दर्य-बोध को ढूँढ़ने का प्रयास करते हैं | वे खुद के लिए और औरों के लिए इसी प्रेरणा के साथ रचनात्मक प्रयास करने में लगे हुए हैं | 
मनुष्य की प्रवृत्ति बड़ी आसानी से अधोमुखी हो नकारात्मक विचारों का निर्माण करने में अधिक रमती है, जिसका मुख्य कारण भय का भाव है | चाहे असुरक्षा की भावना के रूप में हो या कभी किसी अन्य किसी ग्रंथि के रूप में, वह उचित अवसर पाकर किसी न किसी अप्रिय रूप अभिव्यक्त होती ही है | कभी उसे अपनी छवि की चिंता या भय होता है तो कभी ईर्ष्या-द्वेष की भावना, व्यक्ति किसी भी ओहदे का हो, उसके भीतर ऎसी व्याकुलताएं जन्म लेती रहती हैं | लॉक डाउन के दौरान ऐसे विचार और भाव खूब प्रकट हुए जिनमे असुरक्षा की भावना प्रकट हुई |
इस दौर में एक ख़ास बात यह भी दिखाई पड़ रही है और इसके चलते कुछ लोगों के अप्रत्याशित व्यवहार दृष्टिगत हुए जो लॉकडाउन के पहले बहुत ही संजीदा भूमिका में नज़र आ रहे थे | मनुष्य स्वभावत: सामाजिक प्राणी है क्योंकि उसके अस्तित्व का दारोमदार विचारों और भावों के आदान-प्रदान पर ही टिका हुआ है | इसलिए कदाचित सामाजिक दूरियों  के कारण मन की बेचैनियाँ बढ़ी हैं इसे भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता है |
लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण यह कि व्यक्ति अपने भावोँ-विचारों के आदान-प्रदान में कितनी संजीदगी बरतता है | क्या उसकी उस आत्मीयता को छद्म माना जाए जो, जब लॉक डाउन नहीं था तब प्रकट की गयी थी क्योंकि तब सामाजिक दूरी का कोई प्रावधान नहीं था ? तो वर्चुअल दुनिया में प्रवेश करते ही अचानक उसकी सद्भावना इतनी क्षीण कैसे हो गयी ? व्यक्ति, समाज के दायरे में रह कर अपने स्वाभाविक दोष को प्रदर्शित न कर केवल अपने गुणों को ही क्यों उजागर करता है ? यह तो वास्तविक आदान-प्रदान नहीं |    
 मनोवैज्ञानिक आधार पर यदि इसे समझा जाए तो व्यक्ति सबसे अधिक करीब खुद से ही होता ही और इसलिए वह सिर्फ खुद के सामने ही खुद को बहुत ही स्पष्टता से और बेबाकी से अभिव्यक्त कर पाता है | साथ ही यह भी देखा गया है कि जो बात व्यक्ति बोलकर नहीं अभिव्यक्त कर पाता, उसे वह लिख कर बड़ी ही आसानी से प्रेषित भी कर देता है, भले ही उसका कैसा ही प्रभाव पड़े | आभासी दुनिया में इस स्थिति में भी सम्प्रेषण शिथिल हुआ है | दूसरे, मन के नकारात्मकताओं के उन्मुक्त प्रदर्शन का व्यापक प्लेटफार्म ‘आभासी’ होने के कारण जो थोड़ा-बहुत (चाहे बनावटी ही सही) अच्छा व्यवहार किया जाता था, अचानक विलुप्त सा हो गया | क्योंकि यहाँ, कुछ कहने या प्रकट करने की  ख़ास मनाही नहीं | जब जिसका जी चाहे कुछ भी टिप्पणी कर सकता है बिना इस बात की परवाह किये कि उससे किसी को ठेस पहुँच सकती है |
आपने अपनी भड़ास निकालने के लिए किसी व्हाट्स ग्रुप या फेस-बुक या किसी पर कोई बात कह दी और उसकी प्रतिक्रया की अपेक्षा किये बिना चैन की नींद सो गए | अब आपके उस सन्देश का प्रभाव जैसा भी पड़े सो पड़े | किसी के सन्देश को आप या तो आसानी से अनदेखा कर सकते हैं, चाहे वह कितना ही ज़रुरी क्यों न हो | ज़िम्मेदारी की भावना का तेज़ी से क्षरण होता दिख रहा है | सार्थक हस्तक्षेप की मात्रा एकदम से कम हो गयी है | फ्लूइड विचारों की अधिकता से स्थिरता और ठहराव में कमी आयी | सूचना और विचार और भाव एक दूसरे में घुल-मिल कर अजीब सा परिदृश्य बना रहे हैं |
सूचना को अपना विचार मान लेना तो कभी सूचना के कारण अनुभूत भाव की मौलिकता के प्रश्न आज नही तो कल अवश्य उठने चाहिए | किसी एक का स्वतंत्र अस्तित्व नज़र नही आ रहा | जनसंचार के सन्दर्भ में इस बात को समझे तो यह न तो व्यक्तिपरक सम्प्रेषण में आता है और न ही अंतर्व्यक्तिपरक, तो फिर यह कैसा सम्प्रेषण है ?| वर्चुअल दुनिया जैसी आकर्षक महसूस होती है उसका वास्तविक रूप अत्यंत लचीला है, उसके रंग बहुत भड़कीले हैं पर क्षण बहर में लुप्त हो जाने वाले हैं | बैंडविड्थ के सहारे  जिसका अस्तित्व है, अचानक कैसे मन के इतने करीब हो गए ? जिसके आधार बहुत कमज़ोर हैं, क्यों आज व्यक्ति के समक्ष ठोस जगत को प्रस्तुत कर रहा है ?  
शिक्षित और कलाकारों के सानिंध्य के कारण इस बात को अनुभव किया कि कार्यक्षेत्र में अपनी एक अलग पहचान रखने वाले किस प्रकार से एक सामान्य मनुष्य ही हैं जो अपनी तमाम कमजोरियों से अभी तक मुक्त नही हो पाया है, पर सृजनशीलता के कुछ बहुत ही उम्दा प्रयास भी इस दौरान हो रहे हैं | वर्मान की जद्दोजहद में कुछ लिखने वाले बहुत अर्थपूर्ण लिख रहे हैं तो सकारात्मक सोच के चलते रचनाशीलता को नए आयाम भी प्राप्त हुए हैं |
जब लॉकडाउन शुरू ही हुआ था तब वास्तव में क़ैद जैसी स्थिति का अनुभव करते हुए इससे निजात पाने के लिए हमने अपने कुछ मित्रों और परिवार के सदस्यों के साथ दो व्हाट्स-एप ग्रुप बनाए | एक का लक्ष्य था, रोज़ एक पेंटिंग या स्केच को बना कर पोस्ट करना और दूसरे में प्रतिदिन एक गीत गाकर साँझा करना रहा | कलात्मक अभिरुचियों के साथ कैसे क़ैद जैसी ज़िन्दगी अचानक खुशनुमा हो गयी इसका आभास हम सभी ने किया |
साथ ही हम अपनी छुपी हुई प्रतिभा या प्रतिभा के नए आयाम से परिचित हुए | सामाजिक नजदीकीयों से अधिक यहाँ दिल की करीबियों ने हमें एकदम जीवंत और सकारात्मक रखा | गीत की स्वरलहरियों ने किसी बुझे दिल को पनाह दी तो रंगों की कलाकारी से जीवन के फीके पड़ते रंग फिर से जीवंत हो उठे | कला हमारी मनोवृत्तियों का पोषण तो करती ही है पर साथ ही साथ आत्मतुष्टि और आत्मविश्वास का अद्भुत संचार करती है | इस प्रक्रिया का वर्चुअल दुनिया से केवल व्हाट्स-एप सन्देश तक का ही सम्बन्ध था जब उसे सबसे साँझा करना होता था | ख़ास बात यह थी कि जिस अभिव्यक्ति के स्वरुप को सांझा कर रहे थे, उसके निर्माण में कई घंटों की अथक मेहनत, उदात्त विचार और श्रेष्ठ भाव शामिल थे |
डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव
डॉ. अनुपमा श्रीवास्तव
दिल्ली विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं. संपर्क - [email protected]
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