इंडिया गेट निर्विवाद रूप से हमारे देश का महत्वपूर्ण सैन्य स्मारक है।
दुनिया के प्राय: सभी देशों में अपने शहीद सैनिकों को सम्मान देने के लिए स्मृति स्थल बनाए गए हैं। जो लोग इंडिया गेट गए हैं उनमें बहुत से लोग होंगे जिन्होंने इंडिया गेट की दीवारों पर खुदे हुए नामों को पढ़ा होगा। ये नाम ग़ौर से देखने पर ही नज़र आते हैं। लेकिन एक बार देखने के बाद आप उत्सुकतावश इन नामों को पढ़ते जाते हैं।
यहाँ हज़ारों नाम लिखे हैं कुछ अंग्रेजों के नाम भी और बहुत से देसी नाम जैसे कल्लू खां, लड्डन सिंह, रामौतार या नत्थू खां वगैरह। ये उन सैनिकों के नाम हैं जो पहले विश्वयुद्ध में या फिर तीसरे अफ़ग़ान युद्ध में तत्कालीन ब्रिटिश आर्मी के सैनिकों के रूप में लड़ते हुए फ़्रांस और अन्य देशों में भारत से बहुत दूर लड़ते हुए शहीद हुए थे। इनमें सैनिक, सेना के कुली, नाई, रसोइये आदि सभी शामिल हैं।
युद्ध के दौरान सेना के सभी कर्मी सैनिक के रूप में दुश्मन से दो-दो हाथ करते हैं। इंडिया गेट दिल्ली का प्रसिद्ध टूरिस्ट आकर्षण भी है। 1911 में जब देश की राजधानी कलकत्ता से हटाकर दिल्ली लाने का फ़ैसला हुआ तो इंग्लैंड की महारानी विक्टोरिया के बेटे कनॉट ने इसकी नींव रखी। कहा जाता है इसका डिज़ाइन पेरिस में बने ऐसे ही युद्ध स्मारक से प्रेरित होकर तैयार किया गया था।
इंडिया गेट के चारों ओर दूर-दूर तक फैला घास का हरा मैदान और बोट क्लब है। दिन भर यहाँ सैलानियों का जमघट लगा रहता है और शाम होते ही यह स्मारक केसरिया,सफ़ेद और हरी रोशनी में नहा जाता है। हज़ारों स्थानीय लोग भी इसके दूर-दूर तक फैले हरे मैदान पर तनावमुक्त लम्हों की तलाश में आते हैं। बच्चों के लिए तो यह स्थान एक मेले की तरह ही है। गुब्बारे वालों से लेकर आइसक्रीम वाले और न जाने कितनी तरह के खिलौने वाले भी यहाँ घूमने आए लोगों को खुश करके अपनी ज़िंदगी चलाते हैं।
इंडिया गेट के एकदम सामने ऊँची पहाड़ी पर अंग्रेजों द्वारा निर्मित भारत की सत्ता और संप्रभुता का सबसे बड़ा प्रतीक राष्ट्रपति भवन है। जो पहले वायसराय हाउस कहलाता था। वायसराय यानी ब्रिटिश सत्ता का सबसे बड़ा अधिकारी। हिंदुस्तानी उसे लाट साहब कहते थे। वैसे लाट साहब अब भी मानते हैं लेकिन मन ही मन में। सत्ता और शासितों के बीच आज भी उतनी ही दूरी है। बल्कि शायद और भी ज़्यादा बढ़ गई है।
लाट साहब की ताक़त का अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है कि आम ज़ुबान पर जब भी ताक़त की बात होती तो लोग एक-दूसरे को इसी ओहदे से तानाकशी करते हैं – तू क्या लाट साब है… वो क्या लाट साब है, बड़ा लाट साब बना फिरता है वगैरह-वगैरह। या फिर लाट साहब है तो सब कुछ मुमकिन है।



आदरणीय श्रीकांत जी
आपको तो हम पढ़ते रहते हैं।पर बेहतर पुरवाई में ही पढ़ा।पूरा लेख पढ़ा हमने। आज दिल्ली को हमने श्रीकांत जी की दृष्टि से उनके व्यंग्य चुटकियों के साथ मजे लेते हुए जानने का प्रयास किया। बड़ी बारीक जानकारी के साथ ही दिल्ली का ऐतिहासिक वर्णन किया इन्होंने।
बहुत-बहुत बधाई श्रीकांत जी मजा आया पढ़ने में।
अंत में आपने लिखा था कि सुभाष चंद्र बोस के बारे में बहुत कुछ लिखने की आपकी इच्छा है पर आपने इसलिए नहीं लिखा कि आपका लेख बड़ा हो गया था।
लेकिन अगर बड़ा होता तब भी हम तो पढ़ते, क्योंकि सुभाष चंद्र बोस को पढ़ना अपने आप में एक गौरव है।
बेहतरीन लेख के माध्यम से दिल्ली घुमाने के लिए, दिल्ली की जानकारी के लिए, आपका तहे दिल से शुक्रिया।
प्रस्तुति के लिये तेजेन्द्र जी का बहुत-बहुत शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
आपसे सहमत नीलिमा जी।