विश्व के मानस पटल पर विराजमान एकता का प्रतीक ‘हिंदी’ आज जन-जन के मन तक पहुंचकर लोगों को आपस में जोड़ने का कार्य कर रही है इसीलिए आज हिंदी विश्व में सर्वाधिक बोले जाने वाली भाषा बनने की ओर अग्रसर है। हिंदी को विश्व स्तर पर पहुंचने का कार्य गिरमिटिया मजदूरों से लेकर वर्तमान में जनसंचार माध्यमों के साथ-साथ भारतीय तथा प्रवासी साहित्यकारों ने किया है।
आज का युग वैश्वीकरण का युग है। वैश्वीकरण के इस युग में आज संपूर्ण विश्व एक छोटा-सा गाँव लगने लगा है। वैश्वीकरण यह विश्व के अर्थतंत्र के निर्माण की प्रक्रिया है जो कि विश्व के अर्थतंत्र तथा विश्व बाजार के निर्माण में प्रत्येक राष्ट्र को जोड़ता है। यदि देखा जाय तो वैश्वीकरण यह निरंतर चलने वाली प्रक्रिया है क्योंकि इस प्रक्रिया में विश्व के लगभग सभी देश एक-दूसरे से आर्थिक, राजनीतिक, साहित्यिक तथा सांस्कृतिक रूप से परस्पर जुड़े हुए होते हैं।
मेरा मानना है कि भारत की असली ताकत हिंदी भाषा है क्योंकि हिंदी यह आम बोलचाल की भाषा है, जिसे भारत देश की कुल आबादी की लगभग 80% से अधिक जनसंख्या बोलती और समझती है। इस देश में अधिकतर लोग हिंदी में ही संवाद करते हैं। अतः हिंदी दो अहिंदी भाषियों के बीच संपर्क स्थापित करते हुए उनके बीच सेतु निर्माण का कार्य करती है।
हिंदी को न सिर्फ संपर्क भाषा अपितु व्यवसाय की दृष्टि से भी यदि देखा जाए तो बाजार हमेशा बिकने वाली वस्तुओं की ताकत को ही देखता है, आज हिंदी भाषा में वह ताकत है। यही कारण है कि आज सबसे अधिक विज्ञापन हिंदी में ही प्रसारित किए जाते हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया पर भी हिंदी का प्रभाव दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। इतना ही नहीं आज कई सॉफ्टवेयर और हार्डवेयर अंतर्निर्मित हिंदी यूनिकोड की सुविधा के साथ आ रहे हैं, जिसके कारण हिंदी की तकनीकी समस्याएं लगभग समाप्त हो रही हैं।
एक तरफ आजकल सोशल मीडिया और इंटरनेट का प्रयोग करने वाले अधिकांश लोग हिंदी का प्रयोग करते हैं तो वहीं दूसरी तरफ अधिकांश बड़ी-बड़ी संचार कंपनियों को हिंदी में बड़ा उपभोक्ता बाजार दिखाई दे रहा है। गूगल, यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम, टि्वटर भी इससे अछूता नहीं है। भारतीय युवा वर्ग अधिकतर इनका उपयोग हिंदी में ही करते दिखाई देता है। इन सब के कारण ही आज अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हिंदी का प्रचार-प्रसार अधिक तीव्र गति से हो रहा है।
हम सभी भारतीय तथा प्रवासी साहित्यकारों के लिए आज यह गर्व का पल है कि हम सभी एक साथ मिलकर साहित्य के माध्यम से अपने विचारों का आदान-प्रदान करते हुए विश्व के लगभग सभी देशों के साथ एक ऐसे सेतु का निर्माण करने जा रहे हैं जो आने वाले भविष्य तथा युवा पीढ़ी के लिए शुभ संकेत है। इससे दो देशों के बीच अच्छे संबंध स्थापित होने के साथ-साथ साहित्यिक गतिविधियों को नया आयाम प्राप्त होगा तथा विश्व के लगभग सभी देश एक-दूसरे की भाषा व संस्कृति से परिचित होंगे।
“साहित्य के माध्यम से ब्रिटेन तथा भारत के मध्य सेतु का निर्माण” इस संकल्पना की पहली कड़ी की शुरुआत लंदन के पार्लियामेंट हाउस से हुई है। इस महान कार्य के पीछे कथा यूके के संस्थापक महासचिव तथा सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा जी की महत्वपूर्ण भूमिका है। उनके इस महत्वपूर्ण योगदान को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। प्रवासी रचनाकार तेजेंद्र शर्मा जी ने जिस नि:स्वार्थ भाव से प्रवासी साहित्य को आगे बढ़ाने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है उससे न सिर्फ प्रवासी साहित्य व साहित्यकार अपितु भारतीय साहित्यकार व युवा पीढ़ी भी प्रेरणा प्राप्त करेगी।
हम सभी के समक्ष यह प्रश्न उठता है कि आज प्रवासी साहित्य की आवश्यकता क्यों है? इस प्रश्न पर जब हम गंभीरतापूर्वक विचार करते हैं तो यह उत्तर प्राप्त होता है कि प्रवासी रचनाकार जिन परिस्थितियों तथा वातावरण में रहकर अपने आसपास की घटित घटनाओं, दृश्यों आदि को अपनी लेखनी के माध्यम से काव्य तथा कहानी के द्वारा उकेरकर पाठकों के समक्ष लाता है, उससे प्रवासी काव्य तथा कहानी में अंतर्निहित भावनाओं व विचारों का गूढ़ार्थ खुल जाता है। प्रवासी रचनाकार जिस देश में रहकर काव्य, कहानी आदि का लेखन करता है, उनके लेखन में वहां की संस्कृति, भाषा, रीति-रिवाज, परिस्थिति, वातावरण आदि की झलक उनके साहित्य में दिखाई देती है।
आज हर कोई अपने देश के अलावा दूसरे देशों की संस्कृति, भाषा, स्थिति-परिस्थित, समस्याओं आदि से परिचित होना चाहता है। इसीलिए आज प्रवासी साहित्य की आवश्यकता है, जिससे दो देशों के बीच न सिर्फ भाषा व संस्कृति का आदान-प्रदान होगा बल्कि आपसी संबंध में मजबूत होंगे।
यदि लंदन (यूके) के प्रवासी रचनाकारों की बात की जाए तो वहां के रचनाकारों ने वहां की संस्कृति और परिस्थितियों का सुंदर एवं सटीक वर्णन अपनी कविताओं और कहानियों के माध्यम से किया है। मैं यहां पर कुछ उदाहरण प्रस्तुत करना चाहता हूं जिससे यह सिद्ध हो जाएगा कि किस प्रकार साहित्य के माध्यम से दो देशों के मध्य आपसी संबंध मजबूत होंगे और साहित्य के माध्यम से सेतु का निर्माण हो सकेगा।
भारत में गंगा, यमुना, सरस्वती से लेकर कई नदियां इस धरती पर प्रवाहित होती हैं। हर नदी की कोई न कोई विशेषता है। भारतीय रचनाकारों ने इन नदियों के बारे में बहुत कुछ लिखा है परंतु भारत में रहने वाले लोग लंदन में बहने वाली टेम्स नदी से अनभिज्ञ हैं। यूके में लंदन शहर में रहने वाले प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा ने अपनी दूरदृष्टि के माध्यम से सूक्ष्म निरीक्षण करते हुए लंदन में बहने वाली टेम्स नदी के संदर्भ में अपनी कविता में लिखते हैं कि –
टेम्स का पानी, नहीं है स्वर्ग का द्वार
यहां लगा है, एक विचित्र माया बाजार।
पानी है मटियाया, गोरे हैं लोगों के तन
माया के मकड़जाल में, नहीं दिखाई देता मन।
टेम्स कहां से आती है, कहां चली जाती है
ऐसे प्रश्न हमारे मन में नहीं जगह पाती है।
टेम्स बस है ! टेम्स अपनी जगह बरकरार है
कहने को उसके आसपास कला और संस्कृति का संसार है।
तेजेंद्र शर्मा जी सिर्फ टेम्स नदी के द्वारा कला और संस्कृति की पहचान कराने तक ही नहीं रुकते हैं। इसी कविता में आगे मां और गंगा का भी जिक्र करते हुए मार्मिक दृश्य प्रस्तुत करते हुए लिखते हैं कि-
बाजार संस्कृति में नदियां, नदियां ही रह जाती हैं
बनती हैं व्यापार का माध्यम, मां नहीं बन पाती हैं।
टेम्स दशकों, शताब्दियों तक करती है गंगा पर राज
फिर सिकुड़ जाती है, ढूंढती रह जाती है अपना ताज।
टेम्स दौलत है, प्रेम है गंगा; टेम्स ऐश्वर्य है भावना गंगा
टेम्स जीवन का प्रसाद है, मोक्ष की कामना है गंगा।
जी लगाने के कई साधन हैं टेम्स नदी के आसपास
गंगा मैया में जी लगाता है, हमारा अपना विश्वास।
तेजेंद्र शर्मा जी ने उपरोक्त कविता में कई भाव, दृश्य, बिंब, प्रतीक आदि बड़े ही सुन्दर ढंग से उपस्थित किए हैं जो न सिर्फ लंदन की कला, संस्कृति का वर्णन कराती है अपितु भारतीय कला व संस्कृति के बीच आपसी संबंध स्थापित करती है।
डॉ. वंदना मुकेश जी इंग्लैंड का दृश्य प्रस्तुत करते हुए अपने काव्य में लिखती हैं कि-
इंग्लैंड के मेरे घर में,
आकाश में उड़ता,
चिड़ियों का कुटुंब,
जब मेरे आंगन में उतर जाता है,
तब
मेरे बचपन का घर
मुझे बहुत याद आता है।

इन पंक्तियों में कहीं न कहीं इंग्लैंड और भारत के बीच तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत किया गया है जो लंदन तथा भारत के बीच आपसी संबंध को दर्शाता है।

नॉर्थ कैरोलिना, अमेरिका से सुधा ओम ढींगरा अपनी “पतंग” कविता में देशों की संस्कृतियों के टकराव को प्रदर्शित करते हुए लिखती हैं –
देसी मांजे से सनी
आकांक्षाओं से सजी
ऊंची उड़ती मेरी पतंग
दो संस्कृतियों के टकराव में
कई बार कटते-कटते बची,
शायद देसी मांजे में दम था
जो टकराकर भी कट नहीं पायी
और उड़ रही है
विदेश के ऊंचे-खुले आकाश पर
बेझिझक, बेखौफ…।
कहना न होगा कि उपर्युक्त रचनाओं में अधिक क्लिष्टता न होने के कारण पाठकों को समझने में काफी आसानी होगी। प्रवासी रचनाकारों ने अपनी रचनाओं में सहज एवं सरल भाषा का प्रयोग किया है, जिससे भावी युवा पीढ़ी कविताओं के भाव को आसानी से समझ सकेगी तथा विभिन्न देशों की कला व संस्कृति आदि से परिचित होगी।
प्रवासी रचनाकारों के जीवनानुभवों का दस्तावेज है प्रवासी साहित्य। यह सच है कि सपने कभी मरा नहीं करते। मेरी दूसरी संपादित प्रवासी काव्य-संग्रह “प्रवासी-पंछी” में संकलित ज़किया ज़ुबैरी जी की कविता ‘सपने मरते नहीं’ इस बात का प्रमाण है। वे लिखती हैं कि-
शोक संतप्त सुनसान खलिहान
मिथ्यावादी – जुड़े मिथ्य से
जकड़े परिधि में
गोत्र जात – पात
अनावश्यक गुप्त अहम्
लबरेज़ उसूलों से वंचित
सपने मर जाते हैं आंखों में।
इसी क्रम में संस्कृति और रीति-रिवाज की बात करते हुए लंदन की रचनाकार जय वर्मा जी लिखती हैं कि-
शाम ढले साजन घर आए मैं दुल्हन -सी शरमाऊं
हुई बावरी मैं तो घर का हर एक दीप जला जाऊं
कदमों की आहट सुनते ही चौखट के पीछे छुप जाऊं
छुपा-छुपी के खेल में अपनी सुध-बुध खो जाऊं
भारतीय संस्कृति के कण-कण में यह रीति-रिवाज समाया हुआ है वही चीज लंदन में भी रचनाकार ने महसूस किया, जिसे अपनी रचनाओं के माध्यम से व्यक्त किया है। दो देशों की संस्कृतियों एवं रीति-रिवाजों के आपसी संबंधों का सबसे बड़ा उदाहरण है जय वर्मा यह कविता।
पचास वर्ष पहले लखनऊ की यादें ललित मोहन जोशी जी के मन में आज भी ताजा हैं। लखनऊ की उन यादों को वे अपनी कविता ‘लखनऊ’ में जिक्र करते हुए लिखते हैं कि-
लखनऊ
अब भी छलकते हैं
मेरे भीतर
तेरे वो राज़
वो लम्हे
चोरी से लिखे खत
बचपन की मसली हुई
पहली मोहब्बत
महानगर की
अमलतास सुबहे
यादों की
उदास शामें
पचास बरस बाद
आज भी उतरती हैं
मेरे भीतर न जाने क्यों?
मेरी तीसरी संपादित पुस्तक “कैलिप्सो” कहानी-संग्रह में भी कुछ इसी प्रकार के दृश्य व चित्र प्रवासी रचनाकारों ने अपने अनुभवों के आधार पर अपनी लेखनी के द्वारा उकेरे हैं। “कैलिप्सो” यह प्रवासी साहित्यकार तेजेंद्र शर्मा जी की कहानी का नाम है। इसी कहानी के आधार पर पुस्तक का शीर्षक दिया गया है। यह दिल को छू लेने वाली मार्मिक कहानी है। ऐसी घटनाएं भारत में भी घटित होती हैं और कहानी का रूप लेती हैं परंतु तेजेंद्र शर्मा जी ने लंदन में घटित उस सत्य घटना को कुछ अलग ही अंदाज में कहानी के रूप में प्रस्तुत किया है। इस कहानी में संपूर्ण दृश्य लंदन का है लेकिन लेखक ने कहानी के अंत तक कैलिप्सो को राज ही रखा है। वैसे कैलिप्सो के बारे में पता करना इतना भी कठिन नहीं है। जागरूक पाठक बड़ी आसानी से समझ जाएंगे।
उपरोक्त संपादित तीनों पुस्तकों में इस पुस्तक में नस्लवादी आलोचना, नारी विमर्श, दलित विमर्श, आदिवासी विमर्श , सांस्कृतिक-ऐतिहासिक बोध जैसे विविध विमर्श के साथ-साथ, वैश्वीकरण, बहुसांस्कृतिकतावाद आदि विविध दृश्यों को एक साथ देखा जा सकता है। ऐसे विविध विमर्श साहित्य को देखने की नई दृष्टि प्रदान करते हैं।
अंत में बस इतना ही कहना चाहता हूं कि हिंदी यह मात्र एक भाषा ही नहीं है अपितु लोगों को आपस में जोड़ने का माध्यम भी है जो आज विश्व स्तर पर लोगों को एक सूत्र में पिरोने का कार्य कर रही है और इस कार्य में न सिर्फ प्रवासी साहित्यकार अपितु भारतीय साहित्यकार भी निरंतर प्रयासरत हैं। इन पुस्तकों को संपादित एवं प्रकाशित करने का उद्देश्य यही है कि वर्तमान समय में भारत से बाहर रहने वाला लेखक क्या सोच रहा है, उसकी विचारधारा क्या है, समसामयिक परिस्थितियों के प्रति कितना सजग है तथा अपने सृजन के प्रति कितना गंभीर है? इन पुस्तकों में इन्हीं प्रश्नों के उत्तर को ढूंढने का एक सार्थक प्रयास किया गया है। इन पुस्तकों में सम्मिलित प्रवासी कवियों एवं लेखकों के कहानियों एवं कविताओं को पढ़कर निश्चित हमें विश्व चेतना के प्रवाह को समझने में मदद मिलेगी।
डॉ. प्रमोद पांडेय
ईमेल –
drpramod519@gmail.com
मोबाइल – 9869517122

1 टिप्पणी

  1. अति सुन्दर कलेवर से संजोया है आपने कैलिप्सो को। शीर्षक सुनकर ही पठन की इच्छा जागृत होती है और जब वह लंदन की पृष्ठभूमि में हो तो “सोने पर सुहागा ।” आत्मीय बधाइयां आपको और आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी को साधुवाद।

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