Wednesday, May 22, 2024
होमलेखडॉ पुष्पलता का ललित लेख - गाँव लौटते हुए पाँव

डॉ पुष्पलता का ललित लेख – गाँव लौटते हुए पाँव

गाँव लौटते हुए अनगिन पाँवों को देख कुछ स्मृतियां ताजा हो गईं।  गाँव में ऐसा कुछ तो है जो खींचता है।  गाँव शब्द आते ही जाग जाती है मन में अनेक मधुर स्मृतियाँ जो शहर में सब कुछ होते हुए भी, एक स्वर्णिम सादे सरल प्रकति के अरण्य में बने कच्चे घरों के बीच बने, इक्के दुक्के पक्केे घर ,नीम के पेड़ों के नीचे बिछी बाणों से बुनी चारपाइयों ,कुर्ते पेटीकोट और ओढ़नी में ढकी बुजुर्ग औरतों ,साड़ी ,कुरता सलवार दुपट्टे में लिपटी लड़कियों की तस्वीर ताजा हो जाती है।  झाड़ू मारकर चूल्हा लीप बनाई नमक की रोटियां, बगल में दूध बिलोकर रखी छाछ की हांडियां मथनी ,पास में मंजे बर्तन का टोकरा।  पास में चारा खा रही भैंसे गाय बछड़े। घास लेने जाती औरतें। गली में मैले कपड़ो में अधनंगे बच्चे ,उन्हीं के बीच में साफ सुथरे भी, नए सुन्दर परिधानों, चूड़ी पायल में सजी नववधुएं भी।
पूरा गांव एक परिवार ,किसकी बेटी- बेटे ने क्या किया इस पर सबकी नज़र। शालीनता से रहने वाले बच्चों की तारीफ।  दबंगो के साये तले झुककर प्रणाम कर चलती छोटी जातियां।  घेरों में गोबर पाथती बिटौड़े बनाती औरतें, सड़कों पर चारा लाती स्त्रियां ,मजदूरी -नौकरी  पर आते- जाते लोग ,तांगे में  शहर जाते ग्रामीण।  साइकिलों पर शहर स्कूल जाते लड़के -लड़की और पगडण्डी के आसपास गन्ने  , गेंहू,सरसो,मकई ,चेरी ज्वार आदि के खेतों काम करते ,चारा काटते लोग सब आँखों के सामने जीवंत हो जाता है।
ताई  सख्त बीमार थी, देखने जा रही थी।  सड़क पर गन्नों की बुग्गियां लिए ,ट्रेक्टर ट्राली लिए आ रहे लोग सड़क घेर कर चल रहे थे।  यह वही ताई थी जो हमारे घर भैस दूध से भाग जाने पर बिना पानी का दूध ,आधा किलो फालतू डालकर गाढ़े मट्ठे के साथ दे जाती थी।  घर जाने पर दूध पिलाती थी।  शादीशुदा होने पर भी मुझे कन्याओं में बैठाकर जिमाती थी।  जो उनके घर में बनता वो हम जो हमारे घर में बनता ताऊ के बच्चे खाते थे। शादी होती तो बारात का पूरा नाश्ता पूरे मोहल्ले की बहुएँ लड़कियां अपने-अपने चूल्हों पर ले जाकर बना डालती थीं। बारात के लिए हर घर से बिस्तर खाट ले जाकर जिसके घेर में जगह होती इंतजाम हो जाता था।
पूरे मोहल्ले के लड़के उनकी सेवा में सगे  सालों की तरह तत्पर रहते थे।  गांव की लड़की को कोई लड़का छेड़ देता तो उसके परिवार को माफ़ी मांगनी पड़ती।  लड़का इतना शर्मिंदा हो जाता कि कहीं रिश्तेदारी में जाकर मुंह छिपाना  पड़ता था।  लड़के वाले के घर पर लड़की का पूरा कुनबा चढ़ाई कर देता था।  लड़के का कुनबा शर्मिंदा होकर माफ़ी मांगता तो बात आई गयी हो जाती थी  वरना दोनों कुनबों में लठ बज सर फूट जाते थे  फिर औरतें लड़की को कोसती तेरी वजह से हुआ।  लड़के वाले लड़के को कोसते।  थाने में कोई नेता दोनों पक्ष का फैसला करवाता।
मैं बचपन में ही पढ़ने नानी के घर चली गयी थी।  जब गांव में दो महीनों की छुट्टियों में जाती तो विशेष आवभगत होती।  गांव के लोग अपने बेटे -बेटियों को मेरे उदहारण देते।  मुझे देखकर और लोगों ने अपनी बेटियां पढ़ानी शुरू कर दी थी।  गांव से रामशरण चाचा के तांगे में सारी लड़कियां  शहर स्कूल जाने लगी थीं।   जब में गांव में जाती थी उस वक्त हर लड़के लड़की और व्यक्ति की नजरें ऐसे देखती जैसे मैं कोई अभिनेत्री थी।  उनके मन में मेरे जैसे बाल बनाने, कपड़े पहनने, पढ़ने की लालसा कुलांचे मारती थी ।  जो बहुत तेजी से लड़कियों को शहर स्कूल भेजने में तब्दील हुई थी।
मम्मी मिटटी के हारे में हर चीज इकट्ठी  मिला ,उपलों को सुलगा दाल या लोकी  हंडिया में चढ़ा बाकि काम निपटाती रहती थी।  बीच- बीच में एक आध बार देख लेती थी। बाद में रोटी सेक देती थी।  चूल्हे पर बनी उन घी लगी रोटियों पर घी डालकर दी दाल या लौकी का स्वाद ,वो खिचड़ी, वो साग मक्के की रोटी ,वो छाछ वो ताजा नमक की रोटी पर सफेद मक्खन मुँह में घुलता जा रहा था।  कितने साल बाद गांव जा रही थी।
गांव में घुसते ही दिखा केम वाला बाबा ,वो पेड़ जिसे हम दूर से दिखते ही सलाम करते थे।  मम्मी कहती थी ताऊ का लड़का कल्लू उसी की तरफ मुंह करके पेशाब करने के कारण मर गया था।  उस वक्त हम विशेष ध्यान रखते थे किस दिशा में   मुँह करके बैठना है।  आज भी सब अंध विश्वास मानने के बावजूद मैंने आदर  से हाथ जोड़ लिए थे ।  जैसे वह हमारे गांव का दुर्वाशा ऋषि था।  सबके कष्ट हरने वाला भी  था।  लोग उससे मन्नत मांगते थे।  पूरी होने पर सेनक जिसमें एक पान, बताशे, चावल, पैसा, बूरा  आदि उसकी जड़ में रखकर आते थे।  मम्मी ने बताया था कि एक बार वह सेनक देकर आई तो केम वाला बाबा बहुत जोर से हँसा था।  एक पेड़ पूरे गांव को संचालित करता था।  सब उसे पूजते और उससे डरते थे।
औरतें घास लेकर घर जा रही थीं।  किसान -मजदूर घर लौट रहे थे और अब मैं गांव की और जाने वाली पगडण्डी पर आ गयी थी। जहाँ शादी के बाद जब भी कभी गांव जाना होता पति जानबूझकर गोरी तेरा गांव बड़ा प्यारा मैं तो गया मारा आके यहां रे चला देते थे ,मैं मुस्कराती रहती थी।  अमोल पालेकर  वाली वो पिक्चर स्मृति  में ताजा हो जाती थी। ट्यूबवेल पर कई लोग नहा रहे थे।  पास में पानी की बोतल होने के बाद भी मुझे उस ठन्डे पानी को पीने की इच्छा हो गयी थी।
गाना  आज वह तो नहीं दूसरा चल रहा था मगर ताई की स्मृतियों   में व्यवधान खल रहा था।  गाना बंद कर दो, मैंने कहा ,तो पति ने गाना बंद कर दिया था।  गांव थोड़ा बदल गया था।  लड़के मोबाईल लिए थे। अधनंगे मैले बच्चे नहीं मिले।  घर पक्के हो गए थे।  सड़क भी बनी थी। मगर उसके आसपास शौच उसी तरह बिखरी पड़ी थी।  लोग कम दिख रहे थे।  औरतें साड़ी पहने थीं।  लड़के और आदमी कुर्ते पजामे में थे।  धोती इक्का दुक्का थी।
यह गांव की वही सरहद थी जहां मम्मी बताती थी कभी 200  साल पहले बीमारी फैली थी।  गले में कुछ होकर व्यक्ति पट से मर जाते थे।  एक ले जाते चार मरे मिलते।  मेरे तीन बाबा ,दो दादी,  एक ताऊ और एक बुआ भी मरे थे।  मम्मी बताती थी गांव के बाहर एक साधू था उसने बताया था कि गांव पर भारी संकट है। कोई चूल्हा न चढ़ाये ,दूध न बिलोए ,चक्की न चलाए बाकि मैं संभाल लूंगा। बुआ ने दूध बिलो दिया था।  अब सोचती हूँ प्लेग  फैली होगी। बाद में मम्मी कहती है साधू ने सारे गांव का दूध मंगवाकर गांव के चारों तरफ लकीर खिंचवाई थी।
ताई के घर पहुंची तो ताई की मरणासन हालत देख बहुत दुःख हुआ।  वह मुस्कराकर बैठने की कोशिश करने लगी।  हम दोनों की आँखों से बहते आंसू बिना कहे एक दूसरे की भाषा समझ रहे थे।  मैं ताई का हाथ पकडे कुर्सी पर थी।  भतीजे- भतीजी और मोहल्ले के लड़के -लड़की मुझे देखने  को जुट गए थे।
बाथरूम जाने के लिए  उठी तो भाभी बिना कहे समझ गयी अब उन्होंने टॉयलेट बना ली थी जो साफ सुथरी थी।
भतीजी कांच के गिलासों में कोल्ड  ड्रिंक  ले आई थी।  मुझे  याद आ गए थे शादी के दो साल बाद आने पर ताई के दिए आटे के वे गोंद के लड्डू जो उसने घरवालों के लिए बनाये थे।  मेरी वजह से सारे ख़त्म हो गए थे।  हमने तो एक- एक ही खाया था बाकि मुझे देखने आये बच्चों बड़ों की तरफ बढ़ाने पड़े थे।  जब बाद में मैंने कहा तो ताई बोली थी लड्डू तेरे से बढ़िया क्या।  मैं इस बात से संतुष्ट थी ताई साफ सुथरी नहाई धोयी लेटी  थी।  उसकी सेवा हो रही थी। मैं ताई के पीछे लगी गणेश की मूर्ति से प्रे कर रही थी।  मेरी ताई का कष्ट हरो प्रभु।  मेरी  आँखों से  आँसू गिर रहे थे।  ले जाना है तो एक दम ले जाओ वरना स्वस्थ करो। भाभी मेरे पास आ गयी थी।  ए बबली रोवे ना सभी को जाना  एक दिन।  ताई बोली रोये ना बेटी ऐसी मौत सबको दे रामजी।  सब ध्यान रख रे।  खुश रह बेटी।  उसने हाथ बढ़ाया तो भाभी ने उसका न उठ रहा हाथ मेरे सर पर रख दिया था।  भतीजी चाय बिस्कुट नमकीन ले आई थी।  मुझे ताई के पिलाये दूध, लड़ाए माँ जैसे लाड़ याद आ रहे थे।  कभी लगा ही न था वह ताई थी।  कभी मम्मी और ताई की लड़ाई बजती तो हम ताई के पास खेल कूद रहे होते।  मम्मी कहती वहां मत जाओ हम कहते क्यों हम तो जायेंगे।   दो दिन बाद उनमें फिर सुलह हो जाती।  अक्सर तब ताई या मम्मी बच्चों के लिए कुछ बनाकर भेजती।  जो हम देकर आते या भाई ताऊ के लड़के लेकर आते।  झगडे के बाद भी दूध -मठ्ठा आता रहता।  यह दोनों तरफ ही था।  जब ताई की भैस दूध से भाग जाती तो हमारे घर से जाता।  दूध के पैसे तो चले जाते आ जाते मगर दुगना  आता  ,उससे ज्यादा हम एक दूसरे के घरों में पी जाते। मुझे देखकर ताई में जान आ गयी थी।  वह उठकर बाथरूम गयी, भाभी ने पकड़ रखी थी।  वह बोली बबली को देखकर   माँ खड़ी हो गयी।  आस- पास की सारी ताई- चाची -भाभियाँ वहीँ आ गयीं थीं।
मेरे मम्मी- पापा- भाई, अन्य चचेरे भाई शहर में बस चुके थे।  ये भी जाने वाले थे।  बेटियां भाई के यहां पढ़ा रहे थे।  गाजियाबाद ,शामली और मेरठ आदि में थे।  आधा गांव खाली था।  एक आध बूढ़ा -बूढी जो देखकर खुश हुए थे बचे थे।  जबरदस्ती दस -दस रूपये दिए सबने। भाभी ने आठ बजे ही खाना लगा दिया था।  दोपहर में खाया नहीं था सो थोड़ा खा लिया था ,जो गैस पर ही बना और शहरी तरीके से ही खिलाया था। ताई खड़ी होकर अंदर जाने लगी ,भतीजी भीतर ले गयी, जबरदस्ती दोसो- दोसो  रूपये हमें दिलवाये।  ताई को देखकर मैं बोली आप जल्दी अच्छी हो जाओगी।  अब तो मुझे भी लग रहा है भाभी बोली।  हाँ ये ठीक हो जाएँगी।  लिक्विड पिलाओ बाजार का जूस न देना।  इन्होंने कहा ,घर का देना। आते वक्त मुझे लग रहा था शायद अगली बार ताई नहीं मिलेगी।  गांव से विदा ले केम वाले को सर झुका चली आई।  बिटोडे एक आध ही थे।  आधा गांव उजड़ चुका था।  एक हफ्ते बाद  इन्होंने मेरे हाथ में फोन दिया ,भाई था।  माँ चली गयी बबली ,कब ?कल रात, इतवार को आ रहे हैं मेहमान फोन इन्हें पकड़ा दिया था।  अब गांव पूरा उजड़ गया था मैं जैसे ताई की तेरहवी सेअपने प्यारे गांव  से भी विदा होकर लौट रही थी।  जिसकी धरती मेरी विवश माँ जैसी और प्रकृति  बूढ़े पिता जैसी उदास थी।
तेरहवीं में आये मेरे माँ पिताजी भी मुझे उस उदास गांव जैसे लगे जो रोजी की रोटी की तलाश में शहर जाते हैं मगर सीने में मर जाता है ,उजड़ जाता है एक गांव।  कसकता है प्रिय जन की तरह। उम्र भर जैसे याद आती है माँ की गोद।
मन कहता है
लुकती-छिपती प्रीत वो
कहाँ गया नवनीत वो
दूध छाछ की रीत वो
नाचे भँवरे चटकी कलियाँ
इठलाती अल्हड़  सी गलियां
आँगन वाले नीम तले वे
खिलबतियां हँसती फुलझड़ियाँ
मृदुल- मृदुल संगीत वो
कहाँ गया मनमीत वो
वें अमुवा की डार वो झूले
लौट रहे परदेशी भूले
पनघट पर जुटती पनिहारन
गाय-भैस, घूंघट, पथिहारन
बहुवों के बंटते सिंधारे
भावज भेजी रीत  वो
बागों   में कूकी कोयलया
मुदित हवा पहने पायलया
मोर पपीहे मेंढक बगुले
खेत- क्यार, अमिया और फलियां
पुलकित-पुलकित मौसम छलिया
कहाँ गए  जनगीत वो
लुकती -छिपती प्रीत वो
कहाँ गया नवनीत वो
दूध छाछ की रीत वो
डॉ. पुष्पलता
डॉ. पुष्पलता
संपर्क - 09458513369
RELATED ARTICLES

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest

Latest