अक्सर देखा गया है आज कल के बच्चों से प्रताड़ित हो कर बुजुर्गों को बृद्धालय का आश्रय लेना पड़ रहा है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? बच्चे तो कल भी थे आज भी हैं। माँ बाप भी कल जैसे थे आज भी वैसे हैं। फिर कल और आज में फर्क क्या है जो पिता माता ज्यादा संख्या में एक उम्र के बाद बृद्धाश्रम का आश्रय लेने लगे हैं?
        संयुक्त परिवार में रहकर सब के साथ होने का सुख भी था दुःख भी था। सुख दुःख में सब एक दूसरे से जुड़े रहते थे। एक दूसरे के कष्ट-सुख में सब का अपना-अपना दायरा होता था। लेकिन समाज में कल जो रीति-रिवाज चलन में थे क्या आज हैं? माँ बाप अपने बड़ों से, तो बच्चे अपने माँ बाबुजी व बुआ मौसी इन सब से जुड़कर एक सयुक्त परिवार में सुख दुःख के मायने जिम्मेदारियां सीख रहे थे। पीढ़ी दर पीढ़ी जैसे-जैसे परिवार में लोग कम होते गये परिवार के मायने बदलते गये। पहले बड़ों से जो संस्कार मिलता था अब बडें अपने बच्चों को वह संस्कृती देने के लिए कितना वक्त दे पाते हैं? क्या बच्चे वो संस्कृती को अपना रहे हैं? अगर नहीं तो क्यों?
बच्चों के प्रति माँ-बाप की जम्मेदारी पहले से बढ़ गई। पैसों से खरीदने वाले सुख सुविधाएं हर पिता-माता अपने बच्चों को देने का लक्ष्य बना लिया। जितना भी कमाएं उतना खर्च भी तो करना पड़ जाता है। बच्चों की चारों ओर जो बढ़ता असुरक्षा भाव है उस से बचाने पिता-माता बच्चों के लिए सोने के पिंजरे बना दे रहे हैं। चारों ओर सुविधाओं से लैस। जिससे बच्चा बुरा न देख, सुन, बोल के दायरे में रहकर जीवन की सच्चाई से दूर रह जाते हैं। यानी स्पून फीडिंग की जिंदगी देते रहे हैं। हर कोई चीज़ उनके कहने से पहले मिल जाती है। जिससे जीवन के मुश्किलों का सामना करने का मौका ही नहीं मिलता। जिससे वे खुद को अपने लिए एक सुरक्षित माहौल बनाने में सक्षम हो सके। मगर पिता-माता उससे पहले ही उनके पैरों के नीचे के काँटे चुनचुन कर हटा देते हैं ताकि बच्चा आसानी से रास्ता पार कर सके। इसलिए बच्चे भी इन आसान रास्तों की आदत बना लेते हैं और कोई जोखिम भरा काम करने की हिम्मत उनमें नहीं होती। जिससे बड़े काम करने में या तो सोशल मीडिया के सामना करने में तनाव, अन्यमनस्कता और अविश्वास महसूस करते हैं। पिता माता अपने दायरे में सही सोचते हैं किंतु जब स्पर्धा हो तब ही बच्चे कुछ सीखते हैं। जिंदगी के भाग दौड़ में वही बच्चा प्रथम आता है जिसने स्पार्धाओं को अति आसानी से खुद के बलबूते पार करता है। वह तनावपूर्ण जिंदगी से निपटने का हर रास्ता जानता भी है।
       बड़े, जरूरत के सामान जुटाने से पहले बच्चों को अपने बैग, जूते, पुस्तकें, कमरे और अपना बिस्तर आदि समेटकर रखना जो बच्चों की जिम्मेदारी में आती है, उन्हें सिखाने के बजाय उनसे पहले ही पिता-माता सु-सज्जित कर तैयार देते हैं। जब बच्चे सीखेंगे तब उन्हें एहसास होगा उनकी जिम्मेदारी अपना काम खुद करना होता है ना कि यह पिता माता की जिम्मेदारी है। और ऐसे ही परिवार की जिम्मेदारी का एहसास धीरे धीरे उन पर बढ़ाया जा सकता है जिससे उनमें जिम्मेदारी का भाव पैदा हो।
इसतरह पिछड़े हुए बच्चे सहनशीलता, सहिष्णुता खोकर हर चीज़ अपने तक पहुँचाने के जिद पर उतर आते हैं। जिससे दुनिया से तालमेल बिठा न पाने का गम से इंट्रोवर्ट होकर मानसिक बीमारियों की बढ़ोतरी हो रही है। जब बच्चा संयुक्त परिवार में रहता था वह दुःख-सुख के हर भाव, ममता, कष्ट, मेहनत, सभी एहसासों से होकर उसे जीवन का सामना करने का हौसला भी मिलता था जैसे आग में तपकर सोना निखर आता था ठीक वैसे ही सभी के बीच ही जीने की तरीका सीख लेता था।
      अब की स्थिति में बच्चों ने भी खुद को हमारी संस्कृति को अपनाने में और अँधा-धुंध विश्वास करने में परहेज करने लगे। हर चीज़ में सच्चाई और वैज्ञानिक तत्व को ढूंढने परखने लगे। फिर परिवार छोटा होने से बच्चों का स्वतंत्रता भी बढता चला गया। वे परिवार से ज्यादा अपनी हम उम्र के दोस्तों को ज्यादा प्रधान्यता देने लगे। धीरे-धीरे वे अपनी मर्ज़ी को पालने लगे। जो संस्कार उन्हें बाधा देने लगा उन्हें आड़े आँख करते गए। माँ बाप तो माँ बाप हैं, बच्चों के आगे मजबूर होते गए। उनके प्यार, ममता बच्चों को कायदे में रहने से ज्यादा उनकी सुख सुविधाओं पर टिकी रही। वे बच्चों के सामान्य मुश्किलें से भी बड़े विचलित हो जाते हैं और मजबूर नज़र आने लगे। अगर बच्चा अपने सामान्य मुश्किलों का हल खुद ही निकालने लगे तो उनमें खुद के आत्मविश्वास बढ़ने लगता है। जब बच्चे जिम्मेदारी उठाने के बजाय उनकी हर बात को मनवाना उनका हक़ समझने लगे तब हर छोटी बात उन्हें मुश्किल दिखने लगता है और मानसिक तनाव बढ़ेगा। जब वे दादा-दादी के साथ होते थे वे उन्हें उनकी जिम्मेदारियां और हक़ के बीच के दायरे को कम होने नहीं देते थे। लेकिन दादा-दादी के परिवार से दूर होने से माँ बाप की मजबूरी बच्चों की मन मानी को बढ़ावा देता गया।
        पहले कभी कबार पितामाता के अनुभव काम आती थी पर अब वे सिर्फ दादीमा की नुस्खे तक ही रह गए हैं। बदलते समय के साथ-साथ नई तकनीकी का प्रभाव जोर पकड़ता गया और बुजुर्गों का अनुभव, जरुरत के दायरे से कम होते गए। पढ़ाई के क्षेत्र में बढ़ते तकनीकी और स्पर्धा से समाज में पुराने अनुभव, पुराने कार की भांति एंटीक वस्तुओं जैसे सिर्फ शो केस में रखने के लायक ही रह गये। इसलिए बड़ों के अनुभव से ज्यादा बच्चों के अनुभव सराहना की पात्र बनते गया। क्योंकि इंटरनेट के जमाने में घण्टों का काम मिनटों में और हर प्रश्न का उत्तर टैब मोबाइल पर मिल जाने से बड़ों का महत्व कम हो गया।
बच्चों के बढ़ते कदम को देख कौन पिता माता गर्वान्वित न होंगे? बच्चों पर भरोसा, स्नेह, प्यार हद से ज्यादा बढ़ गया कि वे कभी ये सोचना भी मुनासिब न समझे कि अगर बच्चे कभी धोखा दे दें तो उनका क्या होगा। उनकी सारी मेहनत की कमाई, पैसे बच्चों पर उनकी उज्वल भविष्यत पर लुटाने के बाद उनकी आखिरी अवस्था में उनके आगे की जिंदगी के लिए, उनके खुद की सुरक्षा के लिए कुछ न बचता। अगर बेटा परिवार की जिम्मेदारी अपनी जिम्मेदारी समझ हाथ में लिया तो अच्छा वरना पिता माता के दायरे से बच्चे बहुत ऊपर उठ जाते हैं और बड़े बुजुर्ग पिता-माता जमीन पर रेंगते नज़र आते हैं। जबतक सच्चाई उनके सामने आती है तब-तक बहुत देर हो जाता है, तब पिता का अवकाश प्राप्त का समय उन पर हावी हो जाता है। काम के बोझ से थकहार कर जब उन्हें बच्चों के सहारे की जरुरत पड़ने लगती तब उन्हें हकीकत का पता चलने लगता और तब तक बहुत देर हो चूकी होती है।
         इन सब के चलते बच्चे अपनी जरूरतें और दोस्तों के बीच हो कर अपने आप में स्वार्थी होने लगे हैं। उनके दायरे भी उनकी जरुरत के हिसाब से बदलने लगा है। आवश्यक मुताबिक़ उनकी दायरे में परिवार के अलावा शिक्षा, परिसर, दोस्त और समाज में अपनी एक पहचान बनाने की इच्छा बढ़ने लगी जिसके लिए पितामाता हर स्वार्थ से ऊपर रहकर उनके लिए जीवन लुटा देते। इन सब को हासिल करने के अलावा माँ बाप की निस्वार्थ सेवा उन्हें उनके हक़ को भ्रमित कर देता है और सिर्फ वो उनसे कुछ लेने के अलावा कुछ समय उनके लिए निकालना या उनका परवाह करना जरुरी नहीं समझते।
      उनके जीवन में खुशियों की जरुरत उनकी माता पिता की बदौलत और उनकी निस्वार्थ सेवा से ही है ये बात को नज़रअंदाज़ कर देते हैं और इन सारी उपेक्षा के कारण कई पिता-माता खुद बृद्धाश्रम को आश्रित होते हैं या तो बृद्धाश्रम में उन्हें भेज दिया जाता है।
       समाज में तकनिकी क्षेत्र में हो रहे अभिबृद्धि बच्चों को मजबूत करता है। तकनिकी क्षेत्र में नये-नये परिकरणों का उत्पादन हो रहा है। जो काम कभी घंटों में होता था अब मिनटों में होने लगा। साधरण इंडियापोस्ट में खबर पहुँचने में कई दिन लगते थे अब उसकी जगह मेल, फोटो की जगह वीडियो लेने लगी। इंटरनेट ने खबर पहुंचाने का काम भी आसान कर दिया। बच्चों के दायरे हर क्षेत्र में बढ़ते ही गए। बच्चे अपने पिता माता के ऊँगली पकड़ कर नेट का उपयोग सिखाने लगे हैं। यह बदलाव भी जरुरी था।
      इस समाज में बढती तकनीकी का प्रयोग और सही तरीके से इन का प्रयोग जानना भी जरुरी हो गया। एक दिन था एक छोटी से काम के लिए दर-बदर भटकना पढ़ता था मिलों दूर पैदल चलकर काम पूरा करना होता था। जो कई दिन महिना लग जाते और तब परिवार की एक अहं भूमिका होती थी ऐसी हालातों में परिवार की मदद से बहुत ही कारगर साबित होता था पर आज घर बैठे इंटरनेट पर सारे काम आसानी से हो जाते हैं। न सगी संबंधियों की जरूरत न ही किसी से सलाह मसवरा करने की। न बुजुर्गों की अनुभव काम आते न उनकी दूरदर्शीता। क्यों कि ये दुनिया तो बुजुर्गों के लिए बिलकुल ही नया है और बच्चे बड़ों को तकनीकी सिखाने लगे।
        आज के प्रतियोगिता के ज़माने में बच्चों के ऊपर काफ़ी बोझ बढ़ता जा रहा है। पढाई में एक दूसरे से आगे जाने की चाह, अच्छे कॉलेज में दाखिला के लिए रात दिन एक करके पढ़ाई करना उपर से कंप्यूटर का जमाना जिससे बच्चे घर परिवार में रहकर भी बड़ों के स्नेह प्यार से दूर होते जा रहे है। पिछले दिनों कोरोनाकाल में यही तकनिकी के आधार पर जीवन को एक नया मोड़ मिला। इंटरनेट के उपयोग से घर बैठे शहरों तक पहुंच गए। जो उस समय की जरूरत थी। और उस एक साधन के बिना कई देश अलग-थलग पड़ सकते थे। मगर तकनीकी दायरा इतना बढ़ा कि पूरी दुनिया एक होकर कोरोना से लड़कर जीत हासिल की।
       तकनिकी की अपनी अच्छाइयाँ-बुराइयाँ भी हैं, जिसे सही तरीके से उपयोग करने पर ही लाभकारी होता है। क्या बच्चे क्या बड़े मोबाइल के इस युग में 24 घंटे नेट की बदौलत पूरा समय नये नये एप्प पर बने रहते हैं। परिवार के साथ हो कर भी एक कमरे में पास होकर भी पास नहीं होते है। इस तरह परिवार में होकर भी उनसे दूर होते जाते हैं। सिर्फ अपने सहुलियत से उपयोग करने पर उसका लाभ मिलता है। वरना पास बैठे बच्चे भी ब्लू व्हेल जैसे खेलों को मोबइल में अपलोड कर डिप्रेसन का शिकार होने लगते हैं यह बात कानों-कान खबर नहीं हो पाता।
            इन दिनों नेट सर्वोपरी हो गया है। हर क्षेत्र में इसकी जरुरत पड़ने लगी।  इस तरह बच्चे क्या करते हैं किससे बात करते हैं और नेट पर रहकर कोई गलत इंसान से दोस्ती कर कहीं रास्ते से भटक तो नहीं रहे इन सब की चिंता पिता-माता में असुरक्षा का भाव बढ़ा दिया। बस इतना ही नहीं कई बार बड़े भी इसके चपेट में आकर उनकी पूरी जिंदगी की कमाई को भी गंवा देते हैं।
       बच्चों की सुरक्षा के लिए क्या और किस तरह की कदम उठा जाए ये भी चिंता का विषय बन गया है। जब तक बच्चे खुद सही गलत न समझे तब तक पिता माता भी कुछ नहीं कर सकते ऐसे हालात पैदा हो गए हैं। इसके लिए जबतक स्कूलों में बच्चों को सही-गलत का शिक्षा के साथ परिवार और आदर्श को अगर सिखाया न जाए तबतक उनका भविष्य, उनके परिवार का भविष्य भी खतरे में पड़ सकती है। ये समाज के लिए बहुत ही सोचनीय है। और अपने दायरे में रहकर अगर कोई भी काम करते हैं तब धोखा होने के गुंजाइश कम रहता है।
लता तेजेश्वर ‘रेणुका’
संपर्क – latakottapalli@gmail.com

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