आपने गरकद (boxthorn tree) के पेड़ के बारे में सुना है? इसी गरकद के पेड़ से अपनी बात शुरू करता हूँ। यह दरअसल एक पेड़ नहीं बल्कि एक तरह की बड़ी झाड़ी होती है। विगत कुछ वर्षों में इस्राइल ने अपनी सीमा पर बड़ी संख्या में इसके पौधे लगाए हैं। स्वाभाविक सा एक प्रश्न है कि आखिर किसी छायादार, फलदार या कोई और वृक्ष लगाने के बदले लाखों की संख्या में इस झाड़ी को इस्राइल अपनी सीमा पर क्यों लगा रहा है? वास्तव में इसके पीछे एक मान्यता है कि “क़यामत का दिन तब तक नहीं आएगा जब तक मुसलमान यहूदियों से नहीं लड़ेंगे और इस लड़ाई में जब यहूदी पत्थरों और पेड़ों के पीछे छिप जाएंगे तब पत्थर और पेड़ कहेंगे, ‘हे मुसलमानों! हे अल्लाह के गुलामों! मेरे पीछे एक यहूदी है, आओ और उन्हें मार डालो”। केवल गरकद  का पेड़ ऐसा नहीं करेगा, क्योंकि यह यहूदियों का पेड़ है। और यह मान्यता यूँ ही हवा हवाई नहीं है,  बल्कि हदीसों में इसका जिक्र आया है।  हदीस अल-बुखारी और  हदीस  मुस्लिम में यह बात कही गई है।
महत्वपूर्ण यह नहीं है कि हदीसों में इस पेड़ के बारे में क्या कहा गया है या इस्राइल यह पेड़ क्यों लगा रहा है। महत्वपूर्ण यह विश्वास है कि कयामत का दिन तब तक नहीं आएगा जब तक मुसलमान यहूदियों से नहीं लड़ेंगे। यानी कि मुसलमानों को यहूदियों से लड़ना ही लड़ना है।  कयामत एक ऐसा विश्वास है, जिसपर सभी ईमान वाले यकीन रखते हैं और उसके शीघ्र आने के आग्रही हैं क्योंकि आखिरत का दिन आए बिना जन्नत में जाने का सपना पूरा नहीं होगा। कयामत तक कब्रों में पड़े रहना है।  इसलिए कयामत का दिन जितना जल्दी आए उतना अच्छा। इसके पीछे एक मान्यता और भी है कि जब तक दुनिया के सभी लोग ईमान नहीं ले आएंगे तब तक कयामत नहीं आनी है, इसीलिए हर ईमान वाले पर दावाह फर्ज है “ दावाह यानी मुशरिकों को दीन में आने का आमंत्रण”। यहाँ यह भी जिक्र करना दिलचस्प होगा कि यहूदी धर्मांतरण में विश्वास नहीं करते हैं। यानी कि जो व्यक्ति जन्म से यहूदी नहीं है वह कभी भी यहूदी नहीं बन सकता है। इसलिए आपने कभी किसी यहूदी मिशनरी का नाम नहीं सुना होगा। कोई यहूदी यह भी नहीं कहता कि सिर्फ उसका ही धर्म सबसे अच्छा है, इसलिए सबको यहूदी बन जाना चाहिए। यही कारण है कि यहूदी दुनिया के किसी भी हिस्से में रहें वे वहाँ अच्छे नागरिक, अच्छे पड़ोसी साबित होते हैं और दूसरों के लिए संकट नहीं खड़ा करते हैं।
दिलचस्प बात यह भी देखिए कि इस्लाम, यहूदी और  ईसाई तीनों ही एक ईश्वर में विश्वास करने वाले हैं। यहूदी भी अल्लाह की ही भांति एक यहोवा में यकीन रखते हैं। फिर भी आपस में तीनों धर्मों में धर्म के नाम पर सबसे ज्यादा लड़ाइयाँ और हिंसा हुई है।
अब जरा सोचिए कि वर्तमान का इस्राइल देश, जिसकी स्थापना 1948 में हुई, अगर नहीं होता, कहने का अर्थ कि इसकी स्थापना नहीं हुई होती। अगर फिलिसतीन और इस्राइल का यह वर्तमान विवाद नहीं होता तो क्या  मुसलमान  यहूदियों से नहीं लड़ते? सच तो यह है कि  वे तब भी लड़ते। दक्षिण ध्रुव पर जाकर लड़ना होता तो वहाँ जाकर लड़ते। पाकिस्तान या ईरान हमास का समर्थन इसलिए नहीं कर रहे हैं कि वे फिलिस्तीनियों की जमीन वापस चाहते हैं बल्कि इसलिए कर रहे हैं, क्योंकि हमास वाले  यहूदियों से लड़ रहे हैं। क्योंकि इसके पीछे उनकी धार्मिक मान्यता है।   इसीलिए हमने देखा कि पाकिस्तान से आए आतंकवादियों ने जब मुंबई पर हमला किया तो उन्होंने उन स्थानों को भी टारगेट किया जो यहूदियों के केंद्र है। ईमान वाले विश्वासियों के लिए यह जो धरती का जीवन है, फ़ानी है, बेकार है, एक इम्तिहान है, असली जीवन तो कयामत के बाद, मृत्यु के बाद  ही शुरू होना है, इसलिए इस जीवन में वे मरने के लिए हमेशा तत्पर हैं। हमास के लड़ाकों को मालूम था कि वे इस्राइल पर अगर हमला करेंगे तो इस्राइल बदले की कारवाई करेगा। लोग मारे जाएंगे, लेकिन वे मरने के लिए तैयार हैं क्योंकि वे यहूदियों से लड़ रहे हैं। इसके पीछे के एस्केटोलॉजी (eschatology) को समझे बिना  इस मानसिकता को नहीं समझा जा सकता है। सामान्य रूप से यह कहा जाता है कि इस्राइल ने फिलिस्तीनियों की जमीन पर कब्जा कर लिया, इसलिए कई लोग  यह कहते हैं कि हमास या उस जैसे अन्य आतंकवादी संगठनों के द्वारा किए गए दुष्कृत्य मान्य हैं, वाजिब हैं क्योंकि ऐसा वे अपनी स्वतंत्रता के लिए कर रहे हैं। हालांकि मानवता और प्रेम की दुकान चलाने वाले यह नहीं बताते कि धार्मिक नारे लगाते हुए सामान्य नागरिकों की नृशंस हत्या करना, लड़कियों का अपहरण करना, उन्हें नंगा करके सरे-बाजार घुमाना कैसे मानवीय कृत्य कहा जा सकता है? मणिपुर में हुई एक घटना से इस्राइल में हुई घटनाएं क्या कम जघन्य है? क्या ये घटनाएं मानवता के चेहरे पर बदनुमा दाग नहीं है? क्या आदमी और आदमी में फर्क होता है? क्या अपने विश्वासों के कारण कोई आदमी कम आदमी हो जाता है?
खैर! आगे बढ़ते हैं। आप जानते हैं कि पवित्र कुरान में कितनी बार इस्राइल का जिक्र आया है? लगभग 43 बार, इसके अलावे हदीसों में में भी इस्राइल का जिक्र है। पवित्र कुरान में एक एक चैप्टर ही है, अल-इसरा या बनि-इस्राइल ( بني إسرائيل)  । तो पवित्र कुरान में जिस इस्राइल का जिक्र है, वह कहाँ था? क्या इस्राइल नाम की कोई जगह थी या नहीं? इस्राइल यहूदियों की जगह थी या नहीं। क्या यह सच नहीं है कि उन्हें वहाँ से  बेदखल कर दिया गया। क्या 1948 में वे अपनी ही जगह पर वापस नहीं आए?
चलिए इससे आगे बढ़कर देखते हैं। यह जो तर्क है कि फिलिस्तीनी अपनी जगह को वापस लेने के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। उसी तर्क की कसौटी पर जरा देखिए कि जब भारत का बंटवारा हुआ तब पाकिस्तान (जिसमें आज का बांग्लादेश भी शामिल है) में सत्तर से अस्सी प्रतिशत जमीनें हिंदुओं की थी। क्या यह सच नहीं है कि हिंदुओं की जमीनों पर ईमानवालों ने जबरन हिंसा करके कब्जा कर लिया।   तो फिलिस्तीन के तर्क के अनुसार ही भारत के हिंदुओं को अपनी जमीन वापस लेने के लिए  पाकिस्तान पर हमले करते रहना चाहिए था। लेकिन ऐसा कभी नहीं हुआ। क्योंकि इसके पीछे कोई धार्मिक प्रेरणा नहीं थी। पाकिस्तान से आए हिंदुओं ने भारत भूमि को अपनी भूमि स्वीकार किया एवं जीवन को आगे बढ़ाया। आज वे भारत के सबसे अधिक समृद्ध और प्रगतिशील समाज हैं।   इसी क्रम में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि वर्तमान इस्राइल पर 1200 वर्षों से किसी न किसी रूप में मुसलमानों का शासन रहा इसलिए इस्राइल मुसलमानों की भूमि है और यहूदियों का इसपर कोई अधिकार नहीं है। इसी तर्क पर जरा सोचिए कि भारत पर भी विगत  आठ सौ वर्षों से किसी न किसी किसी का  शासन रहा, तो फिर यह देश तो फिर उनका ही हो जाना चाहिए!
इस्राइल पर हुए हमले  के वर्तमान घटनाक्रम को अगर देखें तो यह दिखता है कि  हमास के पीछे दूसरी शक्तियां खड़ी हैं और उन्हें सामरिक और तकनीकी  मदद कर रही हैं, जैसा कि कहा भी जा रहा है कि इन सबके पीछे ईरान है, जो हमास को हथियार और प्रशिक्षण दे रहा है। लेकिन एक प्रश्न यहाँ उठता है कि ईरान तो एक शिया राज्य है, जबकि फिलिस्तिन सुन्नी। तो फिर एक शिया राज्य से सुन्नी कैसे मदद ले रहे हैं?  इसका उत्तर समझना बहुत आसान है कि ईरान का  इसमें कोई नुकसान नहीं है। उसे तो मालूम है कि इस्राइल जब प्रतिक्रिया करेगा तो हमास या फिलिस्तिनी लड़ाके मारे जाएंगे, जो कि सुन्नी हैं। ईरान के दोनों हाथों में लड्डू है। एक तरफ यहूदी मारे जा रहे हैं, दूसरी तरफ सुन्नी।

2 टिप्पणी

  1. नीरज नीर जी इस्राइल व फ़िलस्तीनी युद्ध की जो विवेचना की है वह बहुत सी जानकारी देती है । ये भी तर्क बार बार इस्राइल तथा फ़िलस्तीन व ईरान के बारे में कहे जा रहे हैं। भारत से आपने तुलना कर इसे समझाने का जो प्रयास किया है वह सराहनीय है।
    पर भूगोल बदलता रहता है । अगर रेडइन्डियंस आकर अमेरिका के किसी भूभाग पर अपना अधिकार जताने लगेंऔर वर्तमान में रह रहे विभिन्न देशों के नागरिकों के व्यक्तियों को मारने लगे तो क्या होगा? सुमेरियन। बेबिलोनिया , रोम सभी एक पंक्ति में एक के बाद एक खडे हैं , उनका क्या होगा?
    इरान के शिया होने की बात आपने लिखी ……. वर्तमान इतिहास। हाल की अफ़ग़ानिस्तान की घटनायें गवाह हैं कि जब भी इस्लाम की बात आती है तब तक , इस्लाम के ७५ फिरके एक हो जाते हैं , भारत के मुसलमानों तो वही देखते सुनते हैं जो उनके आका मस्जिदों में उन्हें समझाते हैं। ।
    इसे भी ध्यान में रखना होगा।
    एक विचारणीय लेख के लिये धन्यवाद।

  2. neerajcex@gmail.com
    नीरज जी..आप बहुत अच्छा लिखते हैैं..लेकिन अफसोस ये कि पढ़ते और समझते बिल्कुल भी नहीं हैं…आपने अपने लेख में इस्राइल का जो जिक्र किया है..और उसका उद्धरण कुरआन से दिया है..वह हकीकत में इस्राइल अलैहिसस्सलाम के बारे में है..जो इस्लाम के एक पैगंबर हुए हैं…उन्हीं की वंशबेल में से आज के यहूदी हैं..आप जब विस्तार से पढ़ेंगे तो पता चलेगा कि यहूदियों ने कितने पैगंबरों को साजिश करके कत्ल किया है। दुनिया में कम से कम 3000 साल से और 30 देशों में इन्हें खदेड़ा गया..आखिर क्यों..जरा इस पर भी मनन कर लीजिएगा… और इन्हें जिसने भी शरण दी..हमदर्दी इनसे जिसने भी जताई..इनकी जिसने भी मदद की..उसके साथ इन यहूदियों ने साजिश ही की..धोखा ही दिया…मेरी बात न समझ में आए तो जरा वेदों का भी अध्ययन कर लीजिए..दुनिया के तमाम धर्म की किताबें भी पढ़ लीजिए..उसके बाद गोदी मीडिया का गोबर ज्ञान दीजिएगा…आशा है..आप अध्ययन करके वास्तविकता को समझ पाएंगे। ईश्वर आपकी मदद करे।।।

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