Saturday, May 18, 2024
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डॉ अलका अग्रवाल की बाल कहानी – दीदी का जादू

इस स्कूल में छठी क्लास में मैंने जुलाई में ही प्रवेश लिया था। तीन महीने हो गए थे ,पर अब भी मैं क्लास में पीछे की सीट पर अकेला ही बैठता था। शुरू- शुरू में कुछ बच्चों ने कोशिश भी की थी,मुझसे बात करने की। लेकिन मैंने उनके साथ घुलने मिलने में कोई उत्साह नहीं दिखाया। इस स्कूल से  पहले मैं अपनी कॉलोनी के ही प्राइमरी स्कूल में पढ़ता था। वहां मेरे दोस्त भी थे, मैं सब के साथ खेलता था, दौड़ता भागता था, ऊधम मचाता था।  मैं क्लास में टीचर के प्रश्न पूछने पर जवाब भी नहीं दे पाता,कुछ तो संकोच और कुछ गलत उत्तर के डर से।  कभी-कभी इस बात के लिए मुझे डांट भी पड़ती थी।…… शायद सब कुछ ऐसा ही चलता रहता, अगर उस दिन हमारी नई क्लास टीचर निधि मैडम नहीं आतीं।
वे उस  दिन पहली बार हमारी क्लास में आई थीं। उन्होंने सब बच्चों के नाम पूछे, मेरा भी । सब बच्चों से मैडम बड़े प्यार से बात कर रही थीं। उनकी हॉबी के बारे में पूछ रही थीं। सच तो यह है कि वे मुझे टीचर नहीं बल्कि दीदी लग रही थीं। पर मैं संकोचवश अन्य बच्चों की तरह बात नहीं कर सकता था।क्लास में , वे जब भी प्रश्न पूछतीं तो मैं कुछ भी जवाब नहीं दे पाता था। पर निधि मैडम ने मुझे कभी नहीं डांटा।
कुछ दिन बाद मेरे पास बैठने वाले विनय ने मुझे बताया कि आज क्लास के कुछ छात्रों को बुलाकर मैडम ने पूछा, “अनिल हमेशा ही चुप रहता है या  मेरी क्लास में ही जवाब नहीं देता।” मुझे आश्चर्य हुआ कि यह कैसी टीचर हैं, जो मेरे बारे में इतना जानना चाहती हैं ? इससे पूर्व तो किसी ने मुझ पर ध्यान ही नहीं दिया था । हां, डांटा जरूर था । मैंने उत्सुकता और आश्चर्य से पूछा था,
“फिर तुमने क्या कहा?”
हम दोनों ने यही कहा,” हमेशा ही चुप रहता है । हमसे भी ज्यादा बात नहीं करता ।”
विनय बोला, “पर मैंने कहा कि वह बहुत सुंदर चित्र बनाता है ।”
हम देर तक निधि मैम के अच्छे व्यवहार की बात करते रहे और  इस बात पर सहमत हुए  कि मैम सब बच्चों को अपनी दीदी जैसी ही लगती हैं ।
अगले दिन जब निधि मैम क्लास में आईं,पढ़ाने के बाद उन्होंने कहा,  “मैंने सुना है तुम बहुत ही सुंदर चित्र बनाते हो। मुझे भी दिखाओगे?”
“हां ,मैं अभी दिखाता हूं। ” खुश होकर मैंने कहा।….पर डरते हुए और संकोच के साथ मैं मैडम के पास जाकर चित्र दिखाने लगा। उन्होंने मुझे खूब शाबाशी दी और सब बच्चों से कहा, “अनिल कितने सुंदर चित्र बनाता है। यह अवश्य ही बड़ा चित्रकार बनेगा।”
मैडम की बात सुनकर मुझे बहुत गर्व हुआ और मैंने सोचा कि अब मैं और भी सुंदर चित्र बनाऊंगा ,तो मैडम से खूब शाबाशी पाऊंगा।
शाम की बात है,पापा घर पर ही थे। मैं अपने कमरे में होमवर्क कर रहा था, तभी डोर बेल बजी। उस समय मैं निधि मैडम द्वारा क्लास में की गई मेरी प्रशंसा के बारे में ही सोच रहा था। मैंने जैसे ही दरवाजा खोला ,निधि मैडम वहां खड़ी थीं। मैंने ऐसा सोचा भी नहीं था कि वे हमारे घर भी आ सकती हैं। हड़बड़ा कर मैंने उन्हें नमस्ते की। मन में अनेक सवाल उठ रहे थे।
“तुम्हारे पापा से बात करनी है।”  उन्होंने कहा।
मैंने उन्हें बैठक में बिठाया और पापा को बैठक में भेज दिया ।
मैं पानी का गिलास लेकर बैठक में रख आया।बैठक के बाहर,परदे के पास खड़ा होकर अंदर की बातें सुनने लगा। हालांकि मैं जानता हूं कि यह अच्छी बात नहीं है।
पापा ने पूछा ,”अनिल ने स्कूल में क्या कोई ऐसी शैतानी की है कि आपको घर आना पड़ा?”
“नहीं ,नहीं समस्या तो यही है कि अनिल अन्य बच्चों की तरह शैतानी ही नहीं करता। उस में जैसे बचपना ही नहीं है ।वह क्लास में सबके होते हुए भी अकेला ही रहता है। क्लास में प्रश्न पूछने पर भी जवाब ही नहीं देता।”
मैम की यह बात सुनकर मैं सोच रहा था कि पता नहीं मुझे इन बातों के लिए पापा कितना डांटेगे? तभी मुझे पापा की आवाज सुनाई दी,
“हमेशा से ऐसा नहीं था मेरा अनिल।”
“अच्छा यह तो मेरे लिए बिल्कुल नहीं बात है।” मैडम ने कहा ।
“एक बात और कहना चाहती थी कि वह चित्र तो बहुत अच्छे बनाता है ,पर उसके चित्रों में भी अकेलापन और दुख दिखाई देता है ।”
पापा यह सुनकर और भी दुखी हो गए और बोले, “आपने सही पहचाना। वाकई आप बहुत ही अच्छी टीचर हैं, जो अपने छात्रों के सुख-दुख का पूरा ध्यान रखती है ।मैं पिता होकर भी उसके बनाए चित्रों पर ध्यान नहीं दे सका। मैं आपको यही बताना चाहता था कि अनिल भी पहले हंसता, मुस्कुराता , बतियाता और खेलता था । हालांकि मेरे साथ तो कभी भी उसकी इतनी निकटता नहीं थी, लेकिन अपनी मम्मी के साथ में लूडो ,ताश ,बैडमिंटन खेला करता था।”
मैं चुपचाप सब कुछ सुन रहा था, तभी मैडम की आवाज आई ।
“तब अचानक ऐसा क्या हुआ कि सब कुछ बदल गया।”
पापा ने गहरी सांस लेकर कहा, “इसके बाद वह हुआ, जो नहीं होना चाहिए था। अनिल की मम्मी को ब्लड कैंसर हुआ और कुछ ही समय में वे हम दोनों को  छोड़ कर चली गईं। तब से अनिल का यही हाल है।”
“अब मैं समझ गई,अनिल की चुप्पी और अकेलेपन का कारण। अब  आपको भी उसकी मम्मी की तरह ही उसका ध्यान रखना होगा। उसे अधिक समय भी देना होगा। मैं भी अन्य अध्यापकों और छात्रों के सहयोग से कोशिश करूंगी । मुझे विश्वास है कि अनिल फिर से पहले जैसा हो जाएगा ।अच्छा अब मैं चलती हूं।”मैम ने कहा।
“मैं अभी चाय बनाता हूं । आप पहली बार आई हैं।” पापा बोले।

“मुझे देर हो रही है ,जब अनिल पहले जैसा हो जाएगा ,तब चाय ही नहीं मिठाई भी खाऊंगी ।”मैम उठते हुए पूरे विश्वास से कहा।उन्हें जाते देखकर मैं भी दौड़ कर बाहर आया। उनके प्रति मन में आदर उमड़  रहा था। बाहर आकर मैंने झुक कर उन्हें नमस्ते की।

दूसरे दिन से जैसे धीरे-धीरे सब कुछ बदलने लगा। स्कूल में क्लास के बच्चे  मुझसे बात करने की कोशिश करने लगे।मैने भूंसे बात करनी शुरू की। साथ में खाना खाने के लिए विनय और सुनील बार-बार आग्रह करने लगे। ड्राइंग टीचर ने मुझे बुलाकर बोर्ड पर चित्र बनवाया और मेरी तारीफ भी की।निधि मैडम ने मुझे बहुत प्यार से समझाया, “तुम बहुत अच्छे नंबर ला सकते हो। पढ़ने पर थोड़ा ध्यान दो और जो भी समझ में ना आए, मुझसे पूछो ।”
उनकी बातों का मुझ पर ऐसा असर हुआ कि मैं उनकी दिखाई राह पर चलने लगा ।
उस दिन घर गया तो पापा  घर पर ही थे। वे मुझसे स्कूल की बातें पूछते रहे । अब वे  मुझे चुटकुले भी सुनाते थे। मेरी पसंद की चीजें भी खरीदते थे।रविवार को तो हम दोनों ही कहीं बाहर घूमने निकल जाते। अब मुझे पापा से बात करने में डर नहीं लगता था। पापा मेरे ‘ बेस्ट फ्रेंड’ जो बन गए थे।
स्कूल में  चित्रकला प्रतियोगिता के लिए  मैं कड़ी मेहनत कर रहा था।इसमें मुझे पुरस्कार भी प्राप्त हुआ ।मैं मन लगाकर पढ़ाई करने लगा था। मैं अब सबके साथ ही खाना खाता और खेलता था।  मैं भी दोस्तों की पढ़ाई और ड्राइंग में पूरी मदद करता था।
वार्षिक परीक्षा का परिणाम आने पर मेरी खुशी का ठिकाना न रहा ।मैं क्लास में द्वितीय स्थान पर था और मेरा दोस्त सुनील प्रथम स्थान पर।हम दोनो खुशी से गले मिले।
स्कूल से सीधे मैं घर पहुंचा। पापा मेरा इंतजार कर रहे थे।वे पहले से ही मिठाई लेकर आए थे। पापा ने मुझे प्यार से बर्फी खिलाई। तभी देखा कि निधि मैडम आ रही हैं। मेरी खुशी चौगुनी हो गई। मैडम ने मुझे खूब शाबाशी दी और पापा को बधाई दी।
“मैं कहती थी ना, तुम कर सकते हो।” उन्होंने मेरी पीठ थपथपाई।
“आपके प्रोत्साहन के बिना नहीं हो सकता था।” मैंने कहा ।
पापा बोले,” यह तो सच है। अभी हम आपके यहां ही आने वाले थे, मिठाई लेकर। आप भी लीजिए मिठाई ।”
इस समय मुझे महसूस हो रहा था कि निधि मैम हमेशा मेरी दीदी बनी रहें तो कितना अच्छा हो।इसलिए मैने कहा, “मैडम ,आप हमेशा मेरी दीदी बनी रहेंगी ना।मम्मी भी मुझे छोड़ कर चली गईं। तब मैं और भी अधिक सफल होकर दिखाऊंगा।” मैंने कहा।

“क्यों नहीं, मेरे छोटे भैया। मैं जीवन भर तुम्हारी दीदी रहूंगी। मुझे इतना अच्छा भाई और कहां मिलेगा भला?”

बर्फी खाते हुए ,मेरे सिर पर प्यार से हाथ फेरते हुए दीदी बोलीं। यह दीदी का जादू ही था कि हमारा जीवन बदल गया था।दीदी ने हमारे सूने जीवन में जैसे रंग भर दिए थे।पापा के चेहरे पर बहुत दिनों बाद इतनी खुशी दिखाई दी थी। वे मेरी ओर देखकर गर्व से मुस्करा रहे थे,और…. मैं भी तो बेहद खुश था।
डॉ अलका अग्रवाल
सेवानिवृत्त प्राचार्य, कॉलेज शिक्षा,राजस्थान
फ्लैट नम्बर B-103
B-7,जानकी विहार अपार्टमेंट
शिव मार्ग ,बनीपार्क
जयपुर 30201
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