सन् 2004 में भारतीय दलित साहित्य अकादमी द्वारा सिर्फ इसलिये प्रेमचंद के “रंगभूमि” उपन्यास को दलित विरोधी मान कर उसकी प्रतियां जलाई गई कि उसमें दलित पात्र सूरदास का उस युग में प्रचलित जाति नाम यथावत लिखा गया था । जबकि उपन्यास लेखन के उस युग में “दलित” शब्द संभवतः जन्मा भी नहीं था तथा वर्तमान के दलित वर्ग की वह जाति उस युग में स्वयं अपने आप को भी, उस युग में प्रचलित उसी जाति नाम से संबोधित करती थी । यह बात कतिपय दलित साहित्यकारों की आत्मकथाओं में भी देखी जा सकती है । ऐसी स्थिति में फिर आखिर क्यों प्रेमचंद एवं उनके उपन्यास “रंगभूमि” को दलित साहित्य अकादमी ने दलित विरोधी ठहराया ? क्या ऐसा करने के पूर्व उनने लगभग 700 पृष्ठों के प्रेमचंद के उक्त चर्चित उपन्यास “रंगभूमि” को पढ़ने की जहमत उठाई थी ?
उपरोक्त सभी प्रश्न वर्तमान सन् 2025 में इसलिये भी प्रासांगिक हो गये है कि इस वर्ष प्रेमचंद के “रंगभूमि” उपन्यास के प्रकाशन के 100 वर्ष पूरे हो रहे हैं। “रंगभूमि” उपन्यास का प्रकाशन सन् 1925 में हुआ था तथा वर्तमान सन् 2025, प्रेमचंद के उक्त उपन्यास का शताब्दी वर्ष है । इसके पहले कि प्रेमचंद के उक्त उपन्यास के कथानक, कथ्य एवं उसके अन्य तत्त्वों पर बात की जाये यह जरूरी हो जाता है कि इसी मुद्दे पर चर्चा की जाये कि “क्या प्रेमचंद का रंगभूमि उपन्यास दलित विरोधी है ?” जब इस संदर्भ में हम “रंगभूमि” उपन्यास के कथानक पर गौर करते हैं तो दलित साहित्य अकादमी के आरोपों से बिल्कुल विपरीत एक विचित्र स्थिति उभर कर सामने आती है ।
“रंगभूमि” उपन्यास का कथानायक प्रेमचंद ने दलित सूरदास को तो बनाया ही साथ ही उपन्यास के कथानक में उसे पूरे सम्मानजनक ढंग से इस कदर महिमावान करते हुये प्रस्तुत किया है कि शायद ही किसी दलित साहित्यकार ने अपनी कृतियों में किसी दलित पात्र को नायक बना कर इस भांति महिमावान किया होगा । दलित साहित्यकारों ने तो लगभग अपनी हर कृति में बस दलित पात्रों को दमित शोषित पीड़ित उपेक्षित ही चित्रित किया है । दलित पात्र को समाज में सम्मानजनक पूज्य स्वरुप एवं जननायक के रुप में अपने कथानक में प्रस्तुत करने के मद्देनजर संभवतः प्रेमचंद का यह “रंगभूमि” उपन्यास एक मात्र प्रभावशाली महत्वपूर्ण कृति है ।
उपन्यास के कथानक में दलितनायक सूरदास का सभी सम्मान करते है तथा प्रेमचंद ने उसे पूज्य स्वरुप में प्रस्तुत किया है । कथानक में उच्च क्षत्रिय वर्ण की तथा सामन्त वर्ग की रानी जान्हवी को दलित सूरदास के अंतिम समय में उसके पैरों पर सिर रख कर फूट फूट कर रोते हुये चित्रित किया गया है । प्रकाश बुक्स इंडिया प्रा. लि. के प्रकाशन फिंगरप्रिंट हिन्दी द्वारा प्रकाशित “रंगभूमि” उपन्यास के पृष्ठ 644 में लिखा है –“ रानी जान्हवी ने आगे बढ़ कर भक्ति विह्वल दशा में सूरदास के पैरों पर सिर रख दिया और फूट फूट कर रोने लगी । सूरदास के पैर अश्रुजल से भींग गये । कुंवर साहब ने आंखों पर रूमाल डाल दिया और फूट फूट कर रोने लगे ।“ सूरदास के मृत्योपरांत सूरदास का जहां झोपड़ा था वहां उसकी मूर्ति स्थापित की गई । जन आंदोलन के दौरान सूरदास तथा कुंवर भरत सिंह के पुत्र विनय सिंह दोनों की ही मृत्यु होती है लेकिन शहीद का दर्जा सिर्फ सूरदास को हासिल होता है । इस भांति प्रेमचंद ने अपने “रंगभूमि” उपन्यास में दलित सूरदास को सिर्फ सम्मानित नायक ही नहीं बनाया बल्कि पूज्य स्वरुप में भी प्रस्तुत किया है । ऐसी स्थिति में ताजुब है कि फिर भी दलित साहित्य अकादमी को प्रेमचंद का यह “रंगभूमि” उपन्यास दलित विरोधी एवं अपमानजनक लगा, भला क्यों ? क्या इससे यह प्रमाणित नहीं होता कि सन 2004 में दलित साहित्य अकादमी के दलित साहित्यकार अतीत को अपने युग के चश्मे से निहार कर जम कर सवर्ण वर्ग के साहित्यकारों से प्रतिशोध लेने को तत्पर थे भले ही उसका कोई औचित्य न हो ।
प्रेमचंद के रंगभूमि उपन्यास के कथानक के रंगमंच पर जहां इसाई परिवार के जानसेवक, मिसेज जानसेवक तथा उनका पुत्र प्रभुसेवक एवं सामन्त वर्ग के राजा महेन्द्र कुमार सिंह अंग्रेज शासकों से बराबर तालमेल बैठा कर सुख सुविधा, ऐश्र्वर्य एवं सम्मान अर्जित करने में लगे हैं वहीं दलित निम्न वर्ग का सूरदास अपनी आन पर पूरे स्वाभिमान से डटा है । जबकि कुंवर भरत सिंह उनकी पत्नी रानी जान्हवी पुत्र विनय सिंह तथा पुत्री इन्दु को धर्मानुरागी, समाजसेवक एवं जाति सेवक के रुप में उपन्यास मे प्रस्तुत किया गया है । राजा महेन्द्र कुमार सिंह, कुंवर भरत सिंह के दामाद है । उनकी पुत्री इंदु का विवाह राजा महेन्द्र कुमार सिंह के साथ हुआ है । उपन्यास में कई स्थलों पर प्रजा के हितों एवं सूरदास को समर्थन देने को लेकर इन्दु एवं राजा महेन्द्र कुमार सिंह के बीच मतभेद भी उभर कर सामने आता है । उपन्यास का कथानक दो अलग अलग सिरों में बंट कर चलता है । ये दोनों सिरे कथानक में कहीं कहीं पर मिल जाते हैं तो कहीं कहीं पर स्वतंत्र रुप से अपनी कथा यात्रा जारी रखते हैं लेकिन उपन्यास के समापन के काफी पहले ही दोनों सिरें मिल कर एक हो जाते हैं तथा एक कथाक्रम में आगे चलते हुये समापन की ओर बढ़ते हैं ।
उपन्यास का पहला सिरा उपन्यास के प्रारंभ के साथ ही दृष्टिगोचर होता है जिसमें बनारस शहर के बाहर की पांडेपुर की गरीब बस्ती का रहने वाला गरीब दलित अंधा सूरदास भिक्षावृत्ति कर जीवन यापन करता है । जिसका दलित जातिनाम प्रेमचंद ने उपन्यास में यथावत लिखा है । लेकिन उसकी एक पुश्तैनी जमीन शहर के बाहर की पांडेपुर की गरीब बस्ती में है, जिसे उसने धर्मार्थ मुहल्लेवालों के पशुओं के चारागाह के लिये छोड़ रखी है।
उपन्यास के कथानक के प्रारंभ में सूरदास के प्रवेश के साथ ही इसाई जानसेवक का भी सपरिवार प्रवेश होता है जो कि भिक्षा मांगते सूरदास को पहले तो दुत्कार कर भगा देता है लेकिन जब उसे पता चलता है कि उसकी प्रस्तावित सिगार फैक्ट्री के लिये उसे जिस जमीन की आवश्यकता है वह जमीन इसी सूरदास की है तो उसे वह पांच रुपये दे कर प्रलोभित करना चाहता है लेकिन सूरदास उसे लेने से इंकार कर देता है। फिर उसकी जमीन के लिये जानसेवक मुंहमांगी कीमत देने का प्रस्ताव उसके समक्ष रखता है लेकिन सूरदास अपनी आन पर डटे हुये अपनी जमीन मुहल्ले वालों के पशुओं के चारागाह के लिये ही यथावत छोड़ रखना चाहता है तथा जान सेवक के हर प्रस्ताव को बराबर ठुकराता रहता है । जबकि जानसेवक हर हालत में ऐनकेन प्रकारेण उस जमीन को हथियाना चाहता है । उसके लिये वह वहां के सामन्त राजा महेन्द्र कुमार सिंह एवं अंग्रेज अफसर जोज़फ क्लार्क को भी सहमत करने का प्रयास करता है तथा अपने प्रयास में सफल भी होता है । अंततोगत्वा सूरदास की उस जमीन को जबरन हथिया कर वह सिगार फैक्ट्री बनवाना प्रारंभ कर देता है । जबकि सूरदास मुहल्ले एवं नगर वालों को अपने पक्ष में कर इसके खिलाफ जन आंदोलन करना प्रारंभ कर देता है ।
दूसरी ओर उपन्यास के दूसरे सिरे में इसाई धर्मानुरागी जानसेवक एवं मिसेस जानसेवक की पुत्री सोफिया अकस्मात रानी जान्हवी एवं उनके पुत्र विनय सिंह के संपर्क में आ कर इसाई धर्म से विरक्त हो कर हिन्दू धर्म की ओर श्रृद्धावान एवं विनय सिंह के प्रति आकर्षित होती है । वह विनय सिंह से प्रेम करने लगती है तथा विनय सिंह के ह्रदय में भी सोफिया के प्रति प्रेम जन्मता है । जबकि जानसेवक एवं मिसेस जानसेवक सोफिया का विवाह अंग्रेज अफसर जोज़फ क्लार्क से करना चाहते हैं । रानी जान्हवी भी विनय सिंह को सोफिया से दूर करने तथा जाति सेवा करने के उद्देश्य से दूर भेज देती है । जहां जाति सेवा करते हुये विनय सिंह एक अन्य रियासत में गिरफ्तार कर लिया जाता है । इस बीच सोफिया की सगाई जोज़फ क्लार्क से हो जाती हैं लेकिन उसके ह्रदय में विनय सिंह के प्रति प्रेम यथावत बना रहता है जिसके कि फलस्वरूप जोज़फ क्लार्क को मोहित कर दूसरी रियासत में कैद विनय सिंह से वह मिलती है तथा विनय सिंह की खोज में आये नायकराम से सहयोग कर विनय सिंह को जेल से बाहर निकलवाती है । विभिन्न घटनाक्रमों में विनय सिंह एवं सोफिया जंगलों में एक साथ भटकते तथा भीलों के छोटे से ग्राम मे एक साथ रहते हुये अंततोगत्वा वापस अपने नगर लौट आते है जहां सोफिया अपने घर न जा कर विनय सिंह के घर “सेवा भवन” में रानी जान्हवी के पास जाती है । रानी जान्हवी भी विनय सिंह एवं सोफिया के बीच प्रबल प्रेम को देखते हुए उनके विवाह के लिये राजी हो जाती है ।
उपन्यास के कथानक के यहां तक के सफर के बाद कथानक के दोनों सिरे मिल कर एक साथ कथानक को आगे बढ़ाते हैं । सूरदास के जन आंदोलन को विफल करने का प्रयास करते हुये जानसेवक सूरदास के कुछ मोहल्ले वालों को यह कह कर अपने तरफ मिलाने में सफल हो जाता है कि कारखाना बनने से उनके व्यवसाय में भी वृद्धि होगी । दूसरी ओर सूरदास को झूठे मुकदमे में फंसाने का प्रयास किया जाता है । कारखाना बनने एवं उसमें काम करने वाले बाहर से आये मजदूरों के साथ ही उस मुहल्ले में शराब, ताड़ी जैसे नशों की दुकानें एवं वेश्यालयों की भी आमद होती है । दूसरी ओर जान सेवक की सलाह पर कुंवर भरत सिंह अंग्रेज अफसर से संबंध सुधारने हेतु पांडेपुर की रियासत कोर्ट आफ वार्डस के तहत अंग्रेज सरकार को सुपुर्द कर देता है तथा पांडेपुर के निवासियों को मुआवजा दे कर जमीन खाली करने का आदेश हो जाता है । जानसेवक को पांडेपुर की वह जमीन कारखाना एवं कारखाने के मजदूरों के रहने के लिये मकान बनवाने के लिये मिल जाती है तथा जबरन मुहल्ले वालों से जमीन अधिग्रहण हेतु सिपाहियों द्वारा उनके मकानों को तोड़ा जाता है जिसके खिलाफ सूरदास के नेतृत्व में जन आंदोलन होता है । सूरदास के इस आंदोलन में विनय सिंह, सोफिया एवं इन्दु भी सहयोग करते हैं । सूरदास के इस आंदोलन को कुचलने के लिये मिस्टर क्लार्क सूरदास पर पिस्तौल से फायर करते हैं तथा सूरदास के कंधे पर गोली लगने से वह घायल हो जाता है । सोफिया सूरदास को अपनी गाड़ी में उठा कर हास्पिटल ले जाती है जबकि जनसमुदाय सूरदास पर हुये इस आक्रमण से आक्रोषित हो कर मरने मारने पर आमादा हो जाता है ।
आक्रोषित जन समुदाय को विनय सिंह समझा कर सम्हालने का प्रयास करता है लेकिन चूंकि वह कुंवर महेंद्र सिंह का पुत्र है अतः इन सब के लिये जन समुदाय उसे भी दोषी ठहराते हुये अपमानित करता है उनमें से एक कहता है –“ भाई हम गरीबों की जान सस्ती होती है । रईसजादे होते तो हम भी दूर दूर से खडे तमाशा देखते । (पृष्ठ 618) इन सबसे पीड़ित होकर आक्रोश से जन समुदाय का रास्ता रोक कर विनय सिंह कहता है –“क्या आप देखना चाहते हैं कि रईसों के बेटे क्यों कर प्राण देते हैं ? देखिये यह कह कर उन्होने भरी हुई पिस्तौल निकाल ली छाती में उसकी नली लगाई और जब तक लोग दौड़े भूमि पर गिर पडे । लाश तड़पने लगी । ह्रदय की संचित अभिलाषाएं रक्त की धार बन कर निकल गई।“ (पृष्ठ 619)
दूसरी ओर हास्पिटल मे सूरदास की मृत्यु होती है जिसे शहीद का दर्जा हासिल होता है । रानी जान्हवी सूरदास के पैरों पर सिर रख कर रोती है । कुंवर साहब भी अपनी आंखों को रुमाल से ढक कर रोते हैं । सूरदास की जहां झोपड़ी थी वहां चन्दा कर उसकी मूर्ति स्थापित की जाती है ।
सोफिया के माता पिता सोफिया का विवाह जोज़फ क्लार्क से करना चाहते हैं । लेकिन सोफिया, रानी जान्हवी को एक पत्र में यह लिख कर कि “आपकी सोफिया आज संसार से विदा लेती है । जब विनय न रहे तो मैं किसके लिये रहूं ? …………………. उससे मिलने जाती हूं । यह भौतिक आवरण मेरे मार्ग में बाधक है । गंगा की गोद में सौंप देती हूं ।…… ……………………………………. मम्मा और पापा को कह दीजियेगा, सोफी का विवाह हो गया, अब उसकी चिन्ता न करें ।“(पृष्ठ 666 एवं 667) गंगा नदी में डूब कर आत्महत्या कर लेती है ।
उपन्यास में स्वतंत्रता पूर्व की रियासतों की स्थितियों, रियासतदारों पर अंग्रेज सरकार का प्रभाव, इसाई वर्ग का अंग्रेज सरकार से मधुर सबंध तथा अंग्रेज सरकार द्वारा उनके संरक्षण के चित्र जहां अंकित है वहीं दलित एवं आम व्यक्तियों की दयनीय स्थिति एवं उनके शोषण के चित्र भी अंकित है । उपन्यास में औद्योगीकरण के दूषित परिणामों को भी विस्तृत रुप में प्रस्तुत किया गया है जो कि कमोवेश आज भी दृष्टिगोचर होते हैं ।
दूसरी ओर उपन्यास के कथानक में जहां एक ओर विनय सिंह और सोफिया की मर्मस्पर्शी दुखद प्रेम कहानी है तो दूसरी ओर विनय सिंह का वर्ग वैसम्य को दूर करने के प्रयास में आत्महंता परिणिति है। लेकिन प्रेमचंद ने शहीद का दर्जा सिर्फ दलित सूरदास को दिया है तथा उसे पूज्य स्वरूप में प्रस्तुत किया है । अफसोस इसके बाद भी उनके उस उपन्यास “रंगभूमि” को दलित साहित्य अकादमी ने दलित विरोधी मान कर उसकी प्रतियां जलाई। इस कृत्य हेतु दलित साहित्य अकादमी को क्या प्रेमचंद से छमा याचना नहीं करनी चाहिये ? यदि ऐसा नहीं किया जाता तो शायद भविष्य में कोई भी सवर्ण साहित्यकार दलितहित चिंतन करते हुये कोई भी कृति लिखने का साहस न कर सकेगा ।
राजेन्द्र सिंह गहलौत
“सुभद्रा कुटी”
बस स्टैंड के सामने
बुढार 484110
जिला शहडोल (म. प्र.)
मोबाइल : 9329562110
राजेन्द्र सिंह गहलोत जी नमस्कार
आपने रंगभूमि उपन्यास को दलितों के विशेष सन्दर्भ में रेखांकित किया है सम्भवतः आपने क्या इस विषय पर शोध कार्य या लघु शोध
लिखा है ?लेख एक समीक्षात्मक शोध पत्र जैसा भी लगा ।शुभकामना
Dr Prabha mishra
आदरणीय राजेन्द्र जी!
पूरा लेख पढ़कर बेहद अफसोस हुआ। प्रेमचंद ने तत्कालीन सत्य को कहानी का विषय बनाया। ठाकुर का कुआं कहानी इस बात की गवाही देता है। महा उजबक खोपड़ी लोग हैं भई। पता नहीं दिशा और दृष्टि किस तरह की है। पेंशन के लिए तो ऐसा सोच भी नहीं सकते रंगभूमि उपन्यास हमने पढ़ा है।हालांकि एक लंबा समय हो गया पढ़े हुए।
निश्चित रूप से इसके विरुद्ध कार्यवाही होनी चाहिये। विश्वास ही नहीं हो रहा कि जिन लोगों के समर्थन में प्रेमचंद लिखते रहे ,जिन लोगों के दुख ने उन्हें दुखी किया। जिसे वे अपनी रचना के माध्यम से दुनिया के सामने लाने में प्रयासरत रहे। उन्हीं लोगों ने उनके प्रति इस तरह का व्यवहार किया!
महत्वपूर्ण लेख है। आपका शुक्रिया।।