Sunday, June 23, 2024
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शैली का लेख – जनसंख्या विस्फोट और साहित्य

हमारे देश में सभी को अपने वंश वृद्धि की असीम चिन्ता रहती है। वंश के लिए शादी की बेहद ज़रूरत होती है, ऐसे में मुझे बैंड बजा बारात का एक डायलॉग बहुत याद आता है ,”रेसेशन हो या इनफ्लेशन शादियाँ तो होती रहेंगी,लोग इसमें लाखों करोड़ों खर्च करते रहेंगे”,
जी हाॅं, अमीर, ग़रीब, छोटा बड़ा, नौकरी पेशा, निठाल्ला बेकार, यहाँ तक कि मानसिक, शारीरिक रूप से अक्षम लड़कों की शादियाॅं भी ठीक-ठाक लड़कियों से हो जाती है। अगर वर पक्ष पैसे वाला और वधू ग़रीब हो। यहाँ तो नपुंसक पुरुषों की भी शादियाँ हो जाती हैं, आश्चर्य की बात है कि बच्चे भी होते हैं।
बच्चे यानी आपकी वंशबेलि। अपना वंश बढ़ाने का आम भारतीय को ऑब्सेशन यानी सनक या जुनून होता है। कई ऐसे व्यक्तियों से मिलना हुआ है, जो कामचलाऊ पढ़ाई करके बेकार बैठे थे, घर में खेतीबाड़ी बस इतनी कि मौजूदा परिवार का पेट भर सके। आमदनी का कोई अन्य स्रोत नहीं। लेकिन जनाब ने शादी कर ली और दसवें महीने बच्चा भी होने वाला था। बच्चे की आमद की बात सुनकर जब किसी ने उन सज्जन पूछा कि, “अभी कमाते-धमाते नहीं, बच्चे को क्या खिलाओगे? अभी बच्चे की ज़रूरत ही क्या थी? बन्दे का तपाक से उत्तर आया कि,” तो क्या निरबंसिहा रह जायें?” अब इनसे कौन पूछे कि – सिर्फ़ धरती और माँ-बाप के ऊपर बोझ बनने के अलावा आपने क्या किया आगे आपका बंस क्या सामाजिक हित करेगा? लेकिन इन सभी मुद्दों पर विचार करने की अक्ल या योग्यता ही नहीं होती, न कोई अन्य इन्हें कुछ समझा सकता है।
मात्र जानवरों या कीड़े-मकोड़ों की तरह भारत का एक बड़ा समुदाय शादी करता है बच्चे पैदा करता है। इन्हें समाज और अर्थव्यवस्था पर बोझ बना कर अपनी प्रजनन क्षमता का अहम तुष्ट करता है। फिर समाजसेवी संस्थायें, ऐक्टिविस्ट, बुद्धिजीवी ब्रिगेड और कवि लेखक इन भूखे-नंगे बच्चों के लिए मुहिम चलाते हैं। ग़रीबी की प्रशंसा में क़सीदे पढ़ते हैं। बेरोजगारी और ग़रीबी के लिए सरकार और व्यवस्था को गालियाँ देते हैं, घेरते हैं वगैरह वगैरह…। निजी स्वार्थ के लिए किये गये फ़ैसले, वैश्विक समस्या बन जाते हैं।
भारत की आबादी बढ़ती जा रही है। इन दिनों मॅंहगाई के लिए बहुत हायतौबा मचा हुआ है। हर सोशल मीडिया पर लोग मॅंहगाई का रोना रो-रो कर सरकार को गालियाॅं दे रहे हैं, तो सोचा ज़रा आँकड़े इकट्ठा करूॅं कि रूस-यूक्रेन का युद्ध, सरकार या स्वयं जनता कौन ज़िम्मेदार है इस मॅंहगाई के लिए?
ऐसे में आँकडे़ देखना ज़रूरी हो जाता है। जनसंख्या की दृष्टि से भारत विश्व में दूसरे स्थान पर है और आर्थिक स्थिति की दृष्टि से छठे स्थान पर। यूनाइटेड नेशन के आंकड़ों के वोर्ल्डोमीटर के अनुसार 26 जुलाई 2021 तक भारत की जनसंख्या 1,394,420,224 है। भारत में हर वर्ष औसतन 10 मिलियन, यानी 1 करोड़ शादियाॅं होती हैं, शादी की औसत आयु 18 वर्ष है। हर वर्ष 25 मिलियन बच्चे में पैदा होते है।**
यानी जन्म दर 17.163% है, जबकि आर्थिक वृद्धि दर 5.81 %, अब आप स्वयं विचार करें कि मॅंहगाई के लिए जनता स्वयं ज़िम्मेदार है या नहीं?
उसके बाद कभी ख़ुद को मॅंहगाई के लिए गालियाॅं देते मैंने किसी को नहीं सुना।
अब सोचने की बात ये है कि, क्यों भारत में इतने बच्चे पैदा होते हैं? जन्म लेने पर हमारा कोई नियंत्रण नहीं है, वह जन्म देने वालों पर निर्भर था।
अब जब पैदा हो गये तो जीना पड़ेगा क्योंकि मरना भी ऊपर वाले के हाथ में है।
जन्म-मृत्यु के अलावा जीवन के बहुत से निर्णय व्यक्ति के हाथ और अधिकार में होते हैं। जिनमें से पढ़ाई करके, कोई अन्य शारीरिक या मानसिक योग्यता बढ़ा कर आजीविका का प्रबंध व्यक्ति के हाथ में होता है। मानती हूँ कि परिस्थितियों का भी योगदान होता है। एक निर्णय जो सामन्यतः हर व्यक्ति के हाथ में होता है वह है ‘शादी’, अन्य शब्दों में कहा जाय तो यौन संबन्ध। जिससे बच्चे पैदा होते हैं और धरती पर जनसंख्या बढ़ती है।
बहुत से लोग यह दलील देते हैं कि, “परिवार के दबाव में शादी करनी पड़ी”। यदि व्यक्ति का इतिहास देखा जाय तो परिवार का दबाव अच्छी पढ़ाई करने, अच्छी आजीविका खोजने, नशा न करने, प्रेम सम्बंध न बनाने, अच्छी आदतें सीखने, परोपकार करने जैसे मामलों में काम नहीं करता है। उस समय, “ये हमारी जिन्दगी है, इसे तो अपने ढंग से जीने दो”,” क्या अब हर बात माँ-बाप से पूछ कर करेंगे?”, “कल को तो साँस भी आपकी इच्छा से लेनी पड़ेगी”… वगैरह वगैरह तर्क दिये जाते हैं।
सामन्यतः बुजुर्गों की बातें नज़रंदाज करके अच्छी-बुरी जैसी भी ज़िन्दगी बना कर इन्सान जैसे ही 22-23 वर्ष का होता है (लड़कियों की आयु 17-18 वर्ष) बड़े-बुज़ुर्ग, घर-परिवार वाले बच्चों के विवाह केलिए व्यग्र होने लगते हैं। यह स्थिति शहरी इलाक़ों के मध्यम और उच्च वर्ग की है। गाँव, कस्बों के निम्नवर्ग और ग़रीबी रेखा से नीचे वाले तबके में तो 14-15 वर्ष के बच्चों के विवाह को लेकर व्याकुलता और व्यग्रता बढ़ जाती है। लड़के-लड़कियाँ भी थोड़ा सुगबुगाता सा विरोध करके हामी भर देते हैं। फलस्वरुप दो-तीन सालों के भीतर ‘बच्चों की’शादी, धर्म की तरह’ कर दी जाती है।
यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है कि शादी के खर्च, शादी के बाद बहू या पत्नी पर होने वाले खर्च, शादी के बाद बच्चे के पैदा होने उसे पालन-पोसने से लेकर भविष्य में होने वाले अनेकों खर्च के बारे में ज़्यादा कुछ सोचा नहीं जाता। कुछ शादियाँ तो कर्ज़ लेकर की जाती हैं। ज़िन्दगी जीने के लिए सबसे आवश्यक चीज़ पैसे, आमदनी के बारे में कोई योजना नहीं होती। बहुत से लड़के और लड़कियांँ स्वावलंबी नहीं होते। कुछ कि आय स्वयं का खर्च उठाने के लिए पर्याप्त नहीं होती। ऐसे में पत्नी के खर्च की व्यवस्था के बारे में बिना सोचे शादी हो जाती है। शादी में दहेज की माँग भी इसीलिए बढ़ा-चढ़ा की जाती है।
शादी के बाद के कुछ दिन तो खींच-तान कर कट जाते हैं। लेकिन बहुत से नव-विवाहित जोड़े शादी के एकाध महीने के बाद ही आर्थिक तंगी से ग्रस्त हो जाते हैं।
हैरानी तो तब होती है, जब भीख माँग कर पेट भरने वाले भी शादी के हसीन बंधन के लालच को छोड़ नहीं पाते। शादी न हुई, साँस हो गयी, जिसके बिना जिन्दगी चल नहीं सकती…
यह स्थित मेरे समझ के परे है। आख़िर शादी भारतीय समाज में इतनी आवश्यक क्यों है? क्या मात्र यौन संबंधों के लिए? क्योंकि समाज के हर स्तर के लिए आगामी पीढ़ी, राजवंशों की तरह आवश्यक नहीं है। उत्तराधिकारी यदि नहीं आया तो राज्य/जागीर का क्या होगा?
जिनके पास ख़ुद दो वक़्त की रोटी का जुगाड़ नहीं वह क्यों शादी करते हैं और क्यों बच्चे पैदा करते हैं?
प्राचीन काल की बात अलग थी, उस समय गर्भनिरोधक उपलब्ध नहीं थे। सेक्स मानव की प्राकृतिक आवश्यकता थी। फलतः बच्चे पैदा होते थे। उस समय प्राकृतिक रूप से कन्दमूल, फल और आखेट करके जीवन भी चल जाता था। चिकित्सा अधिक उपलब्ध थी न उसका विकास हुआ था, तो जीवित भी वही रहते थे जो जीवित रहने योग्य थे। इसलिए जनसंख्या विस्फोट जैसी स्थिति नहीं थी।
धीरे-धीरे हमारे धर्म का विकास हुआ। शिक्षा पद्धति विकसित हुई। जिसमें 25 वर्ष तक ब्रह्मचर्य पालन करने और शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था की गयी। ब्रह्मचर्य का महत्व बताया गया और जिन्हें विद्यार्जन करना हो, उन्हें ब्रह्मचारी रहने का उपदेश और निर्देश दिया गया। जीवन उस समय भी कठिन था, विभिन्न कारणों से लोग असामयिक मृत्यु के शिकार होते थे। जनसंख्या वृद्धि समस्या नहीं बनी थी।
क्रमशः मानव विकसित होता गया। शादी की और परिवार की व्यवस्था बनी। चिकित्सा पद्धति का विकास हुआ। बच्चों की मृत्युदर घटी, औसत आयु में वृद्धि हुई। जीविकोपार्जन के तरीक़े बदले। खेती, व्यवसाय उन्नत हुए। अब जनसंख्या बढ़ने लगी।
जनसंख्या की वृद्धि को नियंत्रित करने के लिए गर्भ- निरोधक भी खोजे गये। इनका प्रचार-प्रसार भी हुआ। सरकार ने सरकारी अस्पतालों और चिकित्सा केंद्रों में मुफ़्त गर्भ-निरोधक उपलब्ध कराये। गर्भ निरोधक ऑपरेशन के लिए पैसे देने का प्रावधान भी किया। शादी की न्यूनतम आयु निश्चित की। बाल-विवाह को अपराध घोषित किया। बच्चों की नियंत्रित संख्या के लिये उद्घोषणायें की।
संजय गाँधी ने परिवार नियोजन को युद्घस्तर पर लागू करने का प्रयास भी किया। लेकिन अफ़सोस, यह प्रयास विफल रहा और परिवार नियोजन के प्रयास ठंढे बस्ते में चले गये।
आज भारत की जनसंख्या विश्व में दूसरे स्थान पर है, जबकि क्षेत्रफल में भारत सातवें स्थान पर है।* अभी भी भारत में जनसंख्या नियंत्रण कानून का कोई अस्तित्व नहीं। जनसंख्या विस्फोटक स्थिति में है। विवाह की गति वैसी ही है। बच्चे भी धड़ाधड़ पैदा हो रहे हैं। सम्भावना यह है कि भारत जनसंख्या में कुछ दिनों में चीन को भी पीछे छोड़ कर अव्वल आ जाएगा।
हैरानी और दुःख इस बात से होता है कि, बच्चों को पालने में असमर्थ वर्ग भी बच्चे पैदा करने में कोई गुरेज नहीं करता। एक सर्दी की रात में, रात के 2 बजे के करीब, मेरी नींद अचानक खुलती है। कोई ज़ोर-ज़ोर से सड़क पर आवाज़ लगा रहा था कि, “अस्पताल में बच्चा हुआ है, पहनाने को कपड़ा नहीं है, ओढ़ने को कंबल नहीं है, हे दाताधर्मी! कोई कपड़ा देदो, चादर देदो, कंबल देदो”। मैं सोचने पर मजबूर हो गयी कि इतनी फटेहाल स्थिति में बच्चा पैदा करने की हिम्मत कहाँ से आयी? चलो इस समय तो भीख मांग कर कपड़े, बिस्तर की व्यवस्था कर भी ले, तो आगे बच्चे को पालने के संसाधन कहाँ से आयेंगे? बच्चे के दूध, खाने, कपड़े और शिक्षा की व्यवस्था कहाँ से होगी? ये बच्चा अगर ज़िन्दा रह गया तो क्या कुछ दिनों बाद भीख माँगने वाले में एक और हाथ का इजाफ़ा नहीं हो जायेगा? क्या इसकी मदद करनी चाहिए? आदि आदि….
आज भी मैं ये लेख लिखने को मजबूर इसीलिए हुई, क्योंकि मैं देखती रही कि बुद्धिमान लेखक, विचारक और कवि, मूल कारण पर नहीं, उसके परिणामों पर लेखनी चलाते हैं। हिन्दी साहित्य में ग़रीबी को ‘सेलिब्रेट’ किया जाता है। मानों ग़रीब होना, ग़रीबी में बच्चे पालना कोई बहुत बड़ी उपलब्धि है। ‘मदर्स डे’ और ‘फादर्स डे’ पर लिखी जाने वाली कवितायें पढ़ कर ऐसा महसूस होता है कि, ‘भारत में माँ – बाप बनने का गौरव सिर्फ़ ग़रीबी रेखा से नीचे के वर्ग को प्राप्त है।’ हर तीसरी कविता की माँ ख़ुद गीले में सो कर बच्चे को सूखा बिस्तर देती है, ख़ुद भूखे रह कर बच्चे का पेट भरती है। क्या कोई धन सम्पति से युक्त, बच्चे को पर्याप्त साधनों से पाल सकने वाली माँ भारत के भौगोलिक क्षेत्र में नहीं पायी जाती? यदि स्थिति इतनी दयनीय होती है, तो बच्चे पैदा करने की हिम्मत कहाँ से आती है? क्या कोई सज़ा मिली है कि ख़ुद मर-मर कर बच्चे पैदा करो और पालो?
इसी तरह पिता के ऊपर लिखी जाने वाली कवितायें कुछ ऐसी होती हैं, “अपने सपनों को मार कर बच्चों के सपने पूरे करता है”, “दिन रात खट कर मजदूरी करके बच्चे की परवरिश करता है”, “आधा पेट खा कर बच्चों का पेट भरता है”, “बच्चे को सीने पर सुलाता है (सोने की जगह नहीं होती)”, कोई मजदूरी करता है, अख़बार बेचता है, नंगी पीठ पर बोरे ढोता है आदि इत्यादि….
यहाँ भी सीन वही, कि ख़ुद ग़रीबी रेखा से नीचे रहते हुए बच्चे पैदा करता है।
यह सहानुभूति से भरे कवि, विचारक और बुद्धिमान लेखकगण सिसकती हुई कविता लिखने की जगह ऐसे ग़ैरजिम्मेदार माँ-बाप से यह पूछने की हिम्मत क्यों नहीं जुटाते कि, “यदि ख़ुद के पेट के लिए रोटी और सिर छिपाने के लिए घर, तन ढंकने के लिए कपड़ा और ठीक से जीने के लिए आमदनी नहीं थी तो बच्चे पैदा क्यों किये? धरती का बोझ क्यों बढ़ाया? क्यों एक और भिखारी पैदा करके समाज और देश पर अत्याचार किया? क्यों एक बाल-श्रमिक पैदा किया?
जब ख़ुद की जिन्दगी भारी थी तो गर्भनिरोधक का उपयोग क्यों नहीं किया? यदि गर्भनिरोध नहीं करना था तो ब्रह्मचर्य का पालन ही कर लेते…
ऐसे प्रश्न न पूछ कर उन्हें महान और शहीद का दर्ज़ा दिया जाता है, ऐसी प्रथा क्यों चल रही है? क्यों इस तरह की मानसिकता का कीर्तिगान किया जाता है?
कोई ग़रीब बच्चों के साथ पढ़ाई की दिक्कतों को उजागर करता है, कोई बलश्रम खत्म करने के नारे लगाता है। कितने एन.जी.ओ., कुपोषित बच्चों के लिये अनुदान माँगते हैं। कितने संस्थायें हैं जो गरीबों के लिए भोजन और चिकित्सा सुविधा देने के लिए जनता से गुहार लगाते हैं। फिर यही बच्चे बड़े होते हैं तो बेरोजगारी की समस्या के लिए जागरूक बुद्धिजीवी, सरकार और व्यवस्था को गालियाँ देते हैं।
इन सभी समस्याओं के आधारभूत कारणों पर कोई न तो मुँह खोलता है न ऐसे निकम्मे माता-पिता पर लानत भेजता है। क्या साहित्य का उद्देश्य लोगों की करुणा, दया और सहानुभूति की भावनाओं को एक्सप्लॉइट करना है? जनता को रुला कर तालियाँ बटोरना ही उद्देश्य है? या समाज में फैली रुग्ण मानसिकता और रुढ़ियों पर प्रहार करना, उन्हें सुधारने की कोशिश करना भी साहित्यकार का दायित्व है? इस विषय पर विचार करना ही नहीं पहल करना भी आवश्यक है।
मेरी कुछ पंक्तियों में इसका सार इस तरह है –
बच्चों की कथायें एक राजा एक रानी
हिन्दी कवितायें एक किसान, एक मजदूर
और एक भिखारी
हर ओर भूखमरी, ग़रीबी, लाचारी
जनता भी रहती है किस्मत की मारी
क्या है ये बीमारी?
प्रेमचंद निराला से मुक्ति मिलती नहीं
कवितायें दुःख से आगे बढ़ती नहीं
बेकार रोते युवक से क्यों नहीं पूछते
अपने दो हाथों का उपयोग क्यों नहीं करते?
बालश्रम पर रोते हैं
बच्चा पैदा क्यों किये?
कभी नहीं पूछते हैं…
माँ-बाप ग़रीबी रेखा से नीचे!
प्रश्न एक है – पैदा ही किये इतने बच्चे???
शैली
शैली
सम्पर्क - shailjaa.tripathi@gmail.com
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14 टिप्पणी

  1. वाह वाह शैली जी । निजी स्वार्थ के लिए किए गए फ़ैसले विश्व समस्या बन जातें हैं ।
    बहुत ख़ूब
    बहुत बहुत बधाई ।

    • धन्यवाद पद्मा जी।यदि ध्यान से देखा जाए तो तो हर एक व्यक्ति का निजी निर्णय ही जनसंख्या विस्फोट का कारण है।

  2. बहुत सही,बेबाक, सटीक, सामयिक और नितान्त मौलिक, सभी के द्वारा अवश्य पठनीय

  3. आपके इस आलेख का सार है कि गरीबी रेखा से नीचे के लोग बच्चे पैदा न करें। आपके इस समाधानिक विचारों से दुर्भाग्यवश मैं सहमत नहीं हूँ। समाधान उपदेशों अथवा सुझावों से नहीं बल्कि तार्किक एवं व्यवहारिक कानून से तय होने चाहिए। जिन्हें जीने का अधिकार है उन्हें विवाह का भी अधिकार है। जिन्हें विवाह का अधिकार है उन्हें बच्चे का भी अधिकार है। जो आज गरीब है कल संपन्न हो सकता है। किसी भी देश की आबादी साधन और उस साधन का विवेकपूर्ण वितरण वहाँ के सरकार की जिम्मेवारी है। चीन की जनसंख्या नियंत्रण नीति आबादी कम करने की जगह आबादी बढाने पर जोर दे रही है। भारत सरकार भी जनसंख्या नियंत्रण कानून पर विशेषज्ञों से विचार कर रही है। आर्थिक आधार पर किसी को बच्चे पैदा करने से वंचित करने का विचार मेरी नजर में अमानवीय एवं अव्यवहारिक है। गरीबी एक कभी भी न मिटनेवाली अवस्था है। सबसे निचला पायदान प्रतिमाह चाहे दस डाॅलर कमाये या दस हजार डॉलर। उसका परिवार तंगी में रहेगा। तो क्या वे केवल इसलिए बच्चे पैदा न करें क्योंकि वे सबसे नीचले पायदान पर है। बात रही जो भीख या टिप्स मांगते हैं। तो निश्चित रुप से हीं उसका सपना भी भीख मांगना नहीं है। चीन में कोई टिप्स नहीं लेता। टिप्स देकर अमीरी महसूस करने वाले गोरों का मुँह छोटा सा रह जाता है जब चीनी मुद्रा के दस पैसे भी वेटर्स अपने दोनों हाथों से उसे आदर सहित उसके हाथ में पकड़ा कर उसे धन्यवाद बोलता है। चीन में भीखमंगा भी शायद कहीं खुर्दबीन लेकर ढूँढने पर मिल जाए क्योंकि नये चीन में भीख या टिप्स दे कर महान दयालु बनने अथवा दाता बनने के शौक को सामाजिक दृष्टि से अच्छा नहीं माना जाता। नैतिकता की दृष्टि से भी भीख या टिप्स देकर किसी के स्वाभिमान को गिराना या दबाना एक प्रकार की छुद्रता है सामाजिक अपराध है। किसी की छुद्र दया किसी की विवशता बन जाती है। मूढ दानी लोग राह चलते, जंगलों से गुजरते हुए बंदरों को खाना देकर खुश होते हैं। उन जाहिल दयालुओं को पता नहीं होता ऐसा करके वे बंदरों के साथ कितना बड़ा अपराध करते हैं। वे नजरअंदाज कर देते हैं कि उनकी इस मूर्खता से कितने बंदर खाना ढूँढने का अपना प्राकृतिक स्वभाव भूलकर इनकी दया पर आश्रित हो जाते हैं। इनकी रार देखते रहते हैं और भूख से व्याकुल कभी-कभी इनकी गाड़ियों के नीचे आकर घायल हो जाते हैं अथवा जान गँवा देते हैं। तो क्या सरकार को इन बंदरों की नसबंदी करा देनी चाहिए या उन जाहिल दानियों पर प्रतिबंध लगानी चाहिए कि वे कृपया अनाधिकृत दाता न बनें। वन विभाग अपना काम कर रही है बंदर अपना खाना स्वयं ढूँढ लेंगे।

    • चीन का मुझे कोई निजी अनुभव नहीं। आप कितने वर्षों तक चीन में रहे हैं? व्यक्तिगत मानसिकता को समझने के लिए किसी भी देश में लंबा प्रवास आवश्यक होता है। वैसे राहुल गांधी समेत भारत में चीन और पाकिस्तान के प्रशंसक बहुत से हैं।
      आपके प्रश्नों का उत्तर कहाँ तक दूँ? आपके अनुभव मेरे निजी अनुभवों से 180° का कोण बनाते हैं। आप सम्भावनाओं में विश्वास करते हैं मैं यथार्थ में। हार्दिक धन्यावाद इतनी विस्तृत टिप्पणी के लिए

  4. प्रकृति का एक स्थापित सिद्धांत है सर्वाइवल आफ द फिटेस्ट” यानी “योग्यतम की उत्तरजीविता”। प्रकृति जीवन जीने के लिए योग्यतम जीव का चयन स्वयं करती रहती है। मैं आपकी बातों से पूरी तरह सहमत हूं और आपके साथ खड़ा भी हूं।

  5. अब इनसे कौन पूछे कि – सिर्फ़ धरती और माँ-बाप के ऊपर बोझ बनने के अलावा आपने क्या किया आगे आपका बंस क्या सामाजिक हित करेगा?

    आपके इस प्रश्न कि सबसे सबल जबाब स्वयं भारत के वर्तमान प्रधानमंत्री महोदय हैं। अत्यंत हीं निर्धन परिवार एवं गरीबी में उनका जन्म हुआ। आपकी गणित से उनके माता-पिता को शादी हीं नहीं करनी चाहिए थी और कर भी ली तो बच्चे पैदा नहीं करने चाहिए थे। यथार्थ यह है कि अत्यंत हीं गरीबी में जन्में उस बच्चे की सोंच के बराबर का समुचे भारत में कोई नेता हीं नहीं है। यह उदाहरण एक अपवाद मात्र नहीं है। कभी गरीबी में पैदा हुए भारत में ऐसे करोड़ों लोग है जो अपने अपने स्तर से देश की सेवा कर रहे हैं। समाज को एक दिशा दे रहे हैं। दुसरा उदाहरण मैं वर्तमान भारत के सबसे धनी व्यक्ति अदाणी जी का भी देना चाहता हूँ। जैसा की बताया गया है उनकी आर्थिक दशा भी बहुत अच्छी नहीं थी वरना उन्हें अपनी पढ़ाई अधूरी नहीं छोड़नी पड़ती।

    • आपके आशावादी दृष्टिकोण को नमन है, कल को आप भिक्षा का भी समर्थन कर सकते हैं। “गुदड़ी के लाल” आपको दिखते हैं। क्या आंकड़े देंगे कि यह भारत की जनसंख्या का इतना प्रतिशत है?

  6. एक अत्यंत महत्वपूर्ण सामयिक लेख । शैली जी को साधुवाद!
    तर्क-कुतर्क बहुत से हो सकते हैं, लेकिन देश में जनसंख्या की समस्या के पीछे सबसे बड़ा कारण है बिना योजना के (जिसमें आर्थिक पक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण है) संतान उत्पत्ति करना और निरंतर करते जाना। ऐसे लोगों के कारण सरकार पर और परोक्ष रूप से पूरे समाज पर अनावश्यक बोझ तो पड़ता ही है साथ ही बहुत सी सामाजिक बुराइयाँ फैलती है। और हाँ, अपराध भी पनपता है।

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