पिछले दिनों बाली के एक होटल में रुकने वाले एक पर्यटक परिवार के सदस्यों द्वारा चैक आउट के समय होटल का कुछ सामान साथ ले जाने का प्रयास सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना रहा। लोग तरह-तरह की बातें बना रहे थे।
कोई इसे गलत बता रहा था तो कोई इस गलत कार्य को करने वालों का बचाव भी कर रहा था। सबसे बड़ा प्रश्न ये है कि हम ऐसा क्यों करते हैं? जब हम घूमने-फिरने पर लाखों रुपए खर्च कर देते हैं तो फिर ऐसी ओछी मानसिकता क्यों प्रदर्शित करते हैं?
क्यों दो-चार हजार रुपए के सामान या कई बार सिर्फ कुछ पुराने तौलियों के लोभ में अपनी आत्मा को बेच डालते हैं? कुछ लोग स्वभाव से चोरवृत्ति के होते हैं लेकिन कुछ लोग चोरवृत्ति के न होते हुए भी ऐसा तुच्छ कार्य करने से नहीं हिचकिचाते। कुछ लोग बाहर जाने पर सोचते हैं कि यहां उनको देखने वाला कौन है? यदि कुछ बात हो भी गई तो किसे पता लगेगा? पकड़े गए तो साॅरी बोलकर पीछा छुड़ा लेंगे।
दूसरे अधिकांश लोग ये सोचते हैं कि होटल वाले बहुत कमाते हैं अतः इन छोटी-मोटी बातों से उन पर क्या फर्क पड़ेगा? लोगों को उनकी कमाई से ईष्र्या होती है अतः सामान चोरी करने के अतिरिक्त कई लोग नुकसान भी कम नहीं करते।
कमरों में पर्यटकों अथवा होटल के ग्राहकों की सुविधा के लिए रखी वस्तुओं को खराब अथवा गंदी कर देते हैं। बिजली के स्विच व दूसरा सामान तोड़-फोड़ डालते हैं। जरूरत न होने पर भी चीजों का अधिक से अधिक इस्तेमाल करते हैं। कचरे को सही जगह पर न डालकर ऐसी जगह डाल देते हैं जहां नहीं डालना चाहिए जिससे ड्रेनेज सिस्टम बाधित हो जाता है।
चैक आउट से पहले सामान पैक करते समय चद्दरों व तौलियों से जूते पोंछना आम बात है। जब हममें से अधिकांश लोग ऐसा करेंगे तो हम जहां कहीं भी जाएंगे हमें हर जगह ही टूटी-फूटी और गंदी चीजें ही मिलेंगी। यदि पर्यटकों का व्यवहार व नीयत ठीक नहीं होगी तो होटल वालों से अच्छे व्यवहार व सेवा की अपेक्षा कैसे की जा सकती है? साथ ही ये बात भी महत्त्वपूर्ण है कि कई बार होटल वालों के उचित व्यवहार व सेवा में कमी के कारण भी पर्यटक खराब व्यवहार करने लगते हैं।
ये सोच कि होटल वाले बहुत कमाते हैं अतः उनका नुकसान करने में कोई बुराई नहीं ये सोच ही विकृत है। जो लोग देश-विदेश में घूमने-फिरने जाते हैं वे गरीब तो होते नहीं। फिर भी यदि कम खर्च करना है तो अपेक्षाकृत सस्ते होटल में चले जाइए। नुकसान या चोरी करना तो कोई तरीका नहीं। दूसरे क्या छोटी-मोटी चीज उठा ले जाने से किसी तरह की क्षतिपूर्ति हो जाएगी?
वैसे भी अनेक लोगों द्वारा बार-बार प्रयोग में लाए गए तौलिए, चद्दर अथवा किसी उपकरण को उठा लाना लाने वाले की मानसिकता ही नहीं उसके स्तर को भी प्रदर्शित करता है। कई लोग तर्क-वितर्क व कुतर्क करने में बड़े कुशल होते हैं।
कहते हैं इस्तेमाल किए हुए मैले तौलिए से जूते पौंछने से तौलिए का क्या बिगड़ जाता है? वे तो धुलने ही होते हैं। क्या हम अपने घरों में भी ऐसा ही करते हैं? तौलिए के इस्तेमाल के बाद उसे धोने से पहले उससे जूते, फर्श अथवा गंदगी साफ करते हैं? यदि हम सचमुच ऐसा करते हैं तो हमारे जैसा बेवकूफ कोई नहीं होगा।
यदि नहाने के बाद प्रयोग किए जाने वाले तौलियों से जूते, फर्श अथवा गंदगी साफ करना ठीक होता तो घरों में अलग-अलग प्रयोग के लिए अलग-अलग कपड़े या डस्टर क्यों रखे जाते? होटलों में भी ग्राहकों की ज़रूरत के अनुसार ही चीज़ें रखी होती हैं।
यदि आज हम किसी चीज़ को खराब करेंगे अथवा सुविधा का दुरुपयोग करेंगे तो ये निश्चित है कि अगली बार हम जहाँ भी जाएँगे टूटी-फूटी चीज़ें ही मिल पाएँगी। हाँ कुछ चीज़ें जो होटल के ग्राहकों द्वारा आंशिक रूप से प्रयोग में लाई जा चुकी हों उन्हें ले जाने में कोई बुराई नहीं दिखलाई पड़ती लेकिन इस तरह की चीज़ों के बारे में स्पष्ट निर्देश होने चाहिएँ।
प्रयोग के बाद बचे हुए साबुन अथवा व्यक्तिगत स्वच्छता की अन्य वस्तुओं़ को तो ग्राहकों द्वारा साथ ले जाना अनिवार्य कर दिया जाना चाहिए। इससे आंशिक रूप से प्रयोग में लाई गई चीज़ों का दुरुपयोग रुकेगा और उनका पूरा-पूरा उपयोग संभव हो सकेगा। लेकिन होटल की संपत्ति को नुकसान पहुँचाना अथवा उसे साथ ले जाने का प्रयास किसी भी स्थिति में ठीक नहीं कहा जा सकता।
कोई बच्चा ग़लती कर सकता है लेकिन जब हम पूरे परिवार के साथ कहीं घूमने जाते हैं तो ऐसा कैसे कर सकते हैं? वास्तव में बच्चे ग़लती नहीं करते अपितु बड़े अपने ग़लत आचरण द्वारा उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य कर देते हैं। जब हम विदेशों में घूमने जाते हैं और गलत काम करते हैं तो देश का नाम तो बदनाम होता ही है लेकिन जब हम परिवार व बच्चों के साथ जाते हैं और चोरी जैसा काम करते हैं तो जीवन साथी और बच्चों पर बहुत ही बुरा प्रभाव छोड़ते हैं।
क्या हम अपने जीवन साथी अथवा बच्चों के मन पर एक चोर अथवा असभ्य इंसान की छाप छोड़ना चाहेंगे? यदि इसमें पूरे परिवार की सहमति होती है तो इससे घटिया बात और क्या होगी? जो पर्यटन पर लाखों रुपए खर्च कर सकते हैं उनके बच्चे भी अवश्य ही अच्छे स्कूलों में पढ़ते होंगे? यदि यही सब करना है तो उन्हें अच्छे स्कूलों में पढ़ाने की क्या जरूरत है? इसी संदर्भ में एक घटना याद आ रही है:
अरुण प्रकाश का बेटा और बहू उनकी दो साल की पोती के साथ गर्मियों में छुट्टियां मनाने हिल स्टेशन गए थे। घर लौटते ही नन्ही पोती अपने हाथ में कोई चीज लेकर अपने दद्दू को दिखलाने के लिए दौड़ती हुई उनके पास पहुंची। उसके हाथ में एक ख़ूबसूरत मिल्क पाॅट था। अरुण प्रकाश को समझते देर नहीं लगी। उन्होंने बेटे से पूछा, ‘‘ये तो होटल का लगता है?’’ ‘‘हां पापा होटल का ही है’’, बेटे के ये कहने पर अरुण प्रकाश के अंदर एक भूचाल सा आ गया।
जब भी कुछ ऐसा घटित होता उन्हें लगता कि उनके दिए गए संस्कारों में ही कमी रह गई है और वो अपने को दोषी मानने लगते और पीड़ा से छटपटाने लगते। बच्ची के हाथ में होटल का मिल्क पाॅट देखकर उनका रोम रोम सुलगने लगा। उनका मन कराहने लता। बेटे ने पापा के मनोभावों को ताड़ लिया। उसने पापा से कहा, ‘‘पापा दस हज़ार रुपए रोज का कमरा था।’’
‘‘दस हजार रुपए रोज का कमरा था फिर भी सौ-पचास रुपल्ली की चीज के लिए अपनी औकात दिखा दी?’’ पापा ने ग़ुस्से में स्पष्ट रूप से प्रतिवाद किया। बेटे ने बड़े ध्यान से पिता की ओर देखते हुए कहा, ‘‘पापा ऐसी बात बिल्कुल नहीं है जो आप समझ रहे हैं। दरअसल चैक आउट करते समय आपकी लाड़ली पोती को ये मिल्क पाॅट इतना अच्छा लगा कि इसने उसे उठा लिया और बिल्कुल नहीं छोड़ा।
हमने होटल के रिसेप्शन पर इसके पैसे देने की भी कोशिश की लेकिन उन्होंने पैसे नहीं लिए और कहा कि ये हमारी तरफ से बच्ची के लिए गिफ्ट समझ लीजिए। आपने सोचा हम होटल से उठा लाए। नहीं पापा ऐसा हर्गिज नहीं हो सकता।’’ अरुण प्रकाश ने चैन की सांस ली और मन ही मन कहा, ‘‘नहीं मैं दोषी नहीं हूं। हमने अपने बच्चों को सही संस्कार दिए हैं इसलिए हमारे बच्चे कोई ग़लत काम कर ही नहीं सकते।’’ उन्हें लग रहा था जैसे कैंसर जैसे किसी घातक रोग से मुक्ति मिल गई है। ये हमारे संस्कारों में कमी के कारण होता है जो हम बाहर जाकर ओछी हरकतें करते हैं।
प्रायः देखा जाता है कि कई पर्यटक जहां भी जाते हैं अपनी बेवकूफी की छाप छोड़े बिना नहीं आते। वे न केवल जहां भी जाते हैं गंदगी फैलाते हैं अपितु वहां के नियमों की भी अवहेलना करते हैं। संरक्षित स्थानों को विकृत करने अथवा उन्हें नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं रख छोड़ते। जहां जाते हैं खुरच-खुरचकर अपना नाम लिख देते हैं। पेड़-पौधों तक को नहीं छोड़ते। फल-फूल तोड़ना सामान्य बात है। जहां फोटो खींचना मना हो वहां जरूर फोटो खींचने का प्रयास करेंगे। लिखे हुए निर्देशों का पालन न करने के कारण न केवल पर्यटन स्थलों का स्वरूप विकृत होता है अपितु भयंकर दुर्घटनाएं भी हो जाती हैं।
निर्देशों का पालन न करने के कारण ही हर साल न जाने कितने पर्यटक नदियों व झीलों में डूब जाते हैं। धार्मिक स्थलों पर भी कई पर्यटक वहां के नियमों की उपेक्षा कर न केवल उन स्थलों की पवित्रता अथवा गरिमा को नष्ट करने का प्रयास करते हैं अपितु गलत करते हुए पकड़े जाने पर परेशानी में भी पड़ जाते हैं। ऐसे पर्यटकों को न केवल बार-बार लज्जित होना पड़ता है अपितु यात्रा का आनंद भी जाता रहता है।
पर्यटन हमारे संस्कारों को सुदृढ़ करने में सहायक होता है। यह हमें शिक्षित करता है व सभ्य बनाता है। हमें देश-विदेश की भौगोलिक अवस्था व संस्कृति की जितनी अच्छी जानकारी पर्यटन के माध्यम से होती है वह अन्यत्र दुर्लभ है। यदि हम पर्यटन के दौरान कुछ सीखकर नहीं आते अथवा गलत सीखकर आते हैं तो ऐसे पर्यटन का कोई लाभ नहीं। जहां तक पर्यटक की बात है एक पर्यटक अपने क्षे़त्र अथवा राष्ट्र का सांस्कृतिक प्रतिनिधि होता है।
यदि हमारे व्यक्तित्व अथवा चरित्र में कोई दोष है भी तो हमें पर्यटन के दौरान स्वयं को नियंत्रित, अनुशासित व सुसभ्य बनाए रखना चाहिए। हम चाहे किसी होटल अथवा रिजाॅट वगैरा में ठहरें या अपने किसी रिश्तेदार अथवा परिचित के घर रुकें हमें हर हाल में एक अच्छे मेहमान की छाप छोड़कर आना चाहिए। हमारे यहां अतिथि देवोभव कहकर मेहमान को भगवान के समान माना गया है लेकिन वह तभी भगवान कहलाने का अधिकारी बनता है जब वह ईश्वरीय गुणों से न सही कम से कम शिष्टाचार व सामान्य नैतिक गुणों से तो ओतप्रोत हो।

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