संपादकीय : अब बस करो... 1
साभार : APN Live

वैसे तो 2014 से आज तक किसी भी विपक्षी दल ने वर्तमान सरकार के किसी भी काम की तारीफ़ नहीं की है। हमेशा नुक़्स निकालना विपक्ष का मुख्य काम रहा है। आज एक मौक़ा मिला है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष मिल कर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई लड़ें और जनता को यह महसूस करवाएं कि हम सब एक हैं। मगर ऐसा ना करके हम कभी रेल्वे की टिकटों पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी बसों पर।

भारत की हर राजनीतिक पार्टी प्रवासी मज़दूरों के साथ घिनौनी राजनीति खेल रही है। किसी भी दल को इन मज़दूरों की समस्याओं से कुछ लेना देना नहीं है। हर पार्टी और विशेष तौर पर मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस पार्टी तो पूरी बेशरमी से कोरोना काल में निचले स्तर की राजनीति करने में जुटी है। 
राजनीतिक दल यह नहीं समझ पा रहे हैं कि देश बचेगा तो राजनीति करने के बहुत से अवसर मिलते रहेंगे। किन्तु अगर राजनीति के चलते देश कोरोना के सामने अपनी लड़ाई हार गया तो ये दलों की दलदल भी बचेगी नहीं। 
वैसे तो 2014 से आज तक किसी भी विपक्षी दल ने वर्तमान सरकार के किसी भी काम की तारीफ़ नहीं की है। हमेशा नुक़्स निकालना विपक्ष का मुख्य काम रहा है। आज एक मौक़ा मिला है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष मिल कर कोरोना के विरुद्ध लड़ाई लड़ें और जनता को यह महसूस करवाएं कि हम सब एक हैं।
मगर ऐसा ना करके हम कभी रेल्वे की टिकटों पर राजनीति कर रहे हैं तो कभी बसों पर। यह शोर मचाया जाता है कि हम विद्यार्थियों को राजस्थान से उत्तर प्रदेश वापिस भेजने का प्रबन्ध कर रहे हैं मगर उत्तर प्रदेश सरकार को 36 लाख से ऊपर का बिल भेज दिया जाता है। और डीज़ल के लिये अलग से 19 लाख रुपये की मांग की जाती है। 
क्यों हमारे राज्य आपस में किसी प्रकार की आपसी समझ पैदा नहीं कर पाते। हम क्यों नहीं समझ पाते कि हम सब पहले हिन्दुस्तानी हैं… भारतीय हैं उसके बाद हम किसी राजनीतिक दल के मेम्बर या सरकार के हिस्से हैं। 
इस राजनीतिक बयानबाज़ी और रस्साकशी के बीच एक ऐसा समाचार सामने आया जिस पर विश्वास करना कठिन ही नहीं, असंभव भी है। मुंबई के वसई रेल्वे स्टेशन से एक रेलगाड़ी उत्तर प्रदेश के लिये रवाना हुई थी। उस रेलगाड़ी को प्रवासी मज़दूरों को गोरखपुर लेकर जाना था। मगर 23 घन्टे की यात्रा के बाद जब रेलगाड़ी जाकर रुकी तो बदहाल मज़दूरों को पता चला कि वे लोग उत्तर प्रदेश के बजाए ओड़िसा के राउरकेला पहुंच गये हैं। 
मैं स्वयं लंदन में एक रेल्वे का ट्रेन ड्राइवर रह चुका हूं। मैं जानता हूं कि यह इसलिये संभव नहीं हो सकता क्योंकि हर ट्रेन ड्राइवर एक ख़ास किस्म का रूट साइन करता है। यह कोई सड़क का सफ़र नहीं है। हालांकि बस ड्राइवर भी रूट चेक करके ही किसी ख़ास रूट पर बस चला सकता है। ऐसा नहीं कि किसी भी रूट पर किसी भी बस ड्राइवर को चढ़ा दिया जाए।
हर रूट पर कुछ सिगनल होते हैं। ट्रेन ड्राइवर के लिये ज़रूरी है कि उसे रास्ते के तमाम सिग्नलों की जानकारी हो। यदि ड्राइवर मुंबई से गोरखपुर का रूट साइन करता है तो यह असंभव है कि वह मुंबई और राउरकेला के बीच का रूट भी साइन करता होगा। किसी भी देश की रेल्वे अपने ड्राइवर को अनुमति नहीं दे सकती कि वह किसी ऐसे रूट पर रेलगाड़ी चलाए जिस पर उसकी रूट ट्रेनिंग नहीं हो रखी। यह बहुत बड़ा सेफ़्टी ब्रीच है। 
हाँ यदि रास्ते में से गाड़ी का रूट बदला गया हो और किसी ऐसे ड्राइवर को गाड़ी की कमान सौंप दी गयी हो जो कि उस रूट पर प्रशिक्षित हो, तो अलग बात है। मगर यदि ऐसा किया गया था तो यात्रियों को सूचित करना आवश्यक था। क्योंकि इस मामले में तो यात्री आश्चर्यचकित थे कि वे राउरकेला कैसे पहुंच गये।
अपनी आदत के अनुसार रेल्वे ने अपने बहाने पेश किये ठीक वैसे ही जैसे कि राजनीतिक दल पेश करते हैं। चलती का नाम गाड़ी का गीत अचानक याद आ गया… जाना था जापान पहुंच गये चीन समझ गये ना….
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

4 टिप्पणी

  1. गोरखपुर के बजाय राउरकेला पहुँचने के अविश्वसनीय प्रसंग ने हर सम्वेदनशील हृदय को व्यथित किया था, पर राजनैतिक गाल बजाने के सिवाय कोई कुछ नहीं कर पाया। सम्पादकीय लेखनी ने दु:खती रग पर हाथ रख कर सहृदयों के हृदय को मानो संजीवनी प्रदान कर दी है। हार्दिक साधुवाद।

  2. बहुत कड़वा सच..राजनीति में खेली जा जबरदस्त राजनीतियाँ..असंवेदनशील राजनीतिज्ञ इंसान होना भूल रहे है।

  3. क्या यह संभव है, जैसा कि कहा आपने रुट साइन होता है, यह टौ वही बात हो गयी दो आदमी दिल्ली से गाड़ी में बैठे निकली सीट वाला ऊपरी वाला से पूछा तुम कहाँ जा रहे हो टौ ऊपर वाले ने कहा जलन्धर और तुम नीचे वाले बोला सूरत टौ ऊपर वाला बोला कि विज्ञान ने देखो कितनी रारक्की करली नीचे वाली सीट सूरत जा रही है ऊपर वाली जालंधर

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