एक ओर तो विश्व में बड़ी-बड़ी मल्टी-नेशनल कंपनियों के सी.ई.ओ. के पद पर भारतीय मूल के लोग काबिज़ हैं वहीं दूसरी ओर भारतवंशियों के विरुद्ध दक्षिणपंथी लोग मुहिम चलाए बैठे हैं। याद रहे कि पूरे विश्व में भारतीय मूल के लोग सबसे कम गिनती में अपराधों में शामिल होते हैं। वे हमेशा अपने अपनाए हुए देश के नियम कानूनों का पालन करते हैं। पूरा टैक्स भरते हैं और समाज के विकास में योगदान करते हैं। बहुत से देशों में जो काम स्थानीय गोरे लोग नहीं करना चाहते, भारतीय मूल के लोग पूरी मेहनत से वह काम भी करते हैं। कभी किसी हिंसक घटनाओं में भारतीय मूल के लोगों के नाम नहीं दिखाई देते… इन सबके बावजूद यदि ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड में ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं, तो चिंता होनी तो लाज़मी है।
महात्मा गाँधी ने 1942 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध नारा लगाया था –“अंग्रेज़ों भारत छोड़ो”। इस नारे के पाँच वर्ष बाद अंग्रेज़ों को भारत छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। लेकिन आजकल कुछ वैसा ही परिदृश्य ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड में देखने को मिल रहा है, जहाँ के दक्षिणपंथी समूह भारतवंशियों के खिलाफ नारेबाज़ी कर रहे हैं। इस मुद्दे को लेकर वहाँ जुलूस और प्रदर्शन भी हो रहे हैं।
डोनाल्ड ट्रंप ने निजी कारणों से भारत पर 50 प्रतिशत का टैरिफ़ लगा दिया था, मगर ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड की स्थिति भिन्न है। वहाँ भारतीय मूल के प्रवासियों के खिलाफ जनमानस को तैयार किया जा रहा है। दक्षिणपंथी ताक़तें ये प्रचार कर रही हैं कि भारतीय प्रवासी उच्च पदों पर क़ब्ज़ा जमा रहे हैं और स्थानीय गोरे नागरिक नौकरियों के लिए भटक रहे हैं। इस आधार पर वे भारतीयों को वापस हिंदुस्तान भेजने की पुरज़ोर वकालत कर रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया के कई शहरों में रविवार, 31 अगस्त को ‘मार्च फॉर ऑस्ट्रेलिया’ नाम से बड़ी रैली निकाली गई, जिसमें हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया। यह रैली प्रवासियों के खिलाफ थी, लेकिन इसमें भारतीयों को विशेष रूप से निशाना बनाया गया।
रैली के पोस्टरों में दावा किया गया कि पिछले पाँच वर्षों में भारत से ऑस्ट्रेलिया आने वालों की संख्या, पिछले सौ वर्षों में ग्रीस और इटली से आने वालों की संख्या से अधिक है। सरकार ने इन रैलियों की कड़ी आलोचना करते हुए इन्हें समाज को बाँटने वाला कदम बताया। लेबर पार्टी सरकार का कहना है कि ये प्रदर्शन वास्तव में नफ़रत फैलाने के उद्देश्य से किए जा रहे हैं और इनका संबंध नियो-नाज़ी संगठनों से है।
ऑस्ट्रेलिया में एक प्रवासन-विरोधी रैली के दौरान भारतीय मूल के एक व्यक्ति के साथ बदसलूकी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है। यह घटना उस समय हुई जब वह व्यक्ति भाषण दे रहा था और बीच में ही हाथापाई के कारण उसे चुप होने पर मजबूर होना पड़ा। फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि वीडियो किस शहर का है।
इंस्टाग्राम पर वायरल इस वीडियो की शुरुआत एक ऑस्ट्रेलियाई युवक द्वारा प्रदर्शनकारियों की भीड़ में नए वक्ता का परिचय देने से होती है। वह कहता है-“हमारा अगला मेहमान एक विदेशी है। वह विदेशियों जैसा ही दिखता है और उसने कहा है कि वह बोलना चाहता है।” मेज़बान अपनी बात पूरी भी नहीं कर पाता कि दर्शकों में हूटिंग शुरू हो जाती है। इसके बावजूद वह आगे कहता है – “यह दिखने में बिल्कुल मेरी तरह है और अब यह यहाँ का नागरिक भी बन चुका है।” उसके बाद वह भारतीय मूल का व्यक्ति मंच पर आता है और भीड़ के विरोध के बावजूद अपनी बात कहनी शुरू करता है। “यह सच है कि मैं एक भूरा आदमी हूँ। हाँ, मैं भारत से आया एक अप्रवासी हूँ। मैं यहाँ सही कारणों से आया हूँ।” प्रदर्शनकारियों की हूटिंग चलती रहती है, और वह अपनी बात कहता रहता है।
भारतीय मूल का व्यक्ति अपनी बात जारी रखते हुए पूरे तर्क के साथ कहता है कि प्रवासन का असली उद्देश्य समाज में योगदान देना होना चाहिए, न कि रियायतों की माँग करना। वह कहता है – “प्रवासी का कर्तव्य समाज में योगदान देना है, रियायतें माँगना नहीं। ‘आव्रजन’ का अर्थ लेना नहीं, बल्कि देना है। माँग करना नहीं, बल्कि सम्मान करना है।”
भीड़ को संबोधित करते हुए वह आगे कहता है – “लेकिन आज जो मैं देख रहा हूँ, वह प्रवासन नहीं है, बल्कि खुले दरवाज़ों की नीति है। कोई भी आकर यहाँ बस सकता है, ज़मीन और अवसरों पर दावा कर सकता है और ऑस्ट्रेलिया से बदलाव की माँग कर सकता है। वे हमारी संस्कृति में घुल–मिल नहीं रहे हैं, हमारी स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर रहे हैं; बल्कि वे इसे विकृत और कमजोर कर रहे हैं।”
जैसे-जैसे उसकी बात आगे बढ़ती गई, हूटिंग की आवाज़ें और तेज़ होती गईं। अचानक, एक ऑस्ट्रेलियाई प्रदर्शनकारी ने उसे बीच में ही टोक दिया, माइक्रोफ़ोन छीन लिया और उसे परेशान करने लगा। इस व्यवधान के कारण मंच पर अफरा-तफरी मच गई और भारतीय मूल के व्यक्ति की बात बीच में ही रुक गई।
इस वीडियो पर ऑस्ट्रेलिया में भी सकारात्मक टिप्पणियाँ अवश्य आईं। एक व्यक्ति का कहना था, “हो सकता है कि वह एक सच्चा और दुर्लभ किस्म का भारतीय हो, जिसने वास्तव में हमारे तौर-तरीके अपना लिए हों, और हमारी संस्कृति और मान्यताओं का सम्मान करता हो।… अगर यह सच है तो मैं उसकी सराहना करता हूँ। वह बिल्कुल सही बातें कर रहा था। लेकिन दुर्भाग्य से उसके बहुत से देशवासी अब सामूहिक रूप से यहाँ आ गए हैं, और यहाँ के समाज से घुलने-मिलने से इनकार कर रहे हैं। इस कारण कुछ अच्छे लोगों की भी बदनामी हो रही है। मुझे ऐसा महसूस होता है कि उसे अपनी बात कहने का और फिर अपने काम को दिखाने का मौका मिलना चाहिए था।”
एक दूसरे व्यक्ति ने टिप्पणी करते हुए कहा, “यह आदमी समझदारी की बात कह रहा था। लेकिन अब बात बहुत बिगड़ चुकी है। हम चाहते हैं कि ये सब अब अपने देश वापस चले जाएं।”
लिबरल पार्टी की सीनेटर जसिंता नामपिजिंपा प्राइस ने दावा किया कि बड़ी संख्या में भारतीय ऑस्ट्रेलिया में इसलिए आ रहे हैं, ताकि वे लेबर पार्टी को वोट दे सकें। भारतीयों को लेबर पार्टी का ‘वोट बैंक’ कहा गया। ऑस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज़ ने इस बयान को सिरे से खारिज करते हुए इसे ‘झूठा’ और ‘नुकसान पहुँचाने वाला’ बताया है, जिसके बाद से यह मामला और गरमा गया है। यह टिप्पणी देशव्यापी अप्रवासन-विरोधी प्रदर्शनों के बाद आई, जिसमें आंशिक रूप से भारतीयों को देश में जीवन-यापन के खर्च के लिए जिम्मेदार ठहराया गया था।
प्राइस ने पिछले हफ्ते एक रेडियो इंटरव्यू में यह सुझाव दिया था कि अल्बनीज़ की सेंटर-लेफ्ट लेबर पार्टी के लिए वोट करने के लिए बड़ी संख्या में भारतीयों को ऑस्ट्रेलिया में आकर बसने की अनुमति दी गई है। प्राइस ने कहा, “भारतीय समुदाय को लेकर एक चिंता है – और वह इसलिए, क्योंकि उनकी संख्या बहुत ज्यादा हो गई है| हम देख सकते हैं यह बात कि जिस तरह से यह समुदाय लेबर पार्टी के लिए वोट करता है, उसमें भी झलकती है।”
भारत सरकार ने इन प्रदर्शनों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि वह ऑस्ट्रेलिया में हाल ही में हुए प्रवासी-विरोधी प्रदर्शनों पर करीबी नजर रखे हुए है। इन प्रदर्शनों में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोगों को निशाना बनाया गया है । विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने बताया कि भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावास लगातार ऑस्ट्रेलियाई सरकार और भारतीय समुदाय के संपर्क में हैं।
भारतीयों पर आयरलैंड में भी नसलवादी हमले बढ़ गए हैं, जिसके बाद वहाँ तनाव का माहौल उत्पन्न हो गया है। वहाँ रहने वाले भारतीय लगातार सुरक्षा की माँग कर रहे हैं। बता दें कि पिछले एक दशक में आयरलैंड में भारतीयों की संख्या तेजी से बढ़ी है, जो 2015 के 20,000 से बढ़कर अब 70,000 से अधिक हो गई है।
भारतीय समुदाय के लोगों ने आयरलैंड की स्वास्थ्य, सेवा और तकनीक से लेकर वित्त और फार्मा तक के क्षेत्रों में शानदार भूमिकाएं निभाई हैं, यहाँ तक कि भारतीय मूल के एक व्यक्ति लियो वाराडकर तो आयरलैंड के प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं।
दोनों देशों का इतिहास भी लगभग समान है। भारत की तरह आयरलैंड ने भी कठिन स्वतंत्रता संग्राम के बाद अंग्रेज़ों से आज़ादी प्राप्त की थी। लेकिन हाल के दिनों में यहाँ कुछ नसलवादी समूहों ने भारतीय प्रवासियों का विरोध तेज़ कर दिया है। जुलाई के बाद से भारतीय मूल के लोगों पर हमले की घटनाएँ भी बढ़ने लगी हैं। इन हिंसक घटनाओं के लिए मुख्य रूप से किशोर युवाओं को ज़िम्मेदार ठहराया जा रहा है। एक मामले में तो उन्होंने छह वर्षीय भारतीय मूल की बच्ची पर बर्बरतापूर्वक हमला कर दिया।
आयरलैंड के राष्ट्रपति माइकल डी. हिगिंस ने भारतीय समुदाय के लोगों पर हाल के हमलों की कड़ी निंदा की है। उन्होंने इन हमलों को घृणित और आयरलैंड के मूल्यों के खिलाफ बताया। राष्ट्रपति ने कहा- ये स्वीकार नहीं किया जाएगा।
दरअसल, आयरलैंड में भारतीय नागरिकों पर करीब एक माह में डबलिन, क्लोंडालकिन, बॉलिमुन और वाटरफोर्ड में भारतवंशी प्रवासियों पर 6 हमले हुए हैं।
इनमें पीड़ितों को गंभीर चोटें आईं। मासूम बच्चों से मारपीट हुई और नसलीय अपशब्द कहे गए। हालात यह है कि कई भारतीय और एशियाई लोगों का कहना है कि वे आयरलैंड छोड़कर अन्य यूरोपीय देश में बसने की योजना बना रहे हैं।
भारतीयों पर हमलों के पीछे दक्षिणपंथी सरकार और वाम विपक्ष का बड़ा हाथ है। वे बढ़ती मँहगाई, बेरोजगारी और मकान संकट के लिए भारतीयों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं, इससे हमले बढ़े हैं।
एक ओर तो विश्व में बड़ी-बड़ी मल्टी-नेशनल कंपनियों के सी.ई.ओ. के पद पर भारतीय मूल के लोग काबिज़ हैं वहीं दूसरी ओर भारतवंशियों के विरुद्ध दक्षिणपंथी लोग मुहिम चलाए बैठे हैं। याद रहे कि पूरे विश्व में भारतीय मूल के लोग सबसे कम गिनती में अपराधों में शामिल होते हैं। वे हमेशा अपने अपनाए हुए देश के नियम कानूनों का पालन करते हैं। पूरा टैक्स भरते हैं और समाज के विकास में योगदान करते हैं। बहुत से देशों में जो काम स्थानीय गोरे लोग नहीं करना चाहते, भारतीय मूल के लोग पूरी मेहनत से वह काम भी करते हैं। कभी किसी हिंसक घटनाओं में भारतीय मूल के लोगों के नाम नहीं दिखाई देते… इन सबके बावजूद यदि ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड में ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं, तो चिंता होनी तो लाज़मी है।
महत्वपूर्ण आलेख, आपने बेहद चिंतनीय विषय पर लिखा है सर,यह नेगेटिव सेगमेंट सारे विश्व में फैलाया जा रहा है जो कि निंदनीय है व भारतीयों की सुरक्षा की दृष्टि से गंभीर भी.. इस विषय पर भारत की सरकार को भी कुछ ठोस कदम उठाना चाहिए..
संपादकीय पढ़कर निश्चय ही वैश्विक स्थिति को सही रूप में समझना आसान हो जाता है। साधुवाद तेजेन्द्र जी! आपकी दृष्टि की व्यापकता बनी रहे। शुभकामनाएं!
हर बार संपादकीय में नया विषय होता है, मेहनत साफ़ दिखती है। शुभकामनाएं टीम पुरवाई
हार्दिक धन्यवाद लकी।
आरती , आपकी सार्थक टिप्पणी हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
महत्वपूर्ण लेख
हार्दिक बधाई
ओह ये वाकई बेहद चिंता की बात है
सही कहा आपने।
इस बार का संपादकीय एक ऐसा मुद्दा सामने रखता है जो भारतीयों और केवल भारतीयों से संबंधित है। भारतीय चाहे अपने देश में हो या दूसरे देश में बस पर इतना हो जाता है कि दूसरे देश में वे प्रवासी भारतीय कहलाते हैं और अपने देश में तो वे भारतीय हैं ही।
भारतीय लोग किसी भी स्थिति,परिस्थिति, देश काल को अपने आपको और वहां के नियमों के अनुरूप ढाल लेने के लिए लगता है प्रकृति ने नैसर्गिक रूप से तैयार किए हैं। उनकी बचत करने की आदत,कड़ी मेहनत करने की फितरत, और जिस भी देश में वे रहते हैं ,वहां अपने योगदान को मजबूती से रेखांकित करने की रवायत उनके व्यक्तित्व का हिस्सा होता है।
यही कारण है कि भारतीय जहां कहीं भी हों, वे इन सभी गुणों का परचम लहराते हैं।
बस यही इन गौरांग प्रभुओं से सहन नहीं होता और नस्लवादी हिंसा,आरोप और ज़ुल्म का सिलसिला शुरू हो जाता है।
Ireland जैसा देश भी इसमें लिप्त है यह तो बेहद शर्मनाक है।क्योंकि भारत और आयरलैंड ने एक जैसी आज़ादी की लड़ाई लड़ी है।
ऑस्ट्रेलिया में ईर्ष्यालुओं , शेखीखोरों,विकृत मानसिकता वाले लोगों के साथ सियासत का जिन्न भी अब अपने चरम पर आ गया है।
अब भारत सरकार जो कि काफी सुर्खियां बटोर रही है को अमेरिकी या किसी विकसित राष्ट्र की भांति अपने नागरिकों की सुरक्षा की नीति पर अमल करना होगा और विश्व को बताना होगा कि आत्मनिर्भर भारत क्या है?
यदि ऐसा नहीं होता है तो भारत ज्ञान की सर्वोच्च अर्थव्यवस्था के सपने को कभी पूरा नहीं कर पाएगा।
सादर
सूर्यकांत शर्मा
भाई सूर्य कांत जी आपने संपादकीय को गहराई से हर दृष्टिकोण से परखा है। हार्दिक धन्यवाद।
जवलन्त सामयिक विषय पर सटीक सारगर्भित ज्ञानवर्धक जानकारी।
धन्यवाद उषा जी।
प्रवासी भारतीयों की समस्याओं को उजागर करने वाली गंभीर, चिंतजनक तथा महत्त्वपूर्ण जानकारी है
धन्यवाद अपूर्वा।
जब से पुरवाई पत्रिका पढ़ने लगी हूँ, आपके सम्पादकीय नियमित रूप से पढ़ती हूँ। हर बार एक नए विषय के साथ, विश्व की महत्वपूर्ण घटनाओं का विस्तृत विश्लेषण
अभिभूत कर जाता है और अगले आलेख की प्रतीक्षा शुरू हो जाती है। ज्ञानवर्धक सम्पादकीय की प्रतिक्रिया मैं विस्तार से नहीं दे पाती, लेकिन सहज, सरल रूप में दी जानकारी इतनी प्रभावशाली होती है कि बहुत कुछ सोचने को विवश कर देती है। साधुवाद आपका ।
सुदर्शन जी यह पुरवाई के लिए गर्व का विषय है कि आप जैसी जागरूक पाठक संपादकीय निरंतर पढ़ती हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि आपकी अपेक्षाओं पर हर सप्ताह खरे उतर सकें।
आज के वैश्विक हालात की सच्चाई यही है कि जो युवा वर्ग अपने विवेक और परिश्रम से अपने सपनों को पूरा नहीं कर पा रहा वह अपने आस पास कारण ढूंढ कर अपनी सरकार को कटघरे में खड़ा करना चाहता है ,इस कार्य को आगे बढ़ाने के लिए उन देशों की विपक्ष पार्टी भी सहयोग करती है ।कुंठित युवाओं के लिए भारतीय मेहनतकश साफ्ट टार्गेट हो गया है ।
एक अशांति का वातावरण है पूरी दुनिया युद्ध के मुहाने पर खड़ी है, ऐसा लगता है ।
प्रभा जी आपने अपनी चिंता संपादकीय से जोड़ दी है। बहुत शुक्रिया आपका।
इस बार का संपादकीय-“भारतवंशियो… आस्ट्रेलिया छोड़ो, आयरलैंड छोड़ो!” में भारतीय मूल के लोगों पर हो रहे हमलों पर चिंता व्यक्त की गई है। यह चिंता वाजिब भी है। एक भारतीय होने के नाते मुझे भी लगता है कि जब ये लोग वहां के नियम कानूनों को फालो करते हैं, टैक्स भरते हैं और वहां के विकास कार्यों में पूरा योगदान करते हैं तो इस तरह की घटनाएं नहीं होनी चाहिए।
अपनी मिट्टी से हर कोई प्यार करता है। वे भले ही कुछ न कर पाते हों, और आलस में पड़े पड़े ही सब कुछ प्राप्त कर लेना चाहते हैं। पर दूसरे देश के लोगों को अपने देश में आगे बढ़ता देख जलना स्वाभाविक है।
भारतीय जब दूसरे देश जाते हैं तो एक उद्देश्य लेकर जाते है कि वहां जाकर खूब मेहनत करेंगे और पैसा कमाएंगे। वे अपने उद्देश्य में सफल भी होते हैं। कुछ ही दिनों में उनका रुतबा स्थानीय लोगों से अधिक हो जाता है। स्थानीय लोगों के लिए यही सब ईर्ष्या का कारण बन जाता है।
लोग परदेश जाते हैं तो अपनी सुरक्षा के लिए यूनिटी बनाकर रहने लगते हैं। उनकी यह यूनिटी अपना रंग दिखाती है। मतलब वे अपने अनुसार बहुत से काम पूरे कर लेते हैं।
समाचारों में पढ़ने को मिलता है कि यूरोप प्रवासियों से त्रस्त है। कुछ प्रवासी अपना एजेंडा लेकर वहां पूरी तरह से कब्जा करना चाहते हैं। स्थानीय बच्चियों के साथ ग़लत काम करते हैं। एक संपादकीय आपने इसी पर लिखा था। ऐसे लोगों के कारण अच्छे लोग भी सफर करते हैं।
राजनीति बड़ी बेंडी़ चीज है। उसके अनुसार नहीं हुआ तो वे कुछ भी कर सकते हैं। अगर भारतीयों को पूरी तरह से वहां स्थापित होना है तो एक पार्टी के होकर न रहें। आधे इधर तो आधे उधर। फिर न मंच पर बेइज्जती होगी और न ये बताने की जरूरत रह जाएगी कि हम उस देश के प्रति कितने लाॅयल है।
ये वैश्विक समस्या है। इस वैश्विक समस्या पर एक प्रश्न तो यह भी उठता है कि ये लोग जिस देश के मूल निवासी हैं वे देश क्या कर रहे हैं? इनके पास अपने नागरिकों के जीवन यापन के इंतजाम अभी तक क्यों नहीं हो पाए हैं? विकसित होने के लिए अभी इन्हें कितनी शताब्दियां चाहिए।
सभी देशों को आजाद हुए औसतन पैंसठ साल तो हो ही चुके हैं और कितना समय चाहिए स्टेबिल होने में? बस रोना सीख लिया कि हम तो गरीब देश हैं। और इन देशों के नेता, अभिनेता, व्यापारी अन्य आदि रुपयों के बिस्तर पर सो रहे हैं। ये सच्चाई किसी से छिपी नहीं है। यूरोप अमेरिका के चार चार हाथ-पैर नहीं है जो उन्होंने विकास कर लिया है। उसी की चकाचौंध में हम मूड़ औंधाकर वहीं घुसे चले जा रहे हैं।
सच तो यह भी है कि गरीब गुरवा भारतीय विदेश नहीं जाते हैं। वे रईस जाते हैं जो यहां की गरीबी और गरीबों को देखकर मुंह बनाते हैं। एक पीढ़ी जरा सी पुंजयानी कि अगली पीढ़ी का टिकट तुरंत विदेश के लिए कटा देते हैं। इस गंदे संदे देश में उन्हें अच्छा लगता कहां है। देशों को चाहिए कि वे शिक्षा, रोजगार और चिकित्सा में विकसित देशों से कहीं कम न रहें। लोगों का पलायन नहीं होगा। अगर होगा तो चाइना जैसा होगा। चाइना के लोग अपनी शर्तों पर जाते हैं और अपनी शर्तों पर रहते हैं।
आप संपादकीय के विषय लगातार अच्छे उठा रहे हैं। अगर संपादकीय साप्ताहिक हो तो सोचना तो पड़ता ही होगा कि अगला संपादकीय कैसा लिखा जाए ताकि पाठक उसमें रुचि ले।
आपका यह संपादकीय समसामयिक तो है ही, पाठकों के लिए भी जानकारी से भरपूर है। बढ़िया संपादकीय के लिए बधाई सर।
भाई लखन लाल पाल जी आपने तो संपादकीय का निचोड़ पाठकों के सम्मुख रख दिया है। हार्दिक आभार।
दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण।
सही सटीक सम्पादकीय। समस्या का शानदार विवेचन। अभिनंदन।
इन दिनों भारतीयों की ग्रह दशा बहुत ख़राब चल रही है। ट्रंप का टैरिफ टैरर कम हुआ नहीं कि आस्ट्रेलिया आयरलैंड में भारतीयों के विरोध की.लहर!
पिलकेंद्र भाई बहुत शुक्रिया।
आदरणीय संपादक महोदय,
पहले करोना और उसके बाद अब कई स्थानों पर लंबे समय से खुले युद्ध के मोर्चे विश्व की आर्थिक स्थिति को आमूल- चूल हिला रहे हैं ! अनेक देश आर्थिक संकटकाल की स्थिति के द्वार पर खड़े हैं। ऐसे में यदि अन्य देशों के आप्रवासी उच्च पदों पर दिखाई देते हैं तो अवश्य मूल नागरिकों को उनसे ईर्ष्या होगी ही। जहां तक आप्रवासियों की सहायता से बहुमत प्राप्त करके सरकार बनाने का सवाल है वह अवश्य स्थानीय नेताओं की राजनीति प्रेरित चाल मानी जा सकती है। जहां तक आप्रवासियों का दूसरे देश की सेवा करने का सवाल है, मैं उससे असहमत हूं क्योंकि अधिकतर आप्रवासी अपनी व्यक्तिगत सुविधाओं और आर्थिक लाभ के लिए दूसरे देश में जाते हैं जैसा कि अंग्रेजी की कहावत है ‘ग्रीनर पाश्चर्स ‘ढूंढते हैं! जहां तक नियम और कानून मानने की बात है तो उसके लिए भी कहा ही जाता है कि व्हेन यू आर इन रोम, डू एज़ रोमन्स डू ,।
अभी तक तो प्रवासियों से दोनों पक्षों को लाभ ही था मेजवान देश को सस्ता श्रम और प्रवासी व्यक्ति को सुखी जीवन मिल रहा था। अब जब मेजवान देश की धन की थैली में धन कम है तो उसमें हिस्सेदारी करने वाले प्रवासियों के प्रति क्षोभ बहुत स्वाभाविक है। अब इस क्षोभ प्रदर्शन के तरीके कैसे हों कैसे न हों इन विषयों पर चर्चा अवश्य की जानी चाहिए।
जो देश अब तक धन लेकर लोगों को नागरिकता प्रदान कर रहे थे उन्हें आवश्यक इस विषय में सोचना चाहिए कि प्रवासियों के साथ कैसा व्यवहार हो। पारिस्थितिया़ शोचनीय अवश्य हैं। ज्वलंत विषय को उठाने के लिए आप बधाई के पात्र है। समय इस समस्या का समाधान बतायेगा।
सरोजिनी जी, आपने संपादकीय में लिखी स्थितियों को अपने दृष्टिकोण से विश्लेषित किया है । हार्दिक आभार।
सचमुच यह सब चिंता का विषय है। आपने बहुत बढ़िया लिखा। इस तरह की कार्यवाहियां जो सारे संसार में हो रही है बड़े दुख की बात है! आपको बधाई।
भाग्यम जी, समर्थन के लिये बहुत बहुत धन्यवाद।
सादर नमस्कार सर…. इस संपादकीय ने केवल दुःखित नहीं किया चिंता भी जगाई। क्या हो गया है मानवता को? आपके पहले वाक्य में यह लिखा है कि भारतीयो ने कई मल्टिनेशनल कम्पनी में उच्च पदवी पर रहते हुए उन देशों की प्रगति में सम्पूर्ण योगदान दिया है… तथापि विदेश में आज भारतीयों के बिरुद्ध आंदोलन हो रहा है…. जो लोग अपना देश छोड़ कर वहाँ रह रहें हैं वे सारे नियमों का पालन कर भी रहे हैं।
पर सर.. क्या हमारे बच्चे जो विदेशों में काम करने पाने की इच्छा रखते हैं… वही काम यहाँ नहीं कर सकते? उनके ज्ञान विज्ञान से अपने देश की प्रगति में योगदान नहीं दे सकते? यहाँ रहते हुए उन्नति का माध्यम नहीं बन सकते? वहाँ पढ़ाई के लिए जाते बच्चे वहीं बस जाते हैं… क्या मिलता है अपना देश छोड़कर?
मुझे हमेशा आपके संपादकीय में मेरे बहुत सारे प्रश्न दिखते हैं…
साधुवाद…
अनिमा जी, आपने बहुत सही प्रश्न उठाया है।… स्थिति चिंताजनक अवश्य है।
ओह, यह तो चिंताजनक बात है। लगता है गोरी नस्ल आज भी अपनी नस्ली श्रेष्ठता की गलतफहमी से मुक्त नही हुई है। जबकि सच यही है कि प्रवासी उन कामों को भी पूरी कुशलता से संभाल रहे हैं जिनके लिये ये नकारे साबित हो चुके हैं।
यह संपादकीय सोचने पर विवश करता है कि क्या अपने वतन को छोड़कर दूसरे देशों की सेवा में जीवन अर्पित करना उचित भी है?
अरविंद भाई, इस सार्थक टिप्पणी के लिये बहुत बहुत शुक्रिया।
स्थिति सच में चिन्तनीय है । फौरी तौर पर देखें तो लगता है कि भारत और भारतीयों के ख़िलाफ़ वैश्विक स्तर पर षड़यंत्र चल रहे हैं । जड़ों को खोखला करने की कोशिशें हो रही हैं । भारतीय सामान्यतः परिश्रमी, अनुशासित और विवेकी होते हैं ; तमाम नैरेटिव उनके प्रति द्वेष / नफ़रत भड़काने के लिए चलाये जा रहे हैं । सरकार इस विषय में अपनी सजगता बनाये रखेगी और सही समय पत्र सही कदम भी उठायेगी,ऐसी आशा है।
सामयिक सम्पादकीय के लिए साधुवाद!
सार्थक और सारगर्भित टिप्पणी के लिये हार्दिक धन्यवाद रचना।
गंभीर विषय पर महत्वपूर्ण संपादकीय
धन्यवाद संगीता।
भारतवंशियों… ऑस्ट्रेलिया छोड़ो, आयरलैंड छोड़ो! संपादकीय में सिर्फ ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड की बात की है किन्तु अनेकों पश्चिमी देशों में भारत वंशियों के विरुद्ध मुहिम छेड़ रखी है। शायद इसका कारण भारतवंशियों के जिस देश में वे रहते हैं, उसे अपना मान लेने, नियम पू र्वक अपने कार्य को पूरी ईमानदारी तथा समर्पित भाव से करने के साथ उनकी सहिष्णुता भी है क्योंकि वसुधैवकुटुंबकम का भाव घुट्टी में पिलाया गया है। शायद यही कारण है कि भारत की सभ्यता और संस्कृति को कुचलने का कई शताब्दियों से प्रयास हो रहा है। अब यह बात दूसरी है कि किसी पार्टी के लिए वे वोट बैंक हैं तथा दूसरी के लिए नस्लीय घृणा के…काश! वे अपने देश के विकास में उनके योगदान को देखकर उन्हें (भारतीयों )अपना प्रतिद्वंदी नहीं वरन सहयोगी मान पाते।
यहाँ यही कहना चाहूँगी
जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग।
चंदन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग।।
विश्व व्यापी समस्या को पाठकों के सम्मुख लाने के लिए साधुवाद।
सुधा जी आपने तो बहुत ही ख़ूबसूरत ढंग से समस्या पर अपना दृष्टिकोण प्रस्तुत किया है। हार्दिक आभार।
संपादकीय में उठाए गए सवालों से चिंतित होना लाजिमी है।एक तरफ भारतीयों का ग्लोबल स्तर पर यदा कदा विरोध बाहर भागो कालों को भगाओ जैसे नारे लगातार उछलते रहते हैं। एक तरफ आबादी के मामले में चीन को भी परास्त कर भारत संकटों से अभावों से मानव की जरूरी संसाधनों की कमी से त्रस्त है।उसपर विदेशों से भारतीयों के खिलाफ निष्कासन मुहिम चिंतित करता है ।एक तरफ विदेशों से भारतीयों का बहिष्कार हो रहा है तो दूसरी तरह भारत की नागरिकता को ठुकरा कर विदेश में बसने की ललक लालसा इतनी प्रबल हो गई है कि केवल 12 साल में 25 लाख से ज्यादा भारतीय भारतीय नागरिकता को छोड़ दूसरे देश में जा बस चुके है। भारत छोड़कर जाने वालों में ज्यादातर लोग पाकिस्तान बांग्लादेश श्रीलंका कतर अफगानिस्तान म्यान मार बर्मा तक में आबाद हो गए। भारत छोड़े इन लाखों भारतीयों में कई लाख अरबपतियों का जमात भी है जो भारत सरकार की नीतियों आयकर नियमों तथा tax पर tax पर tax की tax कारणों से भी विदेश जाकर टैक्सी पॉलिसी से मुक्ति पाने की लालसा भी एक कारण है।
क्या विश्व बंधुत्व सरकार के आला सरदारों को यह सवाल चिंतित नहीं करता है कि विरोध बगावत ओर ग्लोबल बहिष्कार के बाद भी भारतीयों को देश छोड़ने का नशा क्यों सवार है। स्वदेशी सरकार के शासन में लाखों अरबपतियों के बाहर चले जाने का आंकड़ा क्या चिंतित नहीं करता या केवल सद्भाव के नाम पर हिंसा नफरत हिन्दू मुसलमान की ही चिल्लम चिल्ली करते कराते रहेंगे।
अनामी शरण बबल
दिल्ली
1100096
पुरवाई का यह अंक इसलिए भी विशिष्ट है कि श्री तेजेंद्र शर्मा ने सम्पादकीय में आस्ट्रेलिया और आयरलैंड में भारतीय अप्रवासियों के खिलाफ हो रहे प्रदर्शन के मूल कारक तत्वों को बख़ूबी उजागर किया है ।उन्होंने वैश्विक राजनैतिक -सामाजिक,आर्थिक परिदृश्य का संकेत करते हुए भारतीय संस्कारों को मानवीय मूल्यों का संरक्षक -संवाहक भी निरूपित किया है । जो सौ फ़ीसदी सही है ।विचारधाराओं के अन्तर्विरोधों से इंसानियत किस कदर छिन्न-भिन्न हो जाती है इसका तर्क सम्मत दृष्टिकोण रखा गया है ।उक्त देशों में भारतीय अप्रवासियों के योगदान का सही मूल्यांकन और उनके प्रति सकारात्मक सोच के लिए यह सम्पादकीय विशेष महत्त्व रखता है ।
समूचा अंक पठनीय है।
हार्दिक बधाई ।
—
मीनकेतन प्रधान
रायगढ़ (छत्तीसगढ़)भारत
भाई मीनकेतन जी आपने कहा है कि संपादकीय विशेष महत्व रखता है। हमारा प्रयास रहता है कि हर मुद्दे पर ऑब्जेक्टिव रूप से बात रखी जाए। आपका बहुत शुक्रिया।
जितेन्द्र भाई: आपका इस बार के सम्पादकीय ने बहुत सारे प्रश्न उठा दिए। पहली बात तो यह कि, ग्रीस और इटली के मुकाबले में,पिछले पाँच साल में जो इतने सारे भारत के लोग औस्ट्रेलिया आगए हैं उस के लिए सरकार ही ज़िम्मेवार है जिस ने उनको विज़ा दिया। वो कोई ग़ैरकानूनी तौर पर तो नहीं आये। फिर इसके लिए बबाल क्यों? अब जब यह लोग अपनी महनत से अच्छा काम करके एक पद पर पहुँच जाते हैं तो फिर इतना चीख़ना चिल्लाना क्यों? जब प्रदर्शन करने वाले स्वयं ही निकम्मे हों और वो सब काम नहीं करना चाहते जो भारत से आये लोग करते हैं तो फिर किस बात का गिला? इन सिर फिरे हल्ला मचाने वालों से कोई पूछे कि अगर देश से इतना ही प्रेम है तो वो सब काम जो भारत से आए लोग कर रहे हैं स्वयं क्यों नहीं करते। रही बात आयरलैंड की सो यह तर्क उन पर भी लागू होते हैं।
यहाँ एक बात मैं अवश्य कहना चाहूँगा कि अधिक्तर हमारे भारती नौकरि या बिज़नैस में होते हैं। समय के साथ साथ उन्हें पॉकिटिक्स में भी आना चाहिए। युगण्डा से जो भातियों का पलायन हुआ वो ज़्यादातर बिज़बैस में थे। अगर वो पॉकिटिक्स में भी होते तो शायद हालात कुछ और ही होते। इन सब के बावजूद भी जो भी इन दोनों देशों में हो रहा है वो एक चिन्ता का विषय है। आशा है भारत सरकार भी इन हालातों को ध्यान से देख रही होगी।
विजय भाई आपने सही सवाल उठाए हैं। भारतीयों को राजनीति में आने का मश्विरा बिल्कुल सही है।
हर बार की तरह महत्वपूर्ण संपादकीय। बहुत चिंताजनक स्थिति है। ऐसे हिंसक वातावरण में रहना और काम करना भारतीयों के लिए निःसंदेह कठिन होगा। एकजुटता की आवश्यकता है ताकि एकजुट होकर सरकार पर नस्लीय हिंसा बंद करवाने के लिए ज़ोर डाला जा सके।
शैलजा, आपका समर्थन हमें हर बार मिलता है। आपने एकजुटता की बात की है… सच में मह्त्वपूर्ण है।
अपने इस बार के संपादकीय में आप ने अपने पाठकों के संग अपनी चिंता सांझी की है जो आयरलैंड व ऑस्ट्रेलिया में भारतवंशियों को वहां अपमान व हिंसा का सामना करना पड़ रहा है, और कैसे वहां के कुछ ‘लोकल’ गुंडे एकत्रित हो कर उन्हें भारत लौट जाने के लिए उत्प्रेरित किया करते हैं। ऐसा वे ईर्षावश ही करते हैं, क्यों कि इन दोनों ही देशों में वहां गए भारतवंशी वहां के देशज जन से अधिक कुशल व गुणी कारीगर/कर्मचारी सिद्ध हो रहे हैं और यह स्थिति अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्हें सराहने की बजाए वे लोग उन्हें अपने देशों से खदेड़ देना चाहते हैं।
हमें इस विषय में जानकारी देने के लिए आभार, तेजेन्द्र जी।
शुभ कामनांए
दीपक शर्मा
दीपक जी, हमारा प्रयास रहता है कि अछूते विषय आपके संज्ञान में लाते रहें। आपका स्नेह हमारे लिये महत्वपूर्ण है।
आप अपने संपादकीय में हमेशा महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं। इस बार का संपादकीय ऑस्ट्रेलिया और आयरलैंड में स्थानीय लोगों का विरोध झेल रहे प्रवासी भारतीयों की पीड़ा से संबंधित है। आपके अनुसार भारतीय मेहनती होते हैं तथा हिंसक घटनाओं में उनका नाम नहीं दिखाई देता। अपने इन्हीं गुणों के कारण संभवतः वे ऊंचे- ऊंचे पदों पर भी आसीन हैं। इसके बाद भी यदि उन्हें अपने देश भारत वापस आने के लिए परेशान किया जा रहा है तो यह स्थिति सचमुच चिंताजनक है। एक सुकून की बात लगी कि ऑस्ट्रेलिया की सरकार ने प्रवासन विरोधी रैलियां की निंदा की है। आयरलैंड की स्थिति भी चिंता उत्पन्न करने वाली है। कई भारतीय और एशियाई लोग आयरलैंड छोड़कर अन्य यूरोपीय देशों में बसने की योजना बना रहे हैं किंतु इस बात की क्या गारंटी है कि वह जहां जाएंगे वह देश उन्हें अपना ही लेगा। कैसी विडंबना है कि भूमंडलीकरण को सुख समृद्धि का द्वार समझा गया और आज इसी का विरोध हो रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, आवास संकट लगता है आज विश्वव्यापी समस्या हो गई है किंतु इसके लिए किसी विशेष कौम को दोष नहीं दिया जा सकता।
यह तो अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात हो गई, अपने यहां एक राज्य दूसरे राज्य के लोगों को सहन नहीं कर पाता। कोई भी क्षेत्र हो स्थानीय और बाहरी का टकराव रहता ही है, वह चाहे बड़े स्तर पर हो अथवा छोटे। आपका संपादकीय पढ़- पढ़ कर हम विश्व नागरिक हो गए हैं विश्व की कोई भी घटना, यदि वह मनुष्यता के विरुद्ध है तो, विचलित करती है। आपका हार्दिक आभार।
विद्या जी, आपने बहुत अहम बात कही है – कैसी विडंबना है कि भूमंडलीकरण को सुख समृद्धि का द्वार समझा गया और आज इसी का विरोध हो रहा है। महंगाई, बेरोजगारी, आवास संकट लगता है आज विश्वव्यापी समस्या हो गई है किंतु इसके लिए किसी विशेष कौम को दोष नहीं दिया जा सकता। – सच में ऐसी घटनाएं विचलित तो करती ही हैं।
केवल भारतीयों के खिलाफ ऐसा माहौल होना चिंताजनक है। भारतीय प्रवासी स्वभाव से ही शांतिपूर्ण और सौहार्दपूर्ण ढंग से जीवन जीते हैं। उनके विरुद्ध ऐसा व्यवहार संभवतः कोई राजनीतिक षड्यंत्र ही हो सकता है।
पूजा जी, आपकी बात में सच्चाई हो सकती है।